अजित पुष्कल की कविताएं


अजित पुष्कल 



जन्म  : 8 मई, 1935 को बाँदा (उ०प्र०) के पैगम्बरपुर गाँव में।

शिक्षा : एम०ए०

सम्प्रति: के० पी० इण्टर कालेज, इलाहाबाद में लम्बे समय तक अध्यापन। 

कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक विधाओं में लेखन।

विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं एवं संकलनों में कविताएँ प्रकाशित।

बुन्देलखण्ड ग्रामांचल पर आधारित चार उपन्यास, दो कहानी संग्रह, पाँच सम्पूर्ण नाटक मंचित एवं प्रकाशित।

श्रेष्ठ नाट्य लेखन के लिए उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी का सम्मान प्राप्त।

निधन  2 फरवरी 2025



आमतौर पर हम मानचित्र से किसी भी राष्ट्र को जानने पहचानने की कोशिश करते हैं। एकबारगी लगता है जैसे यही शाश्वत है। लेकिन हकीकत तो यही है कि देशों के नक्शे समय समय पर बदलते रहते हैं। देशों का ही क्या, अतीत में तो सारे महाद्वीप तक एक भू स्थल से जुड़े थे इन्हें पैंजिया कहा जाता था। बहरहाल देश जनता से बनता है। जनता की भावनाओं से बनता है। हालांकि राष्ट्रों के बनने का आधार धर्म, नस्ल, भाषा आदि भी रहे हैं लेकिन किसी भी राष्ट्र का समूचा सच यही नहीं है। रचनाकार राष्ट्र को समग्रता में देखते हैं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक उम्दा कविता है देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता। इस कविता की पंक्तियां हैं : 'देश कागज पर बना/ नक्शा नहीं होता/ कि एक हिस्से के फट जाने पर/ बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें/ और नदियां, पर्वत, शहर, गांव/ वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें/ अनमने रहें।/ यदि तुम यह नहीं मानते/ तो मुझे तुम्हारे साथ/ नहीं रहना है।... इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा/ कुछ भी नहीं है/ न ईश्वर/ न ज्ञान/ न चुनाव/ कागज पर लिखी कोई भी इबारत/ फाड़ी जा सकती है/ और जमीन की सात परतों के भीतर/ गाड़ी जा सकती है।' आज के समय में भी सर्वेश्वर की यह कविता मानीखेज है। अजित पुष्कल की एक कविता है 'देश दिल है करोड़ों का'। अपनी इस कविता में पुष्कल जी लिखते हैं : देश, वनस्पति औ' खेत नहीं है/ देश, नदी और रेत नहीं है/  देश, कथा, इतिहास नहीं है/ देश, बिम्ब का आभास नहीं है.../ देश दिल है करोड़ों का/ करोड़ों में धड़कता है। अजित पुष्कल मूलतः रंगकर्मी थे। उन्होंने कविताएं भी लिखीं। पिछले वर्ष 2 फरवरी 2025 को ही उनका निधन हो गया। पुष्कल जी की ये कविताएं हमें सन्तोष राय के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं। हम उनके प्रति आभारी हैं। पुष्कल जी की स्मृति को नमन करते हुए आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अजित पुष्कल की कविताएं।



अजित पुष्कल की कविताएं


भर आया जी


सूनी-सी नदी देख, 

भर आया जी। 

बहुत है अकेलापन 

भर आया जी।


टूट रही लहरों का 

घुटा बँधा दर्द। 

झूम गयी आर-पार 

हवा सर्द-सर्द।


आकण्ठ सन्नाटा 

एक राग चुप्प 

भर आया जी।


रह-रह तटों पर बजें, 

पानी के झपताल।

नाविक सब छोड़ गये, 

अलग-अलग नावें 

अलग-अलग पाल।


जला उधर जुगनूँ

फिर तिमिर घना घुप्प

भर आया जी।



यादों के ताने


हवा यह वही है 

नदी यह वही है। 

मगर अब लहर में, 

नहीं बेकली है।


रहने लगे चुप, 

नदी के मुहाने।


इधर नाव खाली 

उधर नाव खाली, 

भरम ने खुशी की 

शहादत छुपा ली।


सहने लगे पाल, 

यादों के ताने।


न आहट के नुपूर 

न चूड़ी की खनखन।

न चितवन की गर्मी, 

न आपस की अनबन।


हृदय जल गया 

मौन के ही बहाने।



प्रतीक्षा


कतर रहा हूँ मैं 

मेंहदी के पौधों की तरह 

रूखे दिन का गरूर।


अरधान में डूबा 

सोचता हूँ 

कल 

रंग माँगने आयेगा बादल ज़रूर।





चित्रकूट के कूट


ये, 

चित्रकूट के कूट 

नीले दर्पण के तले 

अपने हाव-भाव से प्लावित 

एक जगह पर खड़े 

अरे तो... 

खड़े रह गये।


भरत गये 

तो गये 

और ये 

खुली बाँह से खुले 

अभी तक 

खुले रह गये।



जो अनकहा रहा


तुमसे जो 

जब कभी 

कुछ कहा। 

उसका भार 

पहले से 

टीस-टीस सहा।


पर अन्तर में व्याप्त 

एक व्यथा ताप 

रह जायेगा 

जीवन भर अनकहा।



देश दिल है करोड़ों का


देश चित्र औ' आकार नहीं है 

देश रंग औं' विस्तार नहीं है 

देश आकृति है आस्था की 

धरती को रचता है...


देश, वनस्पति औ' खेत नहीं है 

देश, नदी और रेत नहीं है 

देश, कथा, इतिहास नहीं है 

देश, बिम्ब का आभास नहीं है...


देश दिल है करोड़ों का 

करोड़ों में धड़कता है।



देश


सिर पर ओढ़े बर्फ 

पैरों में समुद्र 

पहाड़-सी कठोर नग्न छाती 

बाँहें पसार जैसे 

ईसा टँगा हो सलीब पर।


काला लबादा पहन 

इसके जेहन में रेंगते लोग 

मेरी रीढ़ पर 

यात्राएँ करते हैं।


फिर भी मैं 

अपने इस देश को 

मुट्ठी में नहीं 

हृदय में रखता हूँ।





चैत का गीत


चैत चढ़ आया

वन पलाश दहके


उम्र बढ़ी दिन की,

साधें ज्यों मन की।

समरथ हुई अरहर,

नूपुर-सी‌ छनकी।


झुके हवा के झोंके-

फूल फूल डहके।



गौरैया


कटीली झाड़ी में छिपी

गोरिया से पूछा मैंने

क्यों छील रही हो अपना बदन तुम तो जानी जाती रही

 घर घर की चिड़िया

आना मेरे घर

 दाना पानी दूंगा तुम्हें।


मैं दिनों दिनों तक 

संजोए रखा दाना पानी 

उसके संग जीने के लिए 

बरसता भीगता रहा मेरा मन

पर नहीं आई गौरैया‌

    

   

तुम्हारा जाना         

  

तुम्हारा जाना 

जैसे 

आंगन से

नेह पाली कबूतरी का 

उड़ जाना।


सबने तो जाना 

पर,

दीवारों का 

हजार दृगों से रोना

पथ पर उभरे

पद चिन्हों का 

आंखों में छा जाना

मेरे मन का 

और से और हो जाना 

सिर्फ मैंने जाना।



(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)


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