कँवल भारती का आलेख 'राहुल सांकृत्यायन और डॉ. आंबेडकर'
डॉ भीम राव अम्बेडकर जाति व्यवस्था भारत के लिए एक ऐसी असाध्य समस्या की तरह है जिसका निदान आज तक नहीं निकाला जा सका है। हमारे बुद्धिजीवियों ने इस पर गम्भीर चिन्तन कर इसे खत्म करने हेतु अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। राहुल सांकृत्यायन इसके लिए साम्यवादी तरीका अपनाने की बात करते हैं तो बाबा साहेब डॉ. भीम राव आंबेडकर इसका निदान आर्थिक समस्याओं में देखते हैं। इसी बिना पर डॉ. आंबेडकर राहुल सांकृत्यायन की आलोचना भी करते हैं। राहुल की नजर में सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का काम जेल जाने या फाँसी चढ़ने से भी ज्यादा साहस का काम है। वे लिखते हैं- ‘‘साम्यवादियों को इसे तो पहला सामाजिक नियम बना देना चाहिए कि इसमें आने वाला हिन्दू हो या मुसलमान, छूत हो या अछूत, उसे एक साथ खाना-पीना चाहिए। उसको यह न ख्याल करना चाहिए कि साधारण लोग क्या कहेंगे। किसी भी सामाजिक क्रान्ति में शामिल होने वालों को कुछ कड़वा-मीठा सहने के लिये तैयार होना ही चाहिए। लोग जेल जाने और फाँसी चढ़ जाने को बड़ी हिम्मत की बात कहते हैं। समाज की रूढ़ियों को तोड़ना और उसके द्वारा उनकी आँखों में काँटे की तरह चुभना जेल और फाँसी से भी ...