महेश चन्द्र पुनेठा की कविताएं
पहली बार हमने एक नयी श्रृंखला प्रारम्भ की है जिसके अंतर्गत एक कवि की कवितायें दूसरे कवि की टिप्पणी के साथ प्रस्तुत की जा रही हैं। इसी क्रम में प्रस्तुत हैं महेश चन्द्र पुनेठा की कवितायें शैलेय की टिप्पणी के साथ। महेश चन्द्र पुनेठा लोक के बहुत गहरे कवि हैं। गौरतलब है कि उनके यहां लोक किसी सामान्य उद्वरण सामान्य मुहावरे की तरह नहीं बल्कि वह अपनी गहन संवेदना से सम्पृक्त व्यापक सरोकारों के आख्यान की तरह खुलता चला जाता है। पहाड़ के कवि होने के नाते यह बहुत सहज स्वाभाविक है कि अनगिनत घाटियों सी गहरी-गहरी पीड़ाएं और हरी-भरी अगाध ऊंचाइयों का उद्दाम आवेग उनकी कविताओं का प्राथमिक विषय है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि पुनेठा सुमित्रानंदन पन्त की तरह महज प्रकृति के सुकुमार कवि बन कर ठहर नहीं जाते । वे पहाड़ के कठोर जन-जीवन में भीतर तक पै ठ करते हैं और वहां की विषम जमीनी सच्चाइयों को रचना के धरातल प र ला कर पाठक से रूबरू कराते हैं। यह सुखद आश्वस्ति है कि पुनेठा ने अपने पहले कविता संग्रह भय अतल में की हदों को तोड़ते हुए अपनी कविता में व्यंजनाओं की नई जमीन स्थापित की है। ज...