प्रतुल जोशी का यात्रा वृत्तांत 'मुम्बई से गोवा'
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| गोवा में प्रतुल जोशी |
मनुष्य जन्मजात घुमक्कड़ प्राणी है। सहज रूप में उसे उन जगहों के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है, जो उसके आस पास या दूर दराज हैं। जानने की इस प्रवृत्ति की वजह से ही अमरीका यानी नई दुनिया की खोज हुई। यूरोप से भारत आने के जलमार्ग की खोज हुई। आज कई देशों की आय का एक बड़ा साधन यह पर्यटन ही है। हमारा भारत अपने आप में तमाम विविधताओं वाला देश है। इसीलिए इसे देशों का देश भी कहा जाता है। हालांकि विकास के नाम पर आज हम इन जगहों की कुदरती खूबसूरती को नष्ट करते जा रहे हैं फिर भी हमारे यहां घूमने फिरने की तमाम जगहें अभी भी बची हुई हैं। आमतौर पर पर्यटन हमारे उत्तर भारत के लोगों की प्रवृत्ति नहीं। आम जनता इसे आज तक खाए अघाए लोगों का उपक्रम ही मानती रही है। बहरहाल हरेक यात्रा वृत्तांत अपने आप में बहुत कुछ समेटे होता है। उसमें इतिहास के साथ वर्तमान भी होता है। भूगोल के साथ राजनीति भी होती है। प्रकृति के साथ सामाजिकता भी शामिल होती है। राहुल जी तो कहा ही करते थे : 'सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ/ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ'। वे आजीवन घुमक्कड़ी करते रहे। गांधी जी कभी चैन से नहीं बैठे और देश में एक जगह से दूसरी जगह जाने और लोगों को जानने समझने का प्रयास करते रहे। इसके चलते ही वे आम लोगों की दिक्कतों से परिचित हुए और लोगों को भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन में शामिल कर सके। प्रतुल जोशी भी घुमक्कड़ी सम्प्रदाय के सदस्य हैं। हाल ही में उन्होंने गोवा की सपरिवार यात्रा की। गोवा जाने के क्रम में उन्होंने एक विस्तृत यात्रा संस्मरण लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रतुल जोशी का यात्रा वृत्तांत 'मुम्बई से गोवा'।
'मुम्बई से गोवा'
प्रतुल जोशी
हमारे परिवार के लिए वर्ष के दो महीने ऐसे होते हैं जब हमारी यात्रा की तिथियाँ बहुत दिन पूर्व निश्चित हो जाती हैं। यह महीने हैं जनवरी और जून, और इन महीनों में लखनऊ से बाहर घूमने के कार्यक्रम तय होने के कारण हैं : उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग द्वारा अपने कर्मचारियों को वर्ष में दो दी जाने वाली पन्द्रह-पन्द्रह दिनों की छुट्टियाँ। श्रीमती जी शिक्षा विभाग में अध्यापिका हैं और अपन सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी तो इन छह महीनों में घर से बाहर जाने का योग बनता है। अपन की मंजिल बेटी के कार्यस्थल से भी तय होती है। बेटी गार्गी वर्तमान में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की सेवा में है तो घूमने जाने के लिए स्थान के चुनाव में उसके कार्यस्थल को भी प्रमुखता दी जाती है। पिछली बार वह बंगलुरू में थी तो हमारे पर्यटन की दिशा बंगलुरू और आस-पास के क्षेत्र थे। इस वर्ष वह मुंबई से कार्य कर रही है तो हमारी पहली प्राथमिकता मुंबई थी।
03 जनवरी 2025 की रात्रि लखनऊ की कड़कड़ाती ठंड के मध्य जब हम पति-पत्नी ने लखनऊ से मुंबई के लिए उड़ान भरी तो यह अंदाजा नहीं था कि इस बार की यात्रा अपन दोनों के ज्ञान-चक्षुओं को और ज्यादा चौड़ा करने वाली यात्रा होने जा रही थी।
04 जनवरी की प्रातः ढाई बजे जब हम लोग मुम्बई एयरपोर्ट से बाहर गर्म कपड़े पहन कर आ रहे थे तो यह देख कर थोड़ी शर्म भी लग रही थी कि वहाँ मौजूद भीड़ में हम कुछ लोग ही थे जिनके शरीर पर गर्म कपड़े थे। यह इस देश की विविधता का ही परिणाम है कि जब एक हिस्सा शीतलहर से काँप रहा होता है तो दूसरे हिस्सों में लोग केवल लुंगी पहन कर घूम रहे होते हैं।
मुंबई अपनी तेज भागती जिन्दगी, ऊँची-ऊँची बिल्डिंगों और घने ट्रैफिक के चलते अपन को कभी पसंद नहीं रहा। कारण अपन की जिंदगी हमेशा छोटे और आराम-तलब शहरों में ही बीती। लेकिन मुंबई की एक बात का मैं हमेशा कायल रहा हूँ, वह है मुंबई का कला की पूर्णता के लिए पूर्ण समर्पण। मुंबई वालों में कला की उत्कृष्टता के लिए एक जुनून है। वहाँ सैकड़ों फिल्मों की शूटिंग होती है, विज्ञापन फिल्में बनती रहती हैं। संगीत के बड़े कंसर्ट होते रहते हैं, प्रति सप्ताह स्टैंडअप कॉमेडी की बाढ़ आयी रहती है और साथ ही बेहद शानदार नाटकों का मंचन होता है। नाटकों के प्रति अपने अटूट लगाव के चलते, मुंबई का मेरे लिए खास महत्त्व है।
इसीलिए 2025 में भी जब मुंबई जाने का कार्यक्रम बना तो सबसे पहले अपन ने मुंबई थियेटर गाइड को खंगाला। पाया कि जनवरी के प्रथम पक्ष में कुछ बेहद रोचक नाटकों का मंचन प्रस्तावित था। पहुँचने के दूसरे ही दिन मुंबई के वर्सोवा इलाके में पहुँच गये एक नाटक देखने। लेकिन नाटक देखने के दूसरे दिन श्रीमती जी ने प्रस्ताव रख दिया कि इस यात्रा में उन्हें गोवा देखने की इच्छा थी। बेटी ने प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अपनी गाड़ी से गोवा चलने का कार्यक्रम बना दिया। बस फिर क्या था, तुरत-फुरत एक ड्राइवर की खोज की गई और 07 जनवरी की सुबह सात बजते न बजते हम तीन और एक ड्राइवर साहब निकल पड़े गोवा के रास्ते पर।
मुंबई से गोवा
मुंबई से गोवा पहुँचने के दो रास्ते हैं। एक मुंबई-पुणे-सतारा-सांगली, बेलगाम हो कर। दूसरा रास्ता महाड़-चिपलून सावंतवाड़ी होते हुए गोवा पहुँचने का। दूसरा रास्ता कोंकण क्षेत्र के अंतर्गत आता है। जबकि पहला रास्ता महाराष्ट्र कर्नाटक प्रदेश के रास्ते पर है। हमारे ड्राइवर साहब सूफियान का मानना था कि हम लोगों को कोंकण क्षेत्र से चलना चाहिए क्यूँकि यह रास्ता महाराष्ट्र-कोंकण वाले से दूरी में कम है। कोंकण क्षेत्र मेरे लिए हमेशा से उत्सुकता का विषय रहा है। इसके पीछे एक कारण यह भी रहा कि एक मत के अनुसार हमारे पूर्वज (पाँच सौ वर्ष पूर्व) कोंकण क्षेत्र से पलायन कर के उत्तराखंड में स्थापित हुए थे। अब इस दावे में कितनी सच्चाई है, यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन कोंकण क्षेत्र से पलायन की कथा ने बचपन से ही कोंकण क्षेत्र के लिए मेरे भीतर उत्सुकता पैदा कर रखी थी। अपनी इसी उत्सुकता के तहत दो वर्ष पूर्व मैं रत्नागिरी भी गया था जहाँ के प्रसिद्ध समुद्री किनारे 'भाटे-बीच' और 'मांडवी बीच' पर भी कुछ समय बिताया था।
कोंकण शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों कोण कण से मानी जाती है। कोण यानी कोना और कण माने स्थान। यानी कोने वाला स्थान। कोंकण क्षेत्र महाराष्ट्र एवं गोवा के पश्चिमी हिस्से में फैली हुई जमीन की एक लम्बी पट्टी है जिसके पूर्व में दक्खन के पठार हैं तो इस पट्टी के पश्चिम में है अरब सागर का छलछलाता समुद्र। कोंकण क्षेत्र की उत्तरी सीमा केंद्र शासित प्रदेश दमन से जुड़ती है तो दक्षिण में कोंकण प्रदेश कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले तक फैला है। कोंकण क्षेत्र में ही हैं पश्चिमी घाट की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ और उन पहाड़ियों पर घने जंगल। इन पहाड़ियों को सहयाद्रि की श्रृंखला के तौर पर भी जाना जाता है। इसके अलावा ढेर सारी नदियाँ और नदियों की घाटियों के साथ ही विभिन्न किस्म के फल-फूल और अलग-अलग प्रजातियों के पशु-पक्षी ।
अपने यात्रा-वृत्तांत को विराम देते हुए मैं अगले कुछ पृष्ठों में 'पश्चिमी घाट' के बारे में चर्चा करूँगा क्यूँकि 'पश्चिम घाट' के बारे में हम उत्तर भारतीयों की जानकारी बेहद कम है। इसका एक कारण यह है कि जिस तरह से हम लोगों की पाठ्य-पुस्तकों में हिमालय और गंगा-यमुना के दोआब के बारे में जानकारी दी जाती रही है, उसका पांच फीसदी भी 'पश्चिमी घाट' के बारे में नहीं बताया गया।
"पश्चिमी घाट"
'घाट' शब्द को देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया गया है। इसीलिए पहले इस शब्द को सही तरीके से समझना होगा, तभी 'पश्चिमी घाट' को भी सही तरीके से समझा जा सकता है।
उत्तर भारत में मुहावरा प्रचलित है, 'घाट घाट का पानी पीना। यह घाट नदी के किनारे बनी सीढ़ियों के संदर्भ में जाने-समझे जाते हैं। लेकिन दक्षिण भारत में घाट शब्द पहाड़ियों के लिए प्रयुक्त होता है। कन्नड़ भाषा में 'घट्ट' शब्द का अर्थ होता है 'पर्वत श्रृंखला', तमिल में गहू का अर्थ है पर्वत एवं पर्वतीय जंगल। मलयालम में 'घाट्टम' का अर्थ है पहाड़ी रास्ता, नदी का किनारा आदि। तो 'पश्चिमी घाट' एक पर्वतीय शृंखला है जो भारतीय प्रायद्वीप के पश्चिमी तट के समानांतर लगभग सोलह सौ किलोमीटर उत्तर से दक्षिण तक फैली हुई है। इसका विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों में है। 'पश्चिमी घाट' का शुमार यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों में भी है। यहाँ देश की वनस्पतियों और पशु-संपदा का एक बड़ा हिस्सा अवस्थित है। यूनेस्को के अनुसार 'पश्चिमी घाट' हिमालय से भी ज्यादा पुराने हैं। 'पश्चिमी घाट' भारतीय मानसून के पैटर्न को गर्मियों के मौसम में प्रभावित करते हैं जब दक्षिण-पश्चिम से जो बारिश भरी मानसून हवाएँ चलती हैं, उनके सम्मुख यह अवरोध खड़ा करते हैं। यह पहाड़ियों लगभग एक लाख साठ हजार वर्ग किमी क्षेत्र कवर करती हैं और बहुत सारी नदियों के लिए जल क्षेत्र का भी निर्माण करती हैं। यहाँ समुद्र तल से औसत ऊँचाई लगभग 1,200 फीट से 13,900 फीट है। यह क्षेत्र विश्व के दस जैव विविधता हॉटस्पाट्स में से एक है। यहाँ सात हज़ार से ज़्यादा फूलों की प्रजातियाँ हैं, अठारह सौ से ज्यादा गैर फूलों की प्रजातियाँ हैं, एक सौ उनतीस स्तनधारी पशु हैं, पाँच सौ आठ पक्षियों की प्रजातियाँ हैं, एक सौ उन्यासी उभयचर जीव हैं, दो सौ अस्सी के आस-पास ताजे पानी की मछलियों की प्रजातियाँ हैं और छह हजार कीड़े-मकोड़ों की प्रजातियाँ हैं। कम से कम तीन सौ पच्चीस वैश्विक रूप से खतरे वाली प्रजातियाँ भी पश्चिमी घाट में हैं।
07 जनवरी की सुबह जब हमारी यात्रा मुंबई से गोवा के लिए प्रारंभ हुई तो उत्सुकता का माहौल मेरे भीतर बनने लग गया था। छोटी बहन कृष्णा पिछले पच्चीस वर्षों से पुणे में रह रही है इसके चलते मुंबई पुणे रूट पर मैं कई बार जा चुका था। लेकिन मुंबई गोवा रूट मेरे लिए नया था। हर नये रूट को ले कर उत्सुकता मेरे भीतर बचपन से रही थी। और साठ वर्ष का आंकड़ा पार कर लेने के बाद भी उस उत्सुकता में कोई कमी नहीं आई है।
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| रायगढ़ किला |
गाड़ी ने वाशी (यानी नवी मुंबई) को पार कर मुंबई-पुणे रूट पर ही राह पकड़ी लेकिन थोड़ी देर चलने के बाद कोलाड नामक स्थान से गाड़ी ने मुंबई-गोवा राजमार्ग की राह पकड़ी। हम लोग रायगढ़ ज़िले से गुज़र रहे थे। क्योंकि हमारी यात्रा में सीधे गोवा पहुँचना था और रास्ते में रुकने का कोई स्कोप नहीं था (सिवाय लंच एवं चाय-पानी के), इसलिए हम लोग रास्ते में पड़ने वाले शहरों और कस्बों को घूमने में असमर्थ थे। रायगढ़ जिले से गुजरते हुए मराठा इतिहास की याद आ रही थी। रायगढ़ में ही है 'रायगढ़ किला जो एक लंबे समय तक स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की राजधानी था। यहीं छत्रपति शिवाजी महाराज का स्मारक (या समाधि) भी मौजूद है। रास्ते में रायगढ़ किले तक पहुँचने का प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता है। कुछ देर बाद रायगढ़ जिले को पार कर हमारी कार ने रत्नागिरी जिले में प्रवेश किया। जैसा कि पहले लिख चुका हूँ कि मैं रत्नागिरी शहर में ढाई वर्ष पूर्व दो दिन के लिए रुक चुका था। रत्नागिरी अपने आप में बेहद खूबसूरत शहर है और इसके तटीय क्षेत्र बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मुझे मुंबई-गोवा राजमार्ग पर यात्रा करते हुए पुराने दिनों की याद आ रही थी। खासकर आकाशवाणी रत्नागिरी में लगी सावरकर की मूर्ति। विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी जिंदगी के पन्द्रह वर्ष रत्नागिरी में ही गुजारे थे। 4 जुलाई 1911 को सावरकर को अंडमान एवं निकोबार की सेलुलर जेल में पचास वर्ष की कैद के तहत राजनैतिक कैदी के तौर पर भेज दिया गया था। 2 मई 1921 को विनायक सावरकर को अण्डमान निकोबार से रत्नागिरी की एक जेल में भेज दिया गया था। वर्ष 1922 में जेल में रहते हुए विनायक सावरकर ने अपनी किताब 'Essential of Hindutva' लिखी। 6 जनवरी 1924 को विनायक सावरकर को जेल से सशर्त रिहा कर दिया गया। शर्त यह थी कि रत्नागिरी जिले से बाहर नहीं जायेंगे। सावरकर 1937 तक रत्नागिरी में ही रहे लेकिन वर्ष 1937 में बाम्बे प्रेसिडेंसी की नव निर्वाचित सरकार ने उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया। इन्हीं सब कारणों के चलते आकाशवाणी रत्नागिरी में विनायक दामोदर सावरकर की एक मूर्ति लगी हुई है। यद्यपि आकाशवाणी के किसी अन्य केन्द्र पर मैंने सावरकर की कोई मूर्ति नहीं देखी।
हमारी गाड़ी राष्ट्रीय राजमार्ग 66 पर दौड़ रही थी। यह राजमार्ग 1640 किमी लम्बा है (अधिकांशतः चार लेन वाला है) जो कि देश के पश्चिमी तट के साथ-साथ, 'पश्चिमी घाट' के समानांतर उत्तर से दक्षिण की दिशा में है। मुंबई की पूर्व दिशा में स्थित एक शहर पनवेल से प्रारंभ हो कर मंगलुरु (कर्नाटक) के रास्ते कन्याकुमारी तक जाता है। यह महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों के भीतर अपना रास्ता बनाता है। राजमार्ग बेहद साफ-सुथरा है। मुंबई से गोवा की दूरी सड़क मार्ग से लगभग 550 किमी है। रास्ते में कुछ ज़्यादा टोल प्लाजा भी नहीं हैं। हाँ, यह जरूर है कि कुछ जगहों पर निर्माण कार्य चल रहा है, इसलिए यदि आप गूगल मानचित्र के आधार पर अपनी गाडी चलाते है तो मानचित्र आपको पुराने गोवा-मुंबई रास्ते के बजाए भीतरी रास्तों के लिए निर्देशित करेगा। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ। रायगढ़ के आगे रत्नागिरी जिले में गाड़ी ने पुराने मुंबई-गोवा राजमार्ग को छोड़ कर रत्नागिरी जिले के भीतरी हिस्से में प्रवेश कर लिया। यहाँ भी सड़कें बेहद साफ-सुथरी और गड्डा मुक्त थीं। बहुत देर तक चलने के बाद गाड़ी पुनः राष्ट्रीय राजमार्ग 66 पर आयी।
मुंबई से गोवा के मध्य जो कस्बे हमारी यात्रा में पड़े, वह इस प्रकार थे- पनवेल, पेन, महाड, पोलाड़पुर, खेड़, चिपलून, संगमेश्वर, लांजा, राजापुर, कंकावली, सामंतवाड़ी और फिर पणजी। रत्नागिरी शहर तो राष्ट्रीय राजमार्ग से लगभग पचास से साठ किमी दूर था और हमने अपना लक्ष्य गोवा को बना रखा था, इसलिए रास्ते में पड़ने वाले कस्बों और गाँवों को देख कर ही संतोष करना पड़ रहा था। इसमें एक कस्बा मुझे कुछ अलग नजर आ रहा था और वह था चिपलून। वहाँ छोटे से कस्बे में ढेर सारी औद्योगिक इकाईयों को देख कर मैंने वाहन चालक सूफियान से चिपलून के बारे में जानकारी चाही। वाशिष्ठी नदी के तट पर बसे रत्नागिरी जिले में स्थित चिपलून के बारे में ड्राइवर साहब का कहना था कि वहाँ बहुत सारी फार्मा कंपनियों और रासायनिक पदार्थों की फैक्टरियां हैं।
पिछले दशकों में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में जिस तरह का औद्योगिक विकास हुआ है उसका परिणाम यह है कि इन राज्यों के छोटे-छोटे शहरों और कस्बों में औद्योगिक इकाईयों का जाल दिख जाता है। इसके बरक्स, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में कई सौ किलोमीटर की यात्रा करिए तो भी एक औद्योगिक इकाई नहीं दिखेगी। देश में असंतुलित औद्योगिक विकास का यह नतीजा है कि आज बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, या यूँ कहें हिन्दी पट्टी से बडे पैमाने पर मजदरों का पलायन इन औद्योगिक रूप से उन्नत प्रदेशों में हो रहा है। आपको बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूर मुंबई से लेकर गोवा तक में बड़े पैमाने पर मिल जायेंगे।
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| रत्नागिरी का अल्फांसो |
रत्नागिरी और अल्फांसों आम
लखनऊ के मलिहाबाद में गर्मी के मौसम में अगर कोई जाये तो आमों से लदे बागानों को देखकर मुँह में पानी आना स्वाभाविक है। यहाँ का दशहरी आम पूरी दुनिया में विख्यात है। लेकिन जिसने एक बार महाराष्ट्र के अल्फांसों (जिसे हापुस भी कहते हैं) का स्वाद प्राप्त किया है, वह उसे बार-बार खाना चाहेगा। रत्नागिरी जिले से गुजरते हुए अल्फांसों की याद आना स्वाभाविक है क्यूँकि रत्नागिरी जिले में अल्फांसों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। अल्फांसों न केवल अपने स्वाद बल्कि रूप के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है। अगर बात अल्फांसों के छिलके की ही की जाये तो इस आम का छिलका पीले रंग का और बहुत पतला होता है. इतना पतला कि इसे हाथ से भी आसानी से छीला जा सकता है। फल का आकार भी अच्छा-खासा होता है। प्रत्येक आम का वजन लगभग दो सौ से तीन सौ ग्राम होता है। इसकी एक अलग सी सुगंध होती है, जिसके चलते इन्हें जहाँ रखा जाता है, वह स्थान सुगंध से भर जाता है। अल्फांसों आम यूँ तो देश के कई हिस्सों में उगाया जाता है लेकिन रत्नागिरी के आम का स्वाद सभी से श्रेष्ठ माना गया है। रत्नागिरी की मिट्टी अल्फांसों आमों के लिए बेहद उपयुक्त है। यहाँ एक तरफ भरपूर बारिश है तो वहीं बढ़िया धूप भी। और यह दोनों चीजें अल्फांसों के उत्पादन के लिए अनुकूल है। अल्फांसों का शुमार बेहद महँगे आमों में होता है। और इसका बड़े पैमाने पर निर्यात भी होता है। इसकी पैदावार अप्रैल से जून के मध्य ही उपलब्ध है, इसलिए वर्ष 2025 के जनवरी महीने के प्रथम सप्ताह में जब हम लोगों की गाडी रत्नागिरी जिले से गुजर रही थी तो अल्फांसो की दूर-दूर तक न कोई उपस्थिति थी और न ही सुगंध। मैं मन ही मन निश्चय कर रहा था कि जब भी अवसर मिलेगा तो अप्रैल से जून के मध्य एक बार पुनः रत्नागिरी आयेंगे और छक कर अल्फांसो उर्फ हापुस का लुत्फ उठायेंगे। वैसे अल्फांसो की चर्चा को विराम लगाने का मन नहीं कर रहा, इसलिए मैं इसके नाम के इतिहास पर कुछ बात करना चाहूँगा। इस देश देश की संस्कृति के विकास में पुर्तगालियों के योगदान का जब भी जिक्र होगा तो खूबसूरत चर्चों के अलावा अल्फांसो आम की प्रजाति को भारत भूमि में विकसित करना, महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में रेखांकित किया जाएगा। जब 16वीं सदी के प्रारंभ में पुर्तगाल के निवासियों ने गोवा पर कब्जा कर लिया तो उनके साथ आने वाले जेसुइट (Jesuit) मिशनरियों ने आमों के पेड़ों पर ग्राफ्टिंग तकनीक के माध्यम से एक आम की प्रजाति विकसित की। और फिर इस प्रजाति का नाम पुर्तगाली भारत के प्रथम वायसराय Alfonso de Albuquerque (1509-1515) के सम्मान में पुर्तगालियों ने alfanso (अल्फांसो) रखा। अल्फांसो या हापुस, उत्तर भारतीय आमों की तरह चूस कर नहीं खाया जाता बल्कि इसको काट कर प्लेट में सजा कर प्रस्तुत किया जाता है। अल्फांसो की आइसक्रीम भी बहुत लोकप्रिय है।
राष्ट्रीय राजमार्ग छियासठ पर दौड़ती हुई हमारी चारपहिया ने रत्नागिरी जिले को छोड़ कर फिर महाराष्ट्र के अंतिम जिले सिंधुदुर्ग में प्रवेश किया। सिंधुदुर्ग, दक्षिण पश्चिमी महाराष्ट्र का अंतिम जिला है जो गोवा के साथ अपनी सीमाएँ बनाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, सिंधुदुर्ग आबादी के लिहाज से महाराष्ट्र का सबसे कम जनसंख्या वाला जिला है।
सुबह सात बजे जब हम लोग मुंबई से निकले थे तो रायगढ़ जिले में कहीं नाश्ता किया था। लेकिन अब दोपहर का दो बज चुका था और हम लोगों को लग रहा था कि कहीं रुक कर लंच कर लेना चाहिए। ड्राइवर सूफियान साहब थे कि उन्हें न भूख लग रही थी, न प्यास। उनका सारा ध्यान मंज़िल की ओर ही था। खैर एक स्थान पर गाड़ी रोकी और लंच के बारे में चिंतन किया तो पता चला कि वहाँ अधिकतर सामिष भोजन ही उपलब्ध था। क्योंकि श्रीमती जी शुद्ध शाकाहारी हैं, इसलिए हम लोगों ने चाय के साथ कुछ हल्के-फुल्के खाद्य पदार्थों का आनन्द उठाया और अपनी मंज़िल यानी गोवा की तरफ एक बार फिर से रुख किया। सिंधुदुर्ग के होटल में जिस चीज ने मेरा ध्यान खींचा, वह था कि वहाँ उपलब्ध अधिक खाद्य सामग्री समुद्री भोजन से जुड़ी हुई थी। वहाँ मौजूद स्थानीय लोगों से बात करके ज्ञात हुआ कि सिंधुदुर्ग में क्योंकि एक सौ इक्कीस किमी का समुद्री किनारा है इसलिए वहाँ बड़े पैमाने पर मछलियों का उत्पादन होता है। गूगल की शरण में जाने पर पता चला कि यह आँकड़ा बीस हजार मीट्रिक टन का है। सिंधुदुर्ग का स्थानीय भोजन, शेष महाराष्ट्र के भोजन से अलग भी हैं। यहाँ के भोजन को मालाकर भोजन कहा जाता है। यहाँ भोजन में स्थानीय मसालों का इस्तेमाल होता है और वह भी कम तेल के साथ।
सड़क मार्ग पर यात्रा करते समय आस-पास की दुकानों, प्रकृति और अन्य चीजों के अलावा जिस एक अन्य चीज से आपका साक्षात्कार होता है वह है सड़क के किनारे लगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स। सिंधुदुर्ग ज़िला के भीतर जो पहला इलाका पड़ा, वह था वहाँ की कनकवली विधानसभा क्षेत्र का इलाका। यहाँ प्रवेश करते ही जिन होर्डिंग्स ने मेरा ध्यान खींचा, वह था वहाँ के स्थानीय विधायक नितेश नारायण राणे को महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाये जाने पर दी जा रही बधाईयों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स।
दरअसल 20 नवम्बर 2024 को जब महाराष्ट्र विधानसभा की दो सौ अट्ठासी सीटों पर चुनाव हुये थे तो उसके बाद सरकार के गठन में काफी वक्त लगा था। इस चुनाव में सिंधुदुर्ग ज़िल के कनकवली विधानसभा क्षेत्र से बयालीस वर्षीय नितेश नारायण राणे निर्वाचित घोषित हुए थे। बाद में 15 दिसंबर 2024 को महाराष्ट्र कैबिनेट के विस्तार के दौरान नितेश नारायण राणे को मत्स्य एवं पोर्ट विभागों का कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। क्योंकि हम लोग जनवरी के पहले सप्ताह में ही इस इलाके से गुज़र रहे थे तो यह होर्डिंग्स एक महीने पुराने भी नहीं थे और सिंधुदुर्ग जिले के राजनीतिक माहौल का बयान करते नजर आ रहे थे।
कोंकण की राजनीति में राणे परिवार की बड़ी प्रभावशाली भूमिका रही है। नितेश राणे के पिता नारायण तातू राणे 1 फरवरी 1999 से 17 अक्तूबर 1999 तक महाराष्ट्र के तेरहवें मुख्यमंत्री रहे हैं।
वर्तमान में वह 'रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग' संसदीय क्षेत्र में लोकसभा के सांसद हैं। नारायण राणे जी के राजनीतिक करियर से किसी को भी रश्क हो सकता है। 10 अप्रैल 1952 को मुंबई में जन्मे नारायण राणे ने यद्यपि अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत शिव सेना से की थी, लेकिन एक समय पश्चात् शिव सेना को छोड़ कांग्रेस पार्टी में आ गये। फिर अपनी खुद की पार्टी महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष' पार्टी बनाई। फिर इस पार्टी का भारतीय जनता पार्टी में विलय कर दिया। मोदी सरकार के द्वितीय कार्यकाल में तीन वर्ष (7) जुलाई 2021 से 11 जून 2024) केन्द्रीय मंत्री भी रहे।
महाराष्ट्र सरकार में वर्ष 1996 से वर्ष 2014 के मध्य कितनी ही बार मंत्री रहे। देश में ऐसे कम ही राजनीतिज्ञ होंगे जिन्होंने लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद सभी के सदस्य होने का गौरव हासिल किया हो। नारायण राणे के हिस्से में यह उपलब्धि आती है। महाराष्ट्र की राजनीति में जिन कुछ राजनीतिक घरानों का वर्चस्व है, उनमें नारायण राणे का घराना भी एक है। यदि नारायण राणे स्वयं केन्द्र और राज्य सरकारों में कैबिनेट मंत्री रहे हैं और एक बेटा नितेश राणे, वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री है तो दूसरे पुत्र निलेश नारायण राणे वर्तमान में कुदाल विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। तैतालीस वर्षीय निलेश अपने पिता के वर्तमान संसदीय क्षेत्र (रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग संसदीय क्षेत्र) से वर्ष 2009-2014 में सांसद भी रह चुके हैं।
राणे परिवार में पिता-पुत्रों की जोड़ी ने समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों को अपनी प्रतिभा से उपकृत किया। पिताश्री यदि शिवसेना, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के टिकट से विधान मंडल और संसद में चुने जाते रहे तो बड़े पुत्र निलेश का जुड़ाव समय-समय पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, महाराष्ट्र स्वाभिमान पक्ष पार्टी और शिवसेना से रहा है। वहीं छोटे पुत्र नितेश ने वर्ष 2019 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दामन पकड़े रखा और वर्ष 2019 से भाजपा से जुड़े हैं। वर्तमान में पिताजी भाजपा से सांसद, बड़े पुत्र शिवसेना (शिंदे ग्रुप) से विधायक और छोटे पुत्र भाजपा से विधायक हैं।
अथ श्री नारायण परिवार कथा
महाराष्ट्र में भ्रमण करते हुए मुझे कई बार समूहों में जाते हुए व्यक्तियों के झुंड देखने का अवसर मिला। मुंबई-गोवा राजमार्ग पर भी कई बार छोटे-मोटे समूहों में सफेद पैंट-कमीज पहने और सफेद टोपी लगाये कुछ पुरुषों के समूह मुझे दिख रहे थे। मैंने वाहन चालक सूफियान से पूछा कि वह लोग कौन थे? तो उन्होंने बताया कि वह शिरडी साँई बाबा दर्शन करने जाने वालों का समूह था। कुछ वर्ष पूर्व जब मैं अपनी छोटी बहन कृष्णा के घर पुणे गया था तो वहाँ पंढरपुर जाने वालों का सैलाब देखा था। उसमें स्त्री-पुरुष सब थे। लेकिन रत्नागिरी और रायगढ़ जिले में जो समूह सड़कों पर दृष्टव्य थे, उनमें केवल पुरुष थे।
कुछ ऐसे ही समूह वर्ष 2023 के जनवरी महीने में मुझे कर्नाटक के उडुपी और मंगलौर में दिखे थे। बड़ी संख्या में केवल एक रंगीन धोती पहने हुए। उडुपी के कृष्ण मंदिर में दर्शन के लिए पंक्तिबद्ध। लेकिन यह समूह केरल के सबरीमाला मंदिर के दर्शन करने के लिए कई शहरों, कस्बों और ग्रामों की यात्रा कर यहाँ पहुँचता है। हमारे देश में धर्म और आध्यात्म की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह इन यात्राओं को देख कर समझा जा सकता है।
गोवा की ओर
मुंबई-गोवा राजमार्ग पर लगे मील के पत्थरों से यह पता चल रहा था कि अगले एक-दो घंटे में हम लोग गोवा पहुँच जायेंगे। मुम्बई-गोवा राजमार्ग का पूरा रास्ता बेहद ही खूबसूरत है। अगर बाईं तरफ पश्चिमी घाट की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं तो दाईं तरफ दूर-दूर तक फैली घाटियाँ। उन घाटियों से झाँकते खेत, गाँव और जंगल। मैं एक खूबसूरत मोड़ पर गाड़ी रुकवाता हूँ और आसपास सुंदर प्रकृति के दृश्यों को अपने मोबाइल के कैमरे में कैद करता हूँ। गोवा मैं पहली बार जा रहा था। 30 मई 1987 को जब गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया तो गोवा भारतीय संघ का पच्चीसवाँ राज्य बना। और यह भी अजब संयोग था कि मेरे लिए भी गोवा भारत का पच्चीसवाँ राज्य था क्यूँकि गोवा में प्रवेश करने से पहले मैं देश के इक्कीस राज्य और तीन केंद्र प्रशासित राज्यों का भ्रमण कर चुका था।
गोवा के बारे में सोचने का मेरी चिंतन प्रक्रिया ने कार्य प्रारंभ किया तो याद आया कि गोवा के बारे में सबसे पहले हम लोगों को अपने बचपन में 'सात हिन्दुस्तानी' फिल्म से पता चला था। 'सात हिन्दुस्तानी' अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म थी। वर्ष 1969 में जब यह रिलीज़ हुई थी तो मेरी उम्र मात्र सात वर्ष की थी। संभवतः यह फिल्म मैंने काफी बाद में देखी थी लेकिन उसकी अमिट छाप आज भी मेरे मन-मस्तिष्क में ताजा है। ख्वाजा अहमद अब्बास द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म गोवा के मुक्ति-संग्राम पर आधारित है। गोवा में लगभग चार सौ पचास वर्षों का पुर्तगाली शासन रहा है और ब्रिटिश शासन से भारत को आजादी के 14 वर्षों बाद 19 दिसंबर 1961 को इसे भारतीय गणराज्य में तब शामिल किया गया जब भारतीय सेना ने 'आपरेशन विजय' चला कर गोवा के साथ ही दमन, दीव को भी भारतीय संघ में मिला लिया। 29 मई 1987 तक 'गोवा, दमन और दीव' एक केंद्र प्रशासित राज्य था। लेकिन 30 मई 1989 को गोवा भारतीय गणराज्य का एक राज्य बना। 'आपरेशन विजय' के चलते ही गोवा में दो-दो बार स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। पहला 15 अगस्त को, दूसरा 19 दिसंबर को।
जब गोवा और उससे जुड़ी हिन्दी फिल्मों की बात चल रही है तो मैं यहाँ एक अन्य फिल्म की चर्चा करना चाहूँगा और यह फिल्म है श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित और नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता, इला अरुण, सोनी राजदान दिलीप ताहिल द्वारा अभिनीत 'त्रिकाल' (प्रदर्शन वर्ष-1985)।
'त्रिकाल' मेरे अनुसार श्याम बेनेगल की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में एक है। एक अमीर गोआनी परिवार की कहानी कहती, इस फिल्म में गोआनी इसाई परिवार की झाँकी मिलती है। गोवा को इन्हीं माध्यमों से याद करते हुए मैंने सोचा कि जब गोवा पहुँच ही रहे है तो क्यूँ न यू-ट्यूब से गोवा के बारे में कुछ जानकारी हासिल की जाये।
यू-ट्यूब खोलता हूँ तो पाता हूँ कि बहुत सारे वीडियो एक ही राग अलाप रहे हैं गोवा में पर्यटकों की संख्या में गिरावट'। एक वीडियो में देखता हूँ कि पूर्व पुलिस अधिकारी और साहित्यकार विभूति नारायण राय बता रहे हैं कि वह प्रत्येक वर्ष दिसम्बर-जनवरी में गोवा प्रवास करते हैं।
'गोवा में पर्यटकों की संख्या में गिरावट' वीडियों में विश्लेषक बताते हैं कि गोवा में सबसे ज्यादा पर्यटक वर्ष 2019 में आये और वर्ष 2024 में भी आँकड़ा, वर्ष 2019 के पर्यटकों की संख्या को नहीं पार कर पाया। इसके कई कारण विश्लेषक बताते हैं। एक तो यह कि गोवा में टैक्सी ड्राइवर्स पर्यटकों से मनमाने पैसे वसूल करते हैं और उनके इस कृत्य के प्रति गोवा की राज्य सरकार भी उदासीन है। दूसरा गोवा के मुकाबले दूसरे देशों ने भी अपने यहाँ सस्ते पर्यटक स्थल विकसित कर लिये हैं। जिसके कारण विदेशी पर्यटक इन देशों में जा रहे हैं। इसमें सबसे तेज़ी से उभरता हुआ नाम वियतनाम का है। "तो क्या मुझे गोवा में देशी-विदेशी पर्यटक देखने को नहीं मिलेंगे?" इन्हीं प्रश्नों से जब मैं जूझ रहा था तो पाया कि हमारी चार पहिया गोवा राज्य के भीतर प्रवेश कर चुकी है। ओह 'Go-Goa' के आकर्षक विज्ञापन जिन्हें मैं विभिन्न संचार माध्यमों के प्लेटफार्म पर देखता आया था, उस दिन वास्तविकता का रूप ले चुके थे।
गोवा, यानी मात्र दो जिलों वाला राज्य, जहाँ की विधानसभा में भी सदस्यों की संख्या मात्र चालीस है। जो देश का सबसे कम क्षेत्रफल वाला राज्य है लेकिन प्रतिव्यक्ति आय के मामले में जिसका स्थान देश में दूसरे नंबर पर है। इस गोवा के इतने रूप हैं कि अपने तीन दिन के अत्यंत अल्प प्रवास में मैं उनका गहराई से अध्ययन तो नहीं कर पाया लेकिन थोड़ी-बहुत झलक देखने का अवसर मिला। गोवा के खूबसूरत समुद्र किनारे, वहाँ स्थान-स्थान पर खुली हुई शराब की दुकानें ऐतिहासिक चर्च तो आधुनिक तरीके से बने हुये पुल। तीन हजार सात सौ दो वर्ग किमी में फैला गोवा केवल दो जिलों उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा में ही बंटा है। हम लोग उत्तरी गोवा में पहुँचे थे, और वहीं एक होटल में दो दिन का समय बिताना था। इस दौर में हमारी पथ प्रदर्शक बनी पुत्री गार्गी। गार्गी उर्फ हिना, एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्य करती है और विगत छह वर्षों से मुंबई में रह रही है। गोवा के समुद्री किनारे उसको बहुत आकर्षित करते रहे हैं। वह लगभग आधा दर्जन बार वहाँ पहले जा चुकी थी। इसलिए गोवा के बारे में बहुत सारी जानकारियाँ हम लोगों को उसके माध्यम से भी प्राप्त हो रही थीं।
हम लोग उत्तरी गोवा के Calangute इलाके में थे। Calangute में एक समुद्र तट (Sea Beach) भी है लेकिन हम लोगों ने पड़ोस के बागा बीच (Baga Beach) जाने का निर्णय किया। गोवा में बहुत से प्रसिद्ध समुद्री तट हैं जैसे उत्तरी गोवा में Singuerim, Candolim, Ashwem, Calangute, Baga, Anjuna, Vagator, Morjim और Arandol समुद्री तट बेहद प्रसिद्ध हैं। वही दक्षिणी गोवा सर्किट में Palolem Colva, Agond बेहद चर्चित समुद्री तट हैं। वहीं कम चर्चित समुद्री तटों में शामिल हैं, Majards Beach, Benaulim Beach, Callalossim Beach, Varca Beach, Buttefly Beach एवं Cola Beach. एक अनुमान के अनुसार गोवा में 54 समुद्र तट हैं जहाँ पर्यटक जा सकते हैं।
बागा समुद्री तट में मस्ती
जब हम लोग दिन भर की यात्रा के पश्चात् बागा समुद्री तट पर पहुँचे तो मैं वहाँ का नजारा देख कर थोड़ा हैरत में पड़ गया। जनवरी के दूसरे सप्ताह में भी इस समुद्री तट पर सैकड़ों की भीड़ थी। मैं सोच रहा था कि जब जनवरी के दूसरे सप्ताह के प्रारम्भ में इतनी भीड़ है तो 31 दिसंबर को क्या हाल हुआ होगा? पूरा बागा समुद्र तट ढेर सारे रेस्तराँ से अटा पड़ा है। रेस्तराँ मालिकों ने समुद्र का सामना करते रेस्तरों के हिस्से को खूबसूरत प्रकाश व्यवस्था से सजा रखा था। कुछ रेस्तरों में तेज गति से बॉलीवुडी वुडी गाने गाने बज रहे थे जिन पर दर्जनों पुरुष स्त्रियाँ नृत्य कर रहे थे। बाहर रेत पर ढेर सारी छतरियाँ (shack) जगमगा रही थीं जिनके नीचे चार-छह आराम कुर्सियाँ थीं जिन पर बैठे देशी पर्यटक बीयर और शराब का आनंद ले रहे थे। वहीं कुछ उत्साही युवक-युवतियाँ अपने साथ लाये हुए ब्लू टूथ स्पीकर पर नृत्य कर रहे थे। सामने समुद्र की लहरें हिलोरें मार रही थीं। एक अद्भुत नज़ारा था। समुद्री तटों पर भारत का एक अलग ही रूप नजर आता है। उन्मुक्तता से भरा हुआ। चारों तरफ जमीन से घिरे प्रदेशों (अंग्रेजी में Landlocked state) में ऐसे दृश्य बाहर खुले मैदान के स्थान पर, होटलों और रेस्तराओं के भीतर ही देखने को मिल सकते हैं।
स्वास्थ्य सम्बन्धी सावधानियों के चलते मैं शराब का सेवन लगभग न के बराबर करता हूँ इसलिए बीयर या शराब के बजाए मेरी रुचि रात्रि के भोजन में थी। एक होटल में हमने रात्रि का भोजन किया। वहीं गार्गी ने बताया कि बागा समुद्री तट, विदेशियों की पसंद का Beach नहीं है क्यूँकि वहाँ बहुत शोर है और विदेशी पर्यटक शांत समुद्री तटों को पसंद करते हैं। उसके अनुसार Baga-Beach में ज्यादातर पर्यटक, देशी पर्यटक होते हैं। 'प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्' की उक्ति को चरितार्थ देखते हुए, हमने उसकी राय से सहमति जताई और दिन-भर की थकान उतारने के लिए होटल का रुख किया।
'ओल्ड गोवा' का सौंदर्य
गोवा प्रवास के दौरान हमारा दूसरा दिन पंजिम शहर और आस-पास के इलाके घूमने को समर्पित था। पंजिम या पणजी में तीन चीजें देखना मेरी प्राथमिकता में शामिल था। पहला, आकाशवाणी का पणजी केन्द्र। दूसरा, गोवा विश्वविद्यालय और तीसरा, नदी में तैरते जहाजों में सम्पन्न होती कैसिनो की कार्यवाही।
यूँ तो मैं जिस शहर में जाता हूँ, अगर वहाँ रेडियो स्टेशन हुआ तो उसे ज़रूर देखने का प्रयास करता हूँ। इसका कारण आकाशवाणी में चौंतीस वर्षों का अपना सेवा-काल रहा है। लेकिन आकाशवाणी के पणजी केन्द्र को देखने की उत्सुकता मेरे लिए दूसरे कारणों से थी। दरअसल गोवा राज्य का विलय, भारतीय संघ में वर्ष 1961 में हुआ था। इसलिए आकाशवाणी पणजी भी वर्ष 1961 के बाद अस्तित्व में आया होगा। तो मेरी उत्सुकता का विषय था कि वर्ष 1947 से वर्ष 1961 तक गोवा में रेडियो प्रसारण की क्या स्थिति रही होगी? अपने इसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए मैं आकाशवाणी पणजी गया। लेकिन क्योंकि हमारे पास वक्त बहुत कम था और आकाशवाणी पणजी में उस समय काफी कामकाजी माहौल था तो मैं अपने प्रश्न का उत्तर प्राप्त किये बिना ही आकाशवाणी से वापस हो लिया। यद्यपि आकाशवाणी पणजी बहुत सुव्यवस्थित तरीके से बना हुआ है और वहाँ की साफ-सफाई की अच्छी व्यवस्था देख मैं काफी प्रभावित था।
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| Imelda Dias |
बाद में मुझे अपने प्रश्न का आंशिक उत्तर इंटरनेट पर एक किताब 'Reminiscences of My Radio Days' की समीक्षा को पढ़ कर मिला। इस पुस्तक की लेखिका Dona Imelda Dios हैं। उनके संस्मरण से जो तथ्य निकल कर सामने आये, वह कुछ इस प्रकार से हैं:
Dona अपनी किताब में लिखती हैं कि गोवा में रेडियो प्रसारण की शुरुआत 20 मई 1946 को एक बेहद कम शक्ति के ट्रांसमीटर और नारियल के खोल में बने माइक्रोफोन से हुई थी। इस क्रिया को 'Radio Goa' नाम दिया गया था। तत्कालीन पुर्तगाली सरकार को जब 'रेडियो गोवा की ताकत का अहसास हुआ तो इस प्रसारण को ज्यादा शक्तिशाली ट्रांसमिटर्स से करना आरंभ किया। परिणामस्वरूप शिशु रेडियो एक शक्तिशाली मानव में परिवर्तित हो गया एक रोचक, मजेदार और शिक्षाप्रद संस्थान जो शीघ्र ही सम्पूर्ण भारत में बेहद लोकप्रिय हो गया। 'Radio Goa' का नामकरण किया गया 'Emissora de Goa', 'Emissora de Goa' रेडियो की लोकप्रियता ने दोनों तरह प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। जहाँ शेष भारत में अखबारों में ढेर सारे पत्र लिखे गये जिसमें कहा गया कि कैसे यह रेडियो स्टेशन भारत के लिए ठीक नहीं है, वहीं दूसरी तरफ ज्यादा पत्र इस रेडियो स्टेशन के प्रसारण की प्रशंसा और इसके होने के समर्थन में लिखे गये। फिर आया वर्ष 1961 का दिसंबर महीना जब 'आपरेशन विजय' के अंतर्गत भारतीय सेना ने गोवा पर चढ़ाई की। रेडियो स्टेशन पर बमवर्षा हुई, वहाँ का स्टाफ पहले ही पुर्तगाल जा चुका था। गोवा का भारतीय गणराज्य में होने के पश्चात् 'Emissora de Goa' रेडियो, आकाशवाणी (या All India Radio), के रूप में परिवर्तित हो गया। अपनी पुस्तक में Dona Imelda लिखती हैं, From here in 'Emissora de Goa' we were broadcasting to Africa, the Middle East and Europe- When I began b'casting from Lisbon, people in Africa etc-recognized my voice and asked how is it that the Goa lady announcer is heard here in Portugal\ My colleagues said that I had come as an evacuee- And they replied 'so tell her that we listen to her". (Dona Imelda गोवा के भारत में विलय होने के पश्चात छह महीने के लिए पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन चली गई थीं और वहाँ के रेडियो स्टेशन में कार्य करने लगीं। फिर वह भारत वापस आ गई।)
भारत में प्रसारण के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए Dona Imelda Dias की यह पुस्तक बेहद महत्त्वपूर्ण है। परेशानी यह है कि यह आसानी से उपलब्ध नहीं है।
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| गोवा विश्वविद्यालय |
हम लोग आकाशवाणी पणजी से निकल कर गोवा विश्वविद्यालय पहुँचे। गोवा विश्वविद्यालय शहर से थोड़ा हट कर एक लम्बे-चौड़े क्षेत्र में फैला हुआ संस्थान है। यहाँ मराठी, कोंकणी, पुर्तगाली भाषाओं के साथ ही हिन्दी भाषा और साहित्य की पढ़ाई भी होती है। यहाँ हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर युवा अध्यापक विपिन तिवारी कार्यरत हैं। विपिन लखनऊ के ही रहने वाले हैं। संयोगवश उनसे मेरा पूर्व परिचय था। लगभग एक घंटे उनका आतिथ्य स्वीकार कर हम लोग निकल पड़े ओल्ड गोवा की तरफ।
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| Church of St. Francis of Assisi |
ओल्ड गोवा
गोवा की राजधानी पंजिम से लगभग बारह किमी की दूरी पर स्थित है ओल्ड गोवा, यानी गोवा का मूल रूप। गोवा अपने समुद्री तटों के अतिरिक्त जिस चीज़ के लिए बेहद प्रसिद्ध है. वह है वहाँ के खुबसूरत चर्च। और इन खूबसूरत चर्चों को देखने के लिए ओल्ड गोवा से ज्यादा बेहतरीन जगह और कोई नहीं।
गोवा विश्वविद्यालय से निकल कर हम लोग 'ओल्ड गोवा की तरफ बढ़ गये थे। जनवरी के दूसरे सप्ताह में खूब खिली हुई धूप में हमें बहुत दूर से ही चर्च की सफेद चमकदार इमारतें नजर आने लगी थीं। एक शाँत गाँव की तरह दिख रहे 'ओल्ड गोवा' में हमारे पहुँचने से बहुत पहले ही ढेर सारे पर्यटक पहुँचे हुए थे जिनमें से कईयों ने वहाँ के स्थानीय दुकानदारों से अलग-अलग किस्म की टोपियाँ खरीद रखीं थीं। विभिन्न टोपियों और धूप के चश्मे में सजे-धजे बहुत से पर्यटक पूरी मस्ती के आलम में सराबोर दिख रहे थे। जो 'ओल्ड गोवा' उस समय गंभीर और शांत दिख रहा था, वह अपने भीतर पाँच सौ वर्षों से अधिक का इतिहास समेटे था अब वहाँ उस इतिहास के थोड़े बहुत अवशेष ही थे।
यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के तौर पर संरक्षित ओल्ड गोवा का एक और नाम Velha Goa है जो इसका पुर्तगाली नाम है। 'ओल्ड गोवा' या 'Velha Goa' की स्थापना समीप में बहती मांडोवी' (Mandovi) नदी के किनारे पंद्रहवीं सदी में एक पोर्ट के तौर पर 'बीजापुर सल्तनत ने की थी। आदिल शाह राजवंश की दूसरी राजधानी था 'ओल्ड गोवा नगर (पहली बीजापुर थी)। बाद में पुर्तगालियों ने इस पर कब्ज़ा किया और पुर्तगाली हिन्द की राजधानी के तौर पर वर्ष 1510 से यह प्रशासनिक केन्द्र रही। सोलहवीं सदी के मध्यकाल से 'Velha Goa' पूरब में ईसाईकरण का केन्द्र था। वर्ष 1543 तक इस नगर की जनसंख्या लगभग दो लाख थी। मलेरिया और हैजा ने इस शहर को सत्रहवीं सदी में तबाह कर दिया और यहाँ के अधिकांश निवासियों ने 'ओल्ड गोवा' से पलायन कर लिया था जिसके चलते वर्ष 1775 तक मात्र पन्द्रह सौ लोग ही यहाँ रह गये थे। यह वह समय जबकि पुर्तगाली वायसराय निकटवर्ती पंजिम चले गये थे। संवैधानिक तौर पर वर्ष 1843 तक यह गोवा की राजधानी रही लेकिन फिर पंजिम को राजधानी घोषित किया गया।
'Velha Goa' के इतिहास से निकल कर मैं निकट अतीत में आता हूँ जब ओल्ड गोवा में पुराने चचों के सौंदर्य को देख कर मैं अचंभित था। कुछ वर्ग किलोमीटर में ढेर सारे चर्च देश के उस सामाजिक ताने-बाने को प्रदर्शित कर रहे थे, जिस ताने-बाने के तहत देश के सभी धर्मों और जातियों के लोग मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा, बौद्ध एवं जैन धार्मिक स्थलों में जा कर आध्यात्मिक अनुभूति की प्राप्ति की चाह रखते हैं।
हम एक चौड़ी सड़क पर खड़े थे जहाँ हमारे दाईं तरफ 'Basilica of Bom Jesus' चर्च था और दाईं तरफ 'Church and convent of St-Francis of Assissi' एवं 'Se Cathedraal' की इमारतें थीं। हम लोगों ने पहले Bom Jesus' चर्च का रुख किया। आइये इन चर्चों की चर्चा करते हैं।
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| Basilica of Bom Jesus church |
बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस चर्च
आइए सबसे पहले इस शब्द का अर्थ समझते हैं। यहाँ Bom Jesus का अर्थ है Infant Jesus या शिशु जीसस। शब्द Basilica की उत्पत्ति एक ग्रीक शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है शाही मकान। कैथोलिक विश्व में, Basilica एक ऐसी चर्च बिल्डिंग को कहते हैं जिसे पोप द्वारा विशेष सुविधाएँ दी जाती हैं। यह चर्च गोवा का सबसे पुराना चर्च है और इसका निर्माण प्रारंभ हुआ था वर्ष 1594 में। अपनी आकर्षक वास्तुकला के लिए आज चार सौ पच्चीस वर्षों बाद भी लाखों लोगों के आकर्षण का केन्द्र बने इस में सोलहवीं सदी में जन्मे संत फ्रांसिस जेवियर के अवशेष हैं जो प्रत्येक दस साल बाद जनता के दर्शनार्थ रखे जाते हैं। संयोगवश वर्ष 2024 के दिसंबर माह में संत फ्रांसिस के अवशेष जनता के दर्शनार्थ रखे गये थे। उनके दर्शन को देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। मैं सोच रहा था कि अगर हम लोगों ने गोवा की यात्रा कुछ दिनों पूर्व निर्धारित की होती तो दशक में एक बार होने वाली इस घटना के चश्मदीद होते।
Basilica of Bom Jesus Church चर्च की सवा चार सौ वर्ष पुरानी इमारत को देखने के बाद हम उसके ठीक सामने एक प्रांगण में थे जहाँ बहुत सारे चर्च स्थापित थे। इसमें प्रमुख था 'Se Cathedral Church' और Church and convent of St- Francis of Assissi. इन सारे चर्चों का निर्माण सोलहवीं और सत्रहवी शताब्दी में प्रारंभ हुआ था। इसी परिसर में 'Archacological Museum of Goa' नाम से एक बेहद सुंदर संग्रहालय है। इस संग्रहालय की स्थापना की शुरुआत वर्ष 1964 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गयी थी। भारत में चार सौ वर्षों के पुर्तगाली शासन के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए तो यह संग्रहालय किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहाँ गोवा के विभिन्न वायसराय के दुर्लभ पोट्रेट हैं, साथ ही उस दौर के डाक टिकट, सिक्के। साथ ही गोवा के विभिन्न हिन्दू मंदिरों से प्राप्त मूर्तियाँ। लेकिन सबसे अद्भुत है एक लम्बी चौड़ी कांस्य की मूर्ति जो गोवा के प्रमुख कवि Luis Vaz de Camoes की है।
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| Luis Vaz de Camoes |
किसी कवि को इतना सम्मान देती हुई इतनी भव्य मूर्ति मैंने पहली बार गोवा के इसी संग्रहालय में देखी।
यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थल के लगभग एक किमी क्षेत्र में और भी बहुत से दर्शनीय गिरजाघर थे, लेकिन हमारे पास समय नहीं था, इसलिए हमने कुछ ही गिरजाघरों को देख कर होटल की राह पकड़ी।
गोवा के कैसिनो
द्यूत क्रीड़ा की रुचि रखने वालों के लिए गोवा स्वर्ग है। और इस स्वर्ग का प्रवेश द्वार खुलता है विभिन्न कैसिनो से। जब कोई गोवा की राजधानी पणजी में प्रवेश करता है तो उसे शहर के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग कैसिनो के आकर्षक होर्डिंग्स दृष्टव्य होते हैं। 'Big Daddy', 'Pride Casino', 'Deltin Royal Casino', Deltin Jaqk' हमारे देश में सार्वजनिक स्थलों पर जुआखोरी का निषेध है, इसलिए गोवा में भी लाइव जुआ, मुख्यभूमि पर नहीं होता बल्कि पंजिम शहर में बहने वाली मांडोवी नदी के बीचों बीच बड़ी सी खूबसूरत नावों पर सम्पन्न होता है। वैसे गोवा, भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ Electronic Inland Casino एवं Live offshore Casino दोनों की इजाजत है।
पर्यटन के लिहाज से गोवा में हमारी त्रासदी यह थी कि हम लोगों के पास समय बहुत कम था और हमें बहुत सारे स्थानों तक पहुँचना था। इसलिए कैसिनो को देखने और उसके अंदर जाने की प्रबल इच्छा के बावजूद हम लोग उसके भीतर तो नहीं गये लेकिन गोवा के कैसिनो के बारे में ढेर सारी जानकारियाँ बटोरी। जो जानकारी हमें हासिल हई उसके अनुसार कैसिनो में प्रवेश करने के लिए आपको कुछ न्यूनतम रुपयों का एक टिकट लेना पड़ता है। यह टिकट प्रायः पंद्रह सौ रुपयों से प्रारंभ होता है। इस टिकट को ले कर जब आप कैसिनो में प्रवेश करते हैं तो वहाँ बुफे स्टाइल में भोजन, शराब और रुपये पंद्रह सौ के बदले कुछ रुपयों के टिकट जुआ खेलने के लिए मिल जाते हैं। दरअसल यह ग्राहकों को प्रलोभन के एक जाल में धकेलने के उपक्रम का प्रस्थान बिन्दु होता है। माहौल को उत्तेजक बनाने के लिए कई कैसिनो में गाने और नृत्य के कार्यक्रम भी साथ-साथ चलते रहते हैं। लोग बढ़िया भोजन का लुत्फ उठाते हैं, जो शराब के शौकीन है वह शराब पीते हैं और जिन्हें कैसिनो का आकर्षण अपनी ओर खींचता है, वह उसमें डूब जाते हैं। यहाँ दोनों ही परिणाम हो सकते हैं। कई पर्यटक विजयी भाव से भी इन कैसिनो से बाहर निकलते हैं तो कुछ यह गुनगुनाते हुए सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया'।
गोवा में सामिष भोजन
गोवा राज्य के चुनिंदा राज्यों में से एक है जहाँ गौमांस निषिद्ध नहीं है। एक आँकड़े के मुताबिक गोवा में प्रतिदिन लगभग बीस टन गौमाँस खाया जाता है। इसे देशी-विदेशी पर्यटकों के अतिरिक्त गोवा की आवादी में शामिल कैथोलिक और मुस्लिम आबादी खाती है। गोवा के अलावा केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल एवं उत्तर-पूर्व भारत के बहुत से राज्यों में भी गौमाँस का व्यापार निषिद्ध नहीं है। इसलिए उत्तरी गोवा के एक रेस्तोरों में जब मैंने खाने का आर्डर देने के लिए रेस्तोरों के मेन्यू कार्ड का अवलोकन किया तो वहाँ बीफ (गौमांस) के विकल्प को देख कर मुझे ज़्यादा आश्चर्य नहीं हुआ। भारत अपने भीतर विविध किस्म के रीति-रिवाज़ एवं खान-पान की संस्कृतियों को समाहित किये हुए ऐसा देश है जहाँ आपको बेहद विरोधाभासी तत्वों के दर्शन होंगे। अगर उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर गौहत्या एवं गौमाँस के विरोध में व्यापक विरोध प्रदर्शन होते हैं तो वहीं कुछ राज्यों में इन्हें सार्वजनिक स्थानों पर बेचने की भी मनाही नहीं है। इसी के चलते गोवा, भारत का एक अनूठा राज्य है जहाँ मुख्यधारा के भारत से हट कर एक विभिन्न किस्म की संस्कृति के दर्शन होते हैं।
समुद्र तटीय क्षेत्रों में, मैं जब भी जाता हूँ तो मुझे समुद्री जीवों से बने विविध व्यंजन हमेशा आकर्षित करते हैं। क्योंकि मैं बचपन से मछली खाने का शौकीन रहा हूँ, इसलिए मेरी पहली प्राथमिकता समुद्री मछली की रही है। दक्षिण और पश्चिमी भारत में आपको ऐसे बहुत से रेस्तराँ मिल जाएँगे जहाँ केवल विभिन्न समुद्री जीवों से निर्मित भोज्य पदार्थ मिलेंगे। लेकिन इन भोज्य पदार्थों में बड़ी मात्रा मछलियों की होती है। अब इन मछलियों में जो लोकप्रिय है, उनमें Pomfret मछली सबसे ज्यादा माँग में रहती है। फिर झींगा यानी Prawn का एक अलग आनंद है। तो एक रेस्तराँ में Pomfret का स्वाद तो मैंने लिया ही, साथ ही एक अन्य समुद्री जीव को अपने खाने में दर्ज किया। यह समुद्री जीव Squid से बने व्यंजन।
उत्तर भारत के शहरों के कुछ चुनिंदा रेस्तरों में तो समुद्री व्यंजन मिल जायेंगे लेकिन देश के तटीय क्षेत्रों में जिस सुलभता से यह उपलब्ध हैं, किसी भी शौकीन के लिए इन क्षेत्रों में यह बड़ा आकर्षण होते हैं। गोवा पर्यटन की कुछ यादगार चीजों में सामिष भोजन का लुत्फ उठाना भी एक था।
गोवा यात्रा का अंतिम चरणः दक्षिण गोवा की ओर
जैसा कि मैं पूर्व में भी लिख चुका हूँ कि गोवा राज्य दो जिलों उत्तरी गोवा और दक्षिणी गोवा में विभक्त है। दोनों जिलों के मुख्यालय के मध्य सड़क मार्ग से दूरी लगभग बहत्तर किमी की है। जहाँ उत्तरी गोवा का मुख्यालय पणजी है, वहीं दक्षिण गोवा का मुख्यालय मडगाँव है। उत्तरी गोवा के मुकाबले दक्षिणी गोवा में देशी पर्यटकों की आवाजाही कम है। इसके विपरीत विदेशी पर्यटक, दक्षिण गोवा के समुद्री तटों को ज्यादा पसंद करते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि बहुत से विदेशी पर्यटक जो गोवा आते हैं, उन्हें गोवा में ऐसे समुद्री तटों की तलाश रहती है जो अपेक्षाकृत शांत हों और आर्थिक रूप से सस्ते हों। दक्षिण गोवा में उन्हें यह दोनों सुविधा मिलती है। दक्षिण गोवा के बारे में एक रोचक तथ्य यह भी है कि यहाँ पर्यटन की शुरुआत थोड़ी देर से हुई। यानी पिछली सदी के आखिरी दशक से। 1990 के पहले यहाँ पर्यटन लगभग न के बराबर था। आज भी दक्षिण गोवा में, उत्तरी गोवा के मुकाबले में रिहायश के लिए अपेक्षाकृत सस्ते दरों पर होटल और होम स्टे उपलब्ध हैं।
हमारी चार पहिया गूगल मैप की सहायता से दक्षिण गोवा के Palolem Beach पहुँचती है जहाँ पहले से ही ढेर सारे पर्यटक मौजूद थे जिसका अंदाजा हम लोगों को चार पहिया वाहनों की पार्किंग से हो गया था। थोड़ी जद्दोजहद के बाद गाड़ी पार्क कर जब हमारा परिवार पार्किंग से बाहर आया तो सामने सूरज अपनी दिन भर की मेहनत के बाद डूबता नज़र आ रहा था। बहुत सारे लोग समुद्री तटों पर इसलिए भी जाते हैं ताकि सूर्योदय और सूर्यास्त का आनंद ले सकें। क्षितिज के पार, समुद्र के भीतर से सूरज का उदित होना, अपनी सुनहरी आभा से पृथ्वीवासियों के भीतर आशा और उत्साह का नवीन संचार करना और फिर गोधूलि की बेला में समुद्र के भीतर जल समाधि ले लेना, यह दोनों ही ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ हैं जिनका आनंद लेने चारों दिशाओं से नरपुंगव दुनिया के विभिन्न समुद्री तटों पर पहुँचते हैं।
Palolem Beach पर समुद्र में सूरज की जलसमाधि का दृश्य साकार होने जा रहा था लेकिन हमारे परिवार और इस दृश्य के मध्य अवरोध की तरह एक छोटी पहाड़ी खड़ी थी और मुझे लग रहा था कि हमारा परिवार इस परिघटना से वंचित होने जा रहा है। लेकिन तभी बेटी गार्गी और पत्नी लक्ष्मी ने इस अवरोध से निजात पाने की एक नायाब तरकीब निकाल ली। दोनों ने पास खड़े एक डोंगी वाले से बात की, लाइफ जैकेट पहनी और एक डोंगी ले कर निकल पड़े। समुद्र में, पहाड़ी के पार सूर्य को समुद्र की बाँहों में डूबता हुआ देखने के लिए। सोने में सुहागा गार्गी ने डोंगी में अपनी प्रिय Mercy को भी रख लिया। Mercy यानी श्वान जाति की Beagle प्रजाति की पाँच वर्षीय जीव। हमारे परिवार की डोंगी के साथ ही उस समय समुद्र के सीने को चीरती हुई और ढेर सारी डोंगियाँ दृष्टव्य थीं। समुद्र में डोंगी चलाने की इस क्रिया को आंग्ल भाषा में Kayaki के नाम से जाना जाता है। जहाँ डोंगी में बैठे प्रत्येक नाविक के हाथ में दो पतवारें होती हैं और इन्ही पतवारों से डोंगी समुद्र में आगे बढ़ती है। इस तरह के साहसिक पर्यटन में मेरी कोई रुचि नहीं है। (एवं तैराकी न जानने के चलते भयग्रस्तता की स्थिति भी रहती है।) इसलिए मैं रहा किनारे बैठ।
सफेद समुद्री रेत वाला Palolem Beach दक्षिण गोवा का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। बीच पर स्थित रेस्तराँ में शाम के समय जहाँ बहुत सारे देशी-विदेशी पर्यटक बीयर और शराब के सेवन में मस्त थे, वहीं समुद्री तट के बाहर एक बाजार में विक्रय हेतु ढेर सारी वस्तुएँ उपलब्ध थीं। इनमें पुरुषों औरतों के कपड़ों से लेकर, धूप के चश्मे, तैरने की पोशाकें, आभूषण वगैरह-वगैरह। Palolem Beach के थोड़ा आगे रेस्तराओं की एक श्रृंखला है जहाँ सामिष और निरामिष सभी तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं।
दक्षिण गोवा में और भी ढेर सारे खूबसूरत समुद्री तट हैं जिसमें Aqonda Beach, Colva Baech, Vacra Beach उल्लेखनीय हैं। यदि किसी के पास ढेर सारा समय हो तो इन समुद्री तटों पर जा कर लहरों से अठखेलियों कर सकता है। हम लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे।
गोवा भ्रमण के दौरान हमें थोड़े समय के लिए उत्तरी गोवा के Morjim Beach में जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। वहाँ समुद्री तट के किनारे छयादार फोल्डिंग तख्तों पर लगभग अर्द्ध नग्न अवस्था में लेटे विदेशी स्त्री-पुरुषों को देख कर एक सवाल मेरे दिमाग में रह-रह कर उठ रहा था कि आखिर यह लोग इतनी बड़ी तादाद में अपना देश छोड़ कर विदेशी धरती पर कई-कई दिनों के लिए रहने क्यूँ आते हैं? स्थानीय निवासियों से बात करने पर पता चला कि विदेशी पर्यटकों में बड़ी संख्या रूसी और इजराइली पर्यटकों की होती है। जिस उन्मुक्त अवस्था में वहाँ विदेशी नर-नारी थे, उनसे बात करने का तो मुझे साहस नहीं हुआ लेकिन यह प्रश्न रह-रह कर मुझे परेशान कर रहा था। तो क्या मैं इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त किये बिना ही गोवा से वापस लौट जाऊँगा? इसी उधेड़बुन में, मैं गोवा में लगातार भ्रमणशील था। लेकिन अपने चार दिवसीय गोवा प्रवास के अंतिम दिन यानी 10 जनवरी की सुबह मुझे इस प्रश्न का आंशिक उत्तर अपने प्रातः भ्रमण में मिल गया।
प्रशासनिक दृष्टि से उत्तरी और दक्षिणी गोवा की विभिन्न तालुकों में विभक्त किया गया है। जहाँ उत्तरी गोवा पाँच तालुका में विभक्त है, वहीं दक्षिणी गोवा सात तालुका में विभक्त है। हम लोग दक्षिणी गोवा के Canacona में रुके थे और यह गोवा का सबसे दक्षिणी हिस्सा है और इस तालुका की दक्षिणी सीमाएँ कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिल से सीमाएँ बनाती हैं।
इसी तालुका में सुबह-सुबह मेरी भेंट रूस के रहने वाले एक नागरिक से हुई। लम्बे, गौरवर्ण इन महाशय की वेशभूषा से मुझे इन सज्जन के ISCON का सदस्य होने का भ्रम हुआ। क्योंकि इन सज्जन ने अपने सिर के पृष्ठ भाग में एक चोटी बाँध रखी थी।
'हैलो-हैलो' के पश्चात् मुझे जानकारी हुई कि सज्जन का नाम एन्ड्र है। एन्ड्र से मैंने वही सवाल दागा जिसने मुझे चार दिनों से परेशान कर रखा था। मैंने पूछा आखिर इतनी बड़ी तादाद में रूसी लोग गोवा क्यूँ आते हैं? एन्ड्र ने बताया कि दिसम्बर-जनवरी में रूस के कुछ इलाकों में बेहद ठंड पड़ती है और कई-कई दिनों तक सूर्य देवता के दर्शन नहीं होते, इसलिए तमाम रूसी नागरिक भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों में गर्म स्थानों पर रहने आते हैं। एन्ड्र ने यह भी कहा कि वह लोग दिसम्बर-जनवरी में उत्तर भारत का रुख नहीं करते क्यूँकि उन्हें पता है कि उत्तरी भारत में काफी ठंड पड़ती है।
गोवा में यद्यपि मेरा प्रवास चार दिनों का था लेकिन इन चार दिनों में गोवा के समाज के इतने पृष्ठ क्रमशः खुलते गये जिनकी मैंने यात्रा आरंभ होने से पूर्व आशा नहीं की थी। गोवा में सिर्फ खूबसूरत गिरिजाघर ही नहीं है वरन् प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। एक बात और गोवा में देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुँचे लोग विभिन्न व्यवसायों से जुड़े हैं। अगर मुझे वहाँ परचून की दुकान में काम करते हुए गोरखपुर के कुछ नवजवान मिले तो होटलों में काम करने वालों में बड़ी संख्या बंगाल के लोगों की है। ऐसे ही एक रेस्तराँ में नाश्ता करने के दौरान जब मैंने होटल मालिक से उनका मूल निवास पूछा तो उन्होंने हरियाणा बताया। देश के तमाम उद्योगपतियों के आलीशान होटल गोवा में हैं। दरअसल हमारे देश में, जहाँ भी अच्छी आय की संभावना है, वहाँ देश के विभिन्न हिस्सों से लोग रोजी-रोटी कमाने के लिए पहुँच जाते हैं। गोवा भी इसका अपवाद नहीं है।
देश-विदेश की विभिन्न संस्कृतियों के संगम वाले इस तीर्थ में डुबकियाँ लगाने प्रति वर्ष यदि हजारों, लाखों पर्यटक पहुँचते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
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