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भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'गेंदा'

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भैरव प्रसाद गुप्त भैरव प्रसाद गुप्त ने मुंशी प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाया और इस क्रम में उन्होंने दलित शोषित वर्ग, किसानों और मध्य वर्ग के संघर्षों को अपने लेखन का मुख्य विषय बनाया। हिन्दी साहित्य में 'नयी कहानी आन्दोलन' को दिशा देने और उसे प्रतिष्ठित करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। बाल मन और बाल हठ बड़ा रोचक होता है। कब किस बात पर रींझ जाए, कहा नहीं जा सकता। बच्चे खेल खेल में अपनी अलग ही दुनिया सृजित कर लेते हैं। वे सरल, सहज और उदरमना होते हैं। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं होता। पहले के कई प्रतिष्ठित लेखकों ने बच्चों के लिए भी विपुल लेखन किया है। भैरव जी की कहानी गेंदा बाल मनोविज्ञान का बारीकी से विश्लेषण करती है। आज भैरव जी के जन्मदिन पर हम उनकी स्मृति को नमन करते हैं। आइए इस अवसर पर हम पढ़ते हैं भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी गेंदा। 'गेंदा' भैरव प्रसाद गुप्त  माघ का महीना, सबेरे का समय था। बहुत-से लड़के ओसारे में धूप खा रहे थे। पड़ोस में यही एक ऐसा ओसारा था, जहां सूरज की किरणें बहुत सबेरे आ जाया करती थीं, और यही कारण था कि लड़के बिस्तर से उठकर...

भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'खलनायक'

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  भैरव प्रसाद गुप्त  एक स्त्री का जीवन तमाम विडंबनाओं से भरा होता है। हमारे इस समाज में आज भी तमाम किस्म के ऐसे भेड़िए हैं जिनके लिए स्त्रियां सिर्फ उपभोग की वस्तु हैं। पूंजीवादी मानसिकता, बाजार, विज्ञापन और फूहड़ फिल्मों ने स्त्री की तस्वीर को विकृत करने का ही कार्य किया है। भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'खलनायक' स्त्री के सन्दर्भ में पुरुष मानसिकता के रेशे को खोलती है। कहानी की मुख्य पात्र  रश्मी इस मानसिकता से भलीभांति अवगत है। और वह इस बात से परिचित है कि उसके इर्द गिर्द आज जो जमावड़ा है उसमें उसके यौवन की विशेष भूमिका है। तभी तो बातचीत के दौरान कमल से वह कहती है ' अब तो मैंने तय कर लिया है, कि जब तक जवानी है, मैं जीऊंगी, और उसके बाद आत्म-हत्या कर लूंगी।’’ कह कर, वह एक भयंकर अट्टहास कर उठी।'  रश्मी स्वर्णाभूषणों से लदी हुई है। वह देव को खुद इसे दिखाते हुए कहती है 'ये सोने की चूड़ियां देखिए! यह मोतियों का हार देखिए! ये हीरे के टाप्स देखिए!’’ एक-एक चीज को हाथ से छू-छू कर दिखाते हुए, वह बोलती गयी- ‘‘ये सब चीजें उन्हीं लोगों को दी हुई हैं, जो समाज में शरीफ बने फिरते...

भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'गत्ती भगत'

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  भैरव प्रसाद गुप्त  खेत भारतीय किसानों के लिए उनके प्राण तत्त्व की तरह होते हैं। यही वह कारण है कि किसान हर कीमत पर अपने खेत को बचाए रखना चाहता है और उसके लिए हर सम्भव कोशिशें करता रहा है। आजादी  के बाद जमीदारों का प्रभुत्व समाप्त होने की बात फैलने लगी थी। लेकिन जमींदार अपना अधिकार छोड़ने के लिए राजी नहीं थे। ऐसे में प्रशासन और किसानों के बीच टकराहटें शुरू हो गई थीं। 'गत्ती भगत'  भैरव प्रसाद गुप्त की महत्त्वपूर्ण कहानी है। किसानों का पक्ष ले रहे  किसानों के कम्युनिस्ट नेता रामाधार को छुपा कर भगत यह झूठ बोलता है कि रामाधार को उसने अपने यहां नहीं छुपाया है। भगत ने ऐसा इस जोखिम के बावजूद किया  कि झूठ बोलने से उसका हुनर समाप्त हो जाएगा, जिससे उसकी पूरे जवार में ख्याति थी। आज भैरव प्रसाद गुप्त का जन्मदिन है। जन्मदिन पर नमन करते हुए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  भैरव प्रसाद गुप्त की कहानी 'गत्ती भगत'। गत्ती भगत भैरव प्रसाद गुप्त उस दिन जिधर सुनो, गाँव में छोटे-बड़े सभी के मुँह से अफ़सोस और ताज्जुब के साथ एक ही बात सुनाई दे रही थी, ‘गत्ती भगत की कण्ठी टूट गयी!...