शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का आलेख 'इलाहाबाद में उर्दू-फ़ारसी अदब'
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी इलाहाबाद संगम के लिए दुनिया भर में मशहूर है। गंगा और यमुना जैसी उत्तर भारत की दो बड़ी नदियां यहीं पर एकमेक होती हैं। इस त्रिवेणी की तीसरी धारा उस अदृश्य सरस्वती की है जो ज्ञान से जुड़ी हुई है। इसी से भारतीय परिप्रेक्ष्य में गंगा जमुनी तहजीब की अवधारणा भी अस्तित्व में आई जो हिन्दुओं और मुसलमानों के मेल जोल के लिए आज भी इस्तेमाल की जाती है। एक लम्बे समय तक यह इलाहाबाद उर्दू-फ़ारसी अदब का केन्द्र स्थल बना रहा। मुगलिया जमाने के पतनशील दौर में यही वह भाषा थी जो सत्ता से जुड़ी हुई थी और लेखन के केन्द्र में भी थी। प्रख्यात आलोचक मरहूम शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने इस इलाहाबादी उर्दू-फ़ारसी अदब को केन्द्र में रख कर एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा था। इस आलेख में उन्होंने इलाहाबाद के उर्दू फारसी अदब से जुड़े उन तमाम रचनाकारों का जिक्र किया जो अपनी लेखनी की वजह से एक समय चर्चा के केन्द्र में रहा करते थे। हालांकि आज हम इनमें से कुछेक के बारे में ही जानते हैं। इस आलेख का उम्दा हिन्दी अनुवाद किया है इतिहास के युवा अध्येता शुभानीत कौशिक ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ...