रूचि भल्ला की कहानी ‘आई डोंट हैव ए नेम’।
रूचि भल्ला रूचि भल्ला ने इधर कविता के क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज़ करायी है। समय-समय पर हम उनकी डायरी के पन्नों से भी रु ब रु होते रहे हैं। इधर रूचि ने कहानी के क्षेत्र में भी अपना पहला कदम रख दिया है। उनकी पहली कहानी परीकथा के हालिया अंक में प्रकाशित हुई है। इस कहानी में हम उनके कवि को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। इसे पढ़ कर, इसकी भाषा से गुजर कर हम महसूस कर सकते हैं कि यह एक कवि द्वारा लिखी गयी कहानी है। रूचि के कहानीकार रूप का स्वागत करते हुए हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं उनकी पहली कहानी ‘आई डोंट हैव ए नेम’। आई डोन्ट हैव ए नेम रूचि भल्ला समय सुबह साढ़े पाँच बजे का है । इस वक्त आसमान का रंग वंशीधर के रंग सा हो आया है। तारों की टिमटिमाती लौ धीमी पड़ती जा रही है ...मुर्गे की बाँग और कड़क। गिन कर दस बार बाँग दे चुका है चार्ली का कलगीदार मुर्गा। सूरज की नींद कुम्भकर्ण की नींद सी है जब तक सुबह की रानी माँ उसे जगाएगी नहीं , वह औंधे मुँह आसमानी बिस्तर पर पड़ा सोता रहेगा। मुर्गे ने अब हार कर ग्...