राही डूमरचीर का आलेख 'क्षण में सभे उजार'
रणेंद्र आलोचक का काम केवल रचना को विश्लेषित कर उसकी खूबियां और खामियां गिनाना ही नहीं होता अपितु उसके हवाले से उन तथ्यों, समस्याओं और विचारों को उद्घाटित करना होता है जो उस समय और समाज को गहरे तौर पर प्रभावित कर रहे होते हैं। विकास किसे अच्छा नहीं लगता। किसे नहीं लुभाता। लेकिन भ्रष्ट तन्त्र की कारीगरी तो देखिए, उसने इसके भी मायने बदल दिए हैं। विकास के क्रम में वह क्षणिक बदलाव तो जरूर दिखाई पड़ता है जो हमें तात्कालिक तौर पर प्रभावित करता है लेकिन वह हकीकत नहीं दिखाई पड़ती जो समाज और राष्ट्र को खोखला करती रहती है। रणेंद्र हमारे समय के चर्चित कथाकार और उपन्यासकार हैं। अपनी रचनाओं के द्वारा उन्होंने उस आदिवासी समाज की हकीकत को सामने रखा है जो अभी तक लौह पर्दे के अन्दर छिपा हुआ था या कह लीजिए छिपाया गया था। राही डूमरचीर ने रणेंद्र की कहानी ‘बाबा कौए और काली रात’ के अंतर्पाठ के क्रम में एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है। राही का आलोचकीय दृष्टिकोण हमें आश्वस्त करता है कि हिन्दी आलोचना का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। पहली बार पर राही के रचनात्मक आगाज का हम स्वागत करते हैं। तो आइए आज...