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अजय तिवारी का आलेख 'परसाई का भारत'

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  हिन्दी साहित्य में काफी समय तक व्यंग्य को एक उपेक्षित विधा के रूप में ही देखा जाता रहा। हरिशंकर परसाई को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने व्यंग्य को उसका समुचित स्थान प्रदान कराया। परसाई जी के पैने और मारक व्यंग्य भले ही इस समय के तात्कालिक विषयों को ले कर लिखे गए हों, वे आज भी प्रासंगिक नजर आते हैं। उनकी धार आज भी बनी हुई है। किसी भी रचना की यह सफलता होती है कि वह परवर्ती समय में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए और बचाए रखे। हालांकि परसाई जी रचना की अमरता में विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि जिन विडंबनाओं को वे अपने व्यंग्य का विषय बना रहे हैं वे अगर सुलझ जाएं तो रचना अप्रासंगिक हो जाती है। कोई भी बेहतर रचनाकार यही चाहता है लेकिन हम भारतीय विडंबनाओं को ही अपना जीवन बना लेते हैं। तभी तो कबीर आज सात सौ वर्षों के बाद भी अपनी रचनाओं में जिन्दा हैं। परसाई जी का यह शताब्दी वर्ष हैं। इस क्रम में पहली बार पर हम कई आलेख पहले भी प्रस्तुत कर चुके हैं। आगे भी इस क्रम में कुछ और आलेख प्रस्तुत किए जाएंगे। इसी शृंखला में आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चर्चित आलोचक अजय तिवारी का आलेख 'परसाई का ...

राकेश मिश्र की कविताएं

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  राकेश मिश्र  राजा अपने आप में ही एक निर्मम शब्द है। राज पद को पाने से ले कर इसे बचाए रखने की जुगत में राजा कुछ भी कर सकता है। पहले इस राज पद को देवत्व प्रदान कर लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास किया जाता था आजकल इसकी जगह 'लाभ' ने ले ली है। इस लाभ का जाल जंजाल कुछ इस तरह का होता है कि इससे पार पाना आसान नहीं। अब राजा शब्द ने भी समय को देखते हुए अपना शाब्दिक चेहरा बदल लिया है और आजकल यह कहीं राष्ट्रपति तो कहीं प्रधानमंत्री के चेहरे में तब्दील हो गया है। इनके इर्द गिर्द सरंजाम वही हैं जो पहले कभी हुआ करते थे। राजा की हुकूमत उसके समर्थकों और लाभार्थियों से पूरी हो जाती है। इसके बावजूद जो दायरे में नहीं आते उन्हें राजा दायरे में समेटने के लिए सारे जोर जुगत लगा डालता है। कवि राकेश मिश्र की नजर इस राजा पर रही है। वे खुद भी एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते इससे बखूबी वाकिफ हैं। आज पहली बार पर हम राकेश मिश्र की कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं। कवि की कविताओं पर टिप्पणी की है चर्चित आलोचक अजय तिवारी ने। इस पोस्ट का संयोजन कवि केशव तिवारी का है। विडम्बना की दृष्टि  राकेश मिश्र की कविता...