मेहजबीं की कविताएँ
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| मेहजबीं |
किसी को देख कर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि उसके मन मस्तिष्क में क्या चल रहा है। आज का समय और भी जटिल है तो स्वाभाविक रूप से मनुष्य का शातिरपना और भी बढ़ा है। उसका चरित्र दोहरा हो गया है। कहा जा सकता है कि वह सोचता कुछ और है करता कुछ और ही है। उसमें बड़बोलापन ज्यादा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक कोई भी क्षेत्र इस दोहरेपन से बचा नहीं है। मेहजबीं इसे शिद्दत से महसूस करती हैं और अपनी कविता में इसे कुछ यूं दर्ज करती हैं : 'एक सदी से तुम क़त्लोग़ारत का ख़ाब देखते हो/ तहरीर तुम्हारी युद्ध विरोधी है/ अंदर ही अंदर कितनी शिद्दत से नफ़रत करते हो/ मेरे मुनाफिक दोस्त/ मंच पर चढ़ कर तुम भाईचारे की बात करते हो/ कितनी अच्छी तरह से झूठ बोलते हो/ जब-जब अभिनय करते हो धर्मनिरपेक्ष होने का/ बात करते हो लोकतंत्र संविधान की/ सचमुच कितनी तक़लीफ़ देते हो अपने आप को/ तुम्हारा कारोबार चलता रहे/ दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की होती रहे/ कितनी सफाई से शब्दों का भाषा का व्याकरण का इस्तेमाल करते हो/ मेरे मुनाफिक दोस्त/ कितनी अच्छी तरह से तुम सब मैनेज कर लेते हो'। युवा कवयित्री मेहजबीं अपने समय, समाज और उसकी मानसिकता को करीने से दर्ज करती हैं। वे मनुष्यता की पक्षधर हैं। यह पक्षधरता स्पष्ट है। उनकी भाषा भी आम बोलचाल की गंगा जमुनी भाषा है जिसे समझने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मेहजबीं की कविताएँ।
मेहजबीं की कविताएँ
नागरिक होने का अधिकार
भारत को आज़ाद हुए पचहत्तर साल हो गए हैं
मीर ज़ाफ़र के वंशज मिर्ज़ा उन्नासी साल के हो गए हैं
वो भारत में पैदा हुए और विभाजन के बाद यहीं रह गये
वो यहीं रह गये अपने आंगन के लिए
वो रह गये यहां कि मिट्टी के लिए
वो रह गये यहां के अमरूद जामुन आम नीम के दरख़्त के लिए
वो यहीं रह गये ब्रह्मपुत्र, यमुना, गंगा, रावी, चिनाब, झेलम के लिए
वे रह गये हिन्दुस्तान की मिट्टी में पड़े अपने नमाज़ के निशान के लिए
वे रह गये यहां के पानी से वुज़ू के लिए
वे अब संदिग्ध हैं
काग़ज़ तय करेगा कि वे देश के नागरिक हैं कि नहीं
उनके हाथ में भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाला पेंशन का काग़ज़ है
वे रुंधी हुई आंखों से लरज़ते लहज़े में संवाददाता से पूछ रहे हैं
क्या हम देश के नागरिक नहीं
हमारा क्या कुसूर है जो हमारा वोट काट दिया गया है?
हमारे बाप दादा सब इसी मिट्टी में दफन हो गये
इस मिट्टी में हमारा ख़ून पसीना हमारा वुज़ू का पानी शामिल है
इस मिट्टी में हमारे मुर्दा दफन हैं
यहां कि ख़लां में हमारी सदाएं गूंजती हैं
हमें देश से बाहर करोगे
हमारा वोट देने का अधिकार छिनोगे
हमें हमारे मुर्दा भी वापिस कर दोगे साथ ले जाने के लिए
मिट्टी में से हमारा ख़ून पसीना अलग करके दोगे
ख़लां में तैरती फिरती हमारी आवाज़ क़ैद कर के दे सकोगे?
हमारी भाषा, हमारी पहचान मिटा दोगे
हमें यहां के लोकगीतों से अलग कर सकोगे
हमारी एक हज़ार साल से ज्यादा की कर्बला वापिस कर सकोगे
हमारी ईदीन के ज़ुमे के पंजगाना नमाज़ के सिज़दे
जो इस देश की मिट्टी में शामिल हैं उन्हें उखाड़ कर वापिस कर सकोगे
हमारी अज़ान ख़लां में गूंजती फिरती है उसे वापिस कर सकोगे
जनाब थक जाओगे क्या-क्या वापिस करोगे!!
दीन की खिदमत
अमीर साहब घर के हालात बहुत ख़राब हैं
काम भी मंदा है, सिर पर क़र्ज़ा है
ये दुनिया फना होने वाली है यहां गधों की तरह काम करके कुछ हासिल नहीं
तीन दिन में जाओ दस दिन में जाओ बेहतर होगा चार महीने अल्लाह के रस्ते में लगाओ
जनाब मैं रोज़ खाने कमाने वाला दिहाड़ी मज़दूर हूं
मैं चार महीने के लिए अल्लाह के रस्ते में चला जाऊंगा
तो मेरे पीछे मेरे बीवी बच्चों का बूढ़े मां-बाप का क्या होगा
यही तो मुगालता है कि तुम्हारे काम करने से घर चल रहा है
यहीं तो तुम लोगों का ईमान कमज़ोर है
जो होता है अल्लाह की मर्जी से होता है रिज़्क़ अल्लाह देता है तुम कुछ भी नहीं
जब तुम मर जाओगे तब भी तो घर चलेगा कि नहीं
जब तुम नहीं थे तब भी तो कुनबे का पेट भर रहा था कि नहीं
ये बीवी बच्चे इनके लिए ज़िन्दगी भर कमाते रहो तब भी इनकी डिमांड पूरी नहीं कर सकते
इन औरतों की फरमाइश पूरी करना नामुमकिन है
कमा कमा कर मर जाओगे तब भी इनकी ज़रूरियात पूरी नहीं होती
ये ज़िन्दगी भर रोती रहती हैं ये नाशुक्री हैं
औरतें सबसे ज्यादा दोज़ख़ में जाएंगी
एक तो शौहर की नाफरमानी के लिए दूसरे अपनी नाशुक्री के लिए
तुम अपनी आख़िरत के बारे में सोचो
मरने के बाद की ज़िंदगी के बारे में सोचो
अल्लाह का रस्ता नबियों का बताया रस्ता है
सहाबा सारा सारा साल अल्लाह के रस्ते में रहते थे
सहाबिया चटनी रोटी खा कर गुज़ारा करती थीं
वो दीन के लिए क़ुर्बानियां देती थीं, तभी तो सहाबा दीन के रस्ते में निकलते थे
सहाबा पीछे मुड़ कर देखते भी नहीं थे
नबी का हुक्म होता था और निकल लेते थे
इस्लाम के लिए सबसे पहले क़ुर्बानी औरत ने दी थी
वे दीनदार मुत्तकी परहेज़ग़ार सब्रदार औरतें थीं
आजकल की औरतें बेदीन हैं, नाशुक्री हैं, बेशर्म हैं
औरत, पैसा, दौलत पर्दे में रखने की चीज़ है
औरत की कमाई से घर में कभी बर्कत नहीं होती
तुम अपने घर में रोज़ तालीम करो अपने बीवी बच्चों की तश्क़ील करो
अल्लाह के रस्ते में जो निकलता है उसकी ग़ैबी मदद होती है
अल्लाह उसके घर की हिफाज़त के लिए फरिश्ते मुकर्रर कर देता है
जो औरत अपने शौहर को अल्लाह के रस्ते में भेजेगी
वो अपने शौहर से पांच सौ बरस पहले जन्नत में दाख़िल होगी
अल्लाह का रस्ता ही असल दीन की खिदमत है
याद रहे अगर ज़िन्दगी भर भी घर में रह कर भी
आदमी नमाज़ पढ़ता रहे, क़ुर्आन पढ़ता रहे तो बेकार है फुजूल है
जब तक अल्लाह के रस्ते में न निकले
उस आदमी की दुआ कभी क़ुबूल ही नहीं हो सकती जो अल्लाह के रस्ते में न निकला हो
अगर पैदा होने से मरने के वक़्त तक भी सिजदे में गिरा रहे तो जन्नत नहीं मिल सकती
अल्लाह के रस्ते में निकलने से ही इबादत क़ुबूल होती है और जन्नत मिलती है
ये सब तो ठीक है जनाब
अब्बा बीमार हैं उन्हें अस्पताल ले जाना होता है
वो ख़ुद से चल फिर भी नहीं सकते
मेरे पीछे कौन उनका ख़्याल रखेगा
इतनी देर से तुम्हारे साथ मग़ज़मारी की
तुम्हें फिर भी समझ नहीं आया
तुम भूल जाओ तुम्हारे कुछ करने से कुछ होता है
जो करता है अल्लाह करता है
एतक़ाद ही ख़राब है अल्लाह की क़ुदरत पर यक़ीन ही नहीं है
ये सोचना ही ग़लत है दवा में शिफा है
सदका निकालो सदके से बीमारियों का इलाज करो
तुम जल्द से जल्द अल्लाह के रस्ते में निकलो
घर बीवी बच्चों को मां बाप को देखने वाला अल्लाह है
अल्लाह के रस्ते में निकल कर सारी परेशानी दूर हो जाएगी
एक रूहानियत महसूस होगी दिल को सुकून मिलेगा
दीन के लिए क़ुर्बानी देना अल्लाह के रस्ते में निकलना ही ज़िन्दगी का असल मक़सद है
अब कोई नबी नहीं आएगा हमारी जिम्मेदारी बनती है
अल्लाह के रस्ते में निकल कर दीन की दावत देना
फलां जगह, ढिमकाना जगह लोग मुर्तद हो रहे हैं
दीन से फिर रहे हैं
नाम के मुसलमान हैं
कौम जहालत में पड़ी है, दीन ख़तरे में है
लोगों को कलमा तक याद नहीं है
औरतें नंगी फिर रही हैं
औलादें ग़ैर मुस्लिम का हाथ पकड़ रही हैं
मुसलमान को अपनी पड़ी है अपने बीवी बच्चों की पड़ी है
अल्लाह के रस्ते में नहीं निकलोगे तो ये बेदीनी कल को तुम्हारे घर तक पंहुचेगी
जनाब आपने मेरी आंखें खोल दी मैं तो अब तक ग़फलत में पड़ा था
बताएं मुझे क्या करना होगा
पहले तीन बार तीन तीन दिन लगाओ फिर दस दिन फिर चालिस दिन फिर चार महीने
उसके बाद अपनी बीवी के तीन बार तीन तीन दिन लगवाओ फिर दस दिन फिर चालिस दिन फिर बैरून
रोज़ दीन के रस्ते में आठ घंटे दो सुबह-शाम मस्जिद में मश्वरे में बैठो
तालीम में बैठो, गश्त करो, जोड़ में शामिल रहो
हफ्तावारी जोड़ में शामिल रहो
हर जुमेरात मर्क़ज़ में हाजिर रहो मौलाना का बयान सुनने के लिए
मौलाना ही सब कुछ हैं
उन्होंने दीन के लिए बहुत क़ुर्बानियां दी हैं
उनकी बात टालने का मतलब है हदीस का ठुकराना
लोग मौलाना की ज़ियारत के लिए मर्क़ज़ देखने के लिए तरसते हैं
वे हिन्दुस्तान से बाहर रह कर एक एक पैसा जोड़ते हैं
कि हिन्दुस्तान जा कर मौलाना से मिलेंगे मर्क़ज़ देखेंगे
और एक अपने शहर के मुसलमान हैं जो नज़दीक हो कर भी मर्क़ज़ से दूर रहते हैं
जनाब आपने तो मेरा दीन सुधार दिया
मैं ज़िन्दगी भर अब दीन से नहीं फिरूंगा
अपने ईमान को तरोताजा रखने के लिए दीन के रस्ते पर निकलता रहूंगा
मैं अपनी आख़िरत संवारूंगा दीन की खिदमत करूंगा
अपने बीवी बच्चों को भी दीन के रस्ते पर लाऊंगा मदरसे में दाख़िल करूंगा
एक शख़्सियत दीन के रस्ते पर निकल पड़ी है
रोज़ी रोटी दिहाड़ी छोड़ कर चार महीने में जा चुकी है जन्नत कमाने
बेटे बेटियों को मदरसे में दाख़िल कर दिया है स्कूल से नाम कटवा कर
बीवी की अच्छी तश्क़ील की है
उसे चटनी रोटी टुपकी पैबंद लगे वस्त्रों के मोड पर डाल दिया है
अब वो अकेली ज़िन्दगी की गाड़ी को खींचेगी
रातों को अकेली सोएगी
वो अब एक दीनदार औरत है
सवाब खाएगी सवाब ओढ़ेगी सवाब के साथ सोएगी
बिजली कड़केगी तो सवाब को अपने सीने से लगा लेगी
जब तकिए से भी सब्र नहीं आएगा तो सवाब को सिने से चिपका लेगी
आसानी से दीन के रस्ते पर चलती है तो ठीक है वर्ना एक तलाक़ की धमकी
ख़राब से ख़राब बेदीन औरत को भी अल्लाह के रस्ते से जोड़ देती है।
मेरी प्रिय स्त्रियां - 4
मैं जब जब टूटती हूं बिखरती हूं
बूंदे जो बारिश की मानिंद नहीं हैं
काली बदली उनकी जन्मस्थली नहीं है
वे एक तवील दर्द से जन्मी हैं
इन्हें अर्पित करने के लिए
मैं बैठ जाती हूं क़िबला की ओर रुख़ कर के
हर बार एक स्त्री मेरी झोली में वो रब उपहारस्वरूप देता है
मेरी प्रिय स्त्रियां जो मुझे इबादत के एवज में मिली हैं
मैं इनके साथ ख़ूबसूरत लम्हे गुज़ारना चाहती हूं
मैं इनके साथ दस्तरख़्वान पर बैठ कर संवाद करना चाहती हूं
मैं इनके साथ बादल पर उड़ना चाहती हूं
मैं इनके साथ एक बड़े से केनवास पर
ज़िन्दगी ज़िन्दगी ज़िन्दगी का सृजन करना चाहती हूं
मैं एक शाम अनुराधा के साथ मुंबई की मरीन ड्राइव सड़क पर टहलना चाहती हूं
मैं समुद्र के ख़ूबसूरत पत्थरों पर इतमिनान से बैठ कर
अनुराधा का चेहरा पढ़ना चाहती हूं उसका मन टटोलना चाहती हूं
वो मन जो कभी उसके मनोचिकित्सक पति को दिखाई नहीं दिया
मैं अनुराधा का गीत सुनना चाहती हूं
"हए कैसे दिन बीते कैसी बीती रतियां
पिया जाने न
रुत मतवाली आ के चली जाए
मन में ही मेरे मन की रही जाए
खिलने को तरसे नन्हीं नन्हीं कलियां!"
मैं एक बार अपनी प्रिय उमरा ओ जाना के शहर जाऊंगी
वो एक सदी से पुकार रही है
"क्या कोई मेरे लिए भी उदास बेकरार है !"
अंधा बहरा शहर उसकी पुकार कभी नहीं सुनता
मेरी रुह में उसकी वो पुकार बसी है
मैं उसकी उंगली पकड़ कर उसे अपने घर लाऊंगी
अपने दिल की चैन खोल कर उसमें रख लूंगी उसको
उसका सारा दर्द चुग लूंगी अपनी पलकों से
मैं एक रोज़ बंगाल के सुंदरवन के गांव में जाऊंगी माजुबी से मिलने
मैं उसका बनाया मीठा गुड़ खाऊंगी
यक़ीनन वो दुनिया का सबसे मीठा गुड़ है जो एक सुंदर हृदय की स्त्री ने बनाया है
मैं माजुबी के लिए एक साड़ी कीनूंगी उसके यहां के बाज़ार में
पूंजीवादी हवा से पाक़-साफ है माजुबी
मेरी माजुबी इस बार सारा गुड़ जला देगी
वो रोएगी धोएगी नहीं
वो नहीं गाएगी
"तेरा मेरा प्यार रहे
धूप हो छांव हो
दिन रहे के रात रहे !"
वो गुड़ का सत्यानाश कर देगी
पूंजीवादी पितृसत्तात्मक पुरुष प्रधान व्यवस्था के द्योतक शौहर से खुला लेगी
मैं एक रोज़ कश्मीर जाऊंगी ज़ीनत से मिलने
मैं उसके साथ सीढ़ियां चढूंगी मंदिर की
फिर उसके साथ सीढ़ियों से वापिस उतरूंगी ज़मीन की ओर
ईमान की छलांग लगाती हुई
मैं ज़ीनत का हाथ थाम कर बढ़ूंगी अपनी मंज़िल की तरफ़
ज़ीनत मेरी प्रिय सखी
इसकी सोहबत में मैं ढेर सारी उर्जा हासिल करूंगी
मैं ज़ीनत के साथ दूर तलक़ जाऊंगी गर्म रेत पार करती हुई
रेगिस्तान की ख़लां में ज़ीनत का गीत गूंज उठेगा
"यह हौसला कैसे झुके
यह आरज़ू कैसे रुके
मंजिल मुश्किल तो क्या
धुधंला साहिल तो क्या
तन्हा ये दिल तो क्या!"
मैं सर्दी की सुबह में लखनऊ जाऊंगी अंजुमन से मिलने
अंजुमन मेरी प्यारी कभी दूध नहीं पीती, सेब नहीं खाती
उसके पास क़लम की ताक़त है
वो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को पढ़ती है
"दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है !"
अंजुमन के पास एक बुलंद प्रतिरोध की आवाज़ है
अंजुमन पूछे जाने पर चीख चीख कर कहती है
नहीं क़ुबूल नहीं.... नहीं क़ुबूल नहीं ...
"ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
मैं नहीं जानती मैं नहीं मानती!"
मैं भी उसके साथ खुले आसमान के नीचे जोर-जोर से चींख कर
चीख चीख कर कहूंगी
मुझे क़ुबूल नहीं... मुझे क़ुबूल नहीं
तुम्हारा दस्तूर
तुम्हारा फितूर
तुम्हारा घर, तुम्हारे पैसे
तुम्हारा साथ, तुम्हारी आंखें
तुम्हारा संगमरमर वजूद
मुझे क़ुबूल नहीं मुझे क़ुबूल नहीं
मैं एक बसंत में पंचवटी जाऊंगी अपनी प्रिय चित्रकार साध्वी से मिलने
मैं उसके चित्रों में प्रकृति को महसूस करूंगी
स्त्री मन को पढ़ूंगी
मैं उसके जुड़वा बच्चों से मिलूंगी
वो बच्चे सुंदर हृदय के बच्चे हैं
उनको एक स्वाभिमानी मां रच रही है
वो बच्चे एक रोज़ देश की संप्रभुता को बचाएंगे
वो बच्चे स्त्री पुरुष के सुंदर संबंध बनाएंगे
मैं उन प्यारे बच्चों का हाथ चूमूंगी मैं उन बच्चों की मां का माथा चूमूंगी
मैं अपनी प्रिय चित्रकार से चित्रकारी का हुनर सीख कर आऊंगी
और अपने आप को ख़ुद केनवास पर ड्रो करूंगी
अपने वजूद में अपने हिसाब से रंग भरूंगी
मैं अपनी प्रिय स्त्री सीमा से मिलने जाऊंगी
उसकी तरह अपनी ज़िंदगी में एक फरिश्ते को शामिल करूंगी
मैं उसकी आंखों में आंखें डाल कर बहुत देर तक तकूंगी
मैं महसूस करूंगी एक फरिश्ते की सोहबत को
मैं उसकी मृत देह में प्राण फूकूंगी
उसको बताऊंगी शैतान को ग़ालिब नहीं होने देना है अपने वजूद पर
मैं उससे आग्रह करूंगी कि वो फरिश्ते की सोहबत स्वीकार करें
और इस ज़हर हवा में जहालत भरे दौर में
अपनी संतान के रूप में फरिश्तेनुमा बच्चे इस देश को दे
मैं एक पतझड़ में तालाब के किनारे कुसुम से मिलने जाऊंगी
उससे कहूंगी अपने देह से थोड़ा इत्र मुझे उधार दे दे
अपने सुंदर विशाल हृदय की तरह मेरा हृदय भी बना दे
मैं उससे थोड़ा स्वाभिमान मांग कर लाऊंगी
मैं उसके साथ नदी के पानी में एक पत्थर फेंकूंगी
उसकी थोड़ी हंसी भी चुरा लूंगी
मैं उसके साथ आसमान में देखूंगी
और ईश्वर से मुखातिब होकर कहूंगी
हे ईश्वर
"बेचारा दिल क्या करे सावन जले भादो जले
दो पल की राह नहीं ....!"
मैं एक रात बंगाल जाऊंगी पारो से मिलने
वो एक बड़ी सी फाटकनुमा दरवाज़े के अंदर बंद है
मैं सारे फाटक खोल दूंगी
पारो की उंगली पकड़ कर उसे दरों दीवार से बाहर लाऊंगी
उसका देवदास आज भी इंतजार कर रहा है
पारो को देवदास से मिलवाऊंगी
पारो कलकत्ता से दिल्ली जे एन यू में दाख़िल होगी
वो पूंजीवादी फांसीवादी सामंती व्यवस्था से लड़ेगी
मैं एक रोज़ पूजा से मिलने जाऊंगी
मैं उसके साथ कुछ दिन पीजी में रहूंगी
शहर की खाक छानूंगी, नौकरी तलाश करूंगी
एक स्कूल जॉइन करूंगी
अपने नये मित्र बनाऊंगी और यतीम बच्चे को गोद लूंगी
मैं उस बच्चे की परवरिश का प्रशिक्षण पूजा से सीखूंगी
मैं एक रोज़ पहाड़ों पर संध्या से मिलने जाऊंगी
मैं उससे प्रेम करने का हुनर सीखूंगी
मैं उसके साथ मिल प्यार की बाजी जीतना सीखूंगी
मैं उससे सीखूंगी बाज़ार में बिक चुके साथी को
बाज़ार पूंजीवाद के चंगुल से निकाल कर अपनी ज़िंदगी में कैसे शामिल करते हैं
मैं उसके साथ पियानो बजाऊंगी और गाऊंगी
"जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, खेल अधूरा छूटे न
प्यार का बंधन, जन्म का बंधन, जन्म का बंधन टूटे न !"
मैं एक रोज़ पारवती से मिलने जाऊंगी
मैं उसकी आंखों में ज़मीन को बचाने का ख़ाब देखूंगी
मैं उस दम्पति परिवार को पूंजीवादी व्यवस्था से
कोरपोरेट घराने से लड़ते देखूंगी
मैं उनकी आंखों से ख़ाब ले कर अपनी आंखों में रख लूंगी
वापिस आ कर मैं भी मरते दम तक अपने हिस्से की ज़मीन बचाऊंगी
अपने हिस्से का आसमान बनाऊंगी!!
कैना माई
दूर देश से दुल्हन आई है
बड़का शहर दिल्ली से
नानी अम्मा मुमानी तो बोलती ही नहीं हैं
तुमरा मुमानी गूंगी है
तोरा मम्मा के दिल्ली वाला सब ठग लिहीस
नानी देखिए फूफा क्या बोलते हैं
नईकी दुल्हीन बोलती नहीं है रे बच्चा सब
काहे नानी
हमरा कपार खा लिहीस तू सब
जो हिंया से दूर जो बाड़ी में जा के खेल
कैना माई.... बड़का बड़ा आंख ....
टका .....?
न एक ठू टका न ...?
बड़का शहर दिल्ली ..... कैना माई
अस्सलाम वालेकुम....कैना माई
की कही छे
तोरा कैना माई ...!
बाबू रे .....कैना माई
दिन भर मौन व्रत रखने के बाद
दुल्हन रात में अपने लब खोल रही है
कुछ है नहीं वैसे उसके पास कहने के लिए
एक ठंडी सांस अंदर से बाहर
बाहर से अंदर करनी है उसे
क्योंकि आत्महत्या तो पाप है इस्लाम में
दिन भर वो श्रोता बनी सुनती है ध्वनि
नई जगह, नये लोग, नई भाषा
वो राजधानी से दूर भेज दी गई है ऐसी जगह
जहां उसकी मैचिंग का कुछ भी नहीं है
इतनी तवील ज़िन्दगी जीनी है किस्म किस्म के कंट्रास्ट के बीचों-बीच
कैसे होगा सब
हलाक करने के लिए दो दर्जन चूड़ियां
गले में डला तौक़ पैरों की पाजेब और भारी भरकम साड़ी ही काफी है
ये जबरदस्ती का मुसल्लद किया दुल्हा
इसी से संवाद करना है
इसी के साथ जीवन गुजारना है
कैसे गुजरेगा उसके हाथों में हाथ रखते हुए भी डर लग रहा है
एक जीता-जागता इस्मत चुग़ताई की कहानी का किरदार
उसने बड़े से हाथ में भरी भरी उंगलियों में मेरी हथेली रख दी है
ऐसा लग रहा है जैसे किसी विशाल सागर के बीचों-बीच
छोटी सी कश्ती थम गई है
"कुछ बोलोगी नहीं कब से ख़ामोश हो
नीचे नहीं बोलना है
अच्छा करती हो सबके सामने ऐसे ही रहना
मुझसे तो बात करो यहां कोई नहीं है मेरे सिवा!"
सामने का सब बलर है
धुंधला कुछ भी साफ नहीं
कानों में दिन भर की सुनी हुई ध्वनि गूंज रही है
बड़का शहर दिल्ली
टका
बाबू रे
कैना माई
"आज कैना माई नहीं आई
नीचे बहुत सन्नाटा है
कैना माई अम्मा के पास आती हैं तो खूब हंसती हैं
मुझे देखती हैं टुकुर-टुकुर
ये सब अम्मा की सहायिका रही हैं न पहले
बच्चों ने मुझे बताया है
कैना माई अम्मा का अनाज साफ करती थी
सफाई करती थी, बर्तन धुलती थी, आंगन लीपती थी!"
हा... हा... हा...
आप हंस क्यों रहे हैं
कुछ ग़लत बोल दिया मैंने
सॉरी
"तुम्हें क्या कुछ भी समझ नहीं आता नीचे ?"
"आता है समझ में
बस वो कैना माई आतीं हैं न
उनकी भाषा कितनी अजीब है
मुझे कुछ समझ नहीं आता
जब वे आती हैं तो सब कैना माई कैना माई बोलते हैं
वे भी कैना माई बोलती हैं
बड़का शहर दिल्ली बोलती हैं
टका बोलती हैं
मुझे टका और दिल्ली शहर समझ में आते हैं बाक़ी का कुछ भी नहीं !"
हा... हा... हा...
अब तो कुछ बोलने की हिम्मत नहीं
ख़ामोश रहना बेहतर है
ये ख़ामोशी ही आज से हमसफ़र है और मरहम है
क्यों बोली चुप ही रहती
क्या मिला बोल कर हंसी ही उड़ी
"इधर देखो
मेरी आंखों में देखो
'तुम'
तुम हो कैना माई
वे नहीं जिन्हें तुम कैना माई समझ रही हो
इधर की ज़बान में नई दुल्हन को कैना माई कहते हैं !"
'मैं'
मैं कैना माई हूं
जिस सहायिका को अब तक कैना माई समझ रही थी
वो सहायिका यानी कैना माई मैं हूं
मैं हूं सहायिका
मैं हूं कैना माई यानी की नई दुल्हन
यानी की कैना माई यानी की सहायिका !"
बड़का शहर दिल्ली से आई कैना माई
बड़का शहर से आई सहायिका
बिना पगार की सहायिका
जो अब अम्मा की देह दबाएगी उसमें तेल मलेगी
अम्मा का अनाज साफ करेगी
अम्मा का आंगन बुहारेगी
अम्मा के कुनबे का खाना पकाएगी झूठा बर्तन धुलेगी
बड़का शहर दिल्ली में वापिस आ कर भी
मैं, मैं नहीं हूं अब
मेरे नये रूप नये नामकरण से इरिटेट हो कर
बरामदे की दीवार में रह रहे चिड़ा चिड़िया घोंसला छोड़ कर कहीं चले गए हैं
मेरा नाम धूमिल हो रहा है
मेरी शिनाख्त संदिग्ध है
मेरे गले में चुभने वाला तौक़ है
मेरे टीवी स्क्रीन पर मॉब लिंचिंग की विध्वंस की ख़बरें हैं
मेरा गृह मंत्रालय वहीं है जहां से कैना माई नाम मिला है
कैना माई का प्रोफेशन मिला है
मेरा कोई सुरक्षित भविष्य नहीं है
मेरा कोई न्यायालय नहीं है
मैं कैना माई छोटी सी उम्र में
ढेर सारी दरों दीवार की मालिक
मैं कैना माई छोटी सी उम्र में
कितनी कितनी आंखों की मकान मालकिन
मैं कैना माई यानी की नई दुल्हन
मैं सहायिका यानी की कैना माई
मैं कैना माई यानी कि
इश्मत चुग़ताई की कहानी के किरदार की सहायिका!!
मेरे भाई अपनी नफ़रत का क्या करोगे
मेरे भाई अपनी नफ़रत में क्या-क्या करोगे
दामन छुड़ा लिया, हाथ छोड़ दिया
साथ छोड़ दिया, बातचीत से किनारा कर लिया
नज़रें नहीं मिलाते, हाथ नहीं मिलाते
इतनी बेरुखी से जी नहीं भरा तुम्हारा
मेरे भाई,
इस अंधी बहरी लुली लंगड़ी नफरत का क्या करोगे
मस्जिद तोड़ दी, घर ज़मींदोज़ कर दिया
बीच सड़क पर लाठियों से पीट पीट कर जान से मार देते हो
ख़ून बहाने से भी जी नहीं भरता तुम्हारा
मेरे भाई इस नफ़रत से तुम किसका भला करोगे
फल सब्ज़ी नहीं खरीदोगे
मेरे रेस्तरां में खाना नहीं खाओगे
आर्थिक बहिष्कार करोगे
तुम्हें कोई नुक्सान नज़र क्यों नहीं आता
इस नफ़रत से तुम अपना और इस देश का क्या उद्धार करोगे
सड़क पर मारोगे ट्रेन में मारोगे
चलती गाड़ी से बाहर फेंक दोगे
जिंदा आदमी को मार कर जी नहीं भरा तुम्हारा
अब मुर्दा आदमियों की भी क़ब्रें खोदोगे
मेरे भाई और कितने पागलपन का मुजाहिरा करोगे!
मेरे मुनाफिक दोस्त
मेरे मुनाफिक दोस्त कितनी मेहनत करते हो
जो चेहरे से जाहिर करते हो वो दिल में नहीं है,
जो दिल में है वो चेहरे पर नहीं है
मिनटों में भाव बदल लेते हो, बात बदल देते हो
बड़े मफादपरस्त हो मुनाफे के लिए
कितनी अच्छी तरह तुम ऐक्टिंग करते हो
एक सदी से तुम क़त्लोग़ारत का ख़ाब देखते हो
तहरीर तुम्हारी युद्ध विरोधी है
अंदर ही अंदर कितनी शिद्दत से नफ़रत करते हो
मेरे मुनाफिक दोस्त
मंच पर चढ़ कर तुम भाईचारे की बात करते हो
कितनी अच्छी तरह से झूठ बोलते हो
जब-जब अभिनय करते हो धर्मनिरपेक्ष होने का
बात करते हो लोकतंत्र संविधान की
सचमुच कितनी तक़लीफ़ देते हो अपने आप को
तुम्हारा कारोबार चलता रहे
दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की होती रहे
कितनी सफाई से शब्दों का भाषा का व्याकरण का इस्तेमाल करते हो
मेरे मुनाफिक दोस्त
कितनी अच्छी तरह से तुम सब मैनेज कर लेते हो
सच सच बताओ तुम बोर नहीं होते मुनाफकत से
आइना देखते हो
कैसे मिलाते हो अपनी नज़रें अपनी ही नज़रों से
कभी कोफ्त नहीं होती दोहरे चरित्र से
मेरे मुनाफिक दोस्त
तुम्हें क्या लगता है सच कभी झूठ पर ग़ालिब नहीं होता
तुम्हें पता है
जो हक़ीक़त अंधेरे में है एक रोज़ दिन के उजाले में पढ़ी जाएगी
इस सबके बावजूद मेरे मुनाफिक दोस्त
तुम कितनी अच्छी तरह से थेथरई करते हो!!
मेरे शहर में कोई तन्हा रहता है - 1
अपने जज़्बात के बंद दरीचों से झांक
तू क्यों अजनबियों की मानिंद
दूर - दूर खड़ा रहता है
बाज़ार से निकल, ज़रा घरों के क़रीब आ
जहाँ दिलों में प्यार मिलता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है
रक़ीब की तलाश में
ख़ामोश हैं तेरी नज़रें बेज़ारी का अहसास लिए
यहाँ सभी ख़ुदग़र्ज़ नहीं
अपनापन है यहाँ भी
तू क्यों उदास रहता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है
माना सब्ज़ ज़मीं
दरख़्तों-फूलों का बाग़ मेरे शहर में नहीं
गहरी-गहरी नदियाँ, झरने
पहाड़, सहरा, चमकते जुगनू, तितलियाँ मेरे शहर में नहीं
मगर आसमान वही है, चाँद सितारे वही हैं
वही सूरज है
जो रोज़ तेरे गाँव में निकलता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है
ऊँची ऊँची इमारतों से बाहर आ कर देख
इन छोटी-छोटी बस्तियों में
राब्ता बना के देख
ग़रीब मज़दूर छोटे आदमी के नज़दीक जा कर देख
इनसे दोस्ती का हाथ बढ़ा कर तो देख
इनके दिलों में मुहब्बत का फ़व्वारा बहता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है।
तेरी किताबों की दुनिया से बाहर
युनिवर्सिटी मल्टीनेशनल कम्पनी की सड़कों से दूर
साहित्यिक मंच से उतर कर आ
इस महानगर में
फैक्ट्री बंगलों के पिछे खुले आसमान के नीचे
तेरे ही जैसे सीधे-सादे लोगों का गाँव बस्ता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है।
यहाँ कौन है क़दीमी, शहर का क्या है अपना?
किसकी है ये बेशुमार भीड़?
धीरे-धीरे आ कर यहाँ गाँव ही बसता है
बनती हैं ईद पर सिवईयाँ, होली पर गुजिया
दिवाली पर मिठाइयाँ
छठ पूजा होती है यहाँ,
ताज़िया भी निकलता है
मेरे शहर में तू क्यों तन्हा रहता है!
तुम्हें खारिज किया जाए अब
मैं तुम्हारे इस्तेमाल की वस्तुओं के विज्ञापन में हूं
मैं बाज़ार के मुनाफे के केन्द्र में हूं
मैं तुम्हारी फिल्मों में पेश हूं आई टॉनिक के लिए
मैं तुम्हारे घर में हूं बंधुआ मजदूर
तुम क्या सोच कर परफ्यूम, रेज़र, अंडर गारमेंट्स के विज्ञापन बनाते हो
तुम्हारी ग़लीज़ सोच का जीता-जागता उदाहरण हैं वे
पैग़म्बर की आधी उम्मत
आदम की औलादें
बड़े-बड़े महापुरुषों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकारों के फ्लॉवर्स
ग़लाज़त से लबरेज़ हैं
तुमने बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल कर
बड़े-बड़े आविष्कार कर
हवा को क़ैद कर, पानी का रस्ता चीर कर
समुद्र की गहराइयों में जा कर
ज़मीन की परत दर परत खोद कर
चांद पर चढ़ने के बाद
क्या बनाया है औरत को
तुमने क्या ईज़ाद किया है
मर चुकी सभ्यता
उन्मादी भीड़ कर्कश ध्वनि
दरिद्दर कौम और उसकी आग उगलती भाषा
ये तुच्छ विज्ञापन
एक ग़लीज़ फाइल
जिनमें महिला की देह तुम्हारे लिए खिलौना है मनोरंजन है मुनाफा है बिज़नेस डील है वोट बैंक है
तुम्हें खारिज करने का वक़्त आ गया है
तुम्हारी प्रेम कविता प्रेम कहानियां ग़ज़लें सब फर्ज़ी हैं
इनकी जानिब जी भर कर पत्थर फेंकें जाएं अब
तुम्हारी बुज़ुर्गी का अचार डाला जाए
तुम्हारे सुफेद लिबास को पीकदान बना दिया जाए
तुम्हारे पक चुके सुफेद बालों को बीच चौराहे पर जला दिया जाए
तुम्हारे साहित्य को दफन कर दिया जाए
तुम्हें बाहर निकाला जाए पाक़ मुक़द्दस किताबों से
तुम्हारा बहिष्कार किया जाए सियासत से
तुम्हें बाहर किया जाए संसद से, बातचीत से, बिस्तर से, थाली से, दस्तावेज़ से, दस्तख़त से
तुम्हें बाहर निकाला जाए मानवाधिकार, महिला बाल विकास परियोजना से मंत्रालय से!!

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