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प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख्वाब'

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प्रज्ञा पत्रकारीय जीवन प्रायः बेतरतीब होता है। पत्रकारों को रोज ही कोई न कोई नई लकीर खींचनी होती है। उनकी नजर आम तौर पर उन तथ्यों या सूचनाओं पर होती हैं जो उनके अखबार के लिए बिकाऊ हो सके। ऐसे में कई बार हवा में तीर चलाना पड़ता है। वैसे उन सभी काम काज में ही ऐसा ही होता है जहां हर रोज भारी अनिश्चितता होती है। कई ऐसे काम काज हैं जहां रोज कुँवा खोदना और पानी पीना होता है। देश की अधिकांश जनता ऐसा ही अनिश्चित जीवन यापन करती है। समकालीन कहानीकारों में प्रज्ञा ने अपने कहन और अनूठे शिल्प से पाठकों का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट किया है। 'चांद जैसे ख्वाब' उनकी ऐसी ही कहानी है। जिसमें एक पत्रकार जो लक्ष्य ले कर एक जमाने के चर्चित कवि शशांक निकेत जी की पत्नी के पास बातचीत करने पहुंचती है लेकिन बातचीत का सूत्र बेतरतीबी से कवि पत्नी और उनके लेखकीय जीवन की तरफ मुड़ जाता है। वह जीवन जिसके बारे में कवि पत्नी अब यह भी बिसर गई हैं कि उन्होंने पहले कुछ इस तरह का लिखा था। प्रज्ञा की यह कहानी हमने 'बनमाली कथा' से साभार लिया है । तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रज्ञा की कहानी 'चांद जैसे ख...

गरिमा श्रीवास्तव से प्रज्ञा की बातचीत

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गरिमा श्रीवास्तव  दक्षिण-पश्चिम पोलैंड स्थित ऑशविट्ज़ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन कब्जे में था। यहां की सोलह जर्जर और निर्जन इमारतों को देखने के पश्चात नाज़ी अधिकारियों ने एक जेल बनाने की योजना बनाई। जिस कस्बे में यह स्थित था, उसका नाम ओस्विसीम या ऑशविट्ज़ था। ओस्विसीम के यहूदी निवासियों को मजबूरन परित्यक्त बैरकों का जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण कर के ऑशविट्ज़ प्रथम नामक जेल बनानी पड़ी, जिसमें युद्धबंदियों को रखा जाना था। इनमें से पहले युद्धबंदियों का आगमन मई 1940 में शुरू हुआ। यूरोप भर से यहूदियों और तृतीय रीख के दुश्मनों को जैसे-जैसे निर्वासित किया गया, शिविर की आबादी बढ़ती चली गई। कांटेदार तारों की बाड़ और निगरानी मीनारों से घिरे ऑशविट्ज़ यातना शिविर के काले द्वारों के ऊपर 'Arbeit macht frei' ('काम आपको आज़ाद करता है') लिखा हुआ था। इस शिविर में लगभग ग्यारह लाख लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई।  गरिमा श्रीवास्तव ने अपने उपन्यास "आउशवित्ज़ : एक प्रेम कथा" में बेहद त्रासद और कारूणिक स्थितियों का चित्रण किया है। हालांकि आउशवित्ज़ यातना का प्रतीक है लेकिन उसे ...