हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्र प्रेम : 'स्वराज्य' का आत्मोत्सर्ग उत्सव!'



भारतीय इतिहास को उसकी संस्कृति के बिना संपूर्णता में  जाना समझा नहीं जा सकता। वैसे भी इतिहास के अनेकानेक आयाम होते हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इतिहास और संस्कृति एक दूसरे से कुछ इस तरह नाभिनालबद्ध हैं कि एक दूसरे को अलग कर उन्हें समझा ही नहीं जा सकता। प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने इतिहास को उसके विविध आयामों के साथ जानने समझने की कोशिश की है। राष्ट्रवाद के उदय के पश्चात भारतीय इतिहास का एक नया दौर आरंभ होता है। इस राष्ट्रवाद को विकसित करने में पत्र पत्रिकाओं का अहम योगदान था। इन पत्र पत्रिकाओं में एक सम्मानित नाम है 'स्वराज्य' का। इस समाचार पत्रिका के सन्दर्भ में 'रौलेट समिति' की रिपोर्ट में लिखा गया है कि 'संयुक्त प्रान्त जैसे शांतिप्रिय प्रान्तों में भी क्रान्ति के बीजारोपण का प्रथम सुनियोजित एवं निष्ठापूर्वक प्रयास नवम्बर 1907 से 'स्वराज्य' समाचार पत्रिका के प्रकाशन के माध्यम से हुआ।' हेरंब चतुर्वेदी लिखते हैं 'सिर्फ ढाई वर्ष की अल्पावधि (1907 से 1910) में इसके मात्र 75 अंक प्रकाशित हुए और इसके सभी सम्पादक एक-एक करके पकड़े गये और इन्हें कुल मिला कर 125 वर्षों की जेल की सजा मिली हो! इलाहाबाद के एक अंग्रेज़ कलेक्टर ने इसके सम्पादक के पद को इसी लिए 'मुगल सिंहासन' घोषित किया था? इसमें सज़ा के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं था?" हाल ही में लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद से उनकी एक उम्दा किताब प्रकाशित हुई है भारतीय संस्कृति और इतिहास की समझ।' हेरम्ब चतुर्वेदी की इसी किताब का एक आलेख है 'भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्र प्रेम : 'स्वराज्य' का आत्मोत्सर्ग उत्सव!' आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं हेरम्ब चतुर्वेदी का आलेख 'भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्र प्रेम : 'स्वराज्य' का आत्मोत्सर्ग उत्सव!'


'भारतीय पत्रकारिता और राष्ट्र प्रेम : 'स्वराज्य' का आत्मोत्सर्ग उत्सव!'


हेरम्ब चतुर्वेदी 


भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन और उससे सम्बद्ध उसके पूर्ववर्ती आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण ने एक ऐसे बौद्धिक परिवेश को जन्म दिया था कि औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के प्रतिरोध में भारतीय पत्रकारिता इस उत्कट राष्ट्रवाद के बोध एवं भावना के ही साथ विकसित हुई। अकबर इलाहाबादी जैसे शायर इसी भावना को अभिव्यक्ति देते हुए कह गए "जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो।" तोप का जवाब तोप सिर्फ औपनिवेशिक शक्ति के खेल में फँस कर अपरिहार्य पराजय की ओर स्वतः चले जाने के समान था? कुछ-कुछ, 'आ बैल मुझे मार' जैसी मानसिकता से स्वतःस्फूर्त। वैसे भी आधुनिक युग में क्रान्तियों के अग्रदूत के रूप में हमें नव-जागृत, शिक्षित व चैतन्य वर्ग के सदस्य ही दिखते हैं, जिन्हें एडवर्ड मक्नैल बर्न्स जैसा प्रमुख इतिहासकार 'आधुनिक मध्यम वर्ग' कहता है। इस वर्ग के सदस्य न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हैं, अपितु कर्तव्यों (परिवार, समाज और राष्ट्र) के प्रति भी समर्पित होते हुए उनके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार होते हैं! वस्तुतः उनके अनुसार ये मूल्य-प्रतिमान किसी भी समाज और उसके विकास के लिए होते हैं- ऐसे ही होते हैं जिनके लिए कोई भी कीमत चुकाना कम ही होगा! अतः इन मानवीय सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों की स्थापना को वे अपरिहार्य मानते हुए सहज ही इसके लिए आत्मोत्सर्ग हेतु भी तत्पर हो जाते हैं!


ऐसा ही अविश्वसनीय जज़्बा हमें भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार-पत्रिका 'स्वराज्य' के सम्पादकों, प्रकाशकों में देखने को मिलता है! इस समाचार पत्रिका के सन्दर्भ में 'रौलेट समिति' की रिपोर्ट की कुछ पंक्तियों की ओर आप सब का ध्यानाकर्षण करने से हम अपने आप को नहीं रोक पा रहे हैं। इसमें लिखा गया है कि 'संयुक्त प्रान्त जैसे शांतिप्रिय प्रान्तों में भी क्रान्ति के बीजारोपण का प्रथम सुनियोजित एवं निष्ठापूर्वक प्रयास नवम्बर 1907 से 'स्वराज्य' समाचार पत्रिका के प्रकाशन के माध्यम से हुआ। शिद्दत से पूर्ण इस सुविचारित प्रयास को रायज़ादा शान्ति नारायण भटनागर नामक एक व्यक्ति द्वारा क्रियान्वित किया गया। संयुक्त प्रान्त के ही मूल निवासी शान्ति नारायण पंजाब प्रान्त के एक उर्दू साप्ताहिक, 'हिन्दोस्तान' में सहायक सम्पादक थे तथा लाला लाजपत राय एवं अजीत सिंह के बन्दीगृह से मुक्ति की स्मृति को यादगार बनाने के लिए एवं उसका जश्न मनाने के लिए एक पत्र प्रारम्भ कर के इस अवसर को देशद्रोह (राष्ट्रवाद!) के प्रसार के लिए उपयोग करना चाह रहे थे ताकि इस भावना को भुनाया जा सकता है। इस नवगठित किन्तु सुविचारित तथा सुनियोजित समाचार पत्र की भाषा तथा शैली प्रारम्भ से आंग्ल सरकार के औपनिवेशिक स्वरूप के प्रति आक्रामक और असहनीय ही रही तथा यह उनके दमन चक्र तथा पत्रकार सम्पादक के उत्पीड़न से और अधिक उग्र एवं हिंसात्मक होती चली गयी।


क्या हममें से किसी ने कभी ऐसे समाचार पत्र अथवा पत्रिका के विषय में कल्पना भी की है, जिसको सिर्फ ढाई वर्ष का जीवन मिला हो और इस अल्पावधि (1907 से 1910) में इसके मात्र 75 अंक प्रकाशित हुए हों और इसके सभी सम्पादक एक-एक करके पकड़े गये हों और इन्हें कुल मिला कर 125 वर्षों की जेल की सजा मिली हो! इलाहाबाद के एक अंग्रेज़ कलेक्टर ने इसके सम्पादक के पद को इसी लिए 'मुगल सिंहासन' घोषित किया था? इसमें सज़ा के अतिरिक्त कुछ भी हासिल नहीं था? ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में या उससे भी पूर्व सैय्यद बन्धुओं के काल में जो मुगल सिंहासन और बादशाहों की दयनीय हालत थी, वस्तुतः वही हाल आंग्ल शासन ने 'स्वराज्य' अखबार और उसके सम्पादकों का कर दिया था? अतः वो पतनशील 'मुगल सिंहासन' काल का ही द्योतक एवं उसका प्रतीक ही चुका था। अतः इसी नज़रिए से उक्त अधिकारी की शब्दावली को उद्धृत करते हुए 'रौलट समिति' में लिखा था कि न जाने क्या है कि फिर भी कई दीवाने इस 'मुगल सिंहासन' की ओर आकर्षित होते ही रहते हैं। जबकि सम्पादक की आवश्यकता हेतु उसी स्वराज में प्रकाशित विज्ञापन में स्पष्ट लिखा था, "स्वराज्य अखबार के लिए ऐसा सम्पादक चाहिए जिसे दो सूखी रोटियाँ, एक गिलास सादा पानी और हर सम्पादकीय लेख पर दस साल की सज़ा मिलेगी (और वह उसी में सन्तुष्ट रह सके!)" (दृष्टव्य, उत्तर प्रदेश, मार्च-अप्रैल, 1976)। 'रौलट समिति' और उसकी संस्तुतियों पर पारित "रौलट एक्ट" के विषय में तो सब ही जानते हैं, किन्तु इसकी रिपोर्ट में ही पंजाब, संयुक्त प्रान्त एवं बंगाल आदि सभी प्रान्तों में क्रान्तिकारी (औपनिवेशिक शब्दावली में 'उग्रवाद') गतिविधियों के मूल्यांकन हेतु 1918 में गठित की गयी थी। इसने अपनी रिपोर्ट सरकार को अप्रैल, 1918 में सौंप दी थी। वास्तव में औपनिवेशिक आंग्ल सरकार को शक था कि भारत में क्रान्तिकारी गतिविधियों को या तो ब्रिटेन के कट्टर शत्रु जर्मनी से समर्थन मिला रहा है अथवा वे बोल्शेविक रूस के प्रभाव में काम कर रहे हैं? इसलिए इस समिति ने सभी पहलुओं और सभी साक्ष्यों का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया था! इसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति सिडनी रौलट ने की थी। जे. डी. वी. हॉज (बंगाल प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी), बेसिल स्कॉट (बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश), सी. वी. कुमारस्वामी शास्त्री (जज, मद्रास उच्च न्यायालय), वरनी लोवेट (संयुक्त प्रान्त के राजस्व परिषद् के सदस्य) तथा पी. सी. मित्तर (सदस्य बंगाल विधायिका) इस समिति के अन्य सदस्य थे। इसी ने उस अधिनियम को जन्म दिया जिसको 'रौलट एक्ट' या 'काले कानून' के नाम से भी जाना जाता है। इस 'काले अधिनियम' ने ब्रिटिश वाइसरॉय को समस्त आपातकालीन अधिकार प्रदान कर दिए ताकि वह ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध 'देशद्रोह' को नियन्त्रित कर सके। इसके लिए इस अधिनियम में यह प्रावधान भी किया गया कि सर्वप्रथम वह प्रेस को पूर्णतः शान्त करने के लिए कोई भी कदम उठाने का अधिकारी हो सकता है। इतना ही नहीं सिर्फ सन्देह के आधार पर किसी भी नागरिक को बिना 'वारण्ट' या साक्ष्य के ही देशद्रोह और उसके षड्यन्त्र के लिए उसे तुरन्त निरुद्ध करने के लिए भी वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से वह अधिकार सम्पन्न किया जाये!


उक्त 'रौलेट समिति' की रिपोर्ट से ही हमें इस बात का साक्ष्य मिलता है कि 'स्वराज्य' पत्रिका के आठ में से सात (7) सम्पादक पंजाब प्रान्त के निवासी थे। इस पत्र का प्रकाशन 1908 के नए 'प्रेस अधिनियम' के उपरान्त 1910 में ही सम्भव हो सका था! इसके प्रथम सम्पादक, शान्ति नारायण भटनागर के विषय में ब्रिटिश खुफ़िया रिपोर्टों में यही दर्ज था कि वे भारत में स्थापित ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्धरत हैं: "......द पेपर व्जेड वॉर ऑन द गवर्नमेंट......"। एक प्रकार ते इस रिपोर्ट में ही इस बात के संकेत भी मिलते हैं कि इसी से प्रेरणा ले कर सुन्दर लाल के 'कर्मयोगी' की भाषा भी आक्रामक होती गयी थी और यह भी उसी 'प्रेस एक्ट या अधिनियम' के तहत कार्यवाही के उपरान्त 1910 में बन्द किया जा सका था। इसके संस्थापक सम्पादक शान्ति नारायण ने 'मुजफ्फरपुर काण्ड' (जिसे औपनिवेशिक प्रशासनिक अधिकारी एवं इतिहासकार 'मुजफ्फरपुर हत्याओं' से सम्बोधित करते थे) से सम्बन्धित सिलसिलेवार लेखों की झड़ी लगा दी थी। इसमें ब्रिटिश हुक्मरानों का सबसे आपत्तिजनक लेख 'खुदीराम बोस' से सम्बन्धित था। वे सदैव खुदीराम को मुजफ्फरपुर का हत्यारा कहते थे और पहली बार कोई अखबार खुल कर ब्रिटिश दमनात्मक कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हुए उस प्रकरण की पूरी कलई खोल रहा था। और, यह पूरा 'सत्यान्वेषी लेखन' तथा खोजी पत्रकारिता आंग्ल साम्राज्यवादी सोच के ताबूत का सच उजागर कर रहा था। अतः उनको यह सब बहुत ही नागवार गुज़रा था!


1881 में जन्मे और मूलतः मुज़फ्फ़रनगर के निवासी रायज़ादा शान्ति नारायण भटनागर प्रसिद्ध पत्रकार-सम्पादक दीनानाथ के शागिर्द थे तथा लाल-बाल-पाल के विचारों के समर्थक व प्रचारक ही हो गए थे। डी.ए.वी. स्कूल शिमला के पूर्व छात्र रहे शान्ति नारायण फौज़ में रहे किन्तु अंग्रेज़ अधिकारियों की भारतीय सिपाहियों के साथ की गाली-गलौज़ से नफ़रत ने उन्हें उत्कट राष्ट्रवादी एवं क्रान्तिकारी बना दिया था। वे त्यागपत्र दे कर पत्रकार होकर दीना नाथ जी के अखबार 'हिन्दोस्तान' में नौकरी करने लगे। प्रख्यात क्रान्तिकारी सूफ़ी अम्बा प्रसाद भी वहीं कार्यरत थे और अजीत सिंह प्रायः प्रेस में आया करते थे। इस बीच दीना नाथ जी को 3 वर्ष का कारावास हुआ और 'हिन्दोस्तान' अखबार बन्द हो गया! नौकरी से खाली हो कर शान्ति नारायण ने अपनी योजना पर कार्य करते हुए इलाहाबाद से शीघ्र ही 'स्वराज्य' के प्रकाशन की व्यवस्था की और उसके प्रचार हेतु लाहौर में 'पोस्टर' छपवाए और संयुक्त प्रान्त के तमाम शहर में उनको चिपकाते, प्रचार करते, इलाहाबाद आये। यहाँ उन्होंने जॉनस्टनगंज में एक मकान में अपना लीथो प्रेस लगा कर 'स्वराज्य' का प्रकाशन दीपावली के दिन, सितम्बर 9, 1907 को शुरू किया! इस अखबार के 'लोगो' के रूप में मुख्य पृष्ठ पर भारत माता की तस्वीर और उसके दोनों ओर शेर अंकित होते थे। इन शेरों के हाथ में सम्प्रभुता का ताज दृष्टिगोचर होता था और शेर ऐसी मुद्रा में प्रतीत होते थे जैसे वे भारतमाता को यह ताज पहनाने के लिए उद्यत हों!


शान्ति नारायण स्वयं क्रन्तिकारी तेवर की नज़्में भी लिखते थे और 'स्वराज्य' में प्रकाशित करते थे। खुदीराम वाले लेख के अन्त में उन्होंने नज़्म की जो दो पंक्तियाँ लिखी थीं वे खुदीराम बोस की माँ के ख्यालों को जैसे व्यक्त करती थी: "इस तरह फाँसी पर चढ़ कर जान दी। क्या तुम्हें पाला था इस दिन के लिए?" इसी विचारोत्तेजक लेख और संवेदनशील नज़्म को आधार बनाते हुए शान्तिनारायण भटनागर अप्रैल 7, 1908 में बन्दी बना लिए गये और उन पर भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 120 बी, 124 बी, तथा 153 ए के तहत मुकदमा चला। उन्हें अँगरेज़ जिलाधिकारी मेकने की अदालत में अगले दिन अप्रैल 8, 1908 को जब पेश किया गया तब महामना मदन मोहन मालवीय ने पुरुषोत्तम दास टंडन को उनकी ओर से पैरवी के लिए अदालत में भेजा ! किन्तु, शान्ति नारायण ने बड़ी दृढ़ता और निडरता से आंग्ल जिलाधिकारी से कहा, "मैंने वो किया जो अपने मुल्क के लिए बेहतर समझा अब आपकी बारी है, आप वह करें जो आपके मुल्क के लिए बेहतर हो।" उन्हें पहले नैनी जेल भेजा गया तदुपरान्त आगरा जेल में रखा गया!


अन्ततः भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के वीरों पर लेखों तथा 'विस्फोटक' कविता लिखने के आरोप में रायजादा शान्ति नारायण भटनागर के विरुद्ध दण्डात्मक कार्यवाही करते हुए उन्हें साढ़े तीन वर्ष का सश्रम कठोर कारावास दिया गया। तथा उस समय के मूल्य के हिसाब से एक हज़ार रुपये का भारी आर्थिक दण्ड भी घोषित किया गया था। उनके बन्दी हो जाने के उपरान्त आर्थिक दण्ड की राशि न वसूलने की स्थिति में उनकी सज़ा में छह माह की और वृद्धि होनी थी। शान्तिनारायण को सम्भावित कार्यवाही का अन्दाज़ तो था ही, अतः उन्होंने 'स्वराज्य' के सम्पादक के लिए पहले ही विज्ञापन निकाला था। उसी के परिणामस्वरूप 'मिलाप' के संस्थापक सम्पादक खुशाल चन्द 'खरसंद' और रामदास सरालिया ने तुरन्त आवेदन किया। इसमें से 'स्वराज्य' में शान्तिनारायण के उत्तराधिकारी सम्पादक के रूप में सरालिया का चयन पहले ही कर दिया गया था। शान्तिनारायण को अच्छी तरह से ज्ञात था कि वे क्या कर रहे हैं और इसका क्या परिणाम होना है। अतः शान्तिनारायण के जेल में निरुद्ध होते ही इसके प्रकाशन का दायित्व रामदास सरालिया ने सम्हाला। यही रामदास बाद में स्वामी प्रकाशानन्द के नाम से सुविख्यात हुए थे। इन्होंने 'स्वराज्य' का पुनर्प्रकाशन शुरू ही किया था कि आंग्ल सरकार ने कोई कोताही दिखाए बिना ही 'जमाने की राशि की वसूली के नाम पर' इसके मुद्रणालय 'स्वराज्य प्रेस' की नीलामी कर दी।


इंग्लैण्ड से श्याम जी वर्मा एवं विनय दामोदर सावरकर जैसे राष्ट्रवादियों के घनिष्ठ सम्बन्धों से लैस हो कर तुरन्त लौटे होती लाल (हरियाणावासी) ने इसके सम्पादन दायित्व को वहन किया और नया प्रेस खरीद कर उसका नामकरण 'स्वराज्य प्रेस' कर दिया ताकि स्वराज्य का कार्य निर्विघ्न रूप से जारी रह सके! वे इसके पूर्व भी अरबिन्दो घोष के पत्र 'वन्देमातरम्' से सम्बद्ध रहे थे, अतः 'स्वराज्य' के सिद्धान्तों, स्वरूप और भावना के सर्वाधिक अनुरूप व्यक्ति थे। इस प्रकार होती लाल इस पत्रिका के तृतीय सम्पादक बने। चूंकि, वे उसी रौ के लेखन को प्रोत्साहित ही नहीं कर रहे थे अपितु सम्पादकीय लेखों के माध्यम से भी औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध आग उगल रहे थे। उन्हें अगस्त तथा अक्टूबर 1908 के अंकों में 'राष्ट्रद्रोही लेखन' व सरकार के विरुद्ध षड्यन्त्र करने व भड़काने के लिए अन्ततः सात वर्ष के 'कालापानी की सज़ा' के साथ ही पाँच वर्ष का सश्रम कारावास भी प्रदान किया गया! उनके खिलाफ अलीगढ़ में 'पंजाबियों के नाम सन्देश' शीर्षक से एक राष्ट्रविरोधी (?) परचा या 'पम्फलेट' वितरित करवाने का भी आरोप संलग्न किया गया।


किन्तु अरबिन्दो के साथ ही श्याम जी वर्मा और सावरकर जैसों के घनिष्ठ सम्बन्ध के चलते हम उनके स्वभाव को सहज समझ सकते हैं! उनकी स्वतन्त्र आत्मा, राष्ट्रीय स्वाभिमान और देश के लिए आत्मोत्सर्ग की प्रज्ज्वल भावना को क्या कालापानी और सश्रम सज़ा के नाम पर दमन व शोषण की कार्यवाहियाँ दबा सकती थीं? यदि अंग्रेजों ने ऐसा सोचा था तो उनकी यह बड़ी भूल थी! उन्होंने कुख्यात 'सेलुलर जेल' से एक साधारण बन्दी के हाथों यहाँ के बन्दियों के खिलाफ किये जा रहे अमानुषिक व्यवहार, दमनात्मक कार्यवाहियों एवं बर्बर आचरण के सन्दर्भ में एक लम्बा तीन पृष्ठ का पत्र कांग्रेसी नेता सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी (1895 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन के अध्यक्ष) को भिजवा दिया। उन्होंने जेल की कोठरियों की संख्या सहित सभी कुछ सविस्तार लिख कर पत्र पर अपने हस्ताक्षर करने का अद्भुत साहस का प्रदर्शन किया था। तभी शायद सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी के लिए यह सम्भव हो सका कि वे यह पत्र जस का तस अपने प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय 'बंगाली' (1879 से अंग्रेजी भाषा का लोकप्रिय अखबार, जिसे अंग्रेज़ शासक-प्रशासक भी ध्यान से पढ़ते थे) में प्रकाशित कर सके। यह पत्र प्रकाशित क्या हुआ कि एक ज़बरदस्त तूफ़ान उठ खड़ा हुआ ! क्योंकि सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सिर्फ वही पत्र नहीं प्रकाशित किया अपितु सितम्बर 4, 8 एवं 20, 1911 के 'बंगाली' के अंकों में अन्दमान द्वीप के इस बन्दीगृह में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सिपाहियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार और उत्पीड़न का सविस्तार वर्णन प्रकाशित किया!


सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी के लेखों में अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे अमानवीय व्यवहार पर चिन्ता जताते हुए उनके 'सुसभ्य सुशासन' और 'व्हाइट मैंस बर्डन' जैसे जुमलों पर सवालिया निशान खड़े कर दिए। इस पत्र के माध्यम से सेलुलर जेल के विषय में कई अन्दरूनी किन्तु भयावह बातें पहली बार सार्वजनिक हो पायीं। सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी ने जिन प्रमुख मानवीय मुद्दों पर प्रश्नचिह्न अंकित किये, वे बहुत महत्त्वपूर्ण हो गए थे। उन्होंने सर्वप्रथम इस बात को ही उठाया कि क्यों ज़रा से बहाने से बन्दियों के खाने में कटौती जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता है? दण्ड के नाम से क्यों उन्हें आवश्यक पौष्टिक भोजन से वंचित किया जाता है? क्या वे दण्ड-स्वरूप 'काला-पानी' नहीं भुगत रहे हैं? दूसरा महत्त्वपूर्ण मानवीय प्रश्न इन बन्दियों से ज़बरदस्ती जंगलों में कठोर परिश्रम से जुड़ा हुआ था। मुख्यपत्र 'बंगाली' ने इसके औचित्य पर आंग्ल शासन से स्पष्ट सवाल खड़ा किया। बैनर्जी की तीसरी टिप्पणी बन्दियों के अस्वस्थ होने पर भी और अधिक कष्ट देने की नियत से उनसे कठोर श्रम करवाने पर थी। अन्त में इन सब के परिणामस्वरूप वहाँ के बन्दियों के कुपोषण तथा कमज़ोर हो जाने को रेखांकित किया गया था। उनके मतानुसार, उपरोक्त तीन कारणों के चलते ये बन्दी यातनापूर्ण जिन्दगी जीने को बाध्य हैं और वे लगभग 'मानव कंकालों' में परिवर्तित हुए जा रहे हैं।


हेरम्ब चतुर्वेदी


प्रसंगवश यहाँ बताते चलें कि अंग्रेज़ शासक-प्रशासक खुद अपने निर्णयों और उनकी न्यायप्रियता और औचित्य पर सवालिया निशान लगा रहे थे। क्योंकि, इस व्यक्ति होती लाल वर्मा को तो सज़ा के तौर पर 'सेलुलर जेल' जाना ही नहीं था। किन्तु संयुक्त प्रान्त के तत्कालीन गवर्नर सर जोन हीवेट ने 1909 के प्रारम्भ में इसे एक ज्वलन्त मुद्दा बना दिया! उनके विचारानुसार 'स्वराज्य' के बन्दी बनाये गए ये दोनों सम्पादक, यथा होती लाल वर्मा और उसके उत्तराधिकारी बाबू हरी राम को संयुक्त प्रान्त के किसी भी बन्दीगृह में रखना सुरक्षित नहीं था? वे सदैव बन्दियों के मध्य सरकार-विरोधी प्रचार करते हुए 'क्रान्ति' का परिवेश निर्मित करते रहते थे। अतः अनुशासनहीनता को बढ़ावा देने के लिए उनका प्रान्त के किसी भी बन्दीगृह में रखना बहुत ही खतरनाक मान कर इनके अंडमान द्वीप के 1906 में निर्मित इस सुरक्षित जेल में स्थानान्तरण की जोरदार वकालत की थी।


हालाँकि, तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड मिन्टो ने इसकी संस्तुति नहीं की फिर भी अपनी बला टालने के लिए संयुक्त प्रान्त के लाट गवर्नर ने उनको अन्ततः 'सेलुलर जेल' भिजवा कर ही चैन लिया! किन्तु 'बंगाली' में उस पत्र एवं इन लेखों के प्रकाशन के उपरान्त आंग्ल प्रशासन के समक्ष वाकई ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गयी! भारत के प्रति नीति-निर्माताओं का एक गुट गवर्नर तो दूसरा गवर्नर जनरल का पक्षधर दिखा रहा था? यह तो स्थापित तथ्य था कि होती लाल वर्मा को यहाँ 'सेलुलर जेल' में भेज कर एक बड़ा सरदर्द मोल लिया गया था।


'स्वराज्य' के इस निर्भीक सम्पादक होती लाल वर्मा के पत्र और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप 'बंगाली' के सम्पादक सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी के इन लेखों का प्रकाशित होना था कि 'सेलुलर जेल' का दुर्दान्त एवं कुख्यात अधीक्षक बैरी जेल के अस्पताल के निकट होती लाल को बेंत ले कर गालियाँ बकता रहा। सम्भवतः होती लाल की निश्छल, अभय, शान्त व सन्तुलित मुद्रा देख कर इस बन्दी पर चाह कर भी उसकी बेंत चलाने की हिम्मत नहीं हुई! अन्यथा वह इस भद्दे, कुटिल व कठोर व्यवहार के लिए ही बदनाम था? जो व्यक्ति जेल में रह कर इतना बड़ा तूफ़ान खड़ा कर सकने के काबिल है, उससे अन्दर ही अन्दर जेल अधीक्षक बैरी भी भयाक्रान्त रहा होगा और अपने भय, खीज और पीड़ा को दबाने के लिए और अन्य बन्दियों तथा अधीनस्थों को दिखाने के लिए बेंत ले कर गालियाँ बक कर अपनी खीज व नपुंसक क्रोध मिटाता रहा होगा। उधर होती लाल वर्मा शान्त, स्थिर व दृढ़ता से निर्भीक खड़े रहे और बैरी ने स्वयं अपना तमाशा बनाया! बाकी लोग जो अब तक होती लाल वर्मा के प्रशंसक नहीं भी थे वे भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके!


हमने ऊपर होती लाल वर्मा के साथ 'स्वराज्य' के उनके उत्तराधिकारी बाबू राम हरी का भी जिक्र किया है कि कैसे दोनों को साथ ही संयुक्त प्रान्त के बन्दी गृह से सेलुलर जेल भेजा गया था। आइये अब 'स्वराज्य' के इस क्रान्तिकारी के विषय में भी जान लें। होती लाल वर्मा को दिए दण्ड के पश्चात् 'स्वराज्य' के सम्पादन का दायित्व बाबू राम हरी ने ही संभाला। कादियान, गुरदासपुर (पंजाब) के इस निवासी ने पंजाब से आ कर अभी 'स्वराज्य' के 11 अंक ही प्रकाशित किए थे कि देशद्रोह प्रेरित व प्रोत्साहित करने हेतु उनको  10 मार्च 1910 को 21 वर्ष का कठोर दण्ड दिया गया। इनसे भी गवर्नर हीवेट ने किसी तरह पिण्ड छुड़ाना चाहा था क्योंकि ये दोनों सम्पादक, जो क्रान्ति के प्रचार का काम अपने समाचार पत्र के माध्यम से कर रहे थे वही कार्य वे बन्दीगृह में कर रहे थे। इनके इस प्रचार से अनुशासन एवं शान्ति-व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।


बाबू राम हरी के दण्ड-विधान के उपरान्त लाहौर से प्रकाशित होने वाले लोकप्रिय एवं क्रान्तिकारी पत्र, 'भारतमाता' के सम्पादक मुंशी रामसेवक ने 'स्वराज्य' के सम्पादन का दायित्व संभालने की सहमति दी और वे तत्काल प्रथम उपलब्ध रेलगाड़ी से इलाहाबाद के लिए प्रस्थान कर गए। क्रान्ति की मशाल ले कर उसके प्रचार-प्रसार को प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों और सरकार के बीच ज़बरदस्त रस्साकशी चल रही थी। यह बात इसी प्रकरण से स्पष्ट हो कर स्थापित हो जाती है कि जिस रेलगाड़ी से मुंशी रामसेवक इलाहाबाद के लिए रवाना हुए थे उसी में उनको बन्दी बनाने वाले उच्च अधिकारी के साथ पुलिस वाले भी सवार थे। जैसे ही इलाहाबाद के जिलाधिकारी ('कलेक्टर') के यहाँ मुंशी जी 'स्वराज्य' के सम्पादन के लिए आवश्यक प्रावधानों के तहत जब अपना 'डिक्लेरेशन' जमा करने के लिए उपस्थित हुए वैसे ही उन्हें बन्दी बना लिया गया। सम्भवतः यह इकलौता अवसर था जिसमें बिना संज्ञेय अपराध के बस उसकी सम्भावना से भयाक्रान्त आंग्ल प्रशासन ने अपनी तथाकथित आधुनिक एवं उदारवादी 'न्यायिक प्रक्रिया' का सत्य उजागर कर ही दिया था! कलेक्टर कोर्ट या अदालत में इस गिरफ्तारी से आंग्ल अफसरशाही सन्तुष्ट नहीं थी। तत्कालीन अंग्रेज़ कलेक्टर ने ही गिरफ्तार मुंशी रामसेवक के 'डिक्लेरेशन' जमा करते हुए बन्दी बनाये जाने पर तंज़ करते हुए कहा : “(देखते हैं?) अब दूसरा कौन (माई का लाल) है जो इस मुग़ल सिंहासन पर बैठेगा?" सम्भवतः आंग्ल अधिकारी अपने अहं और सत्ता के मद में भारतीयों के अन्दर उठ रही क्रान्ति और राष्ट्र-प्रेम की अग्नि-शिखा से पूरी तरह से अनभिज्ञ बन कर पूर्ववत् व्यवहार कर रहे थे? शायद 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' यही होती है?


इधर अंग्रेज़ कलेक्टर ने भारतीय बुद्धिजीवी क्रान्तिकारियों पर व्यंग किया और उधर अगले ही क्षण गिरफ्तार हुए मुंशी रामसेवक का स्थान ग्रहण करने हेतु नन्द गोपाल चोपड़ा के आगे बढ़ते ही इजलास में मौजूद सभी लोग दंग रह गये! अतः स्पष्ट था कि क्रान्तिकारी इस क्षण की प्रत्याशा में वैकल्पिक व्यवस्था पर सुनियोजित ढंग से काम कर रहे थे। वे आंग्ल शासन और प्रशासकों की नियत और नीति के अनुरूप ही अपनी वैकल्पिक योजनायें भी बना रहे थे और तद्नुसार अपने कदम बढ़ा रहे थे! उन्हें उसी समय ज्ञात हो चुका था कि मुंशी की गिरफ्तारी के लिए उसी ट्रेन में उनके हमसफ़र बन कर पुलिसकर्मी भी सवार होने थे और उन्होंने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत ब्रिटिश हुकूमत की आँख में धूल झोंकने की नीयत से देहरादून से तत्काल ही नन्द गोपाल चोपड़ा को इलाहाबाद रवाना कर दिया था! अब मुंशी रामसेवक के स्थान पर चोपड़ा ने अपने नाम का 'डिक्लेरेशन' जमा किया और 'स्वराज्य' का प्रकाशन पुनः प्रारम्भ हुआ। किन्तु नन्द गोपाल चोपड़ा भी अभी 'स्वराज्य' के मात्र 12 अंकों का सम्पादन ही कर पाए थे कि उन्हें भी 'देशद्रोह' फैलाने के इल्ज़ाम में मुकदमा चला कर 30 वर्ष के लिए 'देश निकाला' और 'कालापानी' की सजा तत्काल सुना दी गयी !


नन्द गोपाल चोपड़ा ने न केवल 'स्वराज्य' के सम्पादन के दौरान अपितु 'सेलुलर जेल' में अपने बन्दी जीवन के दौरान भी अपने अदम्य साहस, निर्भीकता और स्वतन्त्रता के जज़्बे के साथ सहनशीलता का अद्भुत परिचय दिया था। चूँकि, अंडमान की जेल का अधीक्षक डेविड बैरी अपने दुर्व्यवहार के लिए कुख्यात था, अतः उसने इन क्रान्तिकारियों को हतोत्साहित कर के बाहर तक के क्रान्तिकारियों को सन्देश देने के लिए इनके प्रति अमानवीय व्यवहार की सीमाएँ पार कर दीं। सश्रम सजा के तहत प्रचलन के अनुसार उन्हें कोल्हू पर तेल पेरने का दण्ड दिया गया था। चूँकि बैल की जगह इसमें मनुष्यों को जोता जाता था, अतः नन्द गोपाल ने इसे मानव स्वाभिमान के विरुद्ध कदम मानते हुए इसके विरुद्ध अहिंसक आन्दोलन शुरू कर दिया! स्मरण रहे अभी गाँधी जी हिन्दुस्तान नहीं लौटे थे! जेल अधीक्षक का आक्रामक रुख और गोलियाँ तथा मारने की धमकी भी जब उनके स्थिर, शान्त किन्तु दृढ़ मन का संकल्प नहीं तोड़ पाया तब खिसिया कर डेविड बैरी वहाँ से गालियाँ बकता रवाना होने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सका! पहली बार जीवन में डेविड बैरी मन ही मन अपमान का घूँट पी कर स्वयं घटनास्थल से यूँ चले जाने के लिए बाध्य हुआ था! इस एक घटना से जेल अधिकारियों का भय और आतंक बन्दियों के मन से जाता रहा। इसने सभी को उनके मन में प्रतिरोध और असहयोग के व्यवहार के लिए तैयार कर दिया! वे नैतिक रूप से बहुत सशक्त हो गए! किन्तु, नन्द गोपाल चोपड़ा को हतोत्साहित करने और उनके आत्मबल को तोड़ने के लिए उनके खाने में कटौती की गयी और पाशविक व्यवहार जारी रखा! किन्तु यह भी उनके आत्मबल, नैतिक दृढ़ता, राष्ट्रीय प्रेम तथा स्वाभिमान को तोड़ने में सफल न हुआ!


उनका यह अजब किस्म का 'अवज्ञा व्यवहार' कैसे तोड़ा जाये, यह डेविड बैरी सहित सभी जेल अधिकारियों के लिए सरदर्द बन चुका था? नन्दगोपाल की गतिविधियों का प्रतिकूल प्रभाव सभी बन्दियों और जेल के अनुशासन पर भी पड़ने से वे संज्ञा शून्य हो चुके थे! साथ ही होती लाल वर्मा तथा बाबू हरिराम जैसे 'स्वराज्य' के पूर्व सम्पादक का साथ, समर्थन, सम्बल एवं सहयोग उनकी हिम्मत को निरन्तर बाँध रहा था! उधर इन जेल अधिकारियों को इस स्थिति का सामना करने का कोई प्रशिक्षण तो था ही नहीं? अतः उन्होंने अपनी कार्यशैली के अनुरूप नन्द गोपाल को पुनः कोल्हू खींचने की सजा घोषित कर दी! और नन्द गोपाल ने उसी दृढ़ता से इसे मानने से इनकार करते हुए इसे मानव का नहीं बैल का काम बताया ! यह जेल अधिकारियों के आदेशों का खुला उल्लंघन था! अतः उन्होंने अब नन्द गोपाल को खतरनाक कैदी घोषित करते हुए हथकड़ी-बेड़ियों में जकड़ कर रखने का आदेश दिया! इसी के साथ ही अन्य बन्दियों की अक्ल ठिकाने लगाने और उनके आत्मबल को तोड़ने के लिए सभी बन्दियों को तीन दिन के लिए कोल्हू की सजा सुना दी। इससे बन्दियों में असहजता और प्रतिरोध घटने की जगह और बढ़ गया। और नन्द गोपाल के उदाहरण ने उन्हें सामूहिक रूप से इन अमानुषिक आज्ञाओं की अवेहलना के लिए उद्वेलित कर दिया! 1906 में इस जेल की स्थापना के बाद से पहली बार एक आम हड़ताल जैसी स्थिति बन गयी थी! बन्दियों ने कोल्हू पर बैल की भाँति काम करने से स्पष्ट इनकार कर दिया!


अब जेल अधिकारियों ने कठोर कदम उठाते हुए होती लाल वर्मा, नन्द गोपाल चोपड़ा (ये दोनों तो 'स्वराज्य' के सम्पादक थे) और उल्हासकर दत्ता (जो प्रसिद्ध 'अलीपुर बम काण्ड' के दोषी थे) को दो सप्ताह तक खाने में सिर्फ पानी में पिसे हुए चावल का घोल ही दिये जाने का निर्णय लिया ताकि भूख से उनको तोड़ दिया जाये या वे इस दुनिया से ही कूच कर जायें और बला टले! और पूरी तरह से कमज़ोर हो चुके इन क्रान्तिकारियों को दण्डित करने की नीयत से और इनको तोड़ने के ही प्रयास में इन्हें बाहर श्रम करने भेजा गया! किन्तु कोल्हू न चलवा पाना अपने-आप में इनकी विजय थी और उसी ने सभी के उत्साह और स्वाभिमान की अभिवृद्धि की। इसी अवसर पर ही विनायक दामोदर सावरकर भी अपने 50 वषीय कारावास गुज़ारने सेलुलर जेल पहुंचे। इसी क्रम में जैसा कि हम होती लाल वर्मा के सन्दर्भ में चर्चा करते हुए पहले सविस्तार चर्चा कर आये हैं, जब सब को दण्डित और संत्रस्त किया जाने लगा तभी उनका सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी को लिखा यह पत्र प्रेषित हुआ था और इसीलिए जब सार्वजनिक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ तब जेल अधिकारियों का गुस्सा और ख़ीज का यूँ फूटना उनकी असहायता का ही परिचायक था। जब होती लाल वर्मा के पत्र के साथ ही सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी के लेख 'बंगाली' में प्रकाशित हुए तब पूरे देश में बन्दियों के लिए समर्थन, सहानुभूति, सहयोग और आंग्ल सरकार के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा! इन कदमों ने क्रान्ति की भावना को और सशक्त किया बनिस्पत तोड़ने के!


अतः इस समय तक 'राष्ट्र-प्रेम', देश की सेवा में अपने प्राणों तक की आहुति देने वालों का जज़्बा इस कदर हावी हो गया था कि आंग्ल शासन व सत्ताधीशों के साथ आम भारतीय भी हतप्रभ रह गये! वाह रे 'स्वराज्य' के सम्पादक की प्रतिष्ठा ! एक सम्पादक को सजा होती तो दूसरा कफ़न सर पर बँधवाने के लिए बेचैन हो उठता था? प्राणोत्सर्ग और बलिदान का ऐसा उत्साह और उत्सव भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में लेखन पत्रकारिता के क्षेत्र में फिर देखने को कहाँ मिलता? न भूतो न भविष्यत्! इस पद हेतु इसी स्पर्धा का परिणाम था कि नन्द गोपाल चोपड़ा की गिरफ्तारी के अवसर पर एक नहीं कुल बारह (12) लोगों ने 'स्वराज्य' के सम्पादन के लिए अपने-अपने आवेदन और दावे करके सब को चौंका दिया था ! इससे पूर्व भी 'स्वराज्य' का सम्पादन संभालने के लिए बुद्धिजीवियों में स्पर्धा होती थी, किन्तु आवेदनों की संख्या 3, 4 या अधिकतम छह होती थी! किन्तु जैसे-जैसे आंग्ल शासन का जुल्म बढ़ता गया वह क्रान्ति की अग्नि में घृत का कार्य करता रहा! यह ज्वाला मुखर हो कर धधक रही थी, इन बुद्धिजीवियों के सीनों के साथ उनकी कलम में भी!


इस कड़ी प्रतियोगिता के विजेता रहे लड्ढा राम कपूर! वे अभी दक्षिण-पूर्व एशिया से अच्छी खासी कमाई करके वापस भारत लौटे थे। वस्तुतः लड्ढा राम कपूर अपवाद ही थे! उनके पूर्व 'स्वराज्य' के जितने भी सम्पादक हुए वे शान्ति नारायण भटनागर के अपवाद के अलावा सब कुंवारे थे जब कि कपूर शादीशुदा और परिवार वाले थे। उनका परिवार उनकी कमाई और अर्जित समृद्धि के चलते अब सुकून से रहना चाहता था किन्तु कपूर की मंशा कुछ और ही थी? अपनी पत्नी की प्रश्नवाचक निगाहों के प्रत्युत्तर में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा: "मैं तुम्हें तहे दिल से यकीनन बहुत प्यार करता हूँ और तुम भी इसे जानती हो, लेकिन अपनी मातृभूमि से जितना प्रेम है उसकी तुलना तो किसी इन्सान के प्रति प्रेम से तो हो ही नहीं सकती? इस बात को समझ लो कष्ट कम ही होगा!" ऐसे गम भरे माहौल में पंजाब प्रान्त के गुजरांवाला जिले के ग्राम वारिशावाला के समस्त लोगों ने लड्ढा राम कपूर को इलाहाबाद के लिए रवाना किया। उन्हें तो ज्ञात था कि जो दायित्व वे निभाने जा रहे हैं उसकी कीमत मृत्यु-दण्ड और उसी के समान 'काला पानी' की सजा है। अतः भारी मन से उस गाँव के निवासियों ने अपने यहाँ के इस सपूत को विदा किया! 'स्वराज्य' में प्रकाशित उनके लेखों और सम्पादकीय को देशद्रोह मानते हुए मार्च 22, 1910 को प्रत्याशित रूप से लड्ढा राम कपूर को 30 वर्ष की 'काला पानी' की सज़ा हुई और वह भी अन्धेरी कोठरी में अकेले ('सोलिटरी कन्फाइनमेंट)! इसमें से 10 वर्ष की सश्रम कठोर श्रम की सजा भी सम्मिलित थी! ज़ाहिर है, आंग्ल सरकार इनके प्रतिरोध की कमर तोड़ने को दृढ़संकल्प थी जैसे ये लोग कृतसंकल्प थे! उनकी सत्ता और साम्राज्य के सातत्य के लिए यह अपरिहार्य हो गया था कि वे अब इनका समूल नाश करें और इनकी राष्ट्रप्रेम की भावना को समाप्त कर दूसरों को भी स्पष्ट संकेत एवं सन्देश सम्प्रेषित कर दें।


आंग्ल सरकार और क्रान्तिकारियों के बीच एक अटूट सा दुश्चक्र-सा स्थापित हो गया था, जैसे-जैसे इतना अत्याचार बढ़ता गया वैसे-वैसे उनका बलिदान देने का हौसला दुगनी-चौगुनी गति से बढ़ा! अँग्रेज़ शासन-प्रशासन की खीज निरन्तर बढ़ती ही जा रही थी! फिर, यह तो पुरानी, आजमाई हुई और सही कहावत ही है, "खरबूजे को देख कर खरबूजा भी रंग बदलता है।" इलाहाबाद में वैसे भी 'इण्डियन हेरल्ड' (1889-1892) और 'हिन्दी प्रदीप' (1877-1809) से शुरू हो कर 'अभ्युदय' (1907-46) और 'लीडर' (1909-1968) जैसे पत्रों का प्रकाशन हो ही रहा था! किन्तु, इसके आने और इसके सम्पादकों के महान् बलिदान के बावजूद सम्पादक पद के लिए मची होड़ को आंग्ल सत्ताधीशों ने सही भाँपा और 1908 के 'प्रेस अधिनियम' के कठोर एवं दमनात्मक प्रावधानों के सहारे पहले 'हिन्दी प्रदीप', फिर 'स्वराज्य' का प्रकाशन बन्द करवा दिया! दूसरी ओर, इस प्रकार के बलिदान से अन्य प्रकाशकों-बुद्धिजीवियों ने प्रेरणा लेते हुए 'कर्मयोगी' (1909) या 'मर्यादा' (1910) जैसे पत्र पूरी निष्ठा और त्याग की भावना से ही निकाले और वे भी अब प्रत्येक दुष्परिणाम के लिए मानसिक रूप से तैयार हो चुके थे। 'अभ्युदय', 'लीडर' या बाद के 'इंडिपेंडेंट' से ले कर 'चाँद' और 'भारत' ने भी इस आज़ादी की लड़ाई में कलम को कहीं और कभी भी पीछे नहीं रहने दिया! ये क्रान्ति के अग्रदूत बन कर बौद्धिक नेतृत्व ही नहीं प्रदान कर रहे थे, अपितु अपने बलिदान से देशप्रेम और राष्ट्रवाद को सर्वोच्च शाश्वत मूल्य की भाँति स्थापित करने में सफल भी हुए थे।


प्रसिद्ध क्रान्तिकारी और काला पानी भुगते हुए परमानन्द जी ने अपने संस्मरणों में इस बात का उल्लेख किया है कि कैसे वहाँ सेलुलर जेल में भी लड्ढा राम जी कतई झुकने को तैय्यार नहीं हुए थे जिसके फलस्वरूप अँग्रेज़ जेल अधिकारियों की खीज उन पर और जुल्म कर के उतरी! वे किसी प्रकार के समझौते के लिए तत्पर नहीं थे। अतः उन्हें इसी के परिणामस्वरूप अकल्पनीय 'अमानुषिक यातनाओं' के एक लम्बे दौर से गुज़रना पड़ा। इतना ही नहीं उनको येन केन प्रकारेण झुकाने के लिए उनकी सजा की अवधि छह माह और बढ़ा दी गयी थी। अपनी वीरता, निडरता, अदम्य साहस, स्वाभिमान और देशप्रेम के चलते उनको सभी साथी बन्दी स्वाभिमान, त्याग और अनुकरणीय व्यक्ति मानते हुए उन्हें 'फील्ड मर्शाल' सम्बोधित करते थे। हमें ज्ञात ही है कि थलसेना का यह सर्वोच्च पद होता है! त्याग की भावना से परिपूर्ण भारतीय क्रान्तिकारियों में वे अपने त्याग और सहनशक्ति के चलते सर्वोच्च स्थान के हकदार हो गए थे। इस तरह लड्ढा राम भी अपने पूर्ववर्ती होती लाल और नन्द गोपाल चोपड़ा का ही अनुसरण करते दिखते हैं और उनके स्वाभिमान और हिम्मत को अंग्रेज़ के नियम-कानून और उनके क्रूर तथा अमानवीय क्रियान्वयन भी तोड़ने में सफल नहीं हुआ।


लड्ढा राम के प्रत्यार्पण के पश्चात् भी 'स्वराज्य' के सम्पादक का 'मुग़ल सिंहासन' खाली नहीं रह सका! इस बार ताज ने पण्डित अमीर चन्द बम्बवाल के सर की शोभा बढ़ाई! वे इस यशस्वी परम्परा के अन्तिम क्रान्तिकारी सम्पादक साबित हुए। उनसे भी उस समय के मूल्य वाली राशि 2000 रुपये की व्यक्तिगत ज़मानत लेने के बाद ही 'डिक्लेरेशन' जमा करने का निर्देश दिया गया! वे इन तमाम कड़ी शर्तों की पूर्ति कर के पुनः इसके प्रकाशन को सक्रिय बनाने में सफल रहे। किन्तु यह सफलता बहुत ही अल्पावधि की प्रमाणित हुई। कुल चार अंक निकाल पाने के उपरान्त ही 'स्वराज्य' के लेखों के तेवर व स्वर के आधार पर इस पत्र की ज़मानत राशि ज़ब्त कर ली गयी। इस समस्या के समाधान हेतु श्री बम्बवाल नए सिरे से ज़मानत राशि के रूप में 2000 रुपये जमा करते समय गिरफ्तार कर लिए गये! पुरुषोत्तम दास टण्डन बम्बवाल के वकील थे और वे कुछ ऐसे प्रश्न और विधि प्रावधान प्रस्तुत करने में सफल रहे कि बम्बवाल को मात्र एक वर्ष की ही सज़ा हुई। उनकी गिरफ्तारी का वारण्ट जब तक जारी होता, बम्बवाल अदालत से भागने में कामयाब हो गये! अपनी फ़रारी के दौरान वे प्रदर्शिनी देखते समय पकड़ लिये गए और फिर तो उन्हें पुराने जुर्म के साथ ही अदालत से फरार होने का अपराधी होने के प्रकरण को संज्ञान में लेते हुए लम्बी सजा हुई। इधर एक-एक करके 'स्वराज्य' के सारे सम्पादक बन्दीगृह में और उधर 'स्वराज्य प्रेस' की नीलामी और अन्ततः 'प्रेस एक्ट' के प्रावधानों के अन्तर्गत इस पत्र के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, तब जा कर अंग्रेजों की आँखों में सर्वाधिक खटकने वाला यह क्रान्तिकारी अखबार बन्द हुआ। लेकिन इसके बलिदान की इबारत और इतिहास सदैव भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास के अन्तर्गत और उसके अविभाज्य अंग के रूप में स्वर्णाक्षरों से लिखा जायेगा।

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