यादवेन्द्र का आलेख 'कविता में कहानी'


यादवेन्द्र 


जीवन कविता से हमेशा आप्लावित रहता है और इसका हर एक चरण खुद में एक रोचक कहानी होता है। सुख हो या दुःख, उल्लास हो या शोक, कवि हर जगह कविता की तलाश कर ही लेता है। संस्कृत साहित्य का पहला श्लोक वाल्मीकि ने रति क्रिया में लिप्त क्रौंच के जोड़े पर तीर चलाने वाले बहेलिए के प्रति शोक के परिणामस्वरूप ही लिखी थी। 'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।/ यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम् ।।' इस तरह कविता में कहानी या फिर कहानी में कविता की धारा बहती रहती है। बस इसे देखने वाले में उस काव्य नजर का होना जरूरी होता है। यादवेन्द्र ने अपने आलेख में उन कविताओं की पड़ताल की है जिनमें कथा तत्त्व शामिल होता है। जरूरी नहीं कि इस तरह की कविता लम्बी ही हो। वह छोटी होते हुए भी जीवन के अद्भुत दृश्यों से भरी हो सकती है। एक तरफ जहां कथा तत्त्व कविता को रोचक और दृश्यमय बनाता है वहीं दूसरी तरफ काव्य तत्व कहानी को सहज, सरस और गीतमय बनाता है। यही वजह है कि कवियों द्वारा लिखी गई कहानियां कुछ अलग अंदाज लिए होती हैं जबकि कहानीकारों द्वारा लिखी गई का कविताएं कहानीपन की आभा लिए होती हैं।

आजकल पहली बार पर हम प्रत्येक महीने के पहले रविवार को यादवेन्द्र का कॉलम 'जिन्दगी एक कहानी है' प्रस्तुत कर रहे हैं जिसके अन्तर्गत वे किसी महत्त्वपूर्ण कहानी को आधार बना कर अपनी बेलाग बातें करते हैं। इस बार अपने कॉलम के अन्तर्गत उन्होंने कविता में कहानीपन के तत्त्व की चर्चा की है। कॉलम के अंतर्गत यह पन्द्रहवीं प्रस्तुति है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यादवेन्द्र का आलेख 'कविता में कहानी'।



जिन्दगी एक कहानी है : 15

'कविता में कहानी'


यादवेन्द्र 


मैं सबसे पहले यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं साहित्य का अध्येता हूँ बस, इसलिए मेरी टिप्पणी को किसी तरह से आलोचनात्मक या समीक्षात्मक टिप्पणी न माना जाए। यह लिखते पढ़ते हुए आँखों के सामने से गुजरी सामग्रियों पर एक पाठक की प्रतिक्रिया भर है।


दूसरी बात यह स्पष्ट करनी है कि यहाँ चयनित और उद्धृत रचनाओं में किसी श्रेष्ठता या वरिष्ठता को आरोपित करने का मेरा कोई इरादा नहीं है - बस इन दिनों जो कुछ पढ़ा उनके बारे में अपनी राय पाठकों के साथ साझा करना मेरा उद्देश्य है। यह पूरी तरह संभव है कि इनसे इतर कई और रचनाओं के बारे में बात की जा सकती थी लेकिन मैंने उन्हें पढ़ा नहीं इसलिए उनकी चर्चा नहीं - यह महज़ संयोग है और मेरी सीमा भी।

(एक तरह का डिस्क्लेमर)


मेरी व्यक्तिगत दिलचस्पी कविताओं में कहानी और कहानी में कविताएं ढूंढने में है और मुझे इस तरह की कई रचनाएं मिली हैं जिनमें यह विशेषता है। मैं यह कतई नहीं मानता कि कविता को कविता होने के लिए उसमें कहानी होना जरूरी है और कहानी को कहानी होने के लिए उसमें कविता होना जरूरी है। बस एक से दूसरी विधा में सहज आवाजाही रचना का रंग, रूप, गंध बढ़ा कर ज्यादा ग्राह्य, विश्वसनीय और ललित बना देता है।


बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ी हुई श्याम नारायण पांडेय की 'हल्दीघाटी' और सुभद्रा कुमारी चौहान की 'झांसी की रानी' इसलिए प्रिय थीं कि इनको पढ़ते हुए सिनेमा के बदलते सीन सरीखी छवियाँ आँखों के सामने तैर जाती थीं। इन्हें सिनेमेटिक कह सकते हैं।


श्याम नारायण पाण्डेय 


नौकरी से छुटकारे के बाद पटना आ कर रहने लगा तो अरुण कमल से बार-बार न सिर्फ़ मिलना हुआ बल्कि समग्रता में उनकी कविताओं को पढ़ने के अवसर भी मिले। उनकी कविताओं में से एक कविता जो मेरे मन में तब से बैठी हुई है जब से मैंने इसे पहली बार पढ़ा.... और मैं इस कविता को बार-बार पढ़ता हूँ, लोगों को बार-बार सुनाता हूँ और ऐसा करते हुए ध्वनियों से ज्यादा दृश्य मेरे आस-पास तैरते हैं। यह अरुण जी की शुरुआती कविताओं में से एक है - 'धरती और भार'।


यह छोटी सी कविता दरअसल एक समझ विकसित होते हुए किशोर का अपनी गर्भवती भौजी को संबोधित निर्विकार और प्रेमिल अनुनय-विनय के शिल्प में है। यह ध्यान देने की बात है कि सब कुछ निम्न मध्यम वर्गीय ग्रामीण परिवेश में घटित हो रहा है।


अरुण कमल 


पूर्ण गर्भवती भौजी को एक नहीं दोनों हाथों में डोल (बाल्टी) टांग कर नल पर पानी भरने के लिए घर से बाहर गली में चल कर जाना पड़ता है - रास्ते में कंकड़ पत्थर हैं, इस वजह से उसमें चलना भी आसान और सुरक्षित नहीं है और कहीं भी ठोकर लग कर गिरने का अंदेशा है। ऊपर से भौजी का डोलता हुआ पेट और उसके अंदर बाहर आने को अकुलाता शिशु, उनके चलने पर वह पेट के अंदर से बाहर की ओर झूले जैसा आगे पीछे झूलता है। वाचक को प्यार करने वाली भौजी की मजबूरी है कि घर के अंदर नल नहीं है इसलिए बाहर जा कर दैनिक जरूरत का पानी ले कर खुद आना पड़ता है। उनके दोनों हाथों में लटके हुए पानी से भरे भारी डोल हैं जिसके द्रव्यमान को धरती गुरुत्वाकर्षण के कारण अपनी ओर खींचती हैं। इस सारे परिदृश्य में जो सहज स्वाभाविक क्रिया है वह यह है कि देह की तमाम नसें खिंच जाएंगी, हड्डियां उकस जाएंगी और बउआ (शिशु) को अपने अंदर सावधानी से संभाले हुए पेट ऊपर नीचे दोल जाएगा। और तो और, वाचक को चिंता है कि भौजी तो बड़ी हैं किसी तरह सारे कष्ट सहन कर लेंगी लेकिन जो अभी जन्म लेने वाला है वह बउआ इस सारी क्रिया प्रतिक्रिया को भला कैसे झेल पाएगा - वह बेचारा तो थक जाएगा।


उस बेचारे की भैया से खुद कहने की हिम्मत नहीं है लेकिन भौजी से मनुहार करता है कि भैया को घर के आंगन में अपना नल बैठा देने के लिए मना लो ताकि तुम्हारे नहाने के लिए घर के अंदर ही इंतजाम हो जाए। ऐसा इंतजाम हो जाएगा तो तुम्हें बाहर जा कर एक पांव पर खड़े रह कर न तो देर देर तक इंतजार करना पड़ेगा और न ही लोगों के बीच किसी तरह से अपनी इज्जत बचाते हुए नहाना पड़ेगा।


तुम कितना झुकोगी 

देह को कितना मरोड़ोगी  

घर के छोटे दरवाजे में 

तुम फिर गिर जाओगी 

कितनी कमजोर हो गई हो तुम 

जामुन की डाल सी.... 


वाचक कविता के अंत में फिर आग्रहपूर्वक चेताता है कि हाथ में डोल लिए तुम बाहर नल पर पानी भरने मत जाना भौजी... कहीं गिर गई तो अनिष्ट हो जाएगा। तुम्हारी सुकुमार देह को तो चोट लगेगी ही उस अजन्मे बउआ का क्या होगा, वह तो खुद बेचारा अपनी सुरक्षा भी नहीं कर पाएगा। कितनी कातर प्रतीक्षा है आगत की - बउआ की। यह चिर प्रतिक्षित आगत और कोई नहीं भविष्य है, बेहतरी और साथ देने वाले एक और परिजन की उम्मीद है। बउआ की फ़िक्र में हलकान हुआ जाता वाचक जिस तरह बउआ को कविता के केन्द्र में ला देता है वह इस रचना को न सिर्फ़ अर्थ-विस्तार देता है बल्कि महत्वपूर्ण बनाता है।


अरुण कमल की ही एक अन्य कविता है 'सखियाँ' - यह इतनी ही दृश्यात्मक है जैसे पहली कविता। फ़र्क यह है कि इसमें दो सखियाँ माथे पर पानी से भरा गगरा लिए साथ साथ घर जा रही हैं, एक के तलवे में चलते हुए कांटा चुभता है तो सखी ने बगैर कुछ कहे फ़ौरन उसे खींच कर बाहर निकाल देती है फिर दोनों सखियाँ हँसी ठिठोली करती गंतव्य को निकल जाती हैं। यह कविता पढ़ते हुए भी मैं एक पन्ने की कहानी देखता हूँ लेकिन यह कहानी फ्रेम दर फ्रेम आगे नहीं चलती - वहीं शुरू होती है और सहेलियों के साझेपन के महत्व को रेखांकित करते हुए वही संपन्न हो जाती है।


'धरती और भार' कविता उससे आगे जा कर एक दृश्य में नहीं बल्कि एक वक्तव्य देती हुई दृश्य शृंखला बन कर सम्पन्न होती है। इसी को मैं कविता में कई पन्नों की बड़ी कहानी कहता हूँ।


मेरी प्रिय दृश्य कविताओं में ऐसी ही एक कविता है राजेश जोशी की 'बिजली सुधारने वाले' - यह भी कदम दर कदम एक पूरा दृश्य विधान रचती है कहानी की तरह। मैं इसे जब भी पढ़ता हूँ तो जैसे सब कुछ आँखों के सामने घटता हुआ दिखाई देता है।


झड़ी वाली रात में अंधड़ से सन्नाट पड़ती बौछाट के चलते आपस में गुत्थम गुत्था हो रहे हैं तार। तभी पानी में भीगते नंगे तार से चिंगारियों का चटकना शुरू होता है और अगले ही पल आग का एक उजला फूल बड़े तारे सा ऊपर से झरता है अंधेरी नदी के अंदर। यह हुआ हुआ ही कि घुप्प अंधेरे के अथाह सागर में मोहल्ले के मोहल्ले डूब जाते हैं। 


राजेश जोशी 


ठप कामकाज और जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए फ़ौरन तलब किए जाते हैं बिजली सुधारने वाले, वे आते भी हैं बगैर देर किए। झड़ी लगी हुई है लेकिन वे कोई कोताही नहीं करते अपने काम में... रात, अंधड़ और पानी से तर ब तर हो कर भी बिजली सुधारने का दायित्व पूरा करते हैं।


वे साइकिल से अपने हुनर के साथ टोप लगाए हाथों में रबर के दस्ताने चढ़ाए आते हैं। साइकिल पर लटका कर लाते हैं अपनी पूरी वर्कशॉप- एल्युमिनियम की फोल्डिंग नसेनी, लकड़ी की लंबी छड़, एक पुराने झोले में तार, पेंचकस, टेस्टर और जाने क्या क्या भरे हुए। 


जिन घरों से शिकायत आई है उनकी पुरानी बरसातियों की दरारों और कालर से रिसता हुआ पानी उन्हें अंदर तक भिगोता है। फिर भी वे आते हैं मुस्तैदी के साथ भीगते-भागते। अंधेरे की दीवार को अपनी छोटी सी टॉर्च से छेद कर प्रवेश का रास्ता बनाते हैं।


यह उस समय की बात है जिस समय बिजली के खंभों पर लगे चीनी मिट्टी के सफ़ेद और गाढ़े भूरे इंसुलेटर ( विद्युत अवरोधक) काम में लाए जाते थे - धीरे धीरे पंद्रह बीस साल पहले उनके बेहतर और छोटे विकल्प प्रचलन में आ गए और अब तो ज्यादातर शहरों में बिजली के तार भूमिगत हो गए और सीढ़ी सरीखे पुराने ताम-झाम की जरूरत खत्म हो गई।


बिजली सुधारने वाले साथ लाई सीढ़ियों पर चढ़ कर चीनी मिट्टी के इंसुलेटर को घुमा कर (कान उमेठ कर) गड़बड़ियों का पता करते हैं और फिर पतला सा तार कस कर बिजली की सप्लाई बहाल कर देते हैं। इतनी कठिन रात में भी उनकी मुस्तैदी से देखते-देखते 


एक बार फिर 

जगमग हो जाती है 

हर एक घर की आँख।


अवांछित अंधेरे को उजाले में बदलते हुए वे न तो थकते हैं न मौसम की मार से विचलित होते हैं- अपनी सीढ़ी उतार कर वे अपनी जेब से वह कागज निकालते हैं जिसमें शिकायतों का हिसाब किताब दर्ज़ है। क्रम से काम करते हुए वह इस शिकायत पर संतुष्ट हो कर काम संपन्न हो जाने का निशान लगाते हैं और देखते हैं कि अगली शिकायत कहाँ से आई है। रात बढ़ती जा रही है और अंधड़ पानी ठहरने का नाम नहीं ले रहे - वे अगले मोहल्ले की तरफ बढ़ जाते हैं। वहाँ भी उन्हें अंधेरे को उजाले में बदलना है जिससे फिर से लौट आए ठिठका हुआ जीवन।


यह एक मुकम्मल कहानी है, भले ही लिखी कविता के शिल्प में गई है।

   

मुझे बहुत बाद में पता चला कि शादी के बाद बहन का घर बदल जाता है - हमारे परिवार में एक बुजुर्ग की मृत्यु हुई और मैं ने अपनी अम्मा को यह बात कई दिनों बाद बताई। मेरी मंशा बस यह थी कि अम्मा खबर सुनते ही अपना खाना पीना छोड़ देंगी और परंपरागत ढंग से बगैर कुछ खाए मृत्यु शोक मनाने लगेंगी। यह बात जब मैंने लोगों को बताई तो उन्होंने कहा ऐसा बिल्कुल नहीं होगा क्योंकि हम बहन के घर पर रहते हैं और यह शोकाचार बहन के घर पर लागू नहीं होता। उसके घर पर उसकी ससुराल की तरफ हुई हानि का शोकाचार चलेगा।


प्रभात


मेरे बेहद प्रिय कवि प्रभात की कई कविताएं इतनी दृश्यात्मक है कि उन्हें फ्रेम दर फ्रेम देखा जा सकता है - सुना पढ़ा जा सकता है। उनकी एक बेहद छोटी सी लेकिन मन की अतल गहराइयों में उतर जाने वाली कविता है - 'बहन का घर'। इस कविता को पढ़ते हुए ऊपर कही विवाहित स्त्रियों के पूर्व और वर्तमान घर की परिभाषा को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है।


भाई अपनी बहन से मिलने उसके घर जाता है तो पूरा दिन सास, ससुर, देवर, जेठ के साथ दिन भर बैठता है, बैठा है तो दुनिया जहान की बात बतियाएगा ही - न भी चाहे तो उससे जो पूछा जाएगा उसको जवाब देना ही पड़ेगा। पूरा दिन इस तरह से निकल जाता है और आते-आते भाई को बहन से मिलने बात करने की दो मिनट की - जी हाँ, सिर्फ 2 मिनट की - मोहलत दी जाती है बिल्कुल वैसे जैसे कैदियों से उनके परिजनों को मिलने की घड़ी देख कर कुछ मिनटों की मोहलत दी जाती है। समय बीता नहीं कि वहाँ का गार्ड कड़क आवाज में मुलाकात का समय खत्म होने की घोषणा करता है और बगैर आगा पीछा देखे उसका पालन करना होता है। पर बहन तो किसी जेल में नहीं, वह अपने घर में है - यहाँ घर की सदियों से बताई गई सुरक्षा और आश्वस्ति कितनी विडंबनापूर्ण है।


वे घर की छत के नीचे एक दूसरे से न तो मिल सकते थे न बात कर सकते थे इसलिए आंगन के पेड़ की छांव में आ गए। मुलाकात के दो मिनट में बहन ने नाखून से धरती की मिट्टी कुरेदी, बीच बीच में मेरे चेहरे को निहारा, माँ बाबुल का और अपनी भाभी और बच्चों की खैरियत पूछ सकी .... बस, उसके सिवा एक शब्द ही नहीं बोल पाई कि मुलाकात की अवधि खत्म हो गई। यह मुलाकात भी छुप कर देखी सुनी जाती रही और जेल के गार्ड की तरह अंदर से एक आवाज गूंजी - जा रहे हो तो जाओ, अंवार क्यों करते हो।


यह आवाज सुनते ही कहानी का अगला पन्ना खुलता है: अब जा भाई। ये तीन शब्द बहन के लिए इतने भारी थे कि वह और कुछ बोल नहीं पाई, उसका जिया भर आया और आँखों में सागर निकल उमड़ आया।


बहन जेल में नहीं थी, अपने घर में थी लेकिन सिर्फ़ दो मिनट में खत्म हो गया मिलने का समय - जेल के हृदयहीन लौह कपाट के एक तरफ बहन, दूसरी तरफ भाई। यह हुंकार सुन कर बहन चली गई अंधेरे दरवाजे के अंदर, बहुत काम था उसके जिम्मे घर के अंदर। दो मुलाकातियों के सिवा उस लौह कपाट के बंद होने का सदमा किसी को नहीं लगा, किसी के लिए इसमें ऐसा कुछ विशेष नहीं था जिसके लिए अफ़सोस जताया जाए। ऐसा तो होता ही है... बल्कि ज्यादा उपयुक्त होगा यह कहना कि ऐसा ही होता है। मैं कविता जब-जब भी पढ़ता हूँ बहुत देर तक लौटते भाई के भारी कदमों की थकी हारी आहट देर तक पीछा करती है... जेल से बाहर निकल कर भाई एक पल को तो ठहर कर बहन के लिए रो भी सकता है लेकिन वह जो अंदर चली गई अपने घर के अंधियारे कोने में उसे तो कोई रोने भी नहीं देगा।



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मोबाइल : 9411100294

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