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हितेन्द्र पटेल का आलेख 'बिपन चंद्र के बारे में सोचते हुए'

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बिपन चन्द्र  कुछ किताबें मील का पत्थर होती हैं। वे इतनी जरूरी होती हैं कि उनके बिना एक समय को मुकम्मल तरीके से जानना दिक्कत तलब हो सकता है। आधुनिक भारत के इतिहास की जब भी बात आती है 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' का नाम आवश्यक तौर पर लिया जाता है। इसके लेखक बिपन चन्द्र, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन और के ए पणिक्कर हैं। लेकिन इसके लेखक के तौर पर मुख्य तौर पर प्रायः  बिपन चन्द्र का नाम ही लिया जाता है।  बिपन चन्द्र ने अपनी इस किताब में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी जी के आंदोलनों को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की है। हितेन्द्र पटेल से हमने अनहद के लिए बिपन चन्द्र पर एक स्मृति आलेख लिखवाया था। हाल में उन्होंने उस आलेख का पुनर्लेखन किया है। अपने आलेख में हितेन्द्र लिखते हैं 'गांधी के नेतृत्व में आंदोलन ने जनसाधारण को राजनीतिक बनाया, औपनिवेशिक शासन की वैधता को क्रमशः कमजोर किया, संघर्ष और विराम की लय के माध्यम से संगठन की शक्ति बचाए रखी और स्वतंत्रता के विचार को विस्तृत सामाजिक स्वीकृति दी। 'इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस' इसी दृष्टि ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'सुमित सरकार (1939-2026) का जाना'

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  सुमित सरकार  किसी भी समय के इतिहास को समझने में इतिहासकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पढ़ने पढ़ाने के क्रम में हम किन इतिहासकारों की किताबों से हो कर गुजर रहे हैं, यह बात बहुत मायने रखती है। आधुनिक इतिहास को जानने समझने के लिए एक दौर में सुमित सरकार, विपन चन्द्र, सब्यसाची भट्टाचार्य, रजनी पाम दत्त की किताबें आवश्यक होती थीं। बेहतर समझ के लिए आज भी इन किताबों की अपनी भूमिका है। इन सबमें सुमित सरकार की किताब और किताबों से अलग थी। पहली बार पढ़ते हुए यह बोझिल सी लगी। आज इसे महसूस कर रहा हूं क्योंकि हम एक खास किस्म का इतिहास पढ़ने के अभ्यस्त थे जबकि सुमित सरकार एक अलग तरह का इतिहास लिख रहे थे जिसमें राजनीतिक परिस्थितियों को सामाजिक इतिहास के जरिए जानने समझने और विश्लेषण पर जोर था। लीक से अलग हट कर नई बातों से हो कर गुजरते हुए ये दिक्कतें आती हैं। इस बात में कोई संशय नहीं कि सुमित सरकार की Modern India 1885–1947 आज भी एक उम्दा किताब है। उनके पिता सुशोभन सरकार थे जो बीसवीं सदी के बंगाल के असाधारण प्राध्यापक और मार्क्सवादी इतिहासकार थे। पिता का प्रभाव उनके व्यक्तित्व और लेखन पर ...

हितेन्द्र पटेल का आलेख 'भारत को फिर से सोचने का समय'

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हितेन्द्र पटेल  रोजी रोजगार जीवन से जुड़े ऐसे मुद्दे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक सरकार की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने देश के युवाओं को रोजगार प्रदान करे जिससे कि वह अपना जीवन यापन करने के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा कर सके। लेकिन युवाओं को रोजगार देने के बजाय सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी से बचने के प्रयास में लग जाती हैं। एक और दिक्कत है जो थोड़ी बहुत नौकरियां बची हैं उनकी भर्ती प्रक्रिया में ऐसा भ्रष्टाचार व्याप्त है जिससे दिन रात हाड़तोड़ परिश्रम करने वाले योग्य अभ्यर्थी रोजगार पाने की प्रक्रिया से ही बाहर हो जाते हैं जबकि अयोग्य लोग भ्रष्ट अधिकारियों को साध कर या रिश्वतखोरी के जरिए रोजगार प्राप्त कर लेते हैं। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक होने का मामला बार बार सामने आया है।  ऐसे में युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है जो जंतर मंतर से ले कर रांची तक प्रखर रूप में दिखाई पड़ रहा है। युवाओं (जिन्हें जेन जी कहा जा रहा है) के प्रदर्शन में उनकी भाषा और तरीके को ले कर बुद्धिजीवियों के द्वारा प्रश्नचिह्न उठाए जा रहे हैं। लेकिन इस पीढ़ी को सवालों ...