राजेन्द्र कुमार से अनुपम परिहार की बातचीत
कविता हो या आलोचना, संपादन हो या सांगठनिक सक्रियता प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार हर मोर्चे पर सक्रिय दिखाई पड़े। इलाहाबादी सादगी के वे एक मजबूत स्तम्भ थे। उनके न होने से इलाहाबाद कुछ और कमतर महसूस कर रहा है। राजेन्द्र कुमार जी ने अपना जीवन अपनी शर्तों पर ही जिया। उनकी अपनी कुछ प्रतिबद्धताएं थीं। ये प्रतिबद्धताएं उनके लेखन की आत्मा में रची-बसी हुई थीं। उर्दू पर उनकी बेहतर पकड़ थी। इलाहाबादी परम्परा में हिन्दी उर्दू के बीच वे अन्तिम मजबूत स्तम्भ थे। 'सरस्वती' के लिए राजेन्द्र कुमार जी से पत्रिका के सम्पादक अनुपम परिहार ने एक बातचीत की थी। कई मायनों में यह बातचीत आज भी प्रासंगिक है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं राजेन्द्र कुमार से अनुपम परिहार की बातचीत। इस बातचीत को हमने सरस्वती के जुलाई-सितम्बर, 2024 से साभार लिया है। बातचीत उपलब्ध कराने के लिए हम अनुपम परिहार के आभारी हैं।
प्रेम सारी कलाओं का महत्तम समापर्त्य है
कवि-आलोचक राजेन्द्र कुमार से सरस्वती सम्पादक अनुपम परिहार की बातचीत
अनुपम परिहार : 'सरस्वती' और 'इंडियन प्रेस' की ओर से आपका अभिवादन। एक लम्बे अन्तराल के पश्चात 'सरस्वती' का पुनर्प्रकाशन हुआ है। आपने सरस्वती के अंक देखे होंगे। आपकी पहली प्रतिक्रिया?
राजेन्द्र कुमार : 'सरस्वती' और 'इंडियन प्रेस' के संबंध का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। एक लंबे अंतराल के बाद 'इंडियन प्रेस' को फिर 'सरस्वती' के प्रकाशन का सुयोग मिला है तो आज, जो हमारा सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश है, उसकी दृष्टि से कई नयी चुनौतियां भी सामने हैं। 20वीं सदी वैश्विक स्तर पर एक नये वैचारिक और सुधारवादी आंदोलनों के बीच से अपनी उठान के उत्साह में थी। भाषा और साहित्य के प्रश्न ज्ञान और संवेदना, स्वाधीनता और समानता के प्रश्न भी थे। हिन्दी को एक ऐसे स्वरूप में ढालने की ज़रूरत थी, जो ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न अनुशासनों के वहन का दायित्व निभा सके। मध्ययुगीन संस्कारों से मुक्ति की दिशा में अग्रसर हो सके। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसा समर्पणशील व्यक्तित्व था जो बिना किसी लाभ-लोभ के, अपने व्यापक सोच की कसौटी पर रचनाओं को परखने की आजादी के लिये किसी से कोई समझौता न करने का दृढ़ संकल्प लिये रहा। पर आज न वैसा कोई व्यक्तित्व है, न वैसी पत्रकारिता।
हालांकि मैं ऐसा कह रहा हूँ तो मुझे खुद अपने पर भी शर्म आ रही है। फिर सोचता हूँ कि आचार्य द्विवेदी भी आज होते तो क्या स्थितियां ऐसी हैं कि वे अपने विवेक पर कायम रह पाते? आज विवाद ज्यादा हैं, विश्वसनीयता कम।
देखा जा रहा है कि जो भी पत्रिका लंबे अंतराल के बाद दोबारा निकली, पुरानी प्रतिष्ठा के अनुरूप स्तर नहीं प्राप्त कर सकी। अपवाद के रूप में केवल 'हंस' का नाम ले सकते हैं। हालांकि वह राजेन्द्र यादव जैसे संपादक का कमाल था कि उन्होंने 'हंस' को भले ही एकदम प्रेमचंद का जैसा 'हंस' न बने रहने दिया हो, लेकिन अपने समय के विमशों का अग्रवाहक बना कर उसे नये स्तर पर ला दिया।
असल में होता यह है कि जब कोई पत्रिका फिर से निकलती है तो उसके पुराने स्तरीय स्वरूप का प्रेत पीछे लगा रहता है। उससे मुक्ति का उपाय यही हो सकता है कि समय के बदलाव के अनुरूप उसकी प्रासंगिकता के नये धरातल तलाशे जाएं।
'सरस्वती' के पुनर्प्रकाशन पर फिलहाल आपको और इंडियन प्रेस को शुभकामनाएँ। सर्जनात्मक सामग्री के चयन में थोड़ी ज्यादा सतर्कता की ज़रूरत है। 'धरोहर' स्तंभ में सरस्वती के पुराने अंकों से कुछ अन्य लेखकों के लिखे को भी चुन कर छाप सकते हैं। कला और साहित्य के साथ ज्ञान-विज्ञान के अन्यान्य विषयों के सुधी अध्येताओं और चिंतकों से भी लिखवाइए।
अनुपम परिहार : आपने हिंदी साहित्य में आलोचना के क्षेत्र में कैसे प्रवेश किया?
राजेन्द्र कुमार : मेरी विशेष रुचि शुरू से ही सृजनात्मक लेखन में ही रही। सच कहूँ तो आलोचना से मेरा नाता अध्यापन-कर्म के ज़रिए बना बहुत बाद में। विद्यार्थी मैं विज्ञान का था। इलाहाबाद आया तो पहले अध्यापक भी विज्ञान का ही बना। हिंदी साहित्य से अध्यापक के रूप में रिश्ता तो संयोग से बना। बहरहाल, फिर। विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में आ गया। तो कहना चाहिए, आलोचना मेरे अध्यापन-कर्म का बाई-प्रोडक्ट है।
अनुपम परिहार : आपकी आलोचना पद्धति पर किन-किन विचारधाराओं को प्रभाव रहा है?
राजेन्द्र कुमार : अपने गृहनगर कानपुर में पढ़ाई-लिखाई के दौरान मैं प्रगतिशील लेखकों के संपर्क में रहा। कानपुर तब मिलों और मज़दूरों का शहर था। मार्क्सवादी विचारों की लहर थी। कामरेड राम आसरे, संत सिंह यूसुफ़, सुल्तान नियाज़ी जैसों का प्रभाव और शील जी, सुदर्शन चक्र जैसे कवियों का साथ-संग। इस सबसे मेरे लेखन का भी विचारधारात्मक पर्यावरण रचा-बसा रहा।
उन दिनों कानपुर में प्रगतिशील चेतना के लेखकों में हृषीकेश और कथाकार कामता नाथ से मेरी खूब पटरी बैठती थी। बाद में कामता नाथ ने लखनऊ में अपना स्थायी ठिकाना बनाया। देवीशंकर अवस्थी भी तब डी. ए. वी. कालेज में अध्यापक हो गये थे। उनकी सोहबत से सीख मिली कि विचारधारा यांत्रिक रूप में रचना में उतार देने के लिए नहीं होती। लेकिन आलोचनात्मक लेखन में तो तब मेरी कोई रुचि थी नहीं। संभव है, मेरे रचनात्मक लेखन में सहजतया विचारधारात्मक सजगता जैसा कोई तत्त्व आपको दिख जाए। हाँ, जब इलाहाबाद आ गया और आलोचना में भी कुछ कोशिशें शुरू करनी पड़ीं तो उन कोशिशों में ज़रूर मार्क्सवादी दृष्टि की ओर मेरा झुकाव विशेष लक्षित किया जा सकता है।
अनुपम परिहार : क्या आपको लगता है कि आज साहित्यिक आलोचना का स्तर गिर गया है?
राजेन्द्र कुमार : आलोचना को यदि सचमुच मूल्यांकन कर्म माना जाए, तो यह वास्तविक अर्थों में उसी से सध सकता है। जो सबसे पहले आत्मालोचना का साहस जुटा ले और आत्मविश्वास का मूल्य पहचानता हो। आज यह शर्त संकट में है। आज हर कोई अपनी तारीफ़ ही सुनना चाहता है। हर किसी को भय है कि दूसरा हमें अस्वीकार न कर दे।
प्रामाणिक आलोचना के लिए ज़रूरी है कि आलोचक किसी रचना की ओर सबसे पहले एक सहृदय और प्रबुद्ध पाठक के रूप में मुखातिब होने की पात्रता अर्जित कर ले। और फिर रचना से उसे कुछ मिलता है, तो अपने आप से पूछ ले कि क्या यह केवल उसकी रुचि भर को तृप्त कर के रह जा रहा है या उसके विवेक से भी उसका कोई संबंध बन सका है। पर ऐसा हो सकने में सबसे बड़ी बाधा आज यह है कि रचना से ज़्यादा हमारा ध्यान इस बात पर अटका रहता है कि रचना है किसकी। इस तरह रचना के प्रति आलोचना ईमानदार कैसे हो सकती है?
आलोचक हो या रचनाकार, दोनों को जिस भाषा से काम लेना होता है, वह भाषा एक परंपरा से प्राप्त होती है। लेकिन विडम्बना यह है कि उस भाषा में संभव हुई चिंतन-परंपरा से अवगत होने का उत्साह हममें उतना होता नहीं, जितना अंग्रेज़ी में आए आधुनिक विदेशी चिंतन के प्रति होता है। जब तक दस-पांच विदेशी साहित्यशास्त्रियों से कुछ उद्धरण ले कर हम अपने लेखन में टांक न लें, हमें लगता है, हमारी आलोचकीय दृष्टि कृतार्थ हुई ही नहीं। बहुत हुआ तो अपनी भाषा में अपने से पहले के कुछ नामी आलोचकों को पढ़ कर उनके यहाँ से कुछ सूत्र ले लिये। बस। तो यह तो एक तरह से जूठन बटोरना हुआ। ऐसे में जो स्तर आलोचना का हो सकता है, आज वैसा ही है।
अनुपम परिहार : आधुनिक हिन्दी के विकास में आलोचना की भूमिका को आप किस प्रकार देखते हैं?
राजेन्द्र कुमार : हिन्दी के विकास में आलोचक की भूमिका के सवाल पर मैं सबसे पहले कबीर का नाम लूंगा। आप चौकेंगे। आपने पढ़ा तो यही होगा कि आलोचना आधुनिक विधा है। पर मैं कहता हूँ, हिंदी का पहला आलोचक तो मध्य युग में ही हो गया था। उसका नाम था कबीर। आलोचना का जन्म कबीर की कविता से होता है। आधुनिक काल में नई बात सिर्फ इतनी हुई कि आलोचना ने गद्य की राह पकड़ी, और आलोचना ने गद्य की राह पकड़ी तो एक तरह से यह कहना अनुचित न होगा कि उसके निर्देशन में आधुनिक हिंदी कविता ने भी अपनी मुक्ति की संभावना गद्य में ही तलाशना शुरू की।
कबीर ने जब अपनी कविता के बारे में अपने श्रोता ('साथी') से कहा होगा, 'तुम जिन जानहु गीत यह, यहु निज ब्रह्म विचार', तो वे खुद अपनी कविता को समझने का एक सूत्र दे रहे थे। क्या इस भूमिका में वे आलोचक नहीं थे? खुद अपनी कविता को देखने की सही दृष्टि अपने भावक को बताना, यह भी तो आलोचना-कर्म ही हुआ न। आप इसी तर्ज की आलोचना का एक विकसित रूप आधुनिक काल में निराला के लेख 'मेरे गीत मेरी कला' में देख सकते हैं।
एक बात और। रचना का विवेचन क्या उस समाज के विवेचन के बिना संभव है जिसमें (और जिसकी भाषा में) रचना की गई होती है? इस संदर्भ में भी आप देखिए कबीर उस समाज की कितनी खरी आलोचना कर रहे हैं-जिसमें उन्हें अपना रचना-कर्म करना है। 'आलोचना की सामाजिकता' का सवाल उठाने की तमीज़ जो आधुनिक आलोचना में आई क्या उसकी पृष्ठभूमि आपको कबीर में नहीं दिखाई देती? आज आलोचना में जो विमर्शपरक स्वर हैं, उनका योगदान कविता ही नहीं, अन्यान्य विधाओं के कथ्य को भी नये अनुभव-संदों और विकसित संवेदनाओं में ढलते जाने की दिशा दे रहे हैं।
अनुपम परिहार : आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, और डॉ. नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि पर आपके क्या विचार हैं?
राजेन्द्र कुमार : आलोचना के ऐतिहासिक विकास-क्रम की दृष्टि से पहले तो एक क्रम में नामों को यों रखिये- रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और रामस्वरूप चतुर्वेदी। हिन्दी आलोचना को स्पष्ट, सुचिंतित और वस्तुपरक आधार पर विश्वसनीय बनाने के लिए एक सैद्धान्तिकी की ज़रूरत थी। इस दिशा में एक प्रवर्तनकारी भूमिका निभाने का श्रेय शुक्ल जी को है। उनकी आलोचना-दृष्टि जितना उनके विवेक का पता देती है, उतना ही उनकी रुचि का भी। (कहीं कहीं विवेक पर रुचि हावी हो जाती है।) उन्हें इस बात का भी श्रेय है कि उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के ज्ञान के साथ पश्चिमी चिंतकों से भी अपने परिचय को अद्यतन बनाए रखने की कोशिश की। इसका लाभ उनकी आलोचना-दृष्टि को भी मिला और उनकी साहित्येतिहास-दृष्टि को भी।
हजारी प्रसाद द्विवेदी संस्कृत के विद्वान थे। प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में भी उनकी गति निर्वाध रही। हिन्दी आलोचना में कालिदास और कबीर, दोनों को साध लेना, यह उन्हीं का सामर्थ्य था। पांडित्य और लालित्य, शास्त्र और लोक उनके यहाँ एक-दूसरे से संतुलित होते मिलते हैं।
द्विवेदी जी आधुनिकता के किसी पश्चिमी माडल के प्रभामंडल से तनिक भी आतंकित हुए बिना अपनी देसी ठसक पर कायम रहे। लेकिन उन्होंने अपनी समकालीन रचनाशीलता को परखने का उत्साह नहीं दिखाया। आदिकाल और मध्यकाल तक का परिदृश्य ही उनकी दृष्टि में ज्यादा रहा।
रामविलास शर्मा ने अपनी आलोचना-दृष्टि को जो विस्तार दिया, उससे उनके विचारधारात्मक रुझानों का पता भी चलता है और उनके व्यवस्थित इतिहास-बोध का भी। उनकी आलोचनात्मक मेधा का महत्त्वपूर्ण देय है उनकी ज्ञान-मीमांसा। लेकिन अपने निष्कर्षों के आग्रहों पर अविचलित रहने का उनका मोह शक पैदा करता है कि वे आलोचना में आत्म-संघर्ष की कोई ज़रूरत नहीं समझते।
फिर भी वे मार्क्सवादी आलोचना में अन्यतम हैं अपने साधक व्यक्तित्व के कारण। वे इतिहास में गये, इसलिए नहीं कि उन्हें इतिहासकार होने का दावा पेश करना था। वे राजनीतिशास्त्र में गये, इसलिए नहीं कि उन्हें राजनयिक होना था। वे दर्शनशास्त्र और समाजशास्त्र में गये, इसलिए नहीं कि उन्हें दार्शनिक या समाज शास्त्री होना था। यहाँ तक कि भाषाविज्ञान में गये तो भी महज़ भाषावैज्ञानिक होने के उद्देश्य से नहीं। मूलतः तो उन्हें भूमिका संस्कृति के व्याख्याकार और आलोचक की ही निभानी थी। उनकी आलोचना में 'जनता' और 'जाति'- ये दो शब्द वैसे ही अविच्छिन्न हैं जैसे 'साहित्य' और 'भाषा'।
नामवर सिंह हिन्दी आलोचना में जिस धमक के साथ आए और जैसी धाक उन्होंने जमाई, उसकी दूसरी मिसाल नहीं। शुरूआत उन्होंने ऐसी तैयारी से की, जिसकी धार हमेशा बनी रही। लिख कर जो कुछ करना था, कर लिया और फिर बोलते ही रहे। पर उनका बोला हुआ भी लिखे हुए की तरह इतना सुव्यवस्थित होता कि किताब बन जाती। अपनी मान्यताओं में अस्थिर चाहे जितना रहे हों, असंगत कभी नहीं दिखते। स्मृति अच्छी और अध्ययन अद्यतन, तो काहे की फिक्र? तर्क के तो डिक्टेटर थे। तर्क सीधे काम आ जाए तो ठीक, नहीं तो दरेरा दे कर काम निकाल लेते।
रामस्वरूप जी न राम विलास शर्मा की तरह आग्रही थे, न नामवर सिंह की तरह विवादप्रिय। शांत और संयत प्रकृति के गंभीर अध्येता थे। आलोचना को अधिकाधिक वस्तुपरक और विश्वसनीय बनाए रखने के लिए वे कृति की जांच-परख का बुनियादी आधार भाषा और संवेदना को मानते थे।
रामस्वरूप जी कभी पालिमिक्स के चक्कर में नहीं पड़े। आलोचना को उन्होंने बौद्धिक और विचारधारात्मक पहलवानी का अखाड़ा कभी नहीं समझा। पढ़ा खूब, उनको भी जो उन्हें उखाड़ने में लगे रहे। पर अपने आलोचनात्मक विवेक के पांव कभी नहीं उखड़ने दिये। उनकी समझदारी की ज़मीन अध्ययन-पुष्ट और संवेदनासिक्त थी। लोग उन्हें कलावादी और रूपवादी समझते रहे। पर किसी बाद का ठप्पा किसी पर लगा कर उसके अवमूल्यन में उनकी कभी कोई रुचि नहीं रही। यहाँ तक कि जितना मैंने उनको जाना, मैंने कभी यह महसूस नहीं किया कि मार्क्सवाद-विरोध जैसा कोई मोर्चा उनका रहा हो। हां, मार्क्सवादी वो नहीं थे। कह सकते हैं, मार्क्सवाद के सहृदय आलोचक ज़रूर थे।
अनुपम परिहार : क्या आपको लगता है कि साहित्यिक आलोचना आज के समय में पाठकों को इतना प्रभावित नहीं करती जितना पहले करती थी?
राजेन्द्र कुमार : अब, इस प्रश्न का जवाब तो आपको उन्हीं बातों से मिल जाना चाहिए, जो मैंने कुछ देर पहले प्रामाणिक आलोचना की बुनियादी शर्तों के रूप में बताईं। विश्वसनीयता का बड़ा संकट है।
सब ज्यादातर वही रास्ता पकड़ लेते हैं, जिस पर चलना निरापद हो। रचना हो, चाहे आलोचना दोनों में साहसी और विद्रोही होने का तमगा सब पाना चाहते हैं, पर दांव पर कुछ लगाना नहीं चाहते। निर्भयता, प्रलोभनरहितता और निर्ममता अब सिर्फ शब्द भर हैं। नज़र बस वर्तमान पर रहती है। जो है, बस उसी में से संबंधानुसार प्रशंसा के लिए, कुछ निंदा के लिए चुन कर जो मन में आता है, लिखते रहते हैं। निश्चय ही आलोचक का दायित्व पाठकों को संस्कारित और रचना के प्रति जिज्ञासु बनाना भी होता है। लेकिन पाठक भी अब ऐसे कितने हैं जो सचमुच पाठक हों। वे भी मानो दर्शक बन गए हैं, फेसबुक पर जो दिख जाए या अखबार में किसी की कोई पुरस्कार पाते फोटो दिख जाए तो बस इतने भर से ही राय बना लेते हैं। तो ऐसे पाठकों को आलोचक भला क्या प्रभावित करेगा?
अनुपम परिहार : आपकी दृष्टि में हिन्दी साहित्य में जो प्रयोग किए गए हैं वे कितने सफल हैं?
राजेन्द्र कुमार : प्रयोग से आपका जो भी आशय हो, मेरे खयाल से प्रयोग साधन को ले कर ही किये जा सकते हैं। साध्य तो साहित्य में जीवन के सत्य और जीने की मानवीय संभावनाओं के प्रति अपनी जिज्ञासु संवेदनाओं के तादात्म्य-बिंदुओं को ट्रेस करना ही होता है। उद्देश्य के लिए रचनात्मक विकलता से उत्प्रेरित हो कर प्रयोग किए जाएं, तो निश्चय ही सार्थक कहे जाएंगे। अन्यथा, प्रयोग कितने भी मौलिक हों, उनकी सर्जनात्मक अर्थवत्ता कैसे पहचानी जा सकेगी। मात्र भाषा या शिल्प के चमत्कार तो अंततः फुस्स ही हो जाते रहे। प्रयोग करिए अपने अनुभवों के संयोजन के साथ करिए, निरंतर जटिल होती जाती जीवन-स्थितियों की भाषा में संप्रेष्यता के लिए करिए, अभिव्यक्ति की समाई में क्या आया, क्या आने से रह गया, इसको जांचने के लिए करिए। प्रयोगों की सार्थकता की शर्ते शायद यही हो सकती हैं।
इस दृष्टि से कथाकारों में उदय प्रकाश ने और एक हद तक अखिलेश ने कुछ प्रयोग किये हैं सार्थक। कविता में एक ही नाम सूझता है देवी प्रसाद मिश्र का।
अनुपम परिहार : आपकी कविताओं में जो भावनात्मक गहराई है उसका स्रोत क्या है?
राजेन्द्र कुमार : मेरी कविताओं में आपको भावात्मक गहराई की प्रतीति होती है तो यह मेरे लिए एक आश्वस्ति है। मेरे ही लिए क्यों, बल्कि कहूँ, मेरी रचना की ओर से आपकी पाठकीय अनुभूतिप्रवणता और ग्रहणशीलता की आश्वस्ति भी। असल प्रश्न तो यही है कि कोई पाठक रचना को ग्रहण कितना और किस रूप में कर पाता है।
जहाँ तक भावात्मक गहराई के स्रोत का प्रश्न है, तो यही कह सकता हूँ कि रचना में जो कुछ होता है, उसका मूल स्रोत तो वे विविध प्रकार के सुख-दुःखात्मक अनुभव ही होते हैं जो रचनाकार के जीवन में आए होते हैं। उन अनुभवों में से कितना कुछ तो हमारी संवेदना की नमी से वंचित रह कर सूख ही जाता है। स्मृति से भी झर जाता है। जो बचा रह जाता है, वही हमारी रचनात्मक व्याकुलता का नसीब होता है।
अनुपम परिहार : भक्तिकाल की कविता का बड़ा केंद्र इलाहाबाद के बजाए बनारस बना, इसकी क्या वजहें हैं?
राजेन्द्र कुमार : बनारस अपने नाम से ही 'वाराणसी' का तद्भव है। पर मूल नाम तो काशी है जो तत्सम बने रहने की ज़िद शुरू से ही ठाने रहा। धर्म और अध्यात्म में रमा। चार पुरुषार्थों में पहला (धर्म) और चौथा (मोक्ष) दोनों को काशी ने अपनी मुठ्ठी में रखने की दावेदारी शुरू से ही कायम कर ली। तो यह मिज़ाज रहा काशी का। भक्ति की परिभाषा करने वाले आचार्य शुक्ल जी ने लिखा है- 'भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है।' तो इस रसात्मक अनुभूति के लिये, भक्ति की रासायनिकी (केमिस्ट्री) के लिए 'धर्म' का जितना 'खनिज' काशी में था, उतना और कहाँ उपलब्ध था?
अनुपम परिहार : हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता का बड़ा केंद्र बनारस के वजाए इलाहाबाद रहा है, इसके क्या कारण हो सकते हैं?
राजेन्द्र कुमार : आपको पता होगा कि इलाहाबाद ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की राजधानी भी रहा था। बाद में जब ब्रिटिश राजशाही के हाथ में भारत आया तो एक दिन के लिए (शायद 1858 में) इलाहाबाद एक दिन के लिए फिर राजधानी बना।
इस तरह इलाहाबाद राजनीतिक महत्व का केन्द्र अंग्रेज़ी राज में ही बनने लगा था। वह केवल कुंभ की नगरी ही नहीं रहा, न केवल तीर्थराज। राजनीति, शिक्षा और न्याय- इन तीनों क्षेत्रों में इसका योगदान बहुज्ञात है। इलाहाबाद में पांडित्य भाव पर बौद्धिक चेतना अधिक प्रबल रही।
इस बौद्धिक चेतना के रहते यहाँ ऐसा वातावरण बना, जो धार्मिक आस्था की केंद्रीयता के बावजूद राजनीति, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र की सक्रियताओं के लिए बहुत अनुकूल रहा। इसलिए प्रेस और पत्रकारिता के लिए भी यह उर्वर साबित हुआ।
अनुपम परिहार : क्या साहित्यिक पुरस्कारों का प्रभाव हिंदी साहित्य पर सकारात्मक रहा है?
राजेन्द्र कुमार : साहित्य के पुरस्कारों और सम्मानों की योजनाओं के पीछे बेशक दृष्टि सकारात्मक रही होगी। लेकिन आज जिस रूप में इनकी परिणति होती दिख रही है, उसे सर्वथा सकारात्मक नहीं कहा जा सकता। पुरस्कार भी प्रायः व्यक्ति-पूजा का पर्याय बन कर रह जा रहे हैं। सामान्यतया ये साहित्य के लिये सकारात्मक होने के बजाय साहित्यकार के लिए सकारात्मक हों तो हों। नये लेखकों के लिए प्रलोभन के विषय ज्यादा हैं ये, प्रतिमानपरक उत्साह-वर्धन के कम। अब तो बड़े साहित्यिक संस्थानों के पुरस्कार तक की चयन प्रक्रिया सन्देह से परे नहीं रह गयी है।
अनुपम परिहार : क्या लेखक संगठनों में राजनीति हावी है?
राजेन्द्र कुमार : लेखक संगठन हों और उनमें राजनीति न हो, यह कल्पना करना एक अनधिकार चेष्टा है। सच तो यह है कि आज यदि कोई राजनीति से मुक्त रहने का दावा करता है तो इसके पीछे भी राजनीति ही होती है। मैं खुद 'जन संस्कृति मंच' में हूँ, पहले 'प्रगतिशील लेखक संघ' से संबद्ध रहा। मैं बिना किसी संकोच के, कह सकता हूँ कि प्रलेस, जलेस और जसम के पीछे वामपंथी राजनीति की प्रेरणाएं हैं। यह जरूर है कि हमें ध्यान रखना है कि संगठनों में अपनी राजनीतिक सक्रियताओं का उपयोग अगर हम अपने साहित्यिक व्यक्तित्व की बैसाखी की तरह करने लगें तो इससे न हम अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के प्रति ईमानदार रह सकेंगे, न अपनी साहित्यिक रचनाशीलता के प्रति।
अनुपम परिहार : सत्ता साहित्य को प्रभावित करती है या साहित्य सत्ता को प्रभावित करता है?
राजेन्द्र कुमार : साहित्य का पक्ष प्रेम का पक्ष रहा है। प्रेम साहित्य का, बल्कि कहूँ कि सारी कलाओं का महत्तम समापर्त्य है। लेकिन एक माने में साहित्य की प्रकृति हमेशा प्रतिरोध की रही। सत्ता की चिंता प्रेम से ज़्यादा आत्म-प्रतिष्ठा की रहती है। इसलिए साहित्य और सत्ता का संबंध एक-दूसरे के प्रति सर्वथा अनुकूल रह ही नहीं सकता है। सत्ता अगर सचमुच साहित्य को प्रभावित करने में सफल हो जाए तो सत्ता को चाहे जो लाभ हो, साहित्य के तो स्वत्व की ही बलि हो जाएगी। सामंती युग में सत्ता कवियों-कलाकारों को आश्रय देती थी अपने रंजन और दरबार की शोभा बढ़ाने की नीयत से। लेकिन ऐसे आश्रयत्व की उपलब्धि क्या रही? हद से हद बस, चंदबरदाई, भूषण आदि भर! आप कह सकते हैं- संस्कृत में कालिदास भी तो हुए, हिन्दी में रहीम, घनानंद, बिहारी भी तो हुए। तो मैं इतना ही कह सकता हूँ कि ये कुछ नाम ऐसे कवियों के हैं, जिन्होंने सत्ता को प्रभावित किया। सामंती सत्ता को बनाए रखने में नहीं, बल्कि सामंती मानस में मानवीय जीवन-मूल्यों की संवेदना सिक्त भूमि को उर्वर बनाए रखने में इन कवियों ने योग दिया।
सत्ता चाहे धर्म-तंत्र की रही हो, चाहे राज-तंत्र की या लोक तंत्र की, साहित्य अपनी भूमिका में तभी अर्थ पा सका जब उसका रुख तंत्र के प्रति आलोचनात्मक रहा। आज लोकतंत्र में भी भक्त कवि का यह रुख संतन को कहा सीकरी सों काम' भले ही उतना आदर्श न माना जाए, लेकिन अगर कोई सचमुच अपने को संत माने बैठा है तो उसे निर्भय होकर पूरे साहस के साथ 'सीकरी' से यह पूछने का विवेक तो होना ही चाहिए कि 'सीकरी को कहा संतन से काम?' अन्यथा यही माना जाना चाहिए कि 'संत' सत्ता से प्रलोभित होने के अर्थ में प्रभावित हो गया।
अनुपम परिहार : आप जन संस्कृति मंच (जसम) में भी हैं। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। आपको कई आंदोलनात्मक गतिविधियों में भी देखा जाता रहा। कई जुलूसों और धरना-प्रदर्शनों में भी भागीदारी रही, बाकायदा सड़क पर भी। साहित्य-कर्म के संदर्भ में इन सक्रियताओं की आप क्या सार्थकता मानते हैं?
राजेन्द्र कुमार : आपने मेरी जिन संगठनात्मक सक्रियताओं का ज़िक्र किया, उनकी ट्रेनिंग मेरे जीवन में अपने गृहनगर कानपुर के दिनों से ही शुरू हो गई थी। कानपुर मिलों और मज़दूरों का शहर था तब। सन् 1960-70 के दिनों की बात कर रहा हूँ। मज़दूरों के हकों के लिए लम्बी-लम्बी हड़तालें होती थीं। मिलों के गेट पर धरना प्रदर्शन होता था। कानपुर में एस. एम. बनर्जी मज़दूरों के लोकप्रिय नेता थे। लोकसभा का चुनाव लड़ते थे, स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में, कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से। तीन बार एम. पी. चुने गए। उनके सान्निध्य में मैं आया। तो धरना-प्रदर्शनों में शिरकत तभी से रहती आई, छात्र-जीवन में ही। उन दिनों लिखी गई मेरी प्रारंभिक कविताओं में उन दिनों की संवेदनाएँ दर्ज हैं। फिर इलाहाबाद आ गया। इस शहर का मिजाज अलग था। पर यहाँ भी कामरेड ज़िया भाई मिले। बाद में लाल बहादुर वर्मा भी आ गए। इन सबका साथ-संग फिर प्रेरक बना। मैं ड्राइंग रूम-एक्टिविज्म में विश्वास नहीं रखता। लंबे समय तक डेढ़ कमरों वाले किराये के मकानों में रहा। ड्राइंग रूम जैसा कुछ संभव भी न रहा, तो अच्छा ही हुआ। आज भी अपना घर जैसा कुछ जो है, उसमें ड्राइंग रूम जैसी सजावटी-दिखावटी जगह नहीं है। मैंने बहुत कुछ सड़क पर पैदल चलते हुए, भटकते हुए ही सीखा। सड़क मुझे कभी भी सिर्फ कहीं पहुँचाने वाला रास्ता नहीं प्रतीत हुई। रात-दिन गिरते-उठते, ठोकरें खाते, पसीना बहाते आदमी की जिंदगी में शामिल होने की एक व्याकुल और आत्मीय पुकार की तरह मेरे क़दमों को गति देती रही। मेरी प्रारंभिक कविताओं में उन गतिमान क़दमों की आहटें आपको ज्यादा प्रत्यक्ष सुनाई पड़ सकती हैं। फिर बाद में मैंने जाना, लेखन की अपनी कुछ निजी शर्तें भी होती हैं। सड़क वाले ट्रैफ़िक-नियमों से नितांत अलग। सड़क पर कविता लिखी जा सकती है पर सड़क पर कविता नहीं लिखी जा सकती।
अनुपम परिहार : आपने साहित्यिक जीवन में किस प्रकार की चुनौतियों का सामना किया है?
राजेन्द्र कुमार : मैंने जब लिखना शुरू किया, तो अपने स्कूल के शिक्षकों से मुझे बहुत प्रोत्साहन मिला। मैं उन दिनों गीतात्मक शैली में लिखता था और इतना लिखता था कि कई कॉपियाँ भर गईं। अपने शिक्षकों से उन पर सराहना पाता तो इसी में डूबता इतराता रहता। कोई यह बताने वाला न था कि मेरी रचना में और निखार कैसे आ सकता है। तो इस तरह सराहना मेरी सीमा बन जाती रही। आज कह सकता हूँ कि सबसे बड़ी चुनौती तो यही थी कि इस सीमा से उबरा कैसे जाए। पर यह देर में समझ में आया। इंटरमीडिएट तक आते-आते। जब पाठ्यक्रम से बाहर ताक-झांक करने और पढ़ने के शौक़ ने गति पकड़ी।
फिर यह भी कि स्वभाव से संकोची था। अपनी ओर से कभी किसी से आगे बढ़ कर संपर्क साधने की कोशिश ही नहीं कर पाता। जब रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगीं तब भी किसी से अपने बारे में कह न पाता, न किसी को दिखा पाता कि अमुक पत्रिका में मेरी अमुक रचना छपी है।
नतीजा यह कि अपरिचित ही बना रह जाता। यहाँ तक कि जब कोई किताब भी मेरी छपती तो मैं सोचता कि इसे प्रचारित प्रसारित करना तो प्रकाशक का काम है। मैं अपनी किताब के बारे में किसी से कोई चर्चा न करता। तो यह संकोच भी कवि-लेखक के रूप में मुझे व्यापक परिचय के दायरे में आने देने में बाधक बनता रहा। लेकिन अब तो खैर हिन्दी समाज में उतना अपरिचित नहीं हूँ।
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| अनुपम परिहार |
सम्पर्क
अनुपम परिहार
मोबाइल : 9451124501





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