अजय तिवारी का आलेख 'परसाई का भारत'
हिन्दी साहित्य में काफी समय तक व्यंग्य को एक उपेक्षित विधा के रूप में ही देखा जाता रहा। हरिशंकर परसाई को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने व्यंग्य को उसका समुचित स्थान प्रदान कराया। परसाई जी के पैने और मारक व्यंग्य भले ही इस समय के तात्कालिक विषयों को ले कर लिखे गए हों, वे आज भी प्रासंगिक नजर आते हैं। उनकी धार आज भी बनी हुई है। किसी भी रचना की यह सफलता होती है कि वह परवर्ती समय में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए और बचाए रखे। हालांकि परसाई जी रचना की अमरता में विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि जिन विडंबनाओं को वे अपने व्यंग्य का विषय बना रहे हैं वे अगर सुलझ जाएं तो रचना अप्रासंगिक हो जाती है। कोई भी बेहतर रचनाकार यही चाहता है लेकिन हम भारतीय विडंबनाओं को ही अपना जीवन बना लेते हैं। तभी तो कबीर आज सात सौ वर्षों के बाद भी अपनी रचनाओं में जिन्दा हैं। परसाई जी का यह शताब्दी वर्ष हैं। इस क्रम में पहली बार पर हम कई आलेख पहले भी प्रस्तुत कर चुके हैं। आगे भी इस क्रम में कुछ और आलेख प्रस्तुत किए जाएंगे। इसी शृंखला में आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं चर्चित आलोचक अजय तिवारी का आलेख 'परसाई का ...