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प्रेम कुमार मणि का आलेख 'मेरी दृष्टि में राधाकृष्णन'

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सर्वपल्ली राधाकृष्णन  'मेरी दृष्टि में राधाकृष्णन'   प्रेम कुमार मणि बचपन से 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस का स्वाँग देखता रहा हूँ। जब विद्यार्थी था तब इस अवसर पर शिक्षकों के कल्याण के लिए एक कोश इकट्ठा किया जाता था। यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। इस अवसर पर स्कूलों में कुछ आयोजन किया जाता था। वह महान हैं के पाठ सुनते-सुनते हमारी पीढ़ी ऊब गई थी।  जब कॉलेज में पहुंचा तब इनके बारे में कुछ विशेष जाना। कुछ पढ़ा भी इनका लिखा। मेरे गुरु भिक्षु जगदीश काश्यप जी थे। राधाकृष्णन उनके मित्र थे। उनसे एक बार चर्चा की और अनुरोध किया कि राधाकृष्णन जी के बारे में कुछ बतावें। वह हँस कर टाल गये। उनकी किताब 'इण्डियन फिलॉसफी' पढ़ने के लिए कहा। उनकी एक किताब 'उपनिषदों की भूमिका' मैंने हिन्दी में पढ़ी थी। वह आकर्षक लगी थी। 'इण्डियन फिलॉसफी' के बारे में भी बहुत सुना था। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे उस में कुछ विशेष नहीं दिखा। संभव है अधिक समझने का सामर्थ्य मुझ में नहीं रहा होगा। हाँ, जब वह किताब छपी थी तो इस विषय पर एक कायदे की किताब रही होगी। राहुल जी ने अपनी किताब 'दर्शन-...

प्रेम कुमार मणि का आलेख फिरदौसी का ईरान'

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फिरदौसी किसी भी देश को समग्र तौर पर जानने के लिए उसकी संस्कृति को जानना महत्त्वपूर्ण होता है। फारस यानी कि ईरान प्राचीन विश्व संस्कृति का नेतृत्व करने वाले देशों में से एक रहा है। ईरानी धर्मग्रन्थ 'ज़ेंद अवेस्ता' और भारतीय धर्मग्रन्थ 'वेद' में समानता के कुछ दिलचस्प सूत्र दिखाई पड़ते हैं। शाहनामा दुनिया की क्लासिकल कृतियों में एक प्रमुख कृति मानी जाती है। बकौल प्रेम कुमार मणि "फिरदौसी की कृति 'शाहनामा' अरबी संस्कृति के विरुद्ध ईरान के सांस्कृतिक प्रतिरोध का जीवन्त दस्तावेज है। फिरदौसी और 'शाहनामा' को मैं मध्य एशिया के सांस्कृतिक प्रतिरोध का केन्द्रक मानता हूँ।" ईरान आज अमरीका और इजरायल के हमलों का प्रतिरोध कर रहा है। अपनी स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा करने का अधिकार सभी देशों को है। इसी स्वाभिमान की रक्षा करते हुए प्रमुख ईरानी धार्मिक नेता और वहां के वास्तविक शासक आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 28 फरवरी 2026 को शहीद हो चुके हैं। अमरीका आज अपनी मनमानियां करता जा रहा है। वेनेजुएला के बाद ईरान उसके निशाने पर है। किसी भी देश की जनता को अपने शासकों के बारे...

प्रेम कुमार मणि का आलेख 'जवाहर और जेपी'

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  कुछ व्यक्तियों के बारे में हमारे समाज में ऐसी अफवाहें गढ़ दी जाती हैं जो उनके चरित्र के साथ चस्पा हो जाता है। जवाहर लाल नेहरू का व्यक्तित्व ऐसा ही था। गांधी जी के बाद सम्भवतः नेहरू जी ही ऐसे नेता थे जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे। उनके बारे में उनके विरोधियों ने यह अफवाह यह गढ़ दी कि उनके कपड़े धुलने के लिए पेरिस जाते हैं। स्वयं नेहरू जी इस अफवाह से परिचित थे और उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि असहयोग आन्दोलन के दौरान पिता द्वारा वकालत छोड़ दिए जाने के बाद उनका परिवार आर्थिक दिक्कतों का सामना कर रहा था। ऐसे में कपड़ा धुलने के लिए पेरिस भेजने की बात हास्यास्पद ही नहीं बल्कि मूर्खतापूर्ण भी है। प्रेम कुमार मणि ने अपने एक आलेख 'जवाहर और जेपी' में लिखा है 'उन दिनों कांग्रेस मुख्यालय वहीं होता था, जहाँ अध्यक्ष होता था। इस नाते यह इलाहाबाद में था। जेपी ने अपना ठिकाना इलाहाबाद में बनाया। उन्होंने साठ रुपये प्रतिमाह किराये का एक मकान लिया। 16 रुपये के किराये पर फर्नीचर। एक  रोज जवाहर लाल उनके डेरे पर आये। ताम-झाम देख कर पूछा - 'ये फर्नीचर कहाँ से लाये?' फिर प्यार भरे...

प्रेमकुमार मणि का आलेख 'मार्क्स के जन्मदिन पर बुद्ध-चर्चा'

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गौतम बुद्ध ऐसे महामानव थे जिन्होंने अपने समय में कई रूढ़ियों और अंधविश्वासों को साहस के साथ तोड़ा। रूढ़िवादी समय में उन्होंने नई लकीर स्थापित करने की कोशिश की। वे चाहते थे कि दुनिया का हर मनुष्य समर्थ बने, सक्षम बने और अपने जीवन के निर्णय वह खुद ले। उस समय यह एक बहुत बड़ी परिकल्पना थी। अगर यह परिकल्पना साकार हो जाती तो 'स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व' की जो परिकल्पना 18 वीं शताब्दी में फ्रांस में दिखाई पड़ी वह बहुत पहले ही साकार हो गई होती। जीवन और इतिहास में अगर मगर के लिए जगह नहीं होती। दुनिया के तमाम मनुष्य आज भी अपनी स्वतंत्रता और समानता के लिए अच्छी खासी जद्दोजहद कर रहे हैं। आज महामानव महात्मा बुद्ध की जयंती है। संयोगवश आज कार्ल मार्क्स का भी जन्मदिन है। मार्क्स भी समानता के प्रबल पक्षधर थे। इन दोनों विभूतियों को नमन करते हुए आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं प्रेम कुमार मणि का आलेख 'मार्क्स के जन्मदिन पर बुद्ध की चर्चा'। मार्क्स के जन्मदिन पर बुद्ध - चर्चा   प्रेम कुमार  मणि     आज बुद्ध और मार्क्स दोनों की जयंती है। एक ढाई हजार साल से ज्यादा पहले पैदा हु...

प्रेमकुमार मणि का आलेख ''जीवन को उलट पलट दो' (अंतोन चेखब के जन्मदिन पर)।

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  दुनिया का हर मनुष्य आजाद रहना चाहता है। और दुनिया का हर रचनाकार चाहता है कि उसकी आजादख्याली पर कभी कोई प्रतिबन्ध न लगाया जाए। रचनाकार वैसे भी मन मिजाज से स्वतन्त्र होता है और अपनी रचनाओं के मार्फत वह आजादी की अलख जगाए रखता है। चेखब ने अपनी रचनाओं के माध्यम से इसी आजादी की जोरदार हिमायत की। इसकी वजह ये थी कि वे उस परिवार से आते थे जो अर्द्ध दास हुआ करता था। इन अर्द्ध दासों को रूस में 'सर्फ' कहा जाता था।  चेखब को जीते जी वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। लेकिन अन्ततः उनकी रचनाओं ने उन्हें दुनिया के श्रेष्ठ साहित्यकारों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। भले ही उन्हें  अल्पकालीन साहित्यिक जीवन मिला लेकिन इसी अवधि में उन्होंने रूसी भाषा को चार कालजयी नाटक दिए जबकि उनकी कहानियाँ विश्व के समीक्षकों और आलोचकों में बहुत सम्मान के साथ सराही जाती हैं। चेखव अपने साहित्यिक जीवन के दिनों में ज़्यादातर चिकित्सक के व्यवसाय में लगे रहे। वे कहा करते थे कि चिकित्सा मेरी धर्मपत्नी है और साहित्य प्रेमिका। चेखव का प्रभाव अनेक रूसी लेखकों, बुनिन, कुप्रिन, गोर्की जैसे कालजई रचनाकारों पर पड़ा। य...

प्रेमकुमार मणि की समीक्षा आज़ादी के इर्द-गिर्द : चर्चा एक किताब की 

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आज़ादी के इर्द-गिर्द : चर्चा एक किताब की   प्रेम कुमार मणि   मैं आपको एक किताब के बारे में बताऊंगा, जिसे मेरी बेटी ने उपहारस्वरूप दी है। किताब का नाम है  - India Remembered. बेटी इतिहास पढ़ाती है और इतिहास के प्रति मेरे लगाव को शायद  समझती है;  इसीलिए उसने इस किताब को मेरे लिए चुना होगा। किताब पामेला मॉउन्टबेटन की लिखी है, जिसकी भूमिका उनकी बेटी इंडिया हिक्स ने लिखी है। किताब आज़ादी के इर्द -गिर्द की घटनाओं से आपको रू-ब-रू कराती है।   लेकिन सब कुछ जानने के लिए थोड़ी पृष्ठभूमि समझ लेना आवश्यक होगा। किताब की लेखिका पामेला, तत्कालीन गवर्नर जनरल लुइसअर्ल मॉउन्टबेटन और एडविना एश्ले की बेटी हैं। उनकी दो बेटियों में से एक, जो छोटी होने के कारण अपने माता-पिता के साथ तब दिल्ली में थीं। उनकी बड़ी बहन पैट्रिशिया विवाहित थीं। पामेला या पम्मी तब महज अठारह साल की थीं, लेकिन अपने पिता के कहे अनुसार लगभग नियमित डायरी लिखती थीं। एक चंचल-चित्त किशोरी दुनिया के इतने बड़े देश भारत के एक बड़े ऐतिहासिक मोड़ की चश्मदीद थी। वह अपने माता-पिता के साथ 22 मार्च 1947 को भारत पहुंची और 21 ...

प्रेम कुमार मणि का संस्मरणात्मक आलेख 'तलस्तोय, चेख़फ़ और गोरिकी'।'तलस्तोय, चेख़फ़ और गोरिकी

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'तलस्तोय, गोरिकी और चेख़फ़ रूस ने दुनिया को बोल्शेविक क्रान्ति के साथ साथ एक से बढ़ कर एक अप्रतिम साहित्यकार दिए हैं। यह विश्वास कर पाना ही रोमांच से भर देता है कि एक समय वहाँ पर तलस्तोय , चेखफ़ , और गोरिकी (गोर्की) जैसे रचनाकार थे जिनका आपस में संवाद भी था। इन सभी ने अपनी रचनाओं में रूस की तत्कालीन परिस्थिति और जार के तानाशाही शासन की आलोचना की। ऐसा माना जाता है कि बोल्शेविक क्रान्ति घटित होने में गोरिकी की   क्लासिकल कृति ' मदर ' का भी बड़ा हाथ था। तलस्तोय और चेखफ़ की कृतियाँ पढ़ कर लोग आज भी चकित रह जाते हैं। उनके सूक्ष्म ब्यौरे पढ़ कर हम यह महसूस करते हैं कि इस विषय या चीज को ले कर इस तरह भी सोचा जा सकता है। दुनिया के तमाम रचनाकार दृष्टि की इस बारीकी से आज भी सबक लेते हैं। प्रेम कुमार मणि हमारे समय के गम्भीर विचारक और अध्येता हैं। साहित्य , संस्कृति और समकालीन मुद्दों पर उनका हस्तक्षेप हम फेसबुक पर पढ़ते रहते हैं। उन्होंने इन तीनों रचनाकारों को ले कर एक आलेख लिखा है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है प्रेम कुमार मणि का संस्मरणात्मक आलेख ' तलस्तोय , चेख़फ़ और ग...