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राजेन्द्र कुमार से अनुपम परिहार की बातचीत

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कविता हो या आलोचना, संपादन हो या सांगठनिक सक्रियता प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार हर मोर्चे पर सक्रिय दिखाई पड़े। इलाहाबादी सादगी के वे एक मजबूत स्तम्भ थे। उनके न होने से इलाहाबाद कुछ और कमतर महसूस कर रहा है। राजेन्द्र कुमार जी ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर ही जिया। उनकी अपनी कुछ प्रतिबद्धताएं थीं। ये प्रतिबद्धताएं उनके लेखन की आत्मा में रची-बसी हुई थीं। उर्दू पर उनकी  बेहतर पकड़ थी। इलाहाबादी परम्परा में हिन्दी उर्दू के बीच वे अन्तिम मजबूत स्तम्भ थे। ' सरस्वती' के लिए राजेन्द्र कुमार जी से पत्रिका के सम्पादक अनुपम परिहार ने एक बातचीत की थी। कई मायनों में यह बातचीत आज भी प्रासंगिक है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  राजेन्द्र कुमार से अनुपम परिहार की बातचीत। इस बातचीत को हमने सरस्वती के   जुलाई-सितम्बर, 2024 से साभार लिया है।  बातचीत उपलब्ध कराने के लिए हम अनुपम परिहार के आभारी हैं।  प्रेम सारी कलाओं का महत्तम समापर्त्य है कवि-आलोचक राजेन्द्र कुमार से सरस्वती सम्पादक अनुपम परिहार की बातचीत अनुपम परिहार : 'सरस्वती' और 'इंडियन प्रेस' की ओर से आपका अभि...

अनुपम परिहार की कहानी 'बागड़बिल्ला'

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  अनुपम परिहार  मानव जीवन में रिश्तों की प्रमुख भूमिका रहती आई है। लेकिन जैसे जैसे भौतिकवाद का विकास हुआ सम्पत्ति की अहमियत बढ़ने लगी और रिश्ते नाते इस सम्पत्ति के इर्द गिर्द निर्धारित होने लगे। इसने मानवीय मूल्यों को भी दुष्प्रभावित किया है। अनुपम परिहार प्रतिष्ठित पत्रिका सरस्वती के संपादन से जुड़े हैं और बेहतर कवि हैं। आजकल कहानी लेखन की तरफ मुड़े हुए हैं। अपनी इस पहली कहानी में अनुपम ने जटिल मानवीय सम्बन्धों की पड़ताल करने की सफल कोशिश की है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  अनुपम परिहार की कहानी 'बागड़बिल्ला'। 'बागड़बिल्ला' अनुपम परिहार     उसका असली नाम प्रचंड प्रताप सिंह था, लेकिन गाँव में उसकी उद्दंडता और अलग व्यवहार के कारण लोग उसे बागड़बिल्ला कब कहने लगे, यह उसे भी पता नहीं चला। जल्दी ही लोग उसका असली नाम भूल गए और वह बागड़बिल्ला नाम से ही जाना जाने लगा था। वह अनाथ था। उसके माता-पिता दोनों कब और कैसे मरे, यह बात किसी को भी पता नहीं थी। उसके पास 10-12 बीघा जमीन थी; जिसकी बदौलत उसे खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। उसकी मानसिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी, जिस...

अनुपम परिहार के दोहे

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  अनुपम परिहार   दोहा अपने को व्यक्त करने की वह सर्वाधिक प्रिय विधा है जिसमें भक्ति काल से ही रचनाएँ लिखी और सराहीं गईं। ये रचनाएँ लोगों के बीच काफी चर्चित भी हुई। इनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी कवियों के तमाम दोहे लोगों की जुबान पर हैं। सूक्त वाक्य के रूप में लिखे गए दोहे आज भी जैसे मन मस्तिष्क में बस जाते हैं। कबीर , जायसी , तुलसी , रहीम , रविदास के दोहों से भला कौन ऐसा होगा जो परिचित नहीं होगा। आज के समय में भी दोहे लिखे जा रहे हैं। ' पद-कुपद ' में संकलित अष्टभुजा शुक्ल के दोहे काफी चर्चित रहे। अनुपम परिहार ने इधर कुछ चुटीले अंदाज़ वाले दोहे लिखे हैं जिनमें हमारे समय की विडंबनाओं पर करारा प्रहार किया गया है। अनुपम ने अपने लेखन में दोहे के शास्त्रीय पक्ष को भी बखूबी निबाहा है। आज पहली बार पर प्रस्तुत है अनुपम परिहार के दोहे।     अनुपम परिहार के दोहे।   लोकतंत्र की आड़ में , राजतंत्र का राज। पिता वृद्ध अब हो चला , बेटे के सिर ताज।।( 1) वामपंथ मस्तिष्क में , ना अल्ला न राम। ऐसे काफ़िर पंथ को , मेरा शिष्ट सलाम।।( 2) टूट रहे रिश्ते सभी ...