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कँवल भारती का आलेख 'राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर'

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डॉ भीम राव अम्बेडकर  जाति व्यवस्था भारत के लिए एक ऐसी असाध्य समस्या की तरह है जिसका निदान आज तक नहीं निकाला जा सका है। हमारे बुद्धिजीवियों ने इस पर गम्भीर चिन्तन कर इसे खत्म करने हेतु अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। राहुल सांकृत्यायन इसके लिए साम्यवादी तरीका अपनाने की बात करते हैं तो बाबा साहेब डॉ. भीम राव आंबेडकर इसका निदान आर्थिक समस्याओं में देखते हैं। इसी बिना पर  डॉ. आंबेडकर राहुल सांकृत्यायन की आलोचना भी करते हैं। राहुल की नजर में सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का काम जेल जाने या फाँसी चढ़ने से भी ज्यादा साहस का काम है। वे लिखते हैं- ‘‘साम्यवादियों को इसे तो पहला सामाजिक नियम बना देना चाहिए कि इसमें आने वाला हिन्दू हो या मुसलमान, छूत हो या अछूत, उसे एक साथ खाना-पीना चाहिए। उसको यह न ख्याल करना चाहिए कि साधारण लोग क्या कहेंगे। किसी भी सामाजिक क्रान्ति में शामिल होने वालों को कुछ कड़वा-मीठा सहने के लिये तैयार होना ही चाहिए। लोग जेल जाने और फाँसी चढ़ जाने को बड़ी हिम्मत की बात कहते हैं। समाज की रूढ़ियों को तोड़ना और उसके द्वारा उनकी आँखों में काँटे की तरह चुभना जेल और फाँसी से भी ...

कँवल भारती का आलेख 'नौटंकी और सांग'

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कंवल भारती नौटंकी उत्तर भारत की ख्यात नाट्य परम्परा है। पूर्व-आधुनिक भारत के किसान समाज में रची-बसी यह नाट्यकला जीवंत नृत्य, ढोल की थाप और बुलंद गायन से शुरू होती है। नगाड़े की थाप इसे अलग अर्थ प्रदान करती है। यह नाट्य परम्परा अपने आप में इस अर्थ में मौलिक है कि यह भारतीय जनजीवन में प्रचलित धार्मिक महाकाव्यों रामायण और महाभारत से इतर समकालीन जीवन और उसकी विडम्बना पर केन्द्रित होती है। इनकी कथाएँ अक्सर नाटकीय प्रेम प्रसंग में फंसी नायिकाओं के जीवन पर केंद्रित होती हैं। कैथरीन हैनसेन की नौटंकी पर एक महत्त्वपूर्ण किताब है 'ग्राउंड्स फॉर प्ले'। अपनी इस किताब में कैथरीन हैनसेन ने अपने शोध के आधार पर नौटंकी प्रदर्शन के विभिन्न तत्वों - संगीत, नृत्य, कविता, लोकप्रिय कथाएँ और लिखित ग्रंथों का वर्णन किया है। वे इस कला विधा के सामाजिक इतिहास का पता लगाती हैं और नौटंकी कथाओं में अर्थों के खेल का अन्वेषण करती हैं, विशेष रूप से उन तरीकों पर ध्यान केंद्रित करती हैं जिनसे राजनीतिक सत्ता, सामुदायिक पहचान और लैंगिक असमानता जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे इन कथाओं में प्रस्तुत किए जाते हैं। एक सम...

कँवल भारती का आलेख 'संविधान, संविधानवाद और आंबेडकर'

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  कँवल भारती विगत 27 मार्च 2025 को इलाहाबाद में दलित आलोचक  कँवल भारती द्वारा  सत्यप्रकाश मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण  व्याख्यान  दिया गया। व्याख्यान का विषय था  "संविधान, संविधानवाद और डा. आंबेडकर"। इन तीनों बिंदुओं की तह में जाते हुए भारती जी ने उस लोकतन्त्र की चर्चा की जो संविधान का मूल उद्देश्य है। संविधानवाद सैद्धांतिकी का आधार बनाता है और अंबेडकर संविधान के उन पहलुओं की चर्चा करते हैं जिससे एक भेदभाव रहित समाज की स्थापना की जा सके।  कँवल भारती इस व्याख्यान में बताते हैं कि ' संविधान और संविधानवाद के बीच एक महीन सी नहीं, मोटी सी लकीर है। संविधान समाज का निर्माण नहीं करता। वह समाज को न नैतिक समाज बनाता है, और न अनैतिक। वह सिर्फ समाज को नियंत्रित करता है। लेकिन संविधानवाद में किसी ख़ास तरह के समाज का निर्माण करने की भावना निहित होती है। इसलिए अच्छे या बुरे संविधान का निर्माण करने के लिए जो चीज़ प्रेरित करती है, वह निस्संदेह संविधानवाद है। यह एक संवैधानिक धारणा, दर्शन या वैचारिकी का नाम है।' तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं...