अजय तिवारी का व्याख्यान 'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना'


धूमिल


भारत की आजादी के लिए हमारे पुरखों ने जो सपना देखा था उसमें एक ऐसा भारत था जिसमें सभी समान हों। सभी का जीवन खुशहाल हो। इस आज़ादी के साथ स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता की बहुत सी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। लेकिन आजादी मिलने के पश्चात इस जनता की उम्मीद पर तुषारापात हुआ। भ्रष्ट प्रशासन की वजह से जनता का जीवन यथावत बना रहा। ऐसी स्थिति में रचनाकारों ने इस स्थिति पर अपनी कलम चलाई और इस स्थिति की कड़ी आलोचना की। धूमिल ऐसे रचनाकारों में अग्रणी थे जिन्होंने इस स्थिति पर यादगार कविताएं लिखी। ये कविताएं जनता में काफी लोकप्रिय भी हुईं। अपने एक व्याख्यान में वरिष्ठ आलोचक अजय तिवारी कहते हैं 'धूमिल की प्रतिनिधि पहचान जिन कविताओं से बनी, उनमें एक है—‘आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है।’ सैंतालीस में आज़ादी जिन सपनों के साथ आई थी, वे सपने नहीं रह गए थे। उन सपनों की जगह रंग बुझ गए थे। थके हुए थे, सारे सपने टूट गए थे।  यह अनुभव जिस कविता में है, उसका शीर्षक है—‘बीस साल बाद’। इस थकान से पहले वह ऊब है, ‘जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रुरत होती है!’ स्पष्टतः इस मोहभंग की मानसिकता से धूमिल का बड़ा गहरा सम्बन्ध रहा। वे उस सब्र के खिलाफ थे जो जानवर बनाने के काम आती है।' 23 दिसम्बर 1998 में मुंबई के एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय में अजय तिवारी ने धूमिल पर एक महत्त्वपूर्ण व्याख्यान दिया था। यह व्याख्यान अभी तक अप्रकाशित रहा। हमारे आग्रह पर इस व्याख्यान को उन्होंने ट्रांस्क्राइव करा कर पहली बार के लिए भेजा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अजय तिवारी का व्याख्यान आलेख 'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना'।

 

 व्याख्यान आलेख 

'धूमिल की रचना-दृष्टि और संवेदना' 


अजय तिवारी


उन्नीस सौ बहत्तर-तिहत्तर-चौहत्तर में शिवकुमार मिश्र जी वल्लभविद्यानगर में प्रोफ़ेसर हो गए थे और मैं बीए का छात्र था, धूमिल तब अपनी कीर्ति के शिखर पर थे। हम लोग साहित्य में प्रवेश के लिए दरवाजे पर थे। मुक्तिबोध के अलावा धूमिल युवा पाठकों और लेखकों के हृदयहार थे। विशेष रूप में धूमिल को ले कर हम लोगों के बीच कई तरह की प्रतिक्रियाएँ थीं। उनकी धूम मची हुई थी इसलिए अधिकतर लोगों का दिमाग उनके प्रभाव से ग्रस्त था। लेकिन इस धूम के कारण कुछ वितृष्णा भी उत्पन्न हो गयी थी। इस तरह, आतंक और वितृष्णा की परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ साथ-साथ। समानान्तर मौजूद थीं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि धूमिल की रचनाएँ पढ़ने को बराबर मिलती रहीं।

धूमिल की मानसिकता के लिए, उनके काव्य-संसार के लिए साठोत्तरी दौर का सन्दर्भ ठीक जोड़ा गया। इस दौर का सम्बन्ध स्वातंत्र्योत्तर मोहभंग से माना गया है। धूमिल की प्रतिनिधि पहचान जिन कविताओं से बनी, उनमें एक है—‘आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है।’ सैंतालीस में आज़ादी जिन सपनों के साथ आई थी, वे सपने नहीं रह गए थे। उन सपनों की जगह रंग बुझ गए थे। थके हुए थे, सारे सपने टूट गए थे।  यह अनुभव जिस कविता में है, उसका शीर्षक है—‘बीस साल बाद’। इस थकान से पहले वह ऊब है, ‘जानवर बनने के लिए कितने सब्र की ज़रुरत होती है!’ स्पष्टतः इस मोहभंग की मानसिकता से धूमिल का बड़ा गहरा सम्बन्ध रहा। वे उस सब्र के खिलाफ थे जो जानवर बनाने के काम आती है।

मेरे दिमाग में एक अजीब बात कभी-कभी आती है। उनका नाम था –‘धूमिल’! उन्होंने अपना कविनाम यही रखा था। इनका वास्तविक नाम था सुदामा पाण्डेय। इन्होंने खुद अपना नाम रखा था धूमिल। धूमिल—एक मायने में यह बड़ा व्यंजक, बड़ा सार्थक है। सन साठ के बाद के इस असंतोष के दौर में समाज की, इतिहास की, राजनीति की प्रवृत्तियाँ ऐसी ही अस्पष्ट, ऐसी ही धूमिल थीं। आप याद करें उस दौर को, आठ राज्यों में जन-असंतोष के कारण कांग्रेस की सरकार हट गयी थी लेकिन जो सरकारें बनी थीं, वे कैसी सरकारें थीं? उनमें उन दिनों राजा-रजवाड़ों की एक स्वतंत्र हुआ करती थी, वह शामिल थी; उसमें अभी जो केंद्र में शासन कर रहे हैं, इनका पुराना रूप था जनसंघ, वह शामिल था; उसमें कम्युनिस्ट आन्दोलन की एक धरा, जिसका नाम भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी है, वह शामिल थी; सौभाग्य से सारे कम्युनिस्ट नहीं शामिल थे; आप विचार करें, ऐसी स्थिति थी। असंतोष था जनता का और शासन करने के लिए राजाओं की पार्टी आई थी, जनसंघ साम्प्रदायिकता की, दक्षिणपंथ की पार्टी थी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी वामपंथ की और लोकतंत्र की पार्टी थी। ये सब मिल कर शासन करने लगे थे। राजनीति की प्रवृत्तियाँ एकदम अस्पष्ट थीं। न दाएँ चल रही थीं, न बाएँ चल रही थीं।

इस सारे असंतोष के पीछे छात्र असंतोष मुख्य कारण था। देश भर में छात्रों का ज़बरदस्त आन्दोलन हुआ था। छात्र असंतोष की भी कोई दिशा नहीं थी। यह असंतोष गलत था, मैं ऐसा बिलकुल नहीं कह रहा हूँ। लेकिन इस असंतोष का न कोई संगठित नेतृत्व था, न इसकी कोई परिभाषित या साफ़ दिशा थी। उसे पता नहीं था कि किस तरफ जाना है। गुस्सा है, गुस्सा व्यक्त हो रहा है, अगर ‘भाषा की रात’ की ही पंक्तियाँ ले कर कहा जाय तो—

         गुस्सा है किसी चीज़ पर, भूख पर 

         लेकिन रेल के डिब्बे टूट रहे हैं. 

इस तरह का असंतोष था। जिस युग की परिस्थितियाँ समाज की, राजनीति की, इतनी अस्पष्ट थीं, उस दौर की मानसिकता व्यक्त करने वाले कवि थे धूमिल और इसीलिए उन्होंने अपना नाम भी शायद धूमिल रखा था। धूमिल—उस दौर की सबसे सटीक परिभाषा है। और इसलिए धूमिल महत्वपूर्ण हैं, उन्हें पढ़ना ज़रूरी है क्योंकि हमारे स्वातंत्र्योत्तर इतिहास के एक निश्चित दौर को सबसे सटीक तरीके से व्यक्त करने वाले कवि धूमिल हैं।

लेकिन क्या धूमिल हो जाना, उस दौर से अपनी पहचान इतने अटूट रूप में बाँध लेना, पर्याप्त है? मेरे सामने यह समस्या भी उठती है। महान कला इसलिए महान नहीं होती कि किसी एक विषय पर लिखी जाय। बहुत सारी कविताएँ एक विषय पर लिखी जायँ, इससे महान नहीं होतीं।रीति काल में श्रृंगार रस के अलावा रीतिवादी काव्य में किसी किसी रस में लिखने की कोशिश नहीं की गयी। अकेले एक विषय पर, एक कवि ने नहीं, एक धारा के दर्ज़नों कवियों ने कविताएँ लिखीं और इसके बावजूद रीतिकाव्य को महान कहने का साहस कोई नहीं करेगा। रीतिकाव्य के जो प्रेमी हैं, वे भी तरह-तरह की बातें बना कर रीतिकाव्य को उचित ठहराने की कोशिश करते हैं इसलिए एक विषय पर कविता लिखने से कोई कवि महान नहीं होता। कोई कविता महत्वपूर्ण नहीं होती।



धूमिल जिन दिनों मरे, उन दिनों उनकी कविताएँ कैसी थीं? ‘कंक’ नाम की रतलाम से एक पत्रिका छपती थी। उसमें धूमिल की एक लम्बी कविता छपी। उसमें उन्होंने कहा, 

‘मेरी चीख एक मुकम्मल चेहरा नहीं बन सका है।’ 

याद रखिये, व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए धूमिल भाषा और कविता में गए थे। कविता एक समूचा आदमी माँगती है, यह धूमिल का कहना था। यह धूमिल की अभिलाषा थी। यह उनके काव्य का संघर्ष था। भाषा और कविता माँग रही थी ‘समूचा आदमी’ और धूमिल एक दौर से अपने को इस तरह बाँध चुके थे कि उनकी चीख ‘मुकम्मल चेहरा’ नहीं बन सकी। अगर आदमी का ठीक चेहरा नहीं बन सकी तो समूचा आदमी क्या बनेगी? परिणाम क्या हुआ? धूमिल ने क्षोभ के साथ महसूस किया कि ‘मेरी कविता रंगरूट कवियों के हाथ की गुलेल बन गयी है।’ बहुत-से रंगरूट कवि आये जिन्होंने अपने को धूमिल की परंपरा से जोड़ा और कविता इन रंगरूट कवियों के हाथ की गुलेल बन गयी है और गुलेल केवल चिड़ियों को मारने का काम करती है, रचने का काम तो नहीं करती! धूमिल की कोशिश रचने की थी और वे एक आदमी रचना चाहते थे। रच नहीं पाए, यह अलग बात है। इच्छा तो रचनात्मक थी और परिणाम यह हुआ, धूमिल के ही शब्दों में कहा जाय, कि ‘साल के अंत में मेरी कविताओं के बिना भी हिंदी कविताओं के सर्वश्रेष्ठ कवितांक धड़ल्ले से छप रहे हैं।’ 

बड़े संवेदनशील आदमी थे धूमिल। एक बात नहीं गयी—बड़े अहंकारी आदमी भी थे धूमिल। अहं की मात्र निराला से ज्यादा रही होगी धूमिल में, कम नहीं रही होगी और उनके जीते जी, उनके सामने, उनकी कविताओं के बिना सर्वश्रेष्ठ कवितांक छपने लगे? मामूली तकलीफ नहीं होगी। इस कविता के लिखे जाने के दो-तीन ही महीने बाद धूमिल का देहांत हो गया। फिर यहाँ एक समस्या पैदा होती है। धूमिल लड़ रहे थे व्यवस्था से। व्यवस्था से लड़ने के लिए धूमिल अपना मोर्चा, कविता का मोर्चा, भाषा का मोर्चा बनाये हुए थे। मैं एक बात जोड़ना चाहता हूँ। रतन पाण्डेय की बात गलत नहीं होगी लेकिन मुझे लगता है कि अगर धूमिल के कवि-व्यक्तित्व की पहचान करनी हो तो “जूता” धूमिल की पहचान नहीं है। धूमिल की पहचान भाषा है। मैंने रतन पाण्डेय की तरह आँकड़ा तो नहीं एकत्र नहीं किया लेकिन अगर भाषा की चर्चा देखें धूमिल की कविताओं में तो तीनों संग्रहों को मिला कर तो कम-से-कम पाँच सौ बार भाषा का प्रयोग उन्होंने किया होगा। भाषा धूमिल की चिंता थी क्योंकि भाषा कवि का औजार थी।

अगर सत्ता अन्याय का औजार थी तो भाषा कवि का औजार थी। सत्ता के विरोध में भाषा। धूमिल का संघर्ष जहाँ तक रचनात्मक है, उसकी कसौटी यह चीज़ है। भाषा पर धूमिल सबसे ज्यादा लिखते हैं। हिंदी के नए कवियों में शायद त्रिलोचन के बाद भाषा सबसे ज्यादा धूमिल की चिंता है। और किसी कवि की इतनी बड़ी चिंता नहीं है। रघुवीर सहाय की चिंता है भाषा लेकिन रघुवीर सहाय से ज्यादा धूमिल की चिंता है भाषा। यह बात ध्यान खींचती है। भाषा अन्याय से लड़ने का माध्यम—कवि का माध्यम—है। इसलिए धूमिल राजनीति से, शासन से संघर्ष करते हुए अपनी पहचान कवि के रूप में बनाने की कोशिश करते हैं। धूमिल राजनीति के विरोध में राजनीति में संघर्ष नहीं करते। यह बात ध्यान खींचती है। प्रगतिशील कविता की परंपरा से धूमिल का सम्बन्ध जोड़ा जाता है लेकिन प्रगतिशील कविता की परंपरा से धूमिल का यह अंतर है।

यहाँ मैं एक उल्लेख करना चाहता हूँ। नागार्जुन आज़ादी की लड़ाई के दौरान किसान आन्दोलन के लिए जेल गए। आज़ादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम करते हुए, तेलंगाना आन्दोलन का समर्थन करते हुए, किसानों के साथ जेल गए। आगे चल कर आपात काल में वह डेढ़ साल तक जेल में रहे। आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद जेल जाने वाले कवियों में नागार्जुन का प्रमुख नाम है। आपको मालूम है, शमशेर पूरे प्रगतिशील और नयी कविता आन्दोलन में सबसे अधिक सौंदर्य के और कलावादी कवि माने जाते हैं। शमशेर 1942-43-44-45 के दौर में बम्बई के कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में काम करते थे। ‘जनयुग’ में शमशेर की कविता छपी थी तो वे सबसे ज्यादा खुश हुए थे। इतने खुश वे कभी नहीं हुए थे। सक्रिय रूप से राजनीति के साथ जुड़े हुए थे शमशेर। यही नहीं, 1977 और 1980 के चुनावों में शमशेर दिल्ली में थे और मॉडल टाउन में रहते थे। मैं कम्युनिस्ट पार्टी के लिए काम कर रहा था उस समय। मुझे मॉडल टाउन क्षेत्र में काम करने के लिए पार्टी ने ज़िम्मा दिया था। रात की, आठ-नौ बजे के बाद वाली, चुनाव सभाओं की, ज़िम्मेदारी वहां उस इलाके में मुझे सौंपी गयी थी और आजादपुर की मज़दूर बस्तियों में मैंने छह सभाएँ की थीं। उन सभी सभाओं में शमशेर भाषण करने आते थे। यह उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ कि प्रगतिशील कवियों में सबसे मुखर राजनीतिक कविता लिखने वाले नागार्जुन और सबसे सौन्दर्यपरक कविता लिखने वाले शमशेर राजनीति के साथ सक्रिय रूप में जुड़े हुए कवि थे।

धूमिल राजनीति के साथ जुड़े हुए कवि नहीं थे। हालाँकि राजनीति पर बहुत मुखर टिप्पणियाँ धूमिल ने की थीं। यह फर्क ध्यान देने की चीज़ है। ध्यान देने की चीज़ इसलिए है कि ऐसे ही नहीं है कि धूमिल प्रगतिवाद की परंपरा के कवि नहीं हैं। यह बात मैं बल दे कर कहना चाहता हूँ। प्रगतिवाद की परंपरा उस भाषा और उस मुहावरे की कविता परंपरा नहीं है जो भाषा और मुहावरा धूमिल का है। आप धूमिल के मुहावरे देखिये. एक मुहावरे का बड़ी हिम्मत कर के यहाँ उल्लेख किया गया। उस तरह के मुहावरे धूमिल के यहाँ भरे हुए हैं. ‘भाषा में भदेस हूँ।’ ठीक है, ‘उत्तर प्रदेश हूँ’—लेकिन भाषा में भदेस हूँ। धूमिल को एहसास है कि भदेस हूँ भाषा में। यह ईमानदारी है धूमिल की। इसके लिए धूमिल की आलोचना नहीं की जानी चाहिए। लेकिन भदेस हूँ, यह साफ है. आप देख लीजिए, क्या नागार्जुन की, केदार नाथ अग्रवाल की, त्रिलोचन की, मुक्तिबोध की, शमशेर की, शिवमंगल सिंह सुमन की, नरेंद्र शर्मा की, किसी की कविता भदेस कविता है? नहीं! प्रगतिवाद की एक दूसरी परंपरा है जिसका विकास बहुत हुआ है पिछले वर्षों में। उस दूसरी परम्परा में ‘तिरंगे कफ़न’, ‘गांधीवाद की शवपरीक्षा चल रही थी।



इस परंपरा की एक विशेषता और थी। मैं यहाँ इस बात को समझाने के लिए एक बात कह देना चाहता हूँ आप देखिए, बाएँ चलना चाहिए सड़क पर, यह नियम है। एक जगह धूमिल ने लिखा है कि नगरपालिका ने बाएँ चलना सिखाया है मुझे। आप एक सर्किल की कल्पना कीजिए। उस सर्किल पर एक बिंदु है बाएँ, एक बिंदु है दाएँ। आप बहुत ज्यादा बाएँ जायँ तो अंत में दाएँ से मिल जायेंगे। नियम है। जो बहुत ज्यादा बाएँ चले जाते हैं राजनीति में, चिंतन में, जो बहुत उग्र वामपंथी हो जाते हैं वे अंत में दक्षिणपंथ से मिल जाते हैं। जो लोग बहुत वामपंथी थे, गांधीवाद की शवपरीक्षा कर रहे थे, कोट में बटनहोल देख कर जिनको वितृष्णा हो जाती थी, वही लोग खुद उसी बटनहोल की भाषा का इस्तेमाल कर के कहते थे, ‘मेरा सूरज खो गया!’ (धूमिल) नेहरू जी को खलनायक बनाना और फिर नेहरू जी को देवता बनाना, महानायक बनाना, यह अतिवाद है। आप इस तरह का अतिवाद प्रगतिवाद के कवियों में नहीं पायेंगे। यह अतिवाद धूमिल की कविता में है।

धूमिल एक तरफ नक़्शे के भीतर लाल कलम से जगह घेर कर “अपने घायल कबूतरों को फिर से उड़ना” सिखा रहे थे। एक तरफ वे लाल क्रांति का सपना देखने वाले कवि हैं, मार्क्सवादी विचार के कवि हैं, जो द्वंद्वात्मक विवेक स्वीकार करती है, दूसरी तरफ साठोत्तरी विक्षोभ की उस मानसिकता के कवि हैं, जो अतिवादों में ही जीती थी, जो संतुलित दृष्टिकोण नहीं अपना पायी थी। यह धूमिल की पीड़ा थी। यह धूमिल का संकट था। यह धूमिल की समस्या थी।

एक छोटी सी बात और कहना ज़रूरी है। इसका परिणाम क्या हुआ? यहाँ धूमिल की एक पंक्ति उद्धृत की गयी—

          मुझे डबडबाई आँखों से मत घूरो

          मैं तुम्हारे ही कुनबे का आदमी हूँ।

बड़ी मार्मिक पंक्ति है! आप सभी लोग समझदार हैं और इस बात के मर्म को समझते हैं। हिंदी के सबसे बड़े कवि संत तुलसीदास ने एक अर्धाली में कहा था—

           हित-अनहित पसु पच्छिव जाना

           मानुस तन गुण ग्यान निधाना..।

हित-अनहित पशु-पक्षी भी जानते हैं। आप कुत्ते को चार बार लात मारिये, पाँचवीं बार आपको देख कर भूँकेगा। आप कुत्ते को बार-बार रोटी दीजिये, पाँचवीं बार आपको देख कर दुम हिलाएगा। हित-अनहित पसु-पच्छिव जाना और मैं तुम्हारे ही कुनबे का आदमी हूँ—यह जो ‘तुम’ नाम के प्राणी हैं। लोग हैं, वे धूमिल को अपने कुनबे का आदमी मान कर पहचान नहीं रहे हैं बल्कि धूमिल को बताना पड़ रहा है कि मुझे ऐसे घूरो मत, मैं तुम्हारे ही कुनबे का आदमी हूँ। घूरने वाले इन लोगों की आँखें डबडबाई हैं; वे पीड़ित लोग हैं; धूमिल अपने को इन्हीं के कुनबे का मानते हैं पर वे उन्हें पहचानते नहीं और ‘घूर’ रहे हैं। धूमिल का अपनी जनता से इस तरह का सम्बन्ध था। यह पीड़ा भी है धूमिल की। शायद इसी पीड़ा की वजह से धूमिल अपनी कविता की शैली बदलना चाहते थे जिसे वे बदल नहीं सके और यही उनकी तकलीफ थी। साठोत्तरी विक्षोभ की जो दिशाहीन बेचैनी थी, लेकिन जो बड़ी वास्तविक थी उस युग की, उसके एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि के रूप में धूमिल को आप कैसे पहचानते हैं? उनकी इस छटपटाहट में यह बात दिखाई देती है। धूमिल खुद उस पीड़ा से गुज़र रहे हैं। कबीर को जनता अपना आदमी मानती थी। तुलसी को अपना आदमी मानती थी। पर धूमिल को नहीं मानती थी।

निराला जी का एक रेखाचित्र है—‘चतुरी चमार’। चतुरी गाँव के रिश्ते में निराला के भतीजे लगते थे। उम्र भर निराला के चाचा के बराबर थे। एक दिन चतुरी ने उनको कबीर के कुछ पद सुनाये। बीच-बीच में उनके अर्थ समझा रहे थे। निराला बड़े कवि थे। बड़ा अहंकार था। धूमिल से शायद थोडा ही कम रहा होगा अहंकार। निराला ने टाल दिया। कहा, अर्थ तुम कल समझाना। अभी तुम केवल पद सुना दो। चतुरी भी बात के पक्के। उस दिन कविता सुना कर चले गए। सुबह-सुबह अभी निराला अंगड़ाई लेते हुए उठ रहे थे। चतुरी नहा-धो कर निराला के दरवाजे पर पहुँच गए। कहा—‘काका, वो अर्थ समझाने आया हूँ।’ खैर, मन मार कर निराला ने अर्थ समझाना शुरू किया। चतुरी ने कबीर के पदों के ऐसे-ऐसे अर्थ बताये कि निराला ने कहा, ऐसे अर्थ तो किसी पुस्तक में देखने को नहीं मिले और ये बड़े सच्चे अर्थ हैं। पूछा कि—चतुरी तुम यह अर्थ कैसे कर लेते हो? चतुरी बोले कि—क्या कहूं काका, पढ़ा-लिखा आदमी तो हूँ नहीं, जहाँ गिरह लगाती है साहेब खुद सुलझा देते हैं। यह जो गिरह थी, उसी अनुभव परंपरा की गिरह थी जिस अनुभव-परंपरा में कबीर थे और चतुरी थे। अनुभव-परंपरा के कारण जहाँ गिरह लगती है, अपने आप सुलझ जाती है। चतुरी का अनुभव उन्हें कबीर के अनुभव के समकक्ष ला देता है और कबीर के पदों के अर्थ चतुरी समझ लेते हैं जिन्हें विद्वान नहीं समझ पाते. कौन हमारे कुनबे का आदमी है, इसको समाज चतुरी चमार की तरह पहचानती है। जनता नागार्जुन की तरह पहचानती है जो ‘हरिजन गाथा’ के कवि हैं। जिस नागार्जुन ने ‘नदियाँ बदला ले ही लेंगी’ कविता में लिखा था—

             तुम पानी में आग लगाओ 

             नदियाँ बदला ले ही लेंगी...

             इस होली में भूमिहीन की 

             किस्मत का भुट्टा सिंकता है... 

मैं कोशिश करता हूँ खोजने की कि भूमिहीन, चतुरी चमार, काम करते हुए किसान, ट्रेन में लगातार सफ़र करते हुए स्त्री-पुरुष, जीवन के ऐसे जीते-जागते चरित्र कहीं तो आयें। अजीब बात है कि धूमिल की कविता में ऐसे जीते-जागते चरित्र, ऐसे वास्तविक श्रमिक चरित्र कही नहीं आते। ले-दे कर महत्वपूर्ण कविता है ‘मोची राम’ लेकिन ‘मोची राम’ के लिए धूमिल खुद कहते है कि लगभग शायर है। मोची राम मोची नहीं रह जाता, शायर हो जाता है। कहीं कोई बात थी। जनता से लगाव में कहीं कोई दूरी थी।



धूमिल विक्षोभ के कवि हैं, जन-आंदोलनों के कवि नहीं हैं। जहाँ जनता के साथ कंधे से कंधा रगड़ते हुए आदमी सफ़र करता है। अगर जन-आंदोलनों के कवि थे, जनता के जीवन के मूर्त चित्र देने वाले कवि नहीं थे, और यह धूमिल की कमी थी, तो स्वातंत्र्योत्तर विक्षोभ के कवि थे, यह धूमिल की विशेषता थी और धूमिल का यह महत्व था। धूमिल के अंतर्विरोधों पर ध्यान देना चाहिए। अंतर्विरोध किसी कवि को महान ही नहीं बनाते हैं, अंतर्विरोध किसी कवि की सीमाएं भी तय करते हैं। अगर अंतर्विरोध निराला की महानताएं निर्धारित करते हैं तो धूमिल की सीमाएं भी निर्धारित करते हैं। यह इस बात पर निर्भर है कि अंतर्विरोध का चरित्र क्या है? अंतर्विरोध अगर ‘धूमिल’ बना देता है तो उसकी गति बहुत दूर तक नहीं होती है।

अंत में एक छोटी-सी बात पर टिप्पणी करना और ज़रूरी है। शमशेर तो अपने मन में डूबे हुए कवि थे। तन्मय, आत्मस्थ, भावस्थ स्थितियों के कवि थे शमशेर। लेकिन शमशेर की कविताओं में ध्यान दें, व्यक्तिवाचक नाम इतने ज्यादा आते हैं जिनकी हद नहीं। ये व्यक्तिवाचक नाम क्या बताते हैं? ये व्यक्तिवाचक नाम बताते हैं कि इन वास्तविक मनुष्यों से आपका परिचय है। इनसे आत्मीयता है। रुद्रदत्त भारद्वाज कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर थे। शमशेर उनको आदर्श मानते थे। यह टिप्पणी करते हुए उन्होंने कविता लिखी. त्रिलोचन कम से कम सात-आठ बार उनकी कविताओं में आते हैं। धूमिल की कविता में ‘वे’ हैं, उनकी कविताओं में मुक्तिबोध आते हैं. नेमिचंद जैन आते हैं. उपेन्द्रनाथ अश्क आते हैं. और तेजबहादुर आते हैं। साहित्य के, राजनीति के बहुत-से लोग आते हैं शमशेर की कविताओं में।

धूमिल की कविताओं में केवल राजकमल चौधरी आते हैं, और कोई नहीं आता। कोई व्यक्तिवाचक नाम नहीं है और यह बात मुझे थोड़ा उलझन में डालती है। ‘तुम’ है और ‘मैं’ है, बस। सर्वनामों के सहारे चलने वाली भाषा है. सर्वनामों के सहारे चलने वाली भाषा मनुष्य को अमूर्त बनाती है. नामों के सहारे चलने वाली भाषा मनुष्य को मूर्त करती है। सर्वनामो के सहारे जो भाषा मनुष्य को अमूर्त कर देगी, उस भाषा में कविता की विषय-वस्तु कहाँ से मूर्त रहेगी? इसलिए सारे आक्रोश, सारे विक्षोभ के के बाद भी धूमिल की काव्य-वस्तु अमूर्त रह जाती है। काव्य-वस्तु की अमूर्तता के कारण कोई मुकम्मल चेहरा धूमिल की कविता नहीं बनाती। यह धूमिल की बहुत बड़ी सीमा है और अहंवादी कवियों की अक्सर यह सीमा होती है। लेकिन मैं फिर इसी बात की दूसरी तस्वीर रखना आवश्यक समझता हूँ, जो धूमिल की शक्ति भी है और उसके लिए मैं धूमिल की एक पंक्ति पढ़ने की इजाज़त चाहता हूँ। ‘शांति पाठ’ धूमिल की एक कविता है। इसका ज़िक्र करने से पहले एक बात जोड़ देना आवश्यक है। शमशेर की कविता में साम्राज्य-विरोधी नजरिया बहुत स्पष्ट था क्योंकि वे आज़ादी के दौर के कवि थे। उनकी संवेदनाशीलता का, उनकी काव्य-दृष्टि का, उनके कवि-व्यक्तित्व का विकास स्वाधीनता संग्राम के दौरान हुआ था। उनकी साम्राज्य-विरोधी चेतना बहुत प्रखर थी। बड़ी निर्भ्रांत थी और इसीलिए उन्नीस सौ बयासी-तिरासी-चौरासी वाले दौर में भी हिंदुस्तान में साम्राज्यवाद की राजनीतिक-सांस्कृतिक भूमिका के बारे में शमशेर लिख रहे थे—

       ये मंसूबा है 

       दक्षिण एशिया में धर्म का चक्कर चले 

   और सिक्ख, हिन्दू, बौद्ध, मुस्लिम में रहे टक्कर 

      वो टक्कर हो कि सब कुछ युद्ध का मैदान हो जाए 

     कभी जैसा नहीं था ऐसा हिंदुस्तान हो जाए... 


और आप ध्यान दीजिये, यह संवेदनशील कवि या बड़ा कवि कहाँ बड़ा बनता है? सन बयासी-तिरासी-चौरासी के दौर में राममंदिर का ताला नहीं खुला था. छियासी में खुला था और उसके बाद साम्प्रदायिकता की राजनीति इतने उत्कर्ष पर पहुंची, इतने विस्फोटक रूप में हमारे देश में सामने आई। शमशेर इस अंदेशे को भांप रहे थे. यह वही दौर था जब 1990 में नागार्जुन ने एक कविता में लिखा था कि—


               अबकी पहन लिया है उसने 

               भक्तिन वाला बाना।

भक्ति, धर्म राजनीति के हथियार बनाये जा रहे हैं। इनका परिणाम बड़ा घातक होगा और थोड़े ही दिन में सामने आएगा। यह धर्म का चक्कर साम्राज्यवाद से साठगाँठ का परिणाम है। ये बातें नागार्जुन, शमशेर देख रहे थे। बहुत कम लेकिन ऐसे अंश धूमिल की कविताओं में हैं। ‘शांति-पाठ कविता से चार-पांच लाइनें पढ़ रहा हूँ—

                देश-प्रेम की भट्ठी जला कर 

                मैं अपनी ठंडी मांसपेशियों को 

                विदेशी मुद्रा में ढाल रहा हूँ 

         फूट पड़ने के पहले अणुबम के मसूड़े को 

                बहसों की प्याली में उबाल रहा हूँ।

आप इसमें आये हुए सन्दर्भ देखिये—देश प्रेम, विदेशी मुद्रा, अणुबम। क्या इसके बाद भी टिप्पणी करने की ज़रुरत है कि हमारी आज की राजनीति का चेहरा है। देशप्रेम, विदेशी मुद्रा, अणुबम। मैं राजनीति पर यहाँ टिप्पणी करना नहीं चाहता। इसलिए इतना ही संकेत काफी है. लेकिन देशप्रेम, विदेशी मुद्रा, अणुबम का यह जो परस्पर सम्बन्ध है आज की राजनीति में, वह कितने उभरे हुए साफ़ तरीके से दिखाई देने लगा है। जिस समय धूमिल यह कविता लिख रहे थे, उस समय इतने उभरे हुए, साफ तरीके से दिखाई नहीं देता था लेकिन पूँजीवादी राजनीति किस दिशा में चल रही है, धूमिल इस बात को पहचान रहे थे। इस बात की सार्थकता यह है कि कोई कवि तब महत्वपूर्ण होता है जब वह अपने समय के प्रति वफादार हो। अपने समय के अंतर्विरोधों को पहचानता हो। उस अंतर्विरोध का विकास भविष्य में किस दिशा में होने जा रहा है, उस भविष्य को, उस दिशा को पहचाने तब कोई कविता महत्वपूर्ण होती है। जहाँ धूमिल में ऐसी पहचान है, वहाँ उन्होंने महत्वपूर्ण कविताएँ लिखी हैं। धूमिल की कवि-रूप में महानता का एक बड़ा स्रोत यह है। लेकिन मैं फिर यह कहना चाहता हूँ कि यह महत्ता आपको अंशों में दिखाई पड़ेगी। इसका क्या कारण है? 

आदमी की असहनीय मजबूरियाँ धूमिल की कविताओं में बहुत आती हैं। बेशक, टुकड़ों-टुकड़ों में हो कर आती हैं। मसलन, फटे हुए दूध पर बच्चे का रोना। दूध फट गया है, बच्चा रो रहा है, माँ-बाप असहाय हैं, कुछ कर नहीं सकते हम-आप! जूते में कील चुभ रही है और आदमी तेज़ी से जा रह है। आदमी के जीवन की भी ऐसी स्थितियाँ धूमिल की कविता में हैं। जैसे जीवन की समग्रता नहीं है लेकिन जीवन की बड़ी चुभती हुई स्थितियाँ धूमिल की कविता में हैं, वैसे ही उनकी कविता की संरचना में भी एक सांगोपांग व्यवस्था नहीं है। व्यवस्था तब होती है जब पूरा जीवन आपका विषय हो। जब स्थितियाँ आपका विषय होती हैं तो व्यवस्था नहीं होती है और इसलिए इस व्यवस्था की कमी को धूमिल अपनी एक तरह की मुहवरेदानी से छिपाते हैं। यह मुहावरा एक दौर में बड़ा आकर्षक था। पूरा जीवन न होने पर भी कुछ तो इस मुहावरे के कारण और कुछ अति-राजनीतिक मुखरता के कारण धूमिल एक खास पाठक वर्ग में अपना आकर्षण बनाये रहे। वे अपने मुहावरे से खुद भी बहुत अधिक आकर्षित थे। इतना आकर्षण था कि नर्गिस के फूल की तरह खुद धूमिल अपने ही मुहावरे की खुशबू से मुग्ध हो गए थे और इस मुग्धता से बाहर नहीं निकल सकते थे। अगर ऐसा मुहावरा गढ़ना धूमिल की ताकत थी और धूमिल का महत्व था तो इसी कारण धूमिल को पढ़ना अनिवार्य है क्योंकि ऐसा मुहावरा सिर्फ धूमिल के पास था। अगर इस मुहावरे को गढ़ना एक कवि के रूप में धूमिल की ताकत थी तो उस आपने ही मुहावरे पर इतना मुग्ध हो जाना कि कविता का ढांचा न रह जाय और आप उस मुहावरे से अलग कोई दूसरा मुहावरा न दे सकें, उनकी शक्ति का धूमिल पड़ना था। धूमिल इस तरह के प्रचंड अंतर्विरोध के कवि थे।

नामवर सिंह ने धूमिल की प्रशंसा की थी लेकिन मुझे याद है, ‘कहना न होगा’ उनके साक्षात्कारों का एक संग्रह है, उनकी बेटी समीक्षा ठाकुर ने तैयार किया है, उसमें सुरेश शर्मा का एक छोटा-सा इंटरव्यू है, आठ पेज का, धूमिल के बारे में। उसे ज़रूर पढ़ना चाहिए। वह बहुत महत्वपूर्ण इंटरव्यू है। उसमें ‘पटकथा’ के बारे में नामवर जी ने एक बात कही है कि धूमिल छोटी कविताओं के अच्छे कवि हैं। बड़ी कविताएँ धूमिल नहीं लिख पाते और इसलिए ‘पटकथा’ कविता की तारीफ धूमिल की मृत्यु के बाद उन्होंने शिष्टाचार में की थी—दिल्ली प्रसंग में उन्होंने धूमिल की मृत्यु के बाद उन्होंने जो टिप्पणी की थी, उसमें उनकी जो राय है, वह सुरेश शर्मा से इंटरव्यू में व्यक्त राय से अलग है। वहां उन्होंने ‘पटकथा’ कविता की आलोचना की है. आलोचना की है, यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, आलोचना क्यों की है, इस पर विचार करना चाहिए। धूमिल छोटी कविताओं के कवि हैं, लम्बी कविताओं के कवि नहीं हैं और इस हद तक नहीं हैं कि लम्बी कविता ‘पटकथा’ में पूरा ‘अँधेरे में’ का ढांचा उतरने की कोशिश की है। वैसे ही फैंटेसी, वैसे ही शिल्प, वैसे ही चरित्र, वैसे ही प्रतीक, सारा ‘अँधेरे में’ का ढांचा उतारा गया है। यह किसी कवि का सामर्थ्य नहीं है। उसकी असमर्थता है कि लम्बी कविता जहाँ अपने व्यक्तित्व को पूरा प्रकट कर सकती हो, वहाँ वह दूसरी कविता का ढांचा उतार ले। यह कवि की कमजोरी है लेकिन ‘शांति पथ’ जैसी कविता, ऐसी अनेक कविताएँ या ‘भाषा की रात’ जैसी कविता, ऐसी कविताएँ धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ हैं क्योंकि यहाँ विषय ऐसे हैं जो आक्रोश को उचित बना देते हैं और वहां विषय, यथार्थ, धूमिल का मन तीनों सध जाते हैं कोई कवि, कोई कविता तब महान होती है जब समाज का यथार्थ, कविता की वास्तु और कवि का मन तीनों एक बिंदु पर सध जाते हैं।ऐसी कुछ कविताएँ हैं जहाँ धूमिल का मन इन चीजों से सध जाता है, वहाँ धूमिल श्रेष्ठ हैं।


अजय तिवारी 



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