रवि रंजन का आलेख
बाँसुरी: रिक्तता का राग और अर्थ के विखंडन का सौंदर्यशास्त्र
- रवि रंजन
संरचनावाद (Structuralism) बीसवीं शताब्दी के मध्य में उभरा एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक आंदोलन है, जो आगे चलकर भाषाविज्ञान, मानवशास्त्र, मनोविज्ञान और साहित्यालोचन जैसे विविध क्षेत्रों में विस्तृत हुआ। इस सिद्धांत के अंतर्गत यह मान्यता केंद्र में है कि मानवीय संस्कृति, भाषा और साहित्य की सभी अभिव्यक्तियाँ कुछ अंतर्निहित संरचनाओं से निर्मित होती हैं, जो सार्वभौमिक मानसिक पैटर्न पर आधारित होती हैं। संरचनावादी आलोचना में साहित्य को एक संकेत-प्रणाली (sign system) के रूप में देखा जाता है, जहाँ अर्थ लेखक की निजी मंशा या ऐतिहासिक संदर्भ से नहीं, बल्कि संकेतों के आपसी संबंधों, विरोधों और नियमों से उत्पन्न होता है।
संरचनावाद के प्रमुख विचारकों में फर्डिनेंड द सॉस्यूर (Ferdinand de Saussure), क्लोद लेवी-स्ट्रॉस (Claude Lévi-Strauss), रोलां बार्थ (Roland Barthes) और रोमन जैकोबसन (Roman Jakobson) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सॉस्यूर ने भाषा को एक संरचना के रूप में प्रतिष्ठित किया, लेवी-स्ट्रॉस ने इस संरचनात्मक पद्धति को मिथकों और संस्कृति के अध्ययन में लागू किया, बार्थ ने साहित्य और सांस्कृतिक पाठों की व्याख्या को नए संकेतात्मक धरातल पर रखा, और जैकोबसन ने काव्य-प्रकार्य (poetic function) को रेखांकित करते हुए भाषा के सौंदर्यात्मक आयामों पर प्रकाश डाला।
संरचनावादी आलोचना में साहित्यिक तत्त्वों को अलग-अलग, पृथक इकाइयों के रूप में देखने के बजाय उन्हें एक व्यापक संरचनात्मक ढाँचे के भीतर रखकर समझा जाता है। उदाहरणस्वरूप, संकेत (sign) को संकेतक (signifier) और संकेतित (signified) के रूप में देखा जाता है, जहाँ अर्थ स्वभावतः मनमाना (arbitrary) और संबंधपरक होता है। संरचना के केंद्र में द्वंद्वात्मक विपरीतताएँ (binary oppositions) होती हैं—जैसे प्रकृति/संस्कृति, पुरुष/स्त्री, जीवन/मृत्यु—और मिथक अथवा कविता इन विरोधों के बीच मध्यस्थता का कार्य करती है।
विदित है कि संरचनावाद की नींव फर्डिनेंड द सॉस्यूर की भाषावैज्ञानिक स्थापनाओं पर टिकी हुई है। सॉस्यूर के अनुसार भाषा एक ऐसी प्रणाली है जिसमें अर्थ किसी शब्द या चिह्न में स्वाभाविक रूप से निहित नहीं होता, बल्कि वह अन्य शब्दों से उसके अंतर और संबंध के माध्यम से निर्मित होता है। इसी संदर्भ में उनका प्रसिद्ध कथन है—“भाषा में बिना सकारात्मक पदों के केवल अंतर होते हैं।”(In language, there are only differences without positive terms.) इस सिद्धांत का साहित्यिक पाठों पर प्रत्यक्ष अनुप्रयोग संभव है, क्योंकि कविता में प्रयुक्त शब्द, बिंब और प्रतीक अपना अर्थ स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि अन्य शब्दों और बिंबों से भिन्नता के कारण प्राप्त करते हैं। इसी क्रम में सॉस्यूर यह भी स्पष्ट करते हैं कि—“संकेतक और संकेतित के बीच का संबंध मनमाना होता है।”(The connection between the signifier and the signified is arbitrary.) इसका अभिप्राय यह है कि किसी शब्द या प्रतीक का अर्थ किसी प्राकृतिक या अपरिवर्तनीय सत्य से नहीं जुड़ा होता, बल्कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक सहमति और भाषा-प्रणाली के भीतर निर्मित होता है। साहित्य में प्रयुक्त संकेत इसी मनमानेपन के कारण विभिन्न संदर्भों में भिन्न-भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकते हैं।
लेवी-स्ट्रॉस ने संरचनावाद को भाषाविज्ञान से आगे बढ़ाकर मानवशास्त्र और मिथक-अध्ययन के क्षेत्र में विस्तार दिया। उनका मानना था कि मिथक मानव मस्तिष्क की उन अंतर्निहित संरचनाओं को प्रकट करते हैं, जिनके माध्यम से मनुष्य संसार को समझता है। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं—“मिथक विपरीत द्वंद्वों के ‘मुक़ाबले’ से मिलकर बनते हैं।”(Myths consist of juxtaposed binary oppositions.) लेवी-स्ट्रॉस के अनुसार संस्कृति में कुछ द्वंद्वात्मक संरचनाएँ सार्वभौमिक रूप से उपस्थित रहती हैं—जैसे प्रकृति/संस्कृति, जीवन/मृत्यु, कच्चा/पका, पुरुष/स्त्री आदि। मिथक इन विरोधी तत्त्वों को न तो सीधे नकारते हैं और न ही किसी एक पक्ष को पूर्णतः स्वीकार करते हैं; बल्कि वे इनके बीच एक प्रकार की मध्यस्थता (mediation) स्थापित करते हैं। इस प्रकार मिथक विरोधों को समाप्त नहीं करते, बल्कि उन्हें अर्थपूर्ण ढंग से संतुलित करते हैं।
इसी सैद्धांतिक निकष पर ‘बाँसुरी: रिक्तता का राग और अर्थ के विखंडन का सौंदर्यशास्त्र’ शीर्षक के अंतर्गत इस आलेख में श्रीमद्भागवत महापुराण के 'वेणु गीत' से लेकर रूमी, जानकीवल्लभ शास्त्री, और आधुनिक कवियों—मंगलेश डबराल, नरेश सक्सेना व स्वप्निल श्रीवास्तव—की ‘बाँसुरी’ केंदित रचनाओं का एक उत्तर-संरचनावादी पाठ प्रस्तुत किया गया है। यहाँ बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि एक 'सांकेतिक केंद्र' है, जहाँ रिक्तता ही संगीत का आधार बनती है। इन रचनाओं के माध्यम से एकाकीपन, पीड़ा और आनंद के द्वंद्वात्मक संबंधों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि कैसे एक ही प्रतीक भिन्न-भिन्न कालखंडों और विचारधाराओं में अपने अर्थ को विखंडित और पुनर्गठित करता है। प्रस्तुत विश्लेषण में 'बाँसुरी' को एक सांकेतिक केंद्र मानते हुए उसके भीतर छिपे अस्तित्वपरक एकाकीपन और सौंदर्यपरक आनंद के द्वंद्व को भी डिकोड करने की चेष्टा की गयी है।
साहित्यिक आलोचना में इस सिद्धांत का उपयोग करते हुए कविता को मिथक के समान एक संरचनात्मक इकाई के रूप में देखा जा सकता है। कविता के भीतर उपस्थित बिंब, प्रतीक और कथ्य ‘माइथीम्स’ की तरह कार्य करते हैं—अर्थात् वे अर्थ की सबसे छोटी संरचनात्मक इकाइयाँ होती हैं, जिनके आपसी संबंध से सम्पूर्ण काव्य-अर्थ निर्मित होता है। लेवी-स्ट्रॉस का एक और महत्त्वपूर्ण कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है—“वैज्ञानिक वह व्यक्ति नहीं है जो सही उत्तर देता है, बल्कि वह है जो सही प्रश्न पूछता है।”(The scientist is not a person who gives the right answers; he is one who asks the right questions.) इस विचार का आशय यह है कि संरचनावादी विश्लेषण का उद्देश्य किसी एक निर्णायक अर्थ तक पहुँचना नहीं, बल्कि पाठ के भीतर सक्रिय विरोधों, तनावों और संरचनात्मक प्रश्नों को उजागर करना है। इसी दृष्टि से जब हम मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी-केन्द्रित कविताओं को देखते हैं, तो मूल प्रश्न यह नहीं रह जाता कि बाँसुरी क्या ‘अर्थ’ देती है, बल्कि यह बन जाता है कि वह किन-किन द्वंद्वात्मक संरचनाओं के बीच खड़ी है। यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या बाँसुरी इन विरोधी तत्त्वों—जैसे पीड़ा और आनंद, प्रकृति और संस्कृति, भीतर और बाहर—के बीच किसी प्रकार का समाधान प्रस्तुत करती है, या फिर वह स्वयं इन द्वंद्वों को और अधिक तीव्र कर देती है। संरचनावादी दृष्टिकोण से यह प्रश्न ही कविता के अर्थ-निर्माण की धुरी बन जाता है।
रोलां बार्थ ने संरचनावाद को साहित्य और सांस्कृतिक आलोचना के क्षेत्र में एक नई दिशा दी। उनके लिए मिथक केवल प्राचीन कथा नहीं थे, बल्कि आधुनिक संस्कृति में अर्थ-निर्माण की ऐसी प्रणालियाँ थीं, जो इतिहास को स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय बनाकर प्रस्तुत करती हैं। वे लिखते हैं—“मिथक का मूल सिद्धांत ‘इतिहास को प्रकृति में परिवर्तित करना’ है।“(The very principle of myth is ‘to transform history into nature’.) बार्थ के अनुसार साहित्यिक पाठ बहुस्तरीय संकेत-प्रणाली (multi-layered sign system) होता है, जहाँ अर्थ किसी एक स्तर पर स्थिर नहीं रहता, बल्कि विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषिक कोड्स के माध्यम से निर्मित होता है। पाठ में उपस्थित मिथक इस प्रक्रिया को स्वाभाविक बनाते हैं, जिससे सामाजिक और ऐतिहासिक संरचनाएँ ‘प्राकृतिक सत्य’ के रूप में स्वीकार कर ली जाती हैं। इसी संदर्भ में बार्थ का प्रसिद्ध कथन उल्लेखनीय है—“पाठक का जन्म लेखक की मृत्यु की कीमत पर होना चाहिए।”(The birth of the reader must be at the cost of the death of the Author.) इस विचार का आशय यह है कि साहित्यिक कृति का अर्थ लेखक की निजी मंशा, जीवन या भावनात्मक स्थिति से निर्धारित नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत पाठ स्वयं एक स्वतंत्र संरचना है, जो पाठक के साथ संवाद करते हुए अर्थ का निर्माण करती है। इस दृष्टि से कविता की व्याख्या लेखक-केंद्रित न होकर पाठ-केंद्रित हो जाती है। आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री, मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी-केन्द्रित कविताओं पर इस सिद्धांत को लागू करने पर यह स्पष्ट होता है कि बाँसुरी केवल कवि की अनुभूति का उपकरण नहीं रह जाती, बल्कि एक सांस्कृतिक संकेत बन जाती है। यहाँ पाठक यह तय करता है कि बाँसुरी एकाकीपन का प्रतीक है या पीड़ा का, या सत्ता और नियंत्रण का।
बार्थ द्वारा प्रतिपादित ‘कोड्स’ की अवधारणा भी यहाँ महत्त्वपूर्ण हो जाती है। कविता में रहस्य उत्पन्न करने वाले प्रश्न—जैसे मंगलेश डबराल की कविता में चुप्पी का विलाप में बदल जाना—‘हर्मेन्युटिक कोड’ के अंतर्गत आते हैं। वस्तुत: रोलाँ बार्थ की कोड्स की अवधारणा किसी साहित्यिक कृति के भीतर बुनी गई उन परतों की तरह है जिन्हें पाठक को एक-एक कर खोलना होता है। जब हम ‘हर्मेन्युटिक कोड’ की बात करते हैं, तो इसका सीधा संबंध उस जिज्ञासा या रहस्य से होता है जिसे लेखक जानबूझकर अधूरा छोड़ देता है। यह कोड पाठक के सामने एक पहेली रख देता है जिसका समाधान तुरंत उपलब्ध नहीं होता।मंगलेश डबराल की कविता के संदर्भ में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि जब चुप्पी अचानक विलाप में रूपांतरित होती है, तो यह बदलाव एक तार्किक अंतराल पैदा करता है। पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि वह क्या था जिसने शांति को रुदन में बदल दिया। यहाँ अर्थ का स्पष्ट न होना कोई कमी नहीं है, बल्कि यह बार्थ के उस सिद्धांत का हिस्सा है जहाँ अर्थ को जानबूझकर स्थगित किया जाता है।यह स्थगन पाठक को एक सक्रिय भूमिका में ले आता है। पाठक केवल शब्दों को पढ़ता नहीं है, बल्कि वह उन खाली जगहों को अपनी संवेदनाओं और तर्क से भरने की कोशिश करता है। अर्थ स्पष्ट होने की इस प्रतीक्षा में ही कविता का वास्तविक सौंदर्य छिपा होता है। इस प्रक्रिया में पाठक कविता के भीतर छिपे सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या व्यक्तिगत कारणों की व्याख्या करने लगता है। इस प्रकार हर्मेन्युटिक कोड कविता को एक सरल सूचना बनने से रोकता है और उसे एक जटिल अनुभव बना देता है। पाठक इस रहस्य को सुलझाने के लिए कविता की गहराई में उतरता है, जिससे वह स्वयं उस सृजन प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा बन जाता है।इसी तरह स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी का बार-बार बजना ‘सेमिक कोड’ के माध्यम से एकाकीपन और पीड़ा के सांस्कृतिक संकेत निर्मित करता है।दूसरे शब्दों में स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी का बार-बार बजना रोलाँ बार्थ के सेमिक कोड को समझने के लिए एक सटीक उदाहरण है। सेमिक कोड का मुख्य कार्य कविता के भीतर ऐसे प्रतीकों या संकेतों का निर्माण करना होता है जो किसी विशिष्ट गुण, चरित्र या सांस्कृतिक भाव की ओर इशारा करते हैं। जब कोई बिम्ब बार-बार दोहराया जाता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं रह जाता बल्कि एक गहरे अर्थ का संवाहक बन जाता है।
भारतीय सांस्कृतिक चेतना में बाँसुरी का जुड़ाव अक्सर प्रेम, विरह और एक विशेष प्रकार की व्याकुलता से रहा है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में जब यह वाद्ययंत्र बार-बार बजता है, तो यह केवल मधुर संगीत का संकेत नहीं देता, बल्कि एकाकीपन और पीड़ा की एक निरंतर ध्वनि बन जाता है। यहाँ बाँसुरी का बजना उस अकेलेपन का पर्याय है जो भीतर कहीं गहरा दबा हुआ है और अभिव्यक्ति के लिए तड़प रहा है।सेमिक कोड के माध्यम से यह बाँसुरी एक ऐसे सांस्कृतिक संकेत में बदल जाती है जहाँ वह आधुनिक मनुष्य की नियति और उसके खालीपन को दर्शाती है। यह संकेत पाठक के मानस में एक ऐसी छवि निर्मित करता है जहाँ संगीत आनंद का नहीं बल्कि एक अंतहीन टीस का माध्यम है। बार-बार का यह दोहराव उस पीड़ा की सघनता को बढ़ाता है, जिससे पाठक यह समझ पाता है कि यह संगीत दरअसल एक मौन रुदन है जिसे शब्द नहीं मिल पा रहे हैं।इस प्रकार, सेमिक कोड यहाँ एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जहाँ भौतिक वस्तुएँ अपनी प्रकृति छोड़कर भावनात्मक अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने लगती हैं। बाँसुरी का स्वर यहाँ मनुष्य के अस्तित्वगत संकट और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों के बीच के तनाव को रेखांकित करता है।
रोलाँ बार्थ के इन दोनों कोड्स के बीच का अंतर कविता की बुनावट को समझने में बहुत सहायक होता है। ‘हर्मेन्युटिक कोड’ जहाँ कविता में एक पहेली या प्रश्न खड़ा करता है, वहीं ‘सेमिक कोड’ कविता के भीतर सूक्ष्म संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से एक विशेष भाव-भूमि तैयार करता है।हर्मेन्युटिक कोड का मुख्य उद्देश्य पाठक के भीतर जिज्ञासा बनाए रखना है। यह किसी सत्य को छुपाकर रखता है ताकि पाठक उसे खोजने के लिए सक्रिय हो। जैसे मंगलेश डबराल की कविता में चुप्पी का विलाप में बदल जाना एक ऐसी घटना है जो पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि इसके पीछे का रहस्य क्या है। यह कोड कविता की गतिशीलता और उसके सस्पेंस से जुड़ा होता है।इसके विपरीत, ‘सेमिक कोड’ का संबंध कविता के वातावरण और पात्रों के गुणों से होता है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी का बार-बार बजना कोई रहस्य नहीं है, बल्कि वह एक संकेत है। यह संकेत पाठक को सीधे उस पीड़ा और अकेलेपन से जोड़ता है जो बाँसुरी के सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा रहा है। सेमिक कोड पाठक को यह बताता है कि कविता का मिजाज या उसकी तासीर कैसी है।
इन दोनों कोडों के तुलनात्मक ढांचे को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है - जहाँ हर्मेन्युटिक कोड पाठक से पूछता है कि ऐसा क्यों हुआ, वहीं सेमिक कोड उसे महसूस कराता है कि यहाँ किस तरह का परिवेश है। हर्मेन्युटिक कोड कहानी या कविता के तार्किक विकास से जुड़ा है, जबकि सेमिक कोड उसकी भावनात्मक सघनता और प्रतीकात्मकता से जुड़ा है। कविता में ये दोनों कोड मिलकर एक ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जहाँ पाठक न केवल बौद्धिक स्तर पर उलझता है, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी कविता के साथ एकाकार हो जाता है।
बार्थियन कोडों के आधार पर नरेश सक्सेना की ‘बाँसुरी’ कविता पर नज़र डालें –
बांसुरी के इतिहास में
उन कीड़ों का कोई जिक्र नहीं
जिन्होंने भूख मिटाने के लिए
बांसों में छेद कर दिए थे.
और जब-जब हवा उन छेदों से गुजरती
तो बांसों का रोना सुनायी देता
कीड़ों को तो पता ही नहीं था
कि वे संगीत के इतिहास में हस्तक्षेप
कर रहे हैं
और एक ऐसे वाद्य का आविष्कार
जिसमें बजाने वाले की सांसें बजती हैं.
मैंने कभी लिखा था
कि बांसुरी में सांस नहीं बजती
बांस नहीं बजता
बजाने वाला बजता है
अब
जब-जब बजाता हूं बांसुरी
तो राग चाहे जो हो
उसमें कीड़ों की भूख
और बांसों का रोना भी सुनायी देता है।
नरेश सक्सेना की यह कविता रोलाँ बार्थ के कोड्स को समझने के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है, क्योंकि यह कविता एक भौतिक वस्तु के निर्माण के पीछे छिपी सूक्ष्म और अदृश्य संवेदनाओं की परतों को खोलती है।
हर्मेन्युटिक कोड के नजरिए से देखें तो कविता की शुरुआत ही एक दार्शनिक जिज्ञासा से होती है। बाँसुरी के इतिहास में उन कीड़ों का ज़िक्र न होना एक तरह का रहस्यमयी अंतराल पैदा करता है। पाठक सोचने पर मजबूर होता है कि एक मधुर वाद्ययंत्र का संबंध कीड़ों की भूख से कैसे हो सकता है। यह कोड कविता के मध्य में तब और गहरा होता है जब कवि कहता है कि बाँसुरी में न साँस बजती है, न बाँस, बल्कि बजाने वाला बजता है। यह विरोधाभास पाठक के मन में सत्य को जानने की एक छटपटाहट पैदा करता है, जहाँ अर्थ तुरंत स्पष्ट न होकर धीरे-धीरे उद्घाटित होता है।
सेमिक कोड इस कविता में बाँसुरी और उसमें किए गए छेदों के माध्यम से काम करता है। यहाँ छेद केवल भौतिक छिद्र नहीं हैं, बल्कि वे अभाव और पीड़ा के सांस्कृतिक संकेत बन जाते हैं। कीड़ों द्वारा भूख मिटाने के लिए किए गए छेद विवशता का प्रतीक हैं, जबकि उन छेदों से गुजरती हवा से निकलने वाला रोना दुख की सघनता को दर्शाता है। बाँसुरी का संगीत यहाँ केवल कला नहीं रह जाता, बल्कि वह भूख और पीड़ा के 'सिग्नल्स' में बदल जाता है। यह कोड पाठक को यह संकेत देता है कि हर सुंदर कलाकृति के पीछे किसी न किसी स्तर पर संघर्ष और अभाव की उपस्थिति होती है।
सांस्कृतिक कोड के स्तर पर यह कविता कला के इतिहास के लेखन पर प्रश्न उठाती है। बाँसुरी को लेकर हमारे समाज में जो पारंपरिक और रसीली अवधारणाएँ हैं, कवि उन्हें चुनौती देता है। संगीत का इतिहास अक्सर सौंदर्य की बात करता है, लेकिन वह उस प्रक्रिया को भूल जाता है जहाँ 'हस्तक्षेप' हुआ था। यहाँ कीड़ों की भूख को संगीत के आविष्कार से जोड़ना एक गहरा वैचारिक संकेत है, जो बताता है कि मनुष्य का सृजन अक्सर उसकी बुनियादी जरूरतों और संकटों की कोख से जन्म लेता है।
प्रतीकात्मक कोड के माध्यम से कवि बाँसुरी को एक ऐसे माध्यम के रूप में स्थापित करता है जहाँ कलाकार और उसका माध्यम एक हो जाते हैं। जब कवि कहता है कि राग चाहे जो हो, उसमें कीड़ों की भूख और बाँसों का रोना सुनाई देता है, तो वह यह स्थापित कर रहा है कि कला अपनी मूल जड़ों से कभी अलग नहीं हो सकती। बाँसुरी यहाँ अस्तित्वगत पीड़ा का एक शाश्वत प्रतीक बन जाती है।
इस प्रकार बार्थ के कोड्स के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि यह कविता केवल संगीत के बारे में नहीं है, बल्कि यह सृजन के पीछे छिपे अनकहे दर्द और इतिहास की उन कड़ियों के बारे में है जिन्हें मुख्यधारा की चर्चाओं में भुला दिया जाता है।
नरेश सक्सेना की इस कविता के सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ बार्थ के कोड्स के माध्यम से और भी स्पष्ट हो जाते हैं, क्योंकि यह कविता कला और श्रम के अंतर्संबंधों पर एक गहरा प्रहार करती है।
हर्मेन्युटिक कोड के माध्यम से यहाँ इतिहास की चयनात्मक दृष्टि पर सवाल उठाया गया है। जब कवि कहता है कि इतिहास में उन कीड़ों का कोई जिक्र नहीं, तो यह उस सामाजिक संरचना की ओर इशारा है जो अंतिम उत्पाद या सौंदर्य की तो प्रशंसा करती है, लेकिन उस प्रक्रिया में लगे संघर्ष और अभाव को अदृश्य कर देती है। राजनीतिक रूप से यह उन वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है जिनका श्रम सभ्यता के निर्माण में आधारभूत है, किंतु इतिहास की पुस्तकों में वे कहीं नहीं मिलते।
सेमिक कोड यहाँ भूख को एक विवशता के रूप में नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक हस्तक्षेप के रूप में दिखाता है। इसका राजनीतिक अर्थ यह है कि समाज में जिसे हम अक्सर विकृति या छेद मानकर उपेक्षित कर देते हैं, वही भविष्य में संगीत या किसी बड़े परिवर्तन का आधार बनता है। कीड़ों द्वारा भूख मिटाने के लिए किए गए छेद इस बात का संकेत हैं कि जीवन की बुनियादी जरूरतें ही अक्सर महान आविष्कारों की जननी होती हैं। यह कला के उस अभिजात्य नजरिए को तोड़ता है जो इसे केवल फुर्सत या विलासिता की वस्तु मानता है।
सांस्कृतिक रूप से यह कविता एक बड़े सच की ओर ले जाती है कि कलाकार का अपना अस्तित्व उसके माध्यम से अलग नहीं है। जब कवि कहता है कि बजाने वाला बजता है, तो यह उस श्रम और कलाकार की निजी व्यथा का राजनीतिकरण है। संगीत यहाँ केवल मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि वह उन पूर्वजों, उन संघर्षों और उन अभावों की गूँज बन जाता है जिनसे वह निर्मित हुआ है। राग कोई भी हो, उसकी बुनियाद में वह रोना और वह भूख शामिल रहती है, जिसे व्यवस्था अक्सर सुनने से इनकार कर देती है।
अंततः, यह कविता बार्थ के कोड्स का उपयोग करते हुए यह स्थापित करती है कि सौंदर्य का बोध सामाजिक उत्तरदायित्व से अलग नहीं हो सकता। यदि हम बाँसुरी के मधुर स्वर का आनंद ले रहे हैं, तो हमें उन छेदों और उस भूख के प्रति भी सचेत रहना होगा जिसने उस स्वर को संभव बनाया है।
प्रोएरेटिक कोड मुख्य रूप से क्रियाओं, उनके क्रम और उनके परिणामों से संबंधित होता है। यह कोड पाठक को यह समझने में मदद करता है कि एक घटना किस तरह दूसरी घटना को जन्म देती है और किस प्रकार एक पूरी प्रक्रिया संपन्न होती है। नरेश सक्सेना की इस कविता में यह कोड सृजन की भौतिक प्रक्रिया को तार्किक रूप से जोड़ता है।
पहली क्रिया कीड़ों द्वारा भूख मिटाने के लिए बाँस में छेद करना है। प्रोएरेटिक कोड के अनुसार, यह एक बुनियादी उत्तरजीविता की क्रिया है। इसका परिणाम एक ऐसी शारीरिक क्षति के रूप में निकलता है जिसे आमतौर पर विनाश माना जाना चाहिए था, लेकिन यही क्रिया आगे चलकर संगीत की संभावना का द्वार खोलती है। यहाँ अभाव एक रचनात्मक परिणाम की ओर ले जाने वाली पहली कड़ी है।
दूसरी क्रिया हवा का उन छेदों से गुजरना है। यह प्राकृतिक क्रिया उन कृत्रिम छेदों को 'स्वर' प्रदान करती है। कविता के तर्क में, कीड़ों की क्रिया और हवा की प्रतिक्रिया मिलकर 'बाँसों का रोना' उत्पन्न करती हैं। प्रोएरेटिक दृष्टि से देखें तो यह रोना ही वह कच्चा माल है जिसे बाद में परिष्कृत करके संगीत कहा गया। आविष्कार यहाँ कोई सचेत योजना नहीं थी, बल्कि क्रियाओं के एक आकस्मिक और संघर्षपूर्ण क्रम का परिणाम था।
अंतिम क्रिया बजाने वाले द्वारा बाँसुरी बजाना है। यह क्रिया पिछली तमाम क्रियाओं (भूख, छेद, रोना) को वर्तमान में पुनर्जीवित कर देती है। प्रोएरेटिक कोड यहाँ यह स्पष्ट करता है कि संगीत बजाने का कार्य केवल एक कलात्मक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उन पुरानी क्रियाओं और कष्टों को फिर से दोहराने की प्रक्रिया है। राग चाहे जो भी चुना जाए, उसका अनिवार्य परिणाम कीड़ों की भूख और बाँस के रोने की गूँज ही होगा।
इस प्रकार, प्रोएरेटिक कोड इस कविता को एक गतिशील इतिहास की तरह पढ़ता है, जहाँ कोई भी अंत या परिणाम अपनी पिछली क्रियाओं से मुक्त नहीं होता। यह कोड हमें बताता है कि संगीत का 'आविष्कार' वास्तव में पीड़ा और आवश्यकता के एक निरंतर प्रवाह का अंतिम पड़ाव है।
सिम्बोलिक कोड बार्थ का वह उपकरण है जो कविता के भीतर मौजूद द्वंद्वों, विरोधों और विरोधाभासों (Binary Oppositions) को स्पष्ट करता है। नरेश सक्सेना की इस कविता में यह कोड जीवन के सबसे मौलिक विरोधाभासों को एक साथ लाकर खड़ा कर देता है।
सबसे प्रमुख द्वंद्व 'सृजन' और 'विनाश' के बीच है। कीड़ों का बाँस को कुतरना एक विनाशकारी क्रिया है, जो बाँस के अस्तित्व को खंडित करती है। लेकिन सिम्बोलिक कोड के माध्यम से हम देखते हैं कि यही विनाश सृजन का आधार बनता है। बिना उन छेदों के बाँसुरी का अस्तित्व संभव नहीं था। यहाँ 'क्षति' ही 'निधि' में बदल जाती है।
दूसरा बड़ा द्वंद्व 'सौंदर्य' और 'पीड़ा' का है। हम जिसे मधुर संगीत के रूप में सुनते हैं, कविता उसे 'बाँसों का रोना' और 'कीड़ों की भूख' के रूप में परिभाषित करती है। यहाँ मधुर स्वर (संगीत) और विलाप (रोना) एक ही सिक्के के दो पहलू बन जाते हैं। यह कोड पाठक को समझाता है कि कला का सौंदर्य अक्सर अमानवीय स्थितियों या अभावों की कोख से उपजता है।
तीसरा द्वंद्व 'दृश्य' और 'अदृश्य' के बीच है। संगीत का इतिहास केवल उस बाँसुरी को देखता है जो हाथ में है (दृश्य), लेकिन वह उन कीड़ों और उनकी भूख को भूल जाता है जो इतिहास के पन्नों से गायब हैं (अदृश्य)। सिम्बोलिक कोड यहाँ सत्ता और हाशिए के बीच के इसी संघर्ष को दर्शाता है। जो बज रहा है वह उपस्थित है, लेकिन जो उस बजने का कारण है वह अनुपस्थित है।
अंत में, बजाने वाले की 'साँस' और बाँसुरी के 'काष्ठ' (बाँस) का द्वंद्व भी महत्वपूर्ण है। कवि कहता है कि बाँसुरी में बाँस नहीं बजता, बल्कि बजाने वाला खुद बजता है। यह मनुष्य और निर्जीव वस्तु के बीच के अंतर को मिटाकर एक दार्शनिक एकता स्थापित करता है। यहाँ कलाकार और उसकी कला के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
इस प्रकार, ‘सिम्बोलिक कोड’ के माध्यम से यह कविता केवल एक वाद्ययंत्र की कहानी न रहकर जीवन के गहरे विरोधाभासों का एक कोलाज बन जाती है, जहाँ भूख, रोना, साँस और संगीत एक अटूट सूत्र में बंधे हैं।
नरेश सक्सेना की यह कविता रोलाँ बार्थ के पाँचों कोड्स के संगम से एक पूर्ण अर्थ प्राप्त करती है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यह कविता किसी वस्तु के बाहरी सौंदर्य को उखाड़कर उसकी आंतरिक और ऐतिहासिक जड़ों से पाठक का साक्षात्कार कराती है।
‘हर्मेन्युटिक कोड’ जहाँ हमें इतिहास के एक अनकहे अध्याय की खोज की ओर ले जाता है, वहीं ‘सेमिक कोड’ बाँसुरी के सांस्कृतिक प्रतीकों को विरह से हटाकर भूख और अभाव की ओर मोड़ देता है। ‘प्रोएरेटिक कोड’ इस पूरी प्रक्रिया को एक तार्किक घटनाक्रम की तरह प्रस्तुत करता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि कला कोई दैवीय चमत्कार नहीं बल्कि श्रम और संघर्ष का परिणाम है।‘सिम्बोलिक कोड’ कविता के विरोधाभासों—जैसे संगीत और रोना, भूख और कला—को एक साथ बुनकर यह स्पष्ट करता है कि संसार में जिसे हम पूर्णता मानते हैं, वह वास्तव में कई प्रकार की कमियों और छेदों का ही संयोजन है। यह कविता अंततः एक राजनीतिक और सामाजिक वक्तव्य बन जाती है, जो हमें यह याद दिलाती है कि हमारी हर सुख-सुविधा और कलात्मक आनंद के पीछे किसी न किसी का अदृश्य हस्तक्षेप और पीड़ा शामिल है। इस प्रकार बार्थ के कोड्स के माध्यम से की गई यह व्याख्या कविता को महज शब्दों का समूह न रखकर उसे एक गहरी बौद्धिक और संवेदनापरक संरचना बना देती है।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से देखें तो नरेश सक्सेना की ‘बाँसुरी’ कविता संगीत के उस 'महा-वृत्तांत' (Grand Narrative) को विखंडित करती है जो कला को केवल एक दिव्य या शास्त्रीय उपलब्धि मानता है। यहाँ बाँसुरी का अस्तित्व किसी कलाकार की कल्पना से पहले 'कीड़ों की भूख' से तय होता है। यह 'भूख' ही वह प्राथमिक हस्तक्षेप है, जो बाँस की ठोस सत्ता में 'रिक्तता' (Hollow) पैदा करती है। उत्तर-संरचनावाद के 'हाशिए के विमर्श' के अनुसार, इतिहास ने हमेशा संगीत के उस्तादों को याद रखा, पर उन कीड़ों को भुला दिया जिनके द्वारा किए गए छेद ही संगीत का आधार बने। यहाँ संगीत का सौंदर्यशास्त्र 'रुदन' और 'अभाव' की नींव पर खड़ा है—हवा जब उन जख्मों (छेद) से गुजरती है, तब वह राग बनती है।
कविता की ये पंक्तियाँ—"बाँसुरी में सांस नहीं बजती / बाँस नहीं बजता / बजाने वाला बजता है"—कर्ता (Subject) के पूर्ण विसर्जन की ओर संकेत करती हैं, जहाँ कला और कलाकार के बीच का भेद मिट जाता है। लेकिन तुरंत बाद, अर्थ फिर से विखंडित होता है। कवि यह स्वीकार करता है कि राग चाहे कोई भी हो, उसकी गूँज के पीछे कीड़ों की भूख और बाँसों का रोना हमेशा मौजूद रहता है। यह उस 'उपस्थिति' (Presence) के भीतर 'अनुपस्थिति' (Absence) का पाठ है, जिसे देरिदा जैसे विचारक रेखांकित करते हैं। जहाँ भागवत की बाँसुरी में पूर्णता का आनंद है, वहीं नरेश सक्सेना की बाँसुरी में आनंद के ऐन बीचों-बीच भूख और पीड़ा का एक अनिवार्य 'ट्रैक' बज रहा है। यह विश्लेषण स्पष्ट करता है कि बाँसुरी यहाँ कोई स्थिर प्रतीक नहीं है, बल्कि वह भूख, श्रम, और कला के बीच के द्वंद्वात्मक संबंधों का एक निरंतर परिवर्तनशील अर्थ-क्षेत्र है।
रोमन जैकोबसन ने संरचनावाद को कविता की भाषिक संरचना से जोड़ते हुए भाषा के छह प्रकार्यों (functions) का सिद्धांत प्रस्तुत किया। वे कहते हैं—“वाक्-ध्वनियों को समझा, सीमांकित, वर्गीकृत और समझाया नहीं जा सकता, सिवाय उन प्रकार्यों के प्रकाश में जो वे भाषा में कार्य करते हैं।” (Speech sounds cannot be understood, delimited, classified and explained except in the light of the tasks which they perform in language.) जैकोबसन के अनुसार कविता में काव्य-प्रकार्य (poetic function) प्रमुख होता है, जहाँ भाषा स्वयं अपने रूप और संरचना की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। इसीलिए कविता में समानता और विरोध—जैसे रूपक (metaphor) और लक्षणालंकार (metonymy)—विशेष महत्त्व रखते हैं। जानकीवल्लभ शास्त्री की कविता में ‘किसने बाँसुरी बजाई’सरीखा यक्ष प्रश्न, मंगलेश डबराल की कविता में ‘सुनाई देती है / सुनाई नहीं देती’ का दोहराव और स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में ‘बजती रही / बज जाया करती हूँ’ जैसे वाक्यांश जैकोबसन के समानता-सिद्धांत के अंतर्गत काव्यात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। यह भाषिक पुनरावृत्ति अर्थ को स्थिर नहीं करती, बल्कि उसे संरचनात्मक तनाव से भर देती है जिससे कविता का सौंदर्य और गहराता है।
मंगलेश डबराल की बाँसुरी–केन्द्रित कविता आकार में संक्षिप्त होने के बावजूद अर्थ की दृष्टि से अत्यंत सघन और बहुस्तरीय है—
बाहर एक बाँसुरी सुनाई देती है
एक और बाँसुरी है
जो तुम्हारे भीतर बजती है
और सुनाई नहीं देती
एक दिन बहुत वह चुप हो जाती है
तब सुनाई देता है उसका विलाप
उसके छेदों से गिरती है राख़
संरचनावादी दृष्टि से यह कविता मूलतः ‘द्वंद्वात्मक संरचना’ पर आधारित है। सबसे स्पष्ट द्वंद्व ‘बाहर/भीतर’ का है। बाहर की बाँसुरी सुनाई देती है, जबकि भीतर की बाँसुरी बजते हुए भी मौन में डूबी रहती है। यह द्वंद्व केवल भौतिक स्तर का नहीं है, बल्कि चेतना, अनुभूति और सामाजिक अनुभव के स्तर पर भी सक्रिय है।
लेवी-स्ट्रॉस के अनुसार मिथक और सांस्कृतिक पाठ द्वंद्वात्मक विपरीतताओं के ‘मुक़ाबले’ से निर्मित होते हैं। इस कविता में बाहर की बाँसुरी सांस्कृतिक, सार्वजनिक और दृश्य जगत से जुड़ी प्रतीत होती है, जबकि भीतर की बाँसुरी अचेतन, निजी और दमित अनुभव का संकेत बन जाती है। इस प्रकार कविता प्रकृति/संस्कृति तथा दृश्य/अदृश्य जैसे द्वंद्वों को एक साथ सक्रिय करती है। संरचनावाद यह मानता है कि अर्थ किसी एक पद में नहीं, बल्कि पदों के ‘अंतर’ में निर्मित होता है। सॉस्यूर का एक प्रसिद्ध कथन है—“भाषा में बिना सकारात्मक पदों के केवल अंतर होते हैं।”(In language, there are only differences without positive terms.) इस मन्तव्य के आलोक में देखें तो कविता में बाहर और भीतर की बाँसुरी का अर्थ उनकी भिन्नता से उत्पन्न होता है। एक का सुनाई देना दूसरी के न सुनाई देने से अर्थवान बनता है। यहाँ ‘छेद’ एक केंद्रीय संकेत के रूप में उभरता है। संरचनावादी सिद्धांत के अनुसार संकेतक और संकेतित के बीच का संबंध स्वाभाविक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से निर्मित होता है। कविता में ‘छेद’ संकेतक है, जबकि उससे गिरती ‘राख़’ उसका संकेतित। छेद यहाँ केवल भौतिक रिक्ति नहीं, बल्कि क्षय, ह्रास और अंततः विनाश की ओर संकेत करते हैं।
रोलां बार्थ के मिथक-सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो भीतर की बाँसुरी का धीरे-धीरे चुप हो जाना और फिर उसका विलाप में बदल जाना जीवन की एक प्रक्रिया को मृत्यु और राख के बिंब में रूपांतरित करता है। यह वही प्रक्रिया है जिसमें इतिहास और अनुभव प्राकृतिक और अपरिहार्य प्रतीत होने लगते हैं। कविता इस रूपांतरण को बिना किसी व्याख्यात्मक हस्तक्षेप के प्रस्तुत करती है और पाठक को अर्थ-निर्माण की जिम्मेदारी सौंप देती है।स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ कविता आत्मकथात्मक स्वर में रचित है, जहाँ बाँसुरी स्वयं अपनी कथा कहती हुई प्रतीत होती है—
मैं बाँस का एक टुकड़ा थी
तुमने मुझे यातना देकर
बाँसुरी बनाया
मैं तुम्हारे आनन्द के लिए
बजती रही
फिर रख दी जाती रही
घर के अँधेरे कोने में
जब तुम्हें खुश होना होता था
तुम मुझे बजाते थे
मेरे रोम रोम में पिघलती थी
तुम्हारी साँसें
मैं दर्द से भर जाया करती थी
तुमने मुझे बाँस के कोट से
अलग किया
अपने ओठों से लगाया
मैं इस पीड़ा को भूल गयी कि
मेरे अंदर कितने छेद हैं
मैं तुम्हारे अकेलेपन की बाँसुरी हूँ
तुम नहीं बजाते हो तो भी
मैं आदतन बज जाया करती हूँ
संरचनावादी दृष्टि से देखें तो इस कविता में बाँसुरी एक अत्यंत सघन ‘संकेत’ (sign) के रूप में उभरती है। सॉस्यूर के अनुसार संकेतक और संकेतित के बीच का संबंध स्वाभाविक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से निर्मित और मनमाना होता है। इस दृष्टि से बाँसुरी का भौतिक रूप (संकेतक) और उससे जुड़ा पीड़ा-आनंद का अनुभव (संकेतित) किसी प्राकृतिक अनिवार्यता से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है।
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—“मैं बाँस का एक टुकड़ा थी / तुमने मुझे यातना देकर / बाँसुरी बनाया”—स्पष्ट करती हैं कि बाँसुरी का अर्थ प्राकृतिक बाँस से अलग है। यह रूपांतरण एक हिंसक प्रक्रिया के माध्यम से घटित होता है, जो संरचनावादी द्वंद्व ‘प्रकृति/संस्कृति’ को सामने लाता है। बाँस प्राकृतिक है, जबकि बाँसुरी संस्कृति द्वारा गढ़ी गई वस्तु है। लेवी-स्ट्रॉस के अनुसार मिथक ऐसी ही द्वंद्वात्मक विपरीतताओं की मध्यस्थता करते हैं, और इस अर्थ में यह कविता एक आधुनिक मिथक की तरह कार्य करती है।
कविता में दूसरा प्रमुख द्वंद्व ‘पीड़ा/आनंद’ का है। “मैं तुम्हारे आनन्द के लिए / बजती रही” और “मैं दर्द से भर जाया करती थी” जैसी पंक्तियाँ दिखाती हैं कि आनंद का स्रोत स्वयं पीड़ा से अलग नहीं है। यहाँ संगीत सुख का नहीं, बल्कि सहन की गई यातना का परिणाम बन जाता है। संरचनावादी दृष्टि से यह अर्थ विरोधी पदों के संबंध से उत्पन्न होता है, न कि किसी एक भाव से।
रोलां बार्थ के मिथक-सिद्धांत के अनुसार साहित्य इतिहास को प्रकृति में बदल देता है। इस कविता में भी यातना और शोषण धीरे-धीरे ‘आदत’ में बदल जाते हैं—“मैं इस पीड़ा को भूल गयी कि / मेरे अंदर कितने छेद हैं।” पीड़ा का विस्मरण उसे स्वाभाविक बना देता है, और यही वह क्षण है जहाँ इतिहास प्रकृति का रूप धारण कर लेता है।बार्थ के ‘लेखक की मृत्यु’ के सिद्धांत के तहत यदि कविता को रचनाकार की मंशा से अलग रखकर पढ़ा जाए, तो यह पाठ कई कोड्स के माध्यम से अर्थ निर्मित करता है। ‘मैं तुम्हारे अकेलेपन की बाँसुरी हूँ’ में सेमिक कोड सक्रिय है, जहाँ बाँसुरी एकाकीपन और भावनात्मक रिक्तता का संकेत बन जाती है। वहीं ‘मैं आदतन बज जाया करती हूँ’ में हेर्मेन्यूटिक कोड के तहत यह प्रश्न उभरता है कि यह स्वायत्तता मुक्ति है या शोषण का आंतरिकीकरण।
रोमन जैकोबसन के काव्य सिद्धांत के अनुसार कविता में ‘रूपक’ की भूमिका केंद्रीय होती है। यहाँ बाँसुरी मानवीय संबंधों का रूपक है, जहाँ साँसों का ‘पिघलना’ भावनात्मक और शारीरिक निकटता का संकेत देता है। कविता की संरचना तीन खंडों में विभाजित है—रूपांतरण (बाँस से बाँसुरी), उपयोग (बजना और दर्द), और स्वायत्तता (आदतन बजना)। यह विभाजन लेवी-स्ट्रॉस के ‘माइथीम्स’ की तरह कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक खंड मिलकर एक बड़ी सांस्कृतिक संरचना का निर्माण करता है।
इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूपांतरण, पीड़ा और सीमित स्वायत्तता का संकेत बन जाती है। अर्थ यहाँ किसी स्थिर केंद्र से नहीं, बल्कि द्वंद्वात्मक संबंधों से उत्पन्न होता है, जो संरचनावादी आलोचना की मूल मान्यता को पुष्ट करता है।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ कविता संरचनावादी स्थिरता को चुनौती देती प्रतीत होती है। जहाँ संरचनावाद संकेत को एक अपेक्षाकृत स्थिर व्यवस्था में रखता है, वहीं देरिदा का विखंडन सिद्धांत इस स्थिरता को असंभव मानता है। देरिदा के अनुसार अर्थ कभी उपस्थित नहीं होता, वह हमेशा टलता रहता है—इसी को उन्होंने ‘différance’ कहा है। कविता की पंक्ति—‘मैं तुम्हारे अकेलेपन की बाँसुरी हूँ’—इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच का संबंध स्थिर नहीं है। बाँसुरी ‘तुम’ की नहीं, बल्कि ‘अकेलेपन’ की हो जाती है। इस प्रकार स्वामित्व का केंद्र खिसक जाता है। देरिदा के शब्दों में यह ‘विकेंद्रीकरण’(डिसेंटरिंग) की प्रक्रिया है, जहाँ कोई एक निश्चित अर्थ-केंद्र बचा नहीं रहता।
उत्तर-संरचनावाद में मिशेल फ़ूको द्वारा बहुविध विवेचित शक्ति संरचना का पर विचार करने पर विवेच्य रचनाओं में भी अंतत: शक्ति की संरचना उलट गयी-सी प्रतीत होती है। कविता में ‘तुम’ (सर्जक) बाँसुरी को नियंत्रित करता है (‘तुम मुझे बजाते थे’), लेकिन अंत में ‘तुम नहीं बजाते हो तो भी / मैं आदतन बज जाया करता हूँ’। देरिदा के शब्दों में यह ‘अपोरिया’ (aporia) है जो एक ऐसी स्थिति है, जहाँ कोई विचार खुद अपने साथ उलझ जाता है। इस उलझन से ऐसी गाँठ बनती है जो कभी नहीं खुल सकती। यह अवधारणा बताती है कि भाषा और अर्थ का सम्बन्ध कभी पूरी तरह स्थिर या निश्चित नहीं हो सकता। देरिदा का यह मत भर्तृहरि के ‘वाक्यपदीयम्’ के आरंभ में आए सुप्रसिद्ध श्लोक का स्मरण कराता है जिसमें देरिदा से नितांत भिन्न शब्द एवं अर्थ के अभिन्न सम्बन्ध को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है :
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥ (वाक्यपदीयम् १.१)
(अनादि और अनन्त ब्रह्म वह अक्षर शब्दतत्त्व है, जो अर्थ के रूप में विवर्त (प्रकट) होता है और जिससे जगत की सारी प्रक्रिया (सृष्टि आदि) चलती है।)
जाहिर है कि यह श्लोक भर्तृहरि के ‘शब्दाद्वैतवाद’ का आधार है जिसके अनुसार शब्द और अर्थ अलग नहीं, बल्कि एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं; शब्द ही ब्रह्म है जो विभिन्न अर्थों के रूप में विश्व को उत्पन्न करता है।
बहरहाल, विवेच्य कविता में देरिदा के शब्दों में ‘विरोधाभास’ अर्थ की अनिश्चितता दर्शाता है। कविता का प्रथम-पुरुष स्वर लेखक की उपस्थिति को विखंडित करता है। कविता में अर्थ पाठ पर निर्भर है, जैसा देरिदा बल देकर कहते हैं कि पाठ स्वतंत्र होता है। कुल मिलाकर यह कविता विखंडन के माध्यम से अर्थ की मुक्ति का उत्सव मनाती है और बाँसुरी एक अनंत संकेत बन जाती है, जो स्थिर अर्थ से मुक्त है:
ज़ुबाँ पे मुश्क-ए-खुतन, दिल में दाग़-ए-इश्क़ लिए
न जाने क्या-क्या हमारे लफ़्ज़ों में मानी थे।
यदि देरिदा की ‘डिफरांस’(difference) की अवधारणा का सार समझने की कोशिश करें, तो इसका आशय यह है कि किसी रचना में अर्थ ‘अंतर और विलंब’ दोनों के कारणों से उत्पन्न होता है। अर्थ न तो तुरंत मिलता है और न ही पूर्ण होता है। इस संदर्भ में कविता की अंतिम पंक्तियाँ—“तुम नहीं बजाते हो तो भी / मैं आदतन बज जाया करती हूँ”—अर्थ को किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँचने देतीं। यहाँ ‘आदतन’ शब्द अर्थ को स्थिर करने के बजाय उसे और अधिक अनिश्चित बना देता है।यहीं से कविता में ‘उपस्थिति/अनुपस्थिति’ का द्वंद्व उभरता है। ‘तुम’ की अनुपस्थिति में भी बाँसुरी का बजना यह दर्शाता है कि उपस्थिति कभी पूर्ण नहीं होती। अनुपस्थिति हमेशा किसी न किसी रूप में उपस्थित रहती है। यह वही विचार है जिसे देरिदा ‘अवशेष’ (‘trace’) कहते हैं—अर्थ का अवशेष, जो कभी मिटता नहीं।
कविता में छेदों का उल्लेख—“मैं इस पीड़ा को भूल गयी कि / मेरे अंदर कितने छेद हैं”—विखंडन की दृष्टि से अत्यंत अर्थगर्भित है। छेद वस्तुत: कमी के संकेतक हैं, लेकिन यही कमी बाँसुरी को बाँसुरी बनाती है। यह देरिदा के ‘supplement’ की अवधारणा को मूर्त करती है, जहाँ जो चीज़ कमी के रूप में दिखाई देती है, वही अर्थ को संभव बनाती है। छेद बाँसुरी को पूरा भी करते हैं और उसे घायल भी। यहाँ अर्थ किसी एक भाव—पीड़ा या आनंद—में सीमित नहीं रहता। बाँसुरी का बजना आनंद का संकेत भी है और पीड़ा का परिणाम भी। इस प्रकार कविता ‘या-तो/या’ की संरचना को तोड़कर ‘और-भी’ की स्थिति पैदा करती है। उत्तर-संरचनावाद इसी अनिर्णय (‘aporia’) को अर्थ की वास्तविक स्थिति मानता है।
देरिदा की ‘मेटाफिजिक्स ऑफ प्रेज़ेंस’ की आलोचना के आलोक में देखा जाए तो इस कविता में कोई भी अर्थ पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं है। न ‘बजना’ भी स्थायी है और न ‘चुप रहना’ भी निर्णायक। यहाँ तक कि स्वायत्तता भी संदिग्ध है—क्या बाँसुरी सचमुच स्वतंत्र है, या शोषण की आदत को ही स्वतंत्रता मान रही है? यही प्रश्न कविता को विखंडन के लिए खुला छोड़ देता है।इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ कविता उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से अर्थ की अस्थिरता, केंद्रहीनता और अनंत विलंब का उदाहरण बन जाती है। यह कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, बल्कि अर्थ को लगातार टालती हुई पाठक के लिए व्याख्या की खुली संभावना के द्वार खोल देती है।
मंगलेश डबराल की बाँसुरी-केंद्रित कविता का स्वर स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता से भिन्न, अधिक गहन, संयत और आत्मचिंतनपरक है। जहाँ स्वप्निल की बाँसुरी बोलती है, आत्मकथा रचती है और अंततः आदतन बजती रहती है, वहीं मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी का स्वर धीरे-धीरे चुप्पी की ओर अग्रसर होता है। यह चुप्पी कोई साधारण मौन नहीं, बल्कि गहरे अर्थगत संकट का संकेत है।
कविता की पंक्तियाँ हैं —
“बाहर एक बाँसुरी सुनाई देती है
एक और बाँसुरी है
जो तुम्हारे भीतर बजती है
और सुनाई नहीं देती”—
इस कविता के केंद्रीय द्वंद्व को स्पष्ट करती हैं। यहाँ ‘बाहर/भीतर’ का विभाजन केवल स्थानिक नहीं, बल्कि अर्थगत है। संरचनावादी दृष्टि से ‘बाहर’ वह है जो सुनाई देता है, जो उपस्थित है और जिसे महत्व दिया जाता है; जबकि ‘भीतर’ वह है जो मौन है, अनुपस्थित है और हाशिए पर है।देरिदा का विखंडन इस द्वंद्व को स्थिर नहीं रहने देता। वह दिखाता है कि ‘बाहर’ की उपस्थिति वास्तव में ‘भीतर’ की अनुपस्थिति पर निर्भर है। यदि भीतर की बाँसुरी न हो, तो बाहर की बाँसुरी का अर्थ भी अधूरा रह जाता है। इस प्रकार श्रेष्ठ समझा जाने वाला पक्ष अपने ही विपरीत पर आश्रित हो जाता है।यहाँ ‘डिफ़रांस’(difference) की अवधारणा पुनः महत्त्वपूर्ण हो उठती है। ‘सुनाई देना’ अर्थ को स्थिर नहीं करता, बल्कि उसे टालता है। भीतर की बाँसुरी अभी नहीं सुनाई देती, लेकिन उसका अर्थ लगातार बाहर की बाँसुरी को विचलित करता रहता है। अर्थ उपस्थिति में नहीं, बल्कि विलंब में आकार लेता है।
कविता की अगली पंक्तियाँ—“एक दिन बहुत वह चुप हो जाती है/तब सुनाई देता है उसका विलाप”—विखंडन की दृष्टि से अत्यंत निर्णायक हैं। यहाँ चुप्पी स्वयं ध्वनि में बदल जाती है। अनुपस्थिति उपस्थिति बन जाती है। यह वही बिंदु है जहाँ द्वंद्व पूरी तरह उलट जाता है। देरिदा के अनुसार यह ‘trace’ की स्थिति है—जहाँ अर्थ उस चीज़ से पैदा होता है जो अब मौजूद नहीं है।‘विलाप’ किसी स्पष्ट अर्थ की घोषणा नहीं करता, बल्कि अर्थ के टूटने की ध्वनि है। यह न तो पूर्ण उपस्थिति है और न ही साधारण अनुपस्थिति। इसी अनिर्णय में कविता का अर्थ जन्म लेता है। विखंडन इसे अर्थ की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सच्ची स्थिति मानता है।कविता की अंतिम छवि—“उसके छेदों से गिरती है राख़”—जीवन/मृत्यु के द्वंद्व को सामने लाती है। राख़ मृत्यु का संकेत है, लेकिन वह पूर्ण अंत नहीं है। वह किसी जले हुए अस्तित्व का अवशेष है। विखंडन के तहत यह अवशेष भी अर्थ का वाहक बन जाता है। छेद, जो बाँसुरी को संगीत योग्य बनाते हैं, यहाँ विनाश के मार्ग बन जाते हैं। यही पूरक (supplement) का विरोधाभास है—जो पूर्णता देता है, वही टूटन भी लाता है।इस कविता में कोई स्थिर अर्थ नहीं बचता। न बाहर निर्णायक है, न भीतर। न ध्वनि अंतिम है, न चुप्पी। बाँसुरी स्वयं किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचती, बल्कि अर्थ को निरंतर टालती रहती है। यही कारण है कि मंगलेश डबराल की यह कविता विखंडन के माध्यम से अस्तित्व की उदासीपूर्ण अनिश्चितता को उद्घाटित करती है और बाँसुरी को एक ऐसे संकेत में बदल देती है जो कभी स्थिर नहीं होता।
देरिदा के विखंडन सिद्धांत के आलोक में मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी-केंद्रित कविताएँ पहली दृष्टि में समान प्रतीत होती हैं, क्योंकि दोनों में बाँसुरी एक केंद्रीय संकेत के रूप में उपस्थित है। किंतु जैसे-जैसे पाठ आगे बढ़ता है, यह स्पष्ट होता जाता है कि यह समानता केवल सतही है। वास्तव में दोनों कविताएँ बाँसुरी के माध्यम से अर्थ की अस्थिरता को अलग-अलग दिशाओं में ले जाती हैं।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी स्वयं बोलती है, अपने निर्माण, उपयोग और उपेक्षा की कथा कहती है। यह आत्मकथात्मक स्वर कविता को एक जीवित देह प्रदान करता है। इसके विपरीत मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी बोलती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे चुप हो जाती है। यहाँ स्वर की अनुपस्थिति स्वयं अर्थ का स्रोत बन जाती है।
यदि दोनों कविताओं में निहित प्रमुख द्वंद्वों की तुलना की जाए, तो ‘बाहर/भीतर’ और ‘प्रकृति/संस्कृति’ के द्वंद्व विशेष रूप से उभरकर सामने आते हैं। स्वप्निल की कविता में प्रकृति (बाँस) को संस्कृति (बाँसुरी) में रूपांतरित किया जाता है। यह रूपांतरण हिंसा के माध्यम से घटित होता है—“तुमने मुझे यातना देकर बाँसुरी बनाया।” यह वाक्यांश पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि सौंदर्य के पीछे दमन छिपा हुआ है।मंगलेश डबराल की कविता में प्रकृति और संस्कृति का द्वंद्व सीधे प्रकट नहीं होता, बल्कि ‘बाहर’ और ‘भीतर’ के माध्यम से सांकेतिक रूप लेता है। बाहर की बाँसुरी वह है जो समाज में स्वीकार्य है, सुनाई देती है और अर्थ की तरह प्रस्तुत की जाती है। भीतर की बाँसुरी मौन है, दमित है और अर्थ के संकट को जन्म देती है। विखंडन दिखाता है कि बाहर की अर्थवत्ता भीतर की अनुपस्थिति पर टिकी हुई है।
दोनों कविताओं में ‘छेद’ एक साझा प्रतीक है, किंतु उसका अर्थ भिन्न है। स्वप्निल की कविता में छेद पीड़ा का स्मरण हैं, जिन्हें बाँसुरी धीरे-धीरे भूल जाती है। यहाँ भूलना ही जीने की शर्त बन जाता है। इसके विपरीत मंगलेश डबराल की कविता में छेद भूलने योग्य नहीं रहते; उन्हीं से राख गिरती है। यह राख जले हुए अर्थ का अवशेष है—देरिदा के शब्दों में ट्रेस (trace)। देरिदा के ‘डिफरांस’ (difference) की प्रक्रिया दोनों कविताओं में सक्रिय है, किंतु उसका परिणाम अलग-अलग है। स्वप्निल की कविता में अर्थ बाँस से बाँसुरी बनने, बजने और अंततः आदतन बजते रहने की प्रक्रिया में निरंतर टलता रहता है। यह विलंब जीवनोन्मुख है। बाँसुरी का अर्थ कभी अंतिम नहीं होता, बल्कि हर बार नए संदर्भ में पुनः उत्पन्न होता है।मंगलेश डबराल की कविता में अर्थ का विलंब अधिक गहन और उदासीपूर्ण है। यहाँ अर्थ सुनाई न देने से चुप्पी और चुप्पी से विलाप तक पहुँचता है। अंततः यह विलंब राख में बदल जाता है। यह विलंब किसी नई संभावना की ओर नहीं, बल्कि अर्थ के क्षरण की ओर संकेत करता है।इस प्रकार दोनों कविताएँ विखंडन के माध्यम से यह दिखाती हैं कि अर्थ कभी स्थिर नहीं होता, लेकिन उसकी दिशा अलग-अलग हो सकती है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में यह अस्थिरता प्रक्रिया, जीवंतता और सीमित मुक्ति का संकेत देती है, जबकि मंगलेश डबराल की कविता में वही अस्थिरता शून्यता, विलाप और विनाश की ओर अग्रसर होती है। बाँसुरी दोनों में अर्थ की अनिश्चितता का प्रतीक है, किंतु उसका स्वर अलग-अलग संसारों की ओर ले जाता है।
स्त्रीवादी चिन्तकों द्वारा बहुविध विवेचित विभिन्न अवधारणाओं के आलोक में अगर स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता ‘बाँसुरी’ को पढ़ा जाय, तो बाँसुरी केवल एक वाद्य न रहकर स्त्री-देह और स्त्री-अनुभव का रूपक बन जाती है। कविता की शुरुआत ही इस निर्माण-प्रक्रिया को रेखांकित करती है—बाँस का प्राकृतिक रूप यातना के माध्यम से सांस्कृतिक वस्तु में बदल दिया जाता है। यह प्रक्रिया बोउवार की उस अवधारणा की काव्यात्मक पुनर्रचना है, जिसमें स्त्री को सामाजिक संरचनाओं द्वारा ‘गढ़ा’ जाता है।कविता में ‘तुम’ का संबोधन पुरुष-सत्ता का प्रतिनिधि बनकर उभरता है। ‘मैं तुम्हारे आनन्द के लिए बजता रहा’ जैसी पंक्तियाँ स्त्री के वस्तुकरण और उसके श्रम व देह के उपभोग की ओर संकेत करती हैं। यहाँ आनंद पुरुष का है, जबकि पीड़ा स्त्री की। पुरुष की साँसों का बाँसुरी के भीतर तक उतरना उस अंतरंग हिंसा का रूपक बन जाता है, जो पितृसत्ता के भीतर सामान्यीकृत है।
वर्जीनिया वुल्फ द्वारा रेखांकित स्त्री-अनुभव की चुप्पी और बाधाएँ इस कविता में छेदों के रूपक से जुड़ती हैं। बाँसुरी के भीतर बने छेद केवल संगीत के माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे उन घावों की स्मृति हैं, जिन्हें स्त्री धीरे-धीरे भूलना सीख लेती है। ‘मैं इस पीड़ा को भूल गया कि मेरे अंदर कितने छेद हैं’—यह भूलना स्त्री की जीवित रहने की रणनीति बन जाता है।
जूडिथ बटलर की ‘जेंडर परफॉर्मेटिविटी’ की अवधारणा के अनुसार, पहचान बार-बार दोहराए गए व्यवहारों से बनती है। इस दृष्टि से बाँसुरी का ‘बजना’ एक परफॉर्मेटिव भूमिका है, जिसे वह निरंतर निभाती है। किंतु कविता के अंतिम हिस्से में बाँसुरी का यह कथन कि वह ‘आदतन’ बजती है, दोहरे अर्थ खोलता है—यह आदत पराधीनता का भी संकेत है और धीरे-धीरे उभरती स्वायत्तता का भी।
इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उसमें सीमित प्रतिरोध और आंशिक मुक्ति की संभावना भी रचती है। बाँसुरी पूरी तरह मुक्त नहीं होती, किंतु वह पूरी तरह नियंत्रित भी नहीं रह जाती। यही द्वंद्व इसे स्त्रीवादी दृष्टि से एक जटिल और विचारोत्तेजक पाठ बनाता है।
मंगलेश डबराल की बाँसुरी–केंद्रित कविता को यदि स्त्रीवादी दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता से भिन्न किंतु पूरक अर्थ-क्षेत्र निर्मित करती है। यहाँ बाँसुरी स्वयं बोलती नहीं, बल्कि उसकी चुप्पी, उसका मौन और अंततः उसका विलाप स्त्री-अनुभव की दबी हुई आवाज़ का रूपक बन जाते हैं। यह वह स्थिति है जिसे स्त्रीवादी आलोचना में ‘साइलेंस्ड सब्जेक्ट’ (silenced subject) कहा जाता है—अर्थात वह स्त्री जो बोल नहीं सकती, पर जिसका मौन भी अर्थ से भरा होता है। प्रकारांतर से उन स्त्रियों को ‘दमित विषय’ कहा गया है जिनकी आवाज़, अनुभव और अस्तित्व को पितृसत्तात्मक समाज, भाषा और साहित्य में दबा दिया गया है या अनदेखा किया गया है, और वर्जिनिया वूल्फ सरीखी स्त्रीवादियों की आलोचना इन दमित आवाज़ों को मुखर करने, उनकी चुप्पी के कारणों का विश्लेषण करने और चुप्पी को सशक्तीकरण या प्रतिरोध के रूप में बदल देने का प्रयास करती है।मंगलेश की कविता में बाहर और भीतर की बाँसुरी का विभाजन सार्वजनिक और निजी स्त्री-अनुभव की द्वंद्वात्मक संरचना को संकेतित करता है। बाहर की बाँसुरी वह है जो सुनाई देती है—जो समाज को स्वीकार्य है, जो संस्कृति द्वारा मान्य है। इसके विपरीत भीतर की बाँसुरी वह है जो बजती तो है, लेकिन सुनाई नहीं देती। यह स्त्री के उस आंतरिक जीवन का रूपक है, जिसे सामाजिक संरचनाओं में दबा दिया जाता है। दूसरे शब्दों में, स्त्रीवादी आलोचना में ‘साइलेंस्ड सब्जेक्ट’ का अर्थ उस स्थिति से है जहाँ पितृसत्तात्मक समाज और साहित्य में स्त्रियों को बोलने या अपनी पहचान व्यक्त करने के अधिकार से वंचित रखा जाता है। यह केवल चुप रहने की स्थिति नहीं है, बल्कि एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत स्त्री की आवाज़, उसके अनुभवों और उसकी इच्छाओं को जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर स्त्री को हमेशा दूसरे के संदर्भ में देखा गया है। उसे पिता की पुत्री, पति की पत्नी या बच्चों की माँ के रूप में पहचाना जाता रहा है, लेकिन उसकी अपनी स्वतंत्र चेतना को कभी केंद्र में नहीं रखा गया। जब कोई व्यक्ति अपनी बात स्वयं न कहकर दूसरों की परिभाषाओं के भीतर रहने को मजबूर होता है, तो वह एक साइलेंस्ड सब्जेक्ट बन जाता है। साहित्यिक इतिहास में भी स्त्रियों के लेखन और उनकी अनुभूतियों को लंबे समय तक महत्वहीन माना गया। कई बार स्त्रियों ने छद्म नामों से लिखा या उनकी रचनाओं को घरेलू कहकर मुख्यधारा से बाहर रखा गया। बार्थ के कोड्स के नजरिए से देखें तो यह इतिहास का वह हर्मेन्युटिक अंतराल है जहाँ स्त्री की उपस्थिति तो है, लेकिन उसका स्वर गायब है। साइलेंस्ड सब्जेक्ट होने का अर्थ यह भी है कि स्त्री के अनुभवों को पुरुषों द्वारा परिभाषित किया गया। पुरुष रचनाकारों ने अपनी दृष्टि से स्त्रियों के चरित्र गढ़े, जिससे स्त्री का वास्तविक पक्ष दब गया। स्त्रीवादी आलोचना इसी चुप्पी को तोड़ने का प्रयास करती है और स्त्री को स्वयं अपनी कहानी कहने वाले सक्रिय कर्ता के रूप में स्थापित करती है।बार्थ के ‘सिम्बोलिक कोड’ के अनुसार यहाँ उपस्थिति और अनुपस्थिति का द्वंद्व काम करता है। समाज में स्त्री शारीरिक रूप से उपस्थित है, लेकिन विमर्श और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में वह अनुपस्थित या मौन है। इस चुप्पी को तोड़ना ही स्त्रीवादी विमर्श का मुख्य लक्ष्य है।
गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का प्रसिद्ध निबन्ध की शक्ल में प्रश्न—“क्या सबऑल्टर्न बोल सकते हैं?”(Can subaltern speak?)—इस कविता के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठता है। भीतर की बाँसुरी बजती है, पर उसकी ध्वनि बाहर नहीं पहुँचती। यह बोलने की असमर्थता नहीं, बल्कि सुन लिए जाने की असंभवता है। सत्ता की संरचनाएँ उसकी आवाज़ को बाहर आने से पहले ही निष्प्रभावी कर देती हैं।कविता में आगे जब भीतर की बाँसुरी ‘बहुत चुप’ हो जाती है और तब उसका विलाप सुनाई देता है, तो यह चुप्पी से चीख़ में बदलने का क्षण है। स्त्रीवादी विमर्श में यह वह बिंदु है जहाँ सहनशीलता टूटती है और मौन प्रतिरोध में परिवर्तित हो जाता है। ‘छेदों से गिरती है राख़’—यह पंक्ति स्त्री देह पर पड़े उन घावों की स्मृति बन जाती है, जिनका कोई उत्सव नहीं, केवल अवशेष बचता है।यहाँ राख़ केवल मृत्यु या अंत का संकेत नहीं है, बल्कि उस इतिहास का अवशेष है, जिसे बार-बार जलाया गया। यह स्त्री-अनुभव की वह परत है जो बोल नहीं सकती, पर मिट भी नहीं सकती। इस अर्थ में मंगलेश डबराल की बाँसुरी स्त्रीवादी पाठ में एक ऐसी संरचना बन जाती है, जहाँ आवाज़ नहीं, उसका अभाव केंद्रीय है।यदि स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी सीमित स्वायत्तता की ओर बढ़ती दिखाई देती है, तो मंगलेश डबराल की बाँसुरी उस ऐतिहासिक मौन का प्रतीक बन जाती है, जिसमें स्त्री की पीड़ा केवल संकेतों और अवशेषों के रूप में दर्ज होती है। यह मौन स्वयं में एक राजनीतिक वक्तव्य है। अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता स्त्रीवादी आलोचना के साइलेंस्ड सब्जेक्ट की अवधारणा को बहुत ही मार्मिक और सशक्त ढंग से अभिव्यक्त करती है:
मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ !
... और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।
यहाँ स्त्री स्वयं को एक जड़ वस्तु यानी दरवाज़ा कह रही है, जो उसकी चुप्पी और वस्तुकरण का चरम है।इस कविता के माध्यम से साइलेंस्ड सब्जेक्ट को जिन बिंदुओं के अंर्तगत समझा जा सकता है उनमें पहला है वस्तुकरण और सहनशीलता।
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—मैं एक दरवाज़ा थी, मुझे जितना पीटा गया, मैं उतना ही खुलती गई—स्त्री की उस स्थिति को दिखाती हैं जहाँ उसकी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है। दरवाज़ा खुद नहीं खुलता, उसे पीटा जाता है तब वह खुलता है। यह उस चुप्पी की ओर इशारा है जहाँ स्त्री का अस्तित्व केवल दूसरों की चोटों या मांगों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित कर दिया गया है। यहाँ वह एक कर्ता नहीं, बल्कि एक माध्यम मात्र है।
दूसरा बिंदु है अदृश्य श्रम का चक्र। दरवाजे के भीतर जो वृहत्चक्र चल रहा है—चक्की, चरखा, कैंची-सुई—वह उस घरेलू श्रम का प्रतीक है जिसे इतिहास और समाज कभी दर्ज नहीं करता। साइलेंस्ड सब्जेक्ट का एक बड़ा अर्थ यह भी है कि स्त्री का श्रम तो दिखाई देता है, लेकिन उस श्रम को करने वाली स्त्री की अपनी पहचान और उसकी थकान अदृश्य रहती है। यह अनवरत चलने वाला चक्र उसकी खामोशी की कीमत पर टिका है।
तीसरा बिंदु है सृष्टि के बिखरे क़तरे और स्मृति। कविता के अंत में झाड़ू लगाने और टूटे-बिखरे कतरों को मन की दुछत्ती पर जमा करने की बात उस मानसिक बोझ को दर्शाती है जिसे स्त्री अकेले ढोती है। वह दुनिया भर की गंदगी और बिखराव को समेटती है, लेकिन अपनी पीड़ा के बारे में मौन रहती है। यह मन की दुछत्ती वह कोना है जहाँ एक साइलेंस्ड सब्जेक्ट अपनी उन स्मृतियों और इच्छाओं को छिपाकर रखता है जिन्हें बाहर व्यक्त करने की अनुमति उसे पितृसत्तात्मक समाज नहीं देता।चौथा बिंदु है चुप्पी से अभिव्यक्ति की ओर प्रयाण । हालाँकि यह कविता एक साइलेंस्ड सब्जेक्ट की व्यथा से शुरू होती है, लेकिन कविता का लिखा जाना ही उस चुप्पी का टूटना है। अनामिका ने स्वयं को दरवाज़ा कहकर उस चुप्पी को एक स्वर दिया है। बार्थ के सिम्बोलिक कोड के अनुसार यहाँ दरवाज़ा केवल लकड़ी का ढांचा नहीं है, बल्कि वह घर और बाहर, दृश्य और अदृश्य के बीच की उस सीमा का प्रतीक है जहाँ स्त्री खड़ी है।
कुल मिलाकर यह कविता बताती है कि एक साइलेंस्ड सब्जेक्ट के भीतर संवेदनाओं और कर्म का कितना विशाल ब्रह्मांड छिपा होता है, जिसे दुनिया केवल एक खामोश वस्तु समझती है।
बहरहाल, मूल विषय पर लौटें । संरचनावाद साहित्यिक पाठ में अर्थ की अंतर्निहित संरचना को पहचानने का एक सशक्त उपकरण प्रदान करता है। वह यह स्पष्ट करता है कि कविता या साहित्यिक कृति किसी एक भाव, अनुभव या कथ्य का प्रत्यक्ष कथन नहीं होती, बल्कि संकेतों, द्वंद्वों और संबंधों का एक सुव्यवस्थित तंत्र होती है। मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी–केंद्रित कविताओं में ‘बाहर/भीतर’, ‘पीड़ा/आनंद’, ‘प्रकृति/संस्कृति’ और ‘सुनाई देना/न सुनाई देना’ जैसे द्वंद्व इस संरचनात्मक व्यवस्था को स्पष्ट करते हैं।
किन्तु जहाँ संरचनावाद इन द्वंद्वों को अपेक्षाकृत स्थिर मानकर अर्थ की रचना करता है, वहीं उत्तर-संरचनावाद इन्हीं द्वंद्वों को अस्थिर करके उनके भीतर छिपे सत्ता-संबंधों और मौन को उजागर करता है। देरिदा के विखंडन के आलोक में बाँसुरी का अर्थ किसी एक केंद्र पर टिकता नहीं, बल्कि लगातार खिसकता रहता है—कभी नाद की ओर, कभी चुप्पी की ओर, और कभी राख़ के अवशेष की ओर।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से ‘भीतर की बाँसुरी’ कोई स्थिर प्रतीक नहीं रह जाती, बल्कि वह ऐसा संकेत बन जाती है जो अपनी ही उपस्थिति को टालता रहता है। उसकी चुप्पी केवल मौन नहीं, बल्कि अर्थ के स्थगन की स्थिति है। यह वही प्रक्रिया है जिसे देरिदा ‘अंतर और विलंब’ के रूप में समझाते हैं—जहाँ अर्थ बनते-बनते कभी पूरा नहीं होता।
स्त्रीवादी आलोचना इस विमर्श में देह और अनुभव को जोड़ती है। बाँसुरी यहाँ केवल एक सौंदर्यात्मक या दार्शनिक प्रतीक नहीं रह जाती, बल्कि स्त्री-देह, स्त्री-अनुभव और पितृसत्तात्मक सत्ता द्वारा नियंत्रित आवाज़ का रूपक बन जाती है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी यातना के बावजूद बजती रहती है—यह सीमित प्रतिरोध और आंशिक स्वायत्तता का संकेत है। इसके विपरीत मंगलेश डबराल की कविता में भीतर की बाँसुरी का चुप हो जाना उस स्थिति को दर्शाता है, जहाँ दमन इतना गहरा हो जाता है कि प्रतिरोध की संभावना भी राख़ में बदल जाती है।
सच तो यह है कि संरचनावाद अर्थ की संरचना को समझने का आधार देता है, उत्तर-संरचनावाद उसकी अस्थिरता और विखंडन को उजागर करता है, स्त्रीवाद उसे देह और अनुभव से जोड़ता है, और उत्तर-उपनिवेशवाद उसे इतिहास, सत्ता और शोषण के व्यापक संदर्भ में स्थापित करता है। मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी–केंद्रित कविताएँ इन सभी दृष्टियों के संगम पर खड़ी होकर अर्थ की बहुअर्थी यात्रा को उद्घाटित करती हैं।
जूलिया क्रिस्टेवा की अंतर्पाठीयता वाली अवधारणा बताती है कि कोई भी पाठ अपने आप में स्वत: उद्भूत और सम्पूर्ण होने के बजाय पूर्ववर्ती पाठों की ‘बुनाई’ (interweaving) की प्रक्रिया से गुज़रकर निर्मित होता है। इस सिद्धांत के आलोक में बाँसुरी पर रचित ये कविताएँ कहीं न कहीं राधा के प्रेम के प्रतीक कृष्ण की बाँसुरी को लेकर लिखित अनेक भारतीय सांस्कृतिक पाठों से सम्बद्ध हैं। उदाहरण के लिए महर्षि व्यास कृत माने जाने वाले ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ के ‘वेणु-गीत’ (दशम स्कंध, अध्याय 21, श्लोक 5) का एक सुप्रसिद्ध छंद देखा जा सकता है:
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम् ।
विभ्रदवासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् ।।
रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै: ।
वृन्दारण्य स्वपद रमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः ॥
(जिनके सिर पर मोरपंख का मुकुट शोभायमान है, जिनका शरीर नटों में श्रेष्ठ (अत्यन्त सुन्दर एवं लीलामय) है, जिनके ‘दोनों कानों में कर्णिकार पुष्प’ सुशोभित हैं, जो ‘सोने जैसे पीले वस्त्र’ धारण किए हुए हैं तथा ‘वैजयन्ती माला’ पहने हुए हैं, वे श्रीकृष्ण अपने ‘ओठों की अमृतमयी मधुरता से बांसुरी के छिद्रों को भरते हुए’, गोपों के समूह के साथ ‘अपने चरणचिह्नों से सुन्दर बने हुए वृन्दावन’ में प्रवेश कर रहे हैं, जहाँ उनकी ‘कीर्ति (यश) का गान किया जा रहा है’।)
कहना न होगा कि भागवतकार महर्षि व्यास के ‘वेणु गीत’ का यह श्लोक वेणुनाद का जैसा उदात्त एवं रमणीय वर्णन करता है उसे जानकीवल्लभ शास्त्री, मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में ढूँढना साहित्येतिहास एवं सांस्कृतिक इतिहास-चक्र को उल्टी दिशा में घुमाने की नाकामयाब कोशिश की तरह बेमानी है। वजह यह कि जानकीवल्लभ जी उत्तर-छायावाद के कवि हैं और बाकी दोनों सत्यातीत (पोस्ट ट्रुथ) समय के रचनाकार हैं। बावजूद इसके ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै:’ से जोड़कर इन तीनों कवियों की कविता का पाठ-विश्लेषण दिलचस्प होगा।
संरचनावादी दृष्टि से देखें तो ‘भागवत’ के वेणु-गीत का ‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं’ एक सुगठित श्लोक है जो एक सुव्यवस्थित अर्थ-तंत्र निर्मित करता है। कृष्ण, वंशी, वृन्दावन, गोपवृंद और नाद—ये सभी संकेत एक स्थिर संरचना में परस्पर संबद्ध हैं। वंशी का अर्थ कृष्ण से बाहर स्वतंत्र नहीं है; वह उनके अधरों के स्पर्श और वेणु-रंध्र में उनके साँस के प्रवाह के कारण निकलने वाले सुर के माध्यम से ही अर्थ पाती है। संरचना का केंद्र स्पष्ट है—ईश्वरीय सौंदर्य—और सभी उपतत्त्व उसी केंद्र को पुष्ट करते हैं। यहाँ संकेतक और संकेतित के बीच संबंध स्थिर है; वंशी का कार्य केवल रस-संचार करना है, न कि अर्थ को विचलित करना।
याद रहे कि हिन्दी कविता में भी ‘बाँसुरी’ अनेक रूपों में स्वरित होती रही है। धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ के अलावा उनकी ‘चुंबन’ कविता में आयी ‘बाँसुरी रखी हुई ज्यों भागवत के पृष्ठ पर!’ पंक्ति के साथ ही गोपाल सिंह ‘नेपाली’ के बेहद लोकप्रिय गीत में ‘मुरलिया’ के स्वर को झुठलाती ‘मृगनयनी’ तथा ‘पिकबयनी’ के स्वर वाले पाठ परवर्ती कवियों की रचनाओं में अंतर्पाठीयता के रूप में पहचाने जा सकते हैं। किन्तु, बाँसुरी की तान के माधुर्य को लेकर जानकीवल्लभ शास्त्री का गीत लाजवाब है:
जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
किसने बाँसुरी बजाई
अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई !
किसने बाँसुरी बजाई
जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग
कूक सुना सोए-सोए हिय मे हूक जगाई !
किसने बाँसुरी बजाई
मसक-मसक रहता मर्मस्थल मरमर करते प्राण
कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई !
किसने बाँसुरी बजाई
उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्याला
निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्काई !
किसने बाँसुरी बजाई
उत्तर-छायावाद के प्रमुख कवियों में एक आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का गीत ‘किसने बाँसुरी बजाई’ गीत हिंदी गीतकाव्य और संगीत के पारस्परिक सम्बन्ध की एक सजीव प्रस्तुति है। यह गीत केवल शब्दों का संचयन नहीं है, बल्कि सुर, ताल, लय और स्वरलहरी से आपूरित अनुभूति का ऐसा संगीतात्मक ताना-बाना पेश करता है जो पाठक या श्रोता के भीतर एक गहन शास्त्रीय और अनुभवात्मक यात्रा उत्पन्न करता है। गीत की शुरुआत ही बार-बार पूछे गए प्रश्न ‘किसने बाँसुरी बजाई’ से होती है, और यह प्रश्न कविता के सृजनात्मक संगीत को निरंतरता प्रदान करता है। इस प्रश्न को संगीतशास्त्रीय दृष्टि से देखने पर प्रतीत होता है कि बाँसुरी केवल एक वाद्ययंत्र नहीं है, बल्कि यह राग और भाव की ध्वनि है जो भावक के मन, हृदय और चेतना में सत्वोद्रेक उत्पन्न करती है।
संगीत में जिस प्रकार कोई एक स्वरलिपि (notation) किसी राग के भाव को उद्घाटित करती है, उसी प्रकार इस गीत में शब्दों का चयन और ध्वनि-प्रवाह रागीय अनुकरण की तरह कार्य करता है। ‘जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई’ जैसे शब्दों में तान की कान्ति स्पष्ट रूप से व्याप्त है। तान संगीत का वह स्वरक्रम है जिसे कलाकार एक निरंतर उत्थान और पतन के माध्यम से प्रस्तुत करता है और वह श्रुतिमय रूप से भाव को निर्मित करता है। इसी तरह कविता की ध्वनि-आकृति श्रोता और पाठक के मन में एक ‘तान’ की तरह गूंजती है, जो केवल शब्दों की लय नहीं बल्कि स्वरात्मक कल्पना का सृजन करती है।
गीत की अगली पंक्तियाँ ‘अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई’ में शास्त्रीय संगीत के राग-दर्शन की तरह ही प्रकृति का ऐक्य दिखाई देता है। संगीतशास्त्र में राग का संबोधन केवल तरानों और स्वरक्रमों तक सीमित नहीं रहता, वह तो एक व्यापक ध्वनि-आभा का अनुभव है जो समय, ऋतु, भावना और प्राकृतिक परिवेश को समाहित करता है। इसी प्रकार कदंब का फूला होना, झकोरे का झूलना और यमुना की लहरों की तरंग, यह सभी भाव संगीत की लय और माधुर्य की अनुभूति को रेखांकित करते हैं। यहाँ पर ध्वनि और दृश्य दोनों का समन्वय उस प्रकार होता है जैसे भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग को किसी ऋतु, काल या अवस्था के साथ जोड़ा जाता है। यह गीत अपने शब्दों से स्वर, ताल और ध्वनि के एक ऐसे संगीतात्मक अनुभव का सृजन करता है जो कदंब की खुशबू और यमुना की तरंगों की झनकार की तरह पाठक के मन में प्रतिध्वनित होता है।
जब हम ‘जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग’ जैसे शब्दों को संगीतशास्त्रीय दृष्टि से देखते हैं, तो हमें यह समझ आता है कि यहाँ पर ताल की जटिलता और गति में रचनात्मक तनाव है। संगीत में जिस प्रकार ताल का परिवर्तन भाव को प्रभावित करता है, उसी तरह यह पंक्ति शब्दों के अनुरूप ध्वनि की उत्तेजना उत्पन्न करती है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक ताल का अचानक विराम या विराम के बाद एक नई प्रवाहशीलता श्रोताओं में एक प्रत्याशा उत्पन्न करती है, वैसे ही ‘कूक सुना सोए-सोए हिय में हूक जगाई’ पाठक के भीतर कंपन उत्पन्न करता है। यहाँ पर ‘कूक’ और ‘हूक’ शब्दों में स्पष्ट ‘गमक’ की अनुभूति होती है जो संगीतशास्त्रीय दृष्टि से राग के संक्रमणीय स्वर की तरह कार्य करती हुई एक भावना से दूसरी भावना की ओर जाती है। दूसरे शब्दों में कवि एक शास्त्रीय संगीतज्ञ की तरह शब्दों के माध्यम से स्वर की लयबद्धता और भावनात्मक उभार को निर्मित करता है।
गीत की अगली पंक्तियाँ ‘मसक-मसक रहता मर्मस्थल मरमर करते प्राण, कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई’ संगीत की जटिलता और कोमलता के प्रतिच्छेदन को उद्घाटित करती हैं। भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागिनी वह स्वर-रचना होती है जो विशिष्ट राग की संरचना के भीतर भाव को स्थापित करती है। कठिन रागिनी को कोमल सुरों के संयोग में प्रस्तुत करना संगीत का एक परिष्कृत तत्त्व है और जब शास्त्री कहते हैं कि कितनी कठिन रागिनी को कोमल सुर में गाया गया, तो यह न केवल उनकी संगीतशास्त्रीय गहरी समझ को मुखर करती है, बल्कि सहज और कोमल भावनाओं का प्रवाह भी प्रस्तुत करती है। यह वही स्थिति है जहाँ एक कलाकार भारी राग के अंतर्मुखी भाव को कोमल और सुगम स्वर में व्यक्त करता है, जिससे श्रोताओं में एक अद्भुत भावात्मक जुड़ाव उत्पन्न होता है। कविता में ‘मर्मस्थल’ शब्द का प्रयोग इस भावात्मक गहराई की ओर इंगित करता है।
जब हम ‘उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्याला’ जैसी पंक्ति का संगीतशास्त्रीय अर्थ निकालते हैं, तो यह प्रतीकात्मकता की ओर संकेत करती है, जहाँ विष और उसे पीने की क्रिया एक संगीतात्मक तनाव निर्मित करती है। संगीतशास्त्र में भी कई राग ऐसे होते हैं जिनके आरोह-अवरोह में विरोधाभासी ध्रुवीयताएँ होती हैं और वे विरोधाभास ही संगीत को गहरा बनाते हैं। विष का प्याला संगीत की तीव्रता और पीड़ा की तरह है, जिसका प्रभाव श्रोता के भीतर एक अनिवार्य प्रतिबिंब उत्पन्न करता है। इसके बाद ‘निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्काई’ शारीरिक और भावनात्मक विरोधाभास को उजागर करता है, जैसे संगीत की धुन में विराम के बाद एक हल्की मुस्कान की तरह कोमल स्वर आना। यह वही स्थिति है जहाँ संगीत की धीमी और मधुर धारा अचानक एक भावात्मक मोड़ ले लेती है और श्रोता के अंतर्मन में एक नई अनुभूति घटित होनी आरंभ होती है।
इस गीत की लय का संगीतशास्त्रीय विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि शास्त्री जी ने भाषा के भीतर ही ताल और मात्रा का गहन प्रयोग किया है। शब्दों की लय, विराम, संगत उच्चारण और अधूरापन; इन सबका सम्मिलित प्रभाव एक संगीतात्मक तालबद्धता उत्पन्न करता है जिसे कोई भी पाठक अपने मस्तिष्क में एक रूपक संगीत की तरह अनुभव कर सकता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक शास्त्रीय नृत्य में ताल और लय का संयोजन भाव और गति के बीच संतुलन उत्पन्न करता है। यह गीत भी इसी तरह ताल, मात्रा और ध्वनि के संयोजन से एक भावनात्मक रचना प्रस्तुत करता है, जो शब्दों के भीतर ही संगीत के स्वरूप, रूपांतरण और प्रत्यास्थता को उजागर करती है। स्मरणीय है कि संगीतशास्त्र में ‘प्रत्यास्थता’ वह ‘लचीलापन’ है जो गायन या वादन के दौरान कंठस्वर संयोजन या वाद्य यंत्रों को ध्वनि उत्पन्न करने और उसे बनाए रखने में मदद करती है, जिससे संगीत में वह 'जान' आती है जो श्रोताओं को महसूस होती है।इस गीत के हर अंश में संगीत की परतें एक विशिष्ट प्रकार से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। ‘अंग-अंग फूले कदंब’ जैसी पंक्तियाँ ध्वनि की विस्तारशीलता की ओर इंगित करती हैं, जैसे संगीत में स्वर विस्तार के लिए स्थान, समय और ताल का संतुलन आवश्यक है। इसी प्रकार ‘साँस झकोरे झूले’ पाठक को एक लयात्मक आंदोलकता का अनुभव देता है, जैसे किसी राग की गति अपने आस-पास के परिवेश को ही नियंत्रित कर ले। ‘सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई’ जैसी पंक्तियाँ संगीत के माध्यम से भावात्मक तरंगों की तरह काम करती हैं और ताल के भीतर तरंगों का स्वरूप जैसी यमुना की तरंगों की लहर की छवि पाठक की ध्वनि कल्पना में एक तरल-ताल की अनुभूति उत्पन्न करती है।
गीत में ‘थर-थर काँप लगे रुकने पग’ जैसी पंक्तियाँ गति और विराम के बीच के उस स्थान को उद्घाटित करती हैं जहाँ संगीत की व्यापक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ठीक उसी प्रकार होता है जब कोई कलाकार संगीत की धारा को अचानक विराम देता है और फिर नए स्वर में विस्तार करता है। ऐसे विराम और पुनरारंभ एक तरह का मनोवैज्ञानिक छुटकारा उत्पन्न करते हैं, जो श्रोता को एक नई संवेदना की ओर ले जाते हैं। ‘कूक सुना सोए-सोए हिय में हूक जगाई’ जैसे शब्द संगीत में खामोशी और ध्वनि के बीच की दूरी को दर्शाते हैं, जहाँ खामोशी भी एक स्वरूप ध्वनि की तरह उभरती है और फिर अचानक ‘हूक’ की तरह एक संगीतमय प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है।
गीत की अगली पंक्तियाँ ‘मसक-मसक रहता मर्मस्थल मरमर करते प्राण’ शारीरिक और संगीतात्मक भाव के बीच गहन संबंध बनाती हैं, जैसे किसी गहन राग की आवृत्ति अंतर्मन की अनुभूतियों को सीधे प्रभावित करती है। शास्त्रीय संगीत में राग की ध्वनि को श्रोता के अंतःकरण से जोड़ा जाता है, और यहाँ भी ‘मर्मस्थल’ शब्द इसी गहनता की ओर इंगित करता है, जहाँ ध्वनि और भावना की एकता होती है। ‘कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई’ यह प्रश्न संगीत के तकनीकी और भावात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखता है। किसी कठिन रागिनी को कोमल सुर में प्रस्तुत करना उसी तरह की कलात्मक पराकाष्ठा है जैसा किसी शास्त्रीय संगीतकार द्वारा कठिन राग को सहज, सुगम और भावनात्मक रूप में पिरो देना।
जब हम ‘उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्याला’ जैसी पंक्ति को ध्यान से पढ़ते हैं, तो यह प्रतीत होता है कि यह रचना में एक तनाव-बिंदु की तरह कार्य करता है, जहाँ संगीतात्मक अनुभव अपने चरम पर पहुँचता है। संगीतशास्त्र में भी ऐसे क्षण होते हैं जब ध्वनि की तीव्रता भाव को चरम पर ले जाती है और यह श्रोता को भीतर तक महसूस होती है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे विष का प्याला, जो सांकेतिक रूप से तीव्रता और पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है, एक संगीतात्मक शिखर की अनुभूति प्रदान करता है। इसके बाद ‘निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्काई’ एक प्रकार का भाव परिवर्तन उत्पन्न करता है, जहाँ तीव्रता के बाद सहजता और सुकून की अनुभूति होती है। यह ऐसा ही है जैसे किसी रागीय प्रस्तुति में तीव्र आलाप के बाद एक शांत, मधुर और कोमल भाव की धारा प्रवाहित होती है और बाँसुरी का स्वर, राग और लय सभी मिलकर श्रोता के भीतर आंतरिक संगीतमय यात्रा का निर्माण करते हैं।
गीत की अंतिम पंक्तियों में यह स्पष्ट होता है कि शास्त्री जी ने ध्वनि, स्वर, ताल, गति और विराम का समन्वय इतने परिष्कृत रूप से किया है कि यह गीत एक संगीतमय प्रस्तुति की तरह पाठक या श्रोता के भीतर प्रतिध्वनित होता है। यह केवल शब्दों का समुच्चय नहीं है, बल्कि यह भाषा के भीतर ही एक संगीतमय संरचना और रागीय अनुभूति उत्पन्न करता है। इस प्रकार यह गीत संगीतशास्त्रीय दृष्टि से उसी प्रकार विश्लेषणीय और अनुभूतिपरक है जैसे एक विस्तृत राग का प्रस्तुतीकरण। गीत का हर शब्द, हर विराम, हर ध्वनि का चयन, ताल की व्यवस्था और भावनात्मक उत्थान-पतन ऐसा लगता है जैसे कोई राग स्वयं कविता बनकर उभर रहा है और पाठक के भीतर एक विस्तृत संगीतात्मक यात्रा का निर्माण कर रहा है।
गीत की समग्र संरचना और उसकी ध्वनि संरचना हमें यह समझने में मदद देती है कि यह रचना केवल एक भावनात्मक या दार्शनिक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह ध्वनि, ताल, स्वर और भावना का उत्कृष्ट संगीतात्मक अनुभव है। पाठक के भीतर स्वर की कल्पना, ताल की अनुभूति, विराम और गति की सकारात्मक ऊर्जा; सब मिलकर एक विस्तृत संगीतशास्त्रीय अनुभव का निर्माण करते हैं। इस प्रकार जानकीवल्लभ शास्त्री का यह गीत भाषा और संगीत के बीच की दूरी को समाप्त करता है और एक ऐसी संगीतात्मक दुनिया प्रस्तुत करता है जहाँ शब्द, ध्वनि, ताल और भावना का समन्वय एक नया अर्थ, एक नया संगीत और एक नया अनुभव बनकर सामने आता है। इस गीत को पढ़ते या सुनते समय पाठक स्वयं एक संगीतमय यात्रा का अनुभव करता है, मानो वह किसी राग की प्रस्तुति को आत्मसात कर रहा हो और इस प्रकार यह गीत अपने आप में एक उत्कृष्ट संगीतात्मक संरचना का नमूना साबित होता है।
जानकीवल्लभ जी के गीत के बरअक्स भागवत पुराण के वेणु-गीत का श्लोक वंशी वादन के माध्यम से काव्यानुभूति की गहनता एवं तीव्रता को उजागर करता है। दोनों में बाँसुरी केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि यह मानव संवेदनाओं, प्रेम, स्मृति और आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रतीक बन जाती है। शास्त्री जी के गीत में बार-बार पूछा गया प्रश्न ‘किसने बाँसुरी बजाई’ पाठक को उसी रहस्यमय और दिव्य अनुभव के केंद्र में खड़ा करता है, जिसे भागवत में कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि के माध्यम से व्यक्त किया गया है। दोनों में बाँसुरी की ध्वनि वस्तुत: संगीत और आत्मा के बीच पुल का कार्य करती है, जो सुनने वाले को भाव, स्मृति और आध्यात्मिक चेतना के भीतर ले जाती है।भागवत का ‘वेणु गीत’ भारतीय शास्त्रीय संगीत और भावनात्मक अनुभूति का एक अद्भुत उदाहरण पेश करता है। यह श्लोक केवल शब्दों का संचयन नहीं है, बल्कि यह ध्वनि, ताल, स्वर और भाव के माध्यम से श्रोता को आध्यात्मिक और संगीतमय अनुभव की ओर ले जाता है। ‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम्’ में कृष्ण की स्वरूपकला और कर्णों की सुंदरता का वर्णन केवल दृश्यात्मक नहीं है, बल्कि इसमें ध्वनि की लयात्मकता और स्वर की माधुर्यता समाहित है। ‘कर्णयोः कर्णिकारम्’ जैसे पदबंध उच्चारण में ऐसे मेल उत्पन्न करते हैं जैसे बाँसुरी के स्वर में किसी राग का उद्घाटन होता है। संगीतशास्त्र में राग की शुरुआत अलाप से होती है, जिसमें स्वर की गति, विस्तार और आरोह-अवरोह का प्राकृतिक प्रवाह होता है। इस श्लोक की ध्वनि पाठक या श्रोता के भीतर एक प्राकृतिक रागीय अनुभूति उत्पन्न करती है, जो केवल सुनने तक सीमित नहीं रहती बल्कि भावनात्मक और मानसिक स्तर पर भी प्रभाव डालती है।
दूसरी पंक्ति ‘विभ्रदवासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्’ में ध्वनि और स्वरबद्धता की विशेषता स्पष्ट होती है। ‘कनककपिशं’ और ‘वैजयन्तीं’ शब्दों का उच्चारण लयात्मक है और यह ताल और लय का निर्माण करता है। प्रत्येक उच्चारण श्रोताओं में भाव और संवेदना का उत्थान करता है। यह पंक्ति श्रोता को संगीतशास्त्रीय दृष्टि से एक संतुलित रागीय अनुभव का आभास कराती है। तीसरी पंक्ति ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’ में बाँसुरी की मधुरता, तरलता और विस्तारशीलता का वर्णन है। संगीतशास्त्र में रागीय प्रस्तुति में स्वर की तरलता, विस्तार और गमक श्रोता को भावनात्मक और मानसिक रूप से प्रभावित करती है। यहाँ यह ध्वनि केवल व्यक्तिगत अनुभव तक सीमित नहीं होती, बल्कि गोपवृंद जैसे समूह के सामूहिक अनुभव का केंद्र बनती है। चौथी पंक्ति ‘वृन्दारण्यं स्वपद रमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः’ में वृन्दावन का वन, गोपियों की उपस्थितियाँ और गीतकीर्ति का विस्तार मिलकर ध्वनि, ताल और रागीय संरचना का संगीतमय अनुभव प्रस्तुत करते हैं। यह श्रोता के भीतर रागीय अनुभव, भावनात्मक प्रतिक्रिया और आध्यात्मिक अनुभव का मिश्रण उत्पन्न करता है।
संगीतशास्त्रीय दृष्टि से इस छंद की सांगीतिकता और स्वरबद्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाँसुरी की ध्वनि, आरोह-अवरोह, अलाप और गमक की जटिलता श्रोता के हृदय में मादक और मनोहारी प्रभाव उत्पन्न करती है। ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै:’ स्पष्ट करता है कि बाँसुरी का स्वर मधुर और तरल है, जो श्रोता के भीतर दीर्घकालीन स्मृति और भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। इसका प्रभाव आज भी मंदिरों में इसके गायन और विद्वानों संतों द्वारा भागवत कथा-वाचन के दौरान महसूस किया जाता है।इसमें ताल और विराम का संयोजन अत्यंत परिष्कृत है। शब्दों की आवृत्ति, उच्चारण, विराम और पुनरारंभ श्रोता को मानसिक रूप से बाँसुरी की वास्तविक ध्वनि का अनुभव कराते हैं। जैसे किसी राग की प्रस्तुति में ताल का सटीक अनुपालन भाव और आनंद उत्पन्न करता है, वैसे ही यह श्लोक श्रोता के भीतर एक संगीतमय तालबद्धता उत्पन्न करता है। विराम केवल खामोशी नहीं है, बल्कि यह अगले स्वर और भाव की प्रतीक्षा की स्थिति उत्पन्न करता है।इस छंद का संगीतशास्त्रीय प्रभाव केवल ध्वनि और ताल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रोता के भीतर भक्ति और आध्यात्मिक संवेदनाओं को भी जागृत करता है। कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि श्रोता को गोपियों की अनुभूति, वन का सौंदर्य और गीतकीर्ति के विस्तार से जोड़ती है। यह अनुभव राग, ताल और स्वर के माध्यम से श्रोता की आंतरिक संवेदनाओं को संचालित करता है। शास्त्रीय दृष्टि से राग केवल स्वर का खेल नहीं, बल्कि भाव और आध्यात्मिकता का वाहक है।
संगीतशास्त्रीय दृष्टि से भागवत का वेणु गीत और जानकीवल्लभ शास्त्री का गीत, दोनों की संरचना संगीतात्मक है। दूसरे शब्दों में उनमें गायन-योग्य मनोदशा की अभिव्यक्ति हुई है। कहना यह है कि जब रचना की अंतर्वस्तु में ही गायन-योग्य मनोदशा अन्तरभुक्त हो, तो उसका रूपविधान भी गेय संरचना की दरकार रखता है। ऐसे में गीतकाव्य के नाट्यशास्त्रीय षड्विध लक्षणों को सृजन के स्तर पर रचना का अंग-अवयव बनाना कवि के लिए अपरिहार्य हो जाता है:
स्वरं सुरसं चैव सुरागं मधुराक्षरम् ।
अलंकारं सप्रमाणं षड्विधं गानलक्षणम् ॥
(शार्ङ्गदेव : ‘संगीतरत्नाकर’)
(स्वर की शुद्धता, रस की अनुभूति, राग की पहचान, वाणी की मधुरता, अलंकारों की संगति और लय-ताल का संतुलन—इन छह गुणों से युक्त गायन ही शास्त्रसम्मत गान कहलाता है)
इस नज़रिए से भागवत का ‘वेणु गीत’ और जानकीवल्लभ शास्त्री रचित ‘किसने बाँसुरी बजाई’ गीत कई समानताओं और अंतरालों के माध्यम से तुलनीय हैं। दोनों में बाँसुरी या तान का प्रयोग एक केंद्रीय धुरी के रूप में है। दोनों में ताल, लय, आरोह-अवरोह और गमक के माध्यम से श्रोता या पाठक के भीतर भाव और आध्यात्मिक अनुभूति उत्पन्न होती है। भागवत का श्लोक अधिक पारंपरिक रागीय संरचना और आध्यात्मिकता से सम्बद्ध है, जबकि शास्त्री जी का गीत व्यक्तिगत भाव, स्मृति और जटिल मनोभावों के अनुभव को रागीय और तालबद्ध स्वरूप में प्रस्तुत करता है। दोनों पाठों में ध्वनि और स्वर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भागवत के श्लोक में बाँसुरी के स्वर को लेकर वर्णन स्पष्ट है, और श्रोता को गोपियों और वृन्दावन के वातावरण में ले जाता है। शास्त्री जी के गीत में बाँसुरी और तान की रहस्यमय ध्वनि पाठक को जटिल भावनात्मक परिदृश्य में ले जाती है। दोनों में ताल और विराम का संयोजन श्रोताओं में प्रत्याशा और भावनात्मक उत्थान उत्पन्न करता है।
तुलनात्मक दृष्टि से भागवत का वेणु गीत आध्यात्मिक भक्ति और पारंपरिक रागीय प्रस्तुति का प्रतीक है, जबकि जानकीवल्लभ शास्त्री का गीत व्यक्तिगत भाव, स्मृति और आधुनिक मनोभाव के रागीय और तालबद्ध अनुभव का प्रतिनिधित्व करता है। दोनों में बाँसुरी या तान के माध्यम से संगीत और भाव की अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता है। भागवत में रागीयता और स्वरबद्धता आध्यात्मिक और सामाजिक अनुभव के केंद्र में है, जबकि शास्त्री में स्वर और लय व्यक्तिगत और भावनात्मक अनुभव के केंद्र में है। शास्त्री जी के गीत में पंक्तियाँ जैसे “जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग, कूक सुना सोए-सोए हिय में हूक जगाई” यह दर्शाती हैं कि बाँसुरी की ध्वनि मानव हृदय के भीतर झुरझुरी और संवेग पैदा करती है। भागवत में कृष्ण की बाँसुरी की मधुर ध्वनि से गोपवृन्द और वनसंपदा सौंदर्य, स्मृति और भक्ति की अनुभूति में डूब जाते हैं। ‘किसने बाँसुरी बजाई’ गीत अधिक व्यक्तिगत, भावनात्मक और स्त्रीवादी दृष्टिकोण से संवेदनाओं को उद्घाटित करता है, जबकि भागवत का श्लोक दिव्यता, भक्ति और धार्मिक प्रतीकात्मकता के माध्यम से अनुभव को प्रस्तुत करता है। दोनों में बाँसुरी की ध्वनि का प्रभाव, उसकी गूंज और उसकी आध्यात्मिक या भावनात्मक भूमिका तुलनीय है, भले ही संदर्भ और उद्देश्य अलग हों।
संरचनावादी दृष्टि से देखा जाए तो शास्त्री जी का गीत प्रतीकों और रूपकों के ताने-बाने में बंधा है। कदंब, यमुना, बाँसुरी, विष का प्याला और मीरा-मोहन जैसे प्रतीक एक सांकेतिक जाल बनाते हैं, जो पाठक को अर्थ की खोज में संलग्न करता है। भागवत में भी कृष्ण की वासना, स्वरूप, वस्त्र और बाँसुरी सभी प्रतीकात्मक हैं और पाठक को दिव्यता और भक्ति के अर्थों तक पहुँचाते हैं। दोनों में प्रतीक केवल दृश्यात्मक नहीं, बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर पर अर्थ स्थापित करते हैं।शास्त्री जी के गीत में मीरा का चित्रण और कृष्ण का स्मरण, विष पीने की क्रिया और मृदु मुस्कान जैसे विरोधाभास पाठक को आधुनिक युग के अनुभव की बहुआयामिता में ले जाते हैं। यह दृष्टि विखंडनवाद और उत्तर-संरचनावाद के साथ मेल खाती है, क्योंकि अर्थ स्थिर नहीं है और ध्वनि, स्मृति और प्रतीक के बीच सातत्य और विरोधाभास की क्रीड़ा चलती है। इसके विपरीत ‘भागवत’ में कृष्ण की बाँसुरी के माध्यम से बनता वातावरण, उसकी दिव्यता और गोपियों की प्रतिक्रिया अर्थ की स्थिरता के भीतर बहुआयामी अनुभव प्रस्तुत करती है। दोनों ही पाठों में बाँसुरी की ध्वनि प्रकृति, स्मृति, संवेदना और प्रेम के बीच पुल का काम करती है और पाठक या श्रोता को एक अनुभवात्मक और भावनात्मक यात्रा पर ले जाती है।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से दोनों पाठों में अर्थ की बहुलता और अस्पष्टता है। जानकीवल्लभ जी द्वारा रचित पाठ में ‘किसने बाँसुरी बजाई’ का उत्तर कभी नहीं दिया जाता, जो अर्थ की अनंतता को जन्म देता है। भागवत में कृष्ण की बाँसुरी भले ही कृष्ण के दिव्य रूप से जुड़ी हो, फिर भी उसका प्रभाव और अर्थ श्रोता और पाठक के अनुभव के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है। दोनों पाठों से बारी-बारी से गुज़रते हुए लगता है कि संगीत, प्रतीक और अनुभव का अर्थ केवल लेखक या रचनाकार के हाथ में नहीं रहता, बल्कि श्रोता और पाठक की संवेदनाओं और अनुभवों में अर्थ का निर्माण होता है।
स्त्रीवादी दृष्टि से देखा जाए तो शास्त्री जी का गीत स्त्री-चेतना और भावनात्मक जटिलताओं को उद्घाटित करता है। मीरा का रूठना और मृदु मुस्कान आदि आधुनिक स्त्री के प्रेम, आंतरिक संघर्ष और आत्माभिव्यक्ति को प्रकाश में लाते हैं। भागवत में भी गोपियों की कृष्ण की बाँसुरी पर मौन प्रतिक्रिया और उनकी प्रेमपूर्ण संवेदनाएँ स्त्री-चेतना और भक्ति भाव को उजागर करती हैं। दोनों में स्त्री-संवेदना और प्रेम की अनुभूति का केंद्रीय स्थान है। बावजूद इसके शास्त्री जी के छायावादी कवि होने के नाते उनका पाठ अधिक वैयक्तिक और ‘भागवत’ अधिक आध्यात्मिक काव्य प्रतीत होता है।
संगीत और ध्वनि की तुलना पर ध्यान दें तो शास्त्री जी का गीत और भागवत का ‘वेणु-गीत’ दोनों में बाँसुरी की अंतर्ध्वनि हृदय में गूंजती हुई जीवन और प्रकृति की झंकृतियों को व्यक्त करती हुई पाठक या श्रोता को भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाती है। ‘किसने बांसुरी बजाई’ गीत में यह व्यक्तिगत स्मृति और संवेदनाओं के माध्यम से घटित होती है, जबकि भागवत के ‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम्’ श्लोक में दिव्यता और भक्ति के माध्यम से अनुभव होती है। दोनों ही संदर्भों में बाँसुरी सिर्फ वाद्य नहीं, बल्कि अनुभव और प्रतीक का वाहक है। दोनों टेक्स्ट यह सिद्ध करते हैं कि संगीत और ध्वनि न केवल सुनने के लिए होती हैं, बल्कि यह अनुभव, स्मृति, भाव और आध्यात्मिक चेतना का वाहक बन जाती हैं। शास्त्री का गीत व्यक्तिगत अनुभव, विरोधाभास और स्त्री-चेतना पर केंद्रित है, वहीं भागवत का श्लोक सार्वभौमिक, धार्मिक और दिव्य अनुभव का प्रतीक है। इसके बावजूद, दोनों में बाँसुरी की ध्वनि मन, हृदय और आत्मा तक गूंजती है और उसे एक गहन, रहस्यमय और सम्मोहक अनुभव बनाती है। दोनों टेक्स्ट पाठक और श्रोता को अर्थ, अनुभव और संवेदनाओं की बहुआयामी यात्रा पर ले जाते हैं। शास्त्री जी का गीत व्यक्तिगत अनुभव, विरोधाभास और स्त्री चेतना पर केंद्रित है, वहीं भागवत का श्लोक सार्वभौमिक, धार्मिक और दिव्य अनुभव का प्रतीक है। इसके बावजूद, दोनों में बाँसुरी की ध्वनि अनुभव की गहराई, भावनात्मक प्रभाव और आध्यात्मिक जागृति के लिए एक समान स्रोत बनती है।
कुल मिलाकर ‘भागवत’ का ‘वेणु गीत’ और जानकीवल्लभ शास्त्री का ‘किसने बाँसुरी बजाई’ गीत, दोनों ही संगीतशास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं। बाँसुरी और तान, स्वर, ताल और गमक के माध्यम से ये रचनाएँ श्रोता या पाठक के भीतर गहन संगीतमय, भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव उत्पन्न करने में समर्थ हैं। भागवत का श्लोक परंपरागत भक्ति और धार्मिक रागीय अनुभव का वाहक है, जबकि शास्त्री का गीत आधुनिक भावनाओं, स्मृतियों और जटिल मानसिक स्थितियों का संगीतमय प्रतिनिधित्व करता है। दोनों में ध्वनि, ताल, स्वर और भाव का संयोजन इस प्रकार किया गया है कि श्रोता स्वयं एक आंतरिक संगीतमय यात्रा पर निकल पड़ता है।
जूलिया क्रिस्टेवा के अंतर्पाठीयता सिद्धांत की कसौटी पर कसने से अनेक पाठों से निर्मित मंगलेश डबराल एवं स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं की मोज़ेक संरचना अस्थिर प्रतीत होती है। बाँसुरी का ‘छेद’ (holes) संकेत है जो मृत्यु या अभाव को दर्शाता है, लेकिन अर्थ अनंत है। फूको की ‘शक्ति/ज्ञान’ वाली धारणा के तहत स्वप्निल की कविता की ‘तुमने मुझे... बनाया’ पंक्ति में शक्ति संरचना है – ‘तुम’ (सर्जक) बाँसुरी को नियंत्रित करता है, लेकिन अंत में बाँसुरी की स्वायत्तता (‘तुम नहीं बजाते हो तो भी’) इस शक्ति को उलटकर दिखाती है कि ज्ञान (संगीत) शक्ति से बंधा नहीं हो सकता। इस प्रकार यह कविता संरचनावादी स्थिरता को विखंडित कर अर्थ की मुक्ति का उत्सव मनाती है, जहां बाँसुरी एक अनंत संकेत बन जाती है।
इसी परंपरा में जब हम आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री के “वृन्दावने वादिता वंशी…” जैसे छंद को देरिदा के विखंडनवादी दृष्टिकोण से देखते हैं, तो अर्थ की यह स्थिरता टूटने लगती है। बाँसुरी पुन: केवल वाद्ययंत्र के बजाय स्मृति, दूरी और वियोग का स्रोत बनती हुई प्रतीत होती है। “गता तदानिं दूरतरमहं” जैसी पंक्ति से यह स्पष्ट है कि नाद उपस्थिति का नहीं, अनुपस्थिति का संकेत बनता है। देरिदा के शब्दों में यहाँ केंद्र खिसक जाता है—कृष्ण पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और वंशी, जो भागवत में केवल संकेतक थी, स्वयं अर्थ-उत्पादक बन जाती है। विखंडन की दृष्टि से यह वही क्षण है जहाँ अर्थ अपने मूल आधार से फिसलता है और पाठ अपने ही भीतर तनाव रचता है:
वृन्दावने वादिता वंशी।
गता तदानिं दूरतरमहं प्रव्रजीव सखी हंसी॥ .....
- जानकीवल्लभ शास्त्री : ‘काकली’
(वृन्दावन में बाँसुरी बज उठी। उसी क्षण मैं जैसे बहुत दूर निकल गई—मानो कोई विरहिणी सखी अपने ही हँसते मुख से अंतःकरण का क्रंदन छिपा रही हो। मुरली की उस मधुर तान को सुनकर रास-विहार के पुराने रमणीय क्षण स्मरण हो आए। मेरा हृदय निश्चय ही रो उठा है—“हे प्रिय कृष्ण! हे नाथ! तुम अब कहाँ चले गए हो?)
यह गीत बाह्य प्रसन्नता और आंतरिक विरह के द्वंद्व को दर्शाता है। बाँसुरी की ध्वनि स्मृति बनकर आती है और स्मृति पीड़ा में बदल जाती है—यही शास्त्री जी की गीतात्मकता की विशिष्टता है। भागवतकार से भिन्न जानकीवल्लभ शास्त्री ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो व्याकरण से अधिक अनुभूति से जन्मे हों और जो संस्कृत कविता को गीतात्मक आधुनिकता प्रदान करने में समर्थ हैं। भागवत के वेणु-गीत का ‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम्’ श्लोक कृष्ण के सौंदर्य और लीला को केंद्र में रखकर रचा गया है, जहाँ वंशी उनके अधरों से प्रवाहित साँसों से उत्पन्न नाद का माध्यम भर है। बाँसुरी की ध्वनि वृन्दावन को आलोकित करती है, गोपवृंद उसे सुनते हैं और कृष्ण का रूप–रस सर्वत्र व्याप्त हो जाता है। वहाँ वंशी स्वयं कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि कृष्ण की शोभा बढ़ाने वाला उपकरण है। इसके विपरीत, जानकीवल्लभ शास्त्री की ‘काकली’ में वंशी उसी परंपरा से निकलकर एक सजीव मानवीकृत उपस्थिति बन जाती है। ‘वृन्दावने वादिता वंशी’ केवल ध्वनि का वर्णन नहीं रह जाता, वह स्मृति बनकर राधा-सदृश नायिका के हृदय को विदीर्ण करता है—‘गता तदानिं दूरतरमहं…’ जैसे भावों में वंशी स्वयं वियोग का कारण प्रतीत होती है। इस तरह जहाँ भागवत में वंशी नाद-ब्रह्म की ओर ले जाती है, वहीं ‘काकली’ में वह मन की टूटन और स्मृति के विषाद का प्रतीक बन जाती है। यह अंतर किसी विरोध का नहीं, बल्कि भिन्न काव्य-दृष्टि का संकेत है जिसे हम विवेचन की सुविधा के लिए देव-केंद्रित सौंदर्य से मनुष्य-केंद्रित अनुभूति की ओर रचनाकारों का प्रयाण कह सकते हैं।
यदि इन छंदों को स्त्रीवादी सैद्धांतिकी के आलोक में देखें, तो और गहरे अर्थ खुलते हैं। ‘भागवत’ के श्लोक में स्त्री-दृष्टि अप्रत्यक्ष है; गोपियाँ दर्शक हैं, अनुभवकर्ता नहीं। वहीं ‘काकली’ में स्त्री-चेतना केंद्र में आ जाती है। वंशी यहाँ पुरुष-सत्ता की सहचरी बनकर स्त्री के विरह को तीव्र करती है—मानो वह एक ऐसी प्रतिद्वंद्वी हो जिसने कृष्ण की निकटता छीन ली हो। बाह्य हँसी और आंतरिक रिक्तता का द्वंद्व स्त्री-अनुभव की जटिलता को उजागर करता है, जहाँ भावनात्मक बोझ स्त्री को ही वहन करना पड़ता है। इस दृष्टि से वंशी केवल काव्य-उपकरण नहीं, बल्कि सत्ता-संबंधों का प्रतीक बन जाती है।
इस प्रकार एक ही परंपरा के भीतर स्थित दो पाठ—‘भागवत’ का ‘वेणु-गीत’ और ‘काकली’ का छंद—संरचनावादी स्थिरता से लेकर विखंडन की अस्थिरता और अंततः स्त्रीवादी अनुभव-केंद्रितता तक की एक पूरी वैचारिक यात्रा को संभव बनाते हैं। यही इन दोनों रचनाओं को साथ रखकर पढ़ने का सबसे बड़ा साहित्यिक लाभ है। प्रसंगवश ‘भागवत’ के इस छंद को देरिदा के विखंडनवाद के अंतर्गत नए सिरे से व्याख्यायित करना वैचारिक रूप से अत्यंत उत्तेजक और दिलचस्प है। यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि ऐसी व्याख्या भागवत के पारंपरिक अर्थ को खंडित करने के बजाय उसके गर्भितार्थों और मौन क्षेत्रों को उजागर करने के लिए की जा रही है।
देरिदा की दृष्टि में कोई भी पाठ पूर्णतः आत्म-संपूर्ण नहीं होता; वह अपने अर्थ को स्थिर रखने की चेष्टा करता है, पर उसी प्रयास में अर्थ को फिसलने भी देता है। ‘बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम्’ छंद कृष्ण की उपस्थिति का उत्सव रचता है—रूप, वेश, वेणु-नाद और वृन्दावन सब कुछ उपस्थित है। किंतु इसी अति-उपस्थिति में एक सूक्ष्म अनुपस्थिति भी दर्ज होती है। वंशी, जो अधरों से ‘पूरित’ है, स्वयं मौन वस्तु है; वह तभी अर्थ पाती है जब कृष्ण उसमें श्वास भरते हैं। अर्थात् उसका अर्थ हमेशा किसी और पर आश्रित है, स्वयं में पूर्ण नहीं।विखंडन की दृष्टि से यह संबंध स्थिर नहीं रहता। नाद का स्रोत अधर हैं, पर अधर नाद में विलीन हो जाते हैं; कृष्ण स्वयं अपने चिह्नों में बिखर जाते हैं—पंख, माला, वंशी, गीत-कीर्ति। केंद्र, जो ईश्वर होना चाहिए था, चिह्नों के जाल में फैलकर अस्थिर हो जाता है। अर्थ अब ‘कृष्ण’ नाम एक स्थिर उपस्थिति में नहीं, बल्कि संकेतों की अंतहीन श्रृंखला में बहने लगता है। यह वही ‘différance’ है, जहाँ देरिदा के शब्दों में अर्थ टलता भी है और बनता भी है।
कुछ और गहराई में उतरने पर गोपवृंद की भूमिका एक और विखंडनकारी संकेत देती है। वे श्लोक में उपस्थित हैं, पर उनकी वाणी अनुपस्थित है। वे सुनते हैं, देखते हैं, पर बोलते नहीं। कविता का टेक्स्ट उनकी अनुभूति की ओर संकेत करता है, किंतु व्यक्त नहीं करता। यह मौन स्वयं अर्थ का एक विखंडन है—जहाँ जो सबसे अधिक अनुभव करता है, वही सबसे कम बोलता है। इस प्रकार पाठ अपने ही भीतर एक दरार रचता है।इस दृष्टि से ‘भागवत’ का यह छंद केवल ईश्वरीय सौंदर्य का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि उपस्थिति और अनुपस्थिति, केंद्र और प्रसार, नाद और मौन के बीच निरंतर डगमगाता हुआ अर्थ-क्षेत्र बन जाता है। देरिदा के विखंडनवाद के नज़रिए से यह श्लोक यह दिखाता है कि जिसे हम पूर्ण, दिव्य और स्थिर मानते हैं, वह भी भाषा में आते ही फिसलन, अंतराल और अस्थिरता का हिस्सा बन जाता है।
देरिदा का प्रसिद्ध कथन कि ‘पाठ के बाहर कुछ नहीं है’ यह संकेत करता है कि अर्थ किसी बाहरी, स्थिर यथार्थ में नहीं, बल्कि पाठ के भीतर उपस्थित संकेतों, अंतरालों और संबंधों में बनता–बिगड़ता है। भागवत के वेणु-गीत के एक काव्यांश को लें—‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’। यह पंक्ति पहली नज़र में अत्यंत सहज प्रतीत होती है: कृष्ण अपनी अधर-सुधा से बाँसुरी के छिद्रों को भर रहे हैं और मधुर नाद उत्पन्न हो रहा है। पर देरिदा की विखंडनात्मक दृष्टि से देखें, तो यही ‘रन्ध्र’ पाठ का सबसे अस्थिर और अर्थ-उत्पादक स्थल बन जाता है।रन्ध्र का अर्थ रिक्ति या अभाव है। बाँसुरी स्वयं एक रिक्त संरचना है। वह तभी बजती है जब उसमें शून्य हो। यदि छिद्र न हों, तो नाद संभव ही नहीं है। इस प्रकार संगीत उपस्थिति से नहीं, बल्कि अभाव से जन्म लेता है। देरिदा की शब्दावली में कहें तो अर्थ किसी पूर्ण उपस्थिति से नहीं, बल्कि ‘डिफरांस’(différance) से—अर्थात् ‘अंतर और विलंब’ से उत्पन्न होता है। कृष्ण की अधर-सुधा इन रन्ध्रों को ‘पूरती’ है, पर यह पूर्ति भी विरोधाभासी (paradoxical) है, क्योंकि यदि वे सचमुच भर जाएँ तो नाद रुक जाएगा। इसलिए यहाँ पूर्ति और रिक्ति एक साथ उपस्थित हैं। दूसरे शब्दों में अर्थ एक ही क्षण में बनता भी है और खिसक भी जाता है।
अब पूरे श्लोक के संदर्भ से जोड़ें तो स्पष्ट होगा कि इस श्लोक में वेणु-नाद कृष्ण का ‘स्वरूप’ नहीं, बल्कि उनके और वंशी के बीच के अंतराल से जन्म लेता है। इस प्रकार केंद्र (कृष्ण) भी पूरी तरह आत्म-संपूर्ण होने के बजाय उन छिद्रों पर निर्भर हो जाता है जो स्वयं नकारात्मकता के चिह्न हैं।‘पाठ के बाहर कुछ नहीं है’ सरीखे देरिदा के कथन के आलोक में देखें तो ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै:’ में आए रन्ध्रों को किसी बाहरी आध्यात्मिक सत्य से नहीं, बल्कि पाठ के भीतर ही अर्थ पाना होगा। बाँसुरी के छिद्र यहाँ केवल भौतिक विवरण नहीं, बल्कि भाषा की दरारें हैं—वे स्थान जहाँ अर्थ स्थिर नहीं रहता, बल्कि बहता है। भागवतकार इस श्लोक में यह कहना चाहता हुआ प्रतीत होता है कि दिव्यता भी भाषा में आते ही छिद्रों, अंतरालों और मौन के सहारे व्यक्त होती है। इस प्रकार वेणु-गीत का यह काव्यांश स्वयं अपने भीतर यह दिखा देता है कि पूर्णता का अनुभव भी रिक्ति के बिना संभव नहीं, और यही विखंडनात्मक दृष्टि से इसका सबसे गहरा अर्थ है।भागवत के ‘वेणु-गीत’ में बाँसुरी एक ऐसी रिक्त संरचना है जिसके रन्ध्रों से दिव्य नाद उत्पन्न होता है। वह नाद उपस्थिति का अनुभव कराता है, पर जैसा कि देरिदा के विखंडन से स्पष्ट होता है, यह उपस्थिति स्वयं रिक्ति पर टिकी है। बाँसुरी यहाँ शून्य को छिपाती नहीं, बल्कि उसी के माध्यम से अर्थ रचती है। यह शून्य उत्पादक है के साथ ही जीवन और रस का स्रोत है।
इन तीनों को साथ रखकर देखें तो एक स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है। भागवत में बाँसुरी शून्य के माध्यम से पूर्णता रचती है। जानकीवल्लभ शास्त्री और आगे चलकर आधुनिक हिंदी कविता में वही बाँसुरी स्मृति और वियोग का उपकरण बनती है। मंगलेश डबराल के यहाँ पहुँचकर बाँसुरी का नाद इतिहास की आग में जलकर राख हो जाता है। स्वप्निल श्रीवास्तव के यहाँ वह राख बनने से ठीक पहले की अवस्था में है—जहाँ संगीत की संभावना अब भी बची है, पर सुनिश्चित नहीं। इस तुलना से यह भी स्पष्ट होता है कि बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि भारतीय काव्य-परंपरा में दिव्य नाद से लेकर ऐतिहासिक मौन तक ‘अर्थोत्पत्ति की पूरी यात्रा’ का प्रतीक है।
टैगोर और अरविन्द के यहाँ ‘रिक्त देह में श्वास’ का दर्शन मिलता है। ‘गीतांजलि’ और उनके अन्य बंगला गीतों में बाँसुरी और श्वास का संबंध बहुत निकट आता है। टैगोर बार–बार स्वयं को एक ‘खोखला पात्र’ बताते हैं जिसमें ईश्वर का श्वास या संगीत भरा जाता है। यद्यपि वे बाँसुरी के छिद्रों का यथावत वर्णन नहीं करते, पर भाव बिल्कुल वही है—रिक्त देह, जिसमें दिव्य श्वास प्रवेश कर उसे अर्थ देती है। यह रिक्ति टैगोर के यहाँ अभाव नहीं, बल्कि ग्रहणशीलता है। महर्षि अरविन्द की कविताओं में ‘वाद्ययंत्र’(instrument) और श्वास (breath) का गहरा बिंब बार–बार आता है। वे मानव को ईश्वर के वाद्य के रूप में देखते हैं, जहाँ आत्मा तब बोलती है जब अहं रिक्त होता है। यहाँ भी छिद्र न होने के बावजूद रिक्तता का दर्शन स्पष्ट है जिसके अनुसार पूर्णता शून्य से जन्म लेती है। अरविन्द कहते हैं कि ‘मनुष्य केवल वाद्य है। जब अहं रिक्त होता है—तभी आत्मा बोलती है और ईश्वर की श्वास संगीत बनती है।’ श्री अरविन्द के दर्शन में ‘बांसुरी वादक’(The Flute player)’ कृष्ण का प्रतीक है। कविता में वे उस दिव्य आकर्षण का रूप हैं जो मनुष्य की आत्मा को सांसारिक बंधनों से बाहर निकालकर आनन्द की ओर बुलाता है। वहाँ बाँसुरी का संगीत इस आध्यात्मिक पुकार का प्रतीक है। आत्मा—जो राधा के रूप में देखी जाती है—उस स्वर को सुनकर जागृत होती है और शाश्वत दिव्य प्रेमी से एकाकार होने की लालसा करती है। वही दिव्य सत्ता मानवता का मार्गदर्शन करती है, जिससे वह आध्यात्मिक पूर्णता और ‘सुप्रामेंटल’ अवतरण की ओर बढ़ सके। इस अवस्था में पूर्ण प्रेम, दिव्य ज्ञान और शक्ति एक साथ प्रकट होते हैं और मनुष्य ईश्वरीय चेतना में रूपांतरित होने लगता है। उनके ‘सावित्री’ महाकाव्य में भी बाँसुरी के सुर को दिव्य आह्वान के रूप में वर्णित किया गया है।
दरअसल भारतीय काव्य-परंपरा में बाँसुरी केवल वाद्य के बजाय ‘अस्तित्व-मीमांसा का रूपक’ रही है—और इसी अर्थ में वह विश्व-कविता में भी एक दुर्लभ पर अत्यंत गहरा बिंब है। आधुनिक अंग्रेज़ी कविता में रिक्ति प्रायः नकारात्मक मौन बन जाती है। बाँसुरी के छिद्र को भारतीय कवियों या जलालुद्दीन रूमी की तरह इतनी सघन दार्शनिकता के साथ शायद ही किसी ने पकड़ा हो। टी. एस. एलियट की “The Hollow Men” में ‘ख़ाली या रिक्त’ (hollow) का बिंब मिलता है, लेकिन वहाँ शून्य बाँझ है। वह संगीत उत्पन्न नहीं करता। इसके विपरीत, रूमी की ‘मसनवी’ के आरंभ में ‘बाँसुरी’ कविता आती है जहाँ ‘नरकट की बाँसुरी’ (reed flute) को उसके काटे जाने, खोखले होने और उसी से करुण संगीत पैदा होने का प्रतीक बनाया गया है। वस्तुत: रूमी के यहाँ बाँसुरी स्वयं रिक्ति का गीत गाती है।
‘भागवत’ से जानकीवल्लभ शास्त्री की ‘काकली’ तक बाँसुरी का बिंब भारतीय और सूफ़ी काव्य-परंपरा में एक गहन अंतर्पाठीय संवाद रचता है। यह संवाद केवल धार्मिक या आध्यात्मिक स्तर पर नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की संरचनाओं और उनके विखंडन के स्तर पर भी सक्रिय दिखाई देता है।
‘भागवत’ में बाँसुरी कृष्ण के अधरों से स्पर्श पाकर दिव्य नाद का माध्यम बनती है। वहाँ वंशी स्वयं में स्वतंत्र अर्थ नहीं रचती, बल्कि कृष्ण की उपस्थिति का विस्तार बन जाती है। वंशी के छिद्र रिक्त अवश्य हैं, पर यह रिक्ति पाठ में नियंत्रित है—उसे ईश्वर की उपस्थिति ढँक लेती है। दूसरे शब्दों में, भागवत का पाठ रिक्ति को स्वीकार तो करता है, पर उसे एक स्थिर, दिव्य केंद्र के अधीन रखता है। इसके विपरीत मौलाना रूमी की बाँसुरी किसी अधर से नहीं, बल्कि अपने कटे होने के अनुभव से बोलती है। वह अपने मूल स्रोत से अलग किए जाने की पीड़ा को स्वर देती है। यहाँ रिक्ति कोई छिपी हुई संरचना नहीं, बल्कि स्वयं अर्थ का स्रोत बन जाती है। बाँसुरी का विलाप ही उसका कथ्य है। इस तरह रूमी का पाठ उस संरचना को तोड़ देता है जिसमें कोई केंद्रीय उपस्थिति रिक्ति को नियंत्रित करती हो। जानकीवल्लभ शास्त्री की ‘काकली’ इन दोनों के बीच एक मध्यवर्ती और अत्यंत सूक्ष्म काव्यात्मक स्थिति ग्रहण करती है। उनकी वंशी न तो पूरी तरह ईश्वर-केंद्रित है और न ही आत्म-विलाप में डूबी हुई। वह स्मृति का उपकरण बन जाती है—ऐसी स्मृति, जो नायिका को वर्तमान से ‘दूरतर’ ले जाती है। यहाँ नाद उपस्थिति का नहीं, अनुपस्थिति का संकेत बनता है। कृष्ण पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और बाँसुरी उनका स्थान ले लेती है।इस बिंदु पर अर्थ केंद्र से खिसकने लगता है। वंशी अब केवल संकेतक नहीं रह जाती, बल्कि स्वयं अर्थ-उत्पादक बन जाती है। यही वह क्षण है जहाँ विखंडन सक्रिय होता है—अर्थ अपने स्थिर आधार से फिसलकर स्मृति, दूरी और वियोग की ओर प्रवाहित होने लगता है।
यदि देरिदा के इस विचार को गंभीरता से लें कि अर्थ पाठ के भीतर ही निर्मित होता है, तो महर्षि व्यास, मौलाना रूमी और शास्त्री जी—तीनों के पाठ एक ही विमर्श में आ जाते हैं। व्यास के पाठ में रिक्ति छिपी और नियंत्रित है, रूमी में वही रिक्ति उद्घाटित होकर स्वयं बोलती है और जानकीवल्लभ जी के यहाँ रिक्ति स्मृति बनकर उपस्थित होती है—ऐसी स्मृति, जो कुछ लौटाती नहीं, केवल सुनाई देती है। इस प्रकार इन तीनों पाठों में बाँसुरी का रूपक—रन्ध्र, कटाव, श्वास और नाद—यह सिद्ध करता है कि संगीत, कविता और अर्थ किसी पूर्ण उपस्थिति से नहीं, बल्कि टूटन, दूरी और अभाव से जन्म लेते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ सूफ़ी अनुभव, वैष्णव परंपरा और आधुनिक संस्कृत गीतिकाव्यात्मक चेतना एक-दूसरे से गहरे संवाद में प्रवेश करती हैं और अर्थ की यात्रा को ऐतिहासिक गहराई प्रदान करती हैं।
ऑस्कर वाइल्ड की कविता ‘द फ्लूट प्लेयर’ बाँसुरी-विषयक इस दीर्घ काव्य-परंपरा में एक विशिष्ट आधुनिक हस्तक्षेप के रूप में उभरती है। यह कविता न तो भागवत की तरह दिव्य केंद्र को स्थिर करती है और न ही रूमी की तरह कटाव और विरह को आध्यात्मिक विलाप में रूपांतरित करती है। यहाँ बाँसुरी का संगीत सत्ता को क्षणिक रूप से विचलित करता है, पर उसे स्थायी रूप से बदल नहीं पाता। इस कविता में ‘पहाड़ी पर हँसता हुआ बाँसुरीवादक और उसके स्वर से आकृष्ट होकर अपने ऊँचे आसनों से झुकते देवता’ का दृश्य कला की मोहक शक्ति को रेखांकित करता है। बाँसुरी का नाद इतना प्रभावी है कि देवत्व भी ठिठक जाता है। संरचनात्मक स्तर पर यह सौंदर्य की सर्वोच्चता का दृश्य है, जहाँ कला क्षण भर के लिए सत्ता पर भारी पड़ती है।
लेकिन देरिदा की विखंडनात्मक दृष्टि से देखने पर यह ‘झुकना’ पूर्ण समर्पण नहीं, बल्कि अस्थायी असंतुलन का संकेत है। देवता सुनते हैं, पर रूपांतरित नहीं होते। बाँसुरी का संगीत उन्हें रोक तो लेता है, पर किसी नए नैतिक या आध्यात्मिक केंद्र की स्थापना नहीं करता। यही वह बिंदु है जहाँ वाइल्ड की कविता आधुनिकता का संकेत देती है—कला अब मोक्ष या सत्य का वचन नहीं देती, बल्कि एक क्षणिक, किंतु तीव्र, अनुभव प्रदान करती है।
यहाँ ध्यान देने योग्य है कि वाइल्ड की कविता में बाँसुरी का इतिहास, उसका कटाव, उसके छिद्र—सब अनुपस्थित हैं। बाँसुरी केवल ‘क्षीण, स्वच्छ स्वर’ है। उसकी पीड़ा, उसकी निर्मिति, उसकी रिक्तता पाठ से बाहर रह जाती है। देरिदा की शब्दावली में कहें तो यह उपस्थिति को प्राथमिकता देने वाला सौंदर्यबोध है, जहाँ अनुपस्थिति और अभाव को दबा दिया जाता है। इसी कारण वाइल्ड की बाँसुरी भागवत की वंशी से मिलती-जुलती प्रतीत होती है—दोनों ही रिक्ति को ढँक देते हैं। फ़र्क यह है कि भागवत में यह ढँकाव दिव्यता से होता है, जबकि वाइल्ड के यहाँ सौंदर्य से। दोनों ही स्थितियों में बाँसुरी स्वयं नहीं बोलती; उसका स्वर किसी बड़े केंद्र की सेवा करता है।
यह आधुनिक सौंदर्यवादी दृष्टि आगे चलकर और अधिक अस्थिर होती है, जब हम इसी बाँसुरी को मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में देखते हैं। वहाँ यह अस्थायी सौंदर्य भी टिक नहीं पाता और अंततः मौन, राख और आत्मकथात्मक पीड़ा में बदल जाता है। इस प्रकार वाइल्ड की बाँसुरी परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संक्रमण-बिंदु बन जाती है—जहाँ संगीत अब भी आकर्षित करता है, लेकिन अर्थ स्थायी नहीं रह जाता। ऑस्कर वाइल्ड की कविता में जो अनुपस्थिति दबा दी गई थी—बाँसुरी का इतिहास, उसका कटाव, उसकी रिक्तता—उसे मंगलेश डबराल की कविता बिना किसी सौंदर्यात्मक आवरण के सीधे सामने ले आती है। यहाँ बाँसुरी अब केवल संगीत का उपकरण नहीं रह जाती, बल्कि चेतना के भीतर और बाहर फैली हुई एक दरार बन जाती है।
मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी दो स्तरों पर विभक्त है—एक जो बाहर सुनाई देती है और दूसरी जो भीतर बजती है, पर सुनाई नहीं देती। यह विभाजन केवल ध्वनि का नहीं, बल्कि अनुभव और चेतना का विभाजन है। बाहर की बाँसुरी सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वीकृत स्वर है, जबकि भीतर की बाँसुरी वह दमित आवाज़ है जो व्यक्ति की अंतरात्मा में दबी रहती है।विखंडनात्मक दृष्टि से यह विभाजन अर्थ की स्थिरता को पूरी तरह तोड़ देता है। यहाँ कोई एक केंद्र नहीं बचता—न बाहर की ध्वनि पूर्ण है, न भीतर की चुप्पी। अर्थ दोनों के बीच टलता रहता है। देरिदा के अनुसार यह वही स्थिति है जहाँ अर्थ न पूरी तरह उपस्थित होता है, न पूरी तरह अनुपस्थित।जब कविता कहती है कि एक दिन भीतर की बाँसुरी पूरी तरह चुप हो जाती है और तब उसका विलाप सुनाई देता है, तो यह चुप्पी साधना या आध्यात्मिक शांति नहीं रह जाती। यह वह बिंदु है जहाँ दमन अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है। यहाँ मौन स्वयं एक हिंसक स्वर में बदल जाता है। ‘छेदों से गिरती है राख़’—काव्यपंक्ति विखंडन के स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पहले जिन छिद्रों से संगीत निकलता था, अब उन्हीं से राख गिरती है। यह राख अर्थ के जल जाने का अवशेष है—न पूरी तरह नष्ट, न पूरी तरह जीवित। देरिदा की शब्दावली में यह ‘ट्रेस’ है—अर्थ का वह चिन्ह जो केवल अनुपस्थिति के रूप में बचा रहता है। इस बिंदु पर मंगलेश डबराल की बाँसुरी ऑस्कर वाइल्ड की बाँसुरी से पूरी तरह अलग हो जाती है। वहाँ छिद्र छिपे थे, यहाँ वे ही कविता का केंद्र बन जाते हैं। संगीत अब सौंदर्य का उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास के दमन और स्मृति के विनाश का प्रमाण बन जाता है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ इस राख को एक बोलती हुई देह प्रदान करती है। जहाँ मंगलेश डबराल की कविता में भीतर की आवाज़ अंततः चुप हो जाती है, वहीं स्वप्निल की कविता में वही बाँसुरी स्वयं अपनी कथा कहती है। यहाँ बाँसुरी केवल प्रतीक नहीं रहती, बल्कि एक आत्मकथात्मक उपस्थिति बन जाती है, जो अपनी यातना, अपने छेद और अपने आदतन बजते रहने की कहानी सुनाती है। इस प्रकार ‘बाँसुरी’ यहाँ आधुनिक हिंदी कविता में एक विशिष्ट आत्मकथात्मक स्वर के रूप में सामने आती है, जहाँ प्रतीक स्वयं बोलने लगता है। यहाँ बाँसुरी केवल किसी बाह्य सत्ता द्वारा बजाया जाने वाला वाद्य नहीं, बल्कि एक ऐसी देह है जो अपने निर्माण, अपने उपयोग और अपनी आदतों को स्वयं व्यक्त करती है। यह आत्मकथन किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक वस्तु के माध्यम से निर्मित चेतना का है—और यही इसे देरिदा की विखंडनात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाता है।
इस कविता की संरचना इस तथ्य पर टिकी है कि बाँसुरी अपने प्राकृतिक अस्तित्व से अलग की गई है। वह पहले बाँस थी—अखंड, पूर्ण और मौन। रूपांतरण की प्रक्रिया में वह उपयोगी बनती है, पर इसी उपयोगिता के साथ यातना, छेदन और पीड़ा भी जुड़ जाती है। इस रूपांतरण में कोई उत्सव नहीं है; यह हिंसा का इतिहास है जिसे सामान्य और स्वाभाविक बना दिया गया है। विखंडन की दृष्टि से देखें तो यह वही क्षण है जहाँ ‘प्रकृति’ और ‘संस्कृति’ का द्वंद्व स्थिर नहीं रहता। बाँसुरी न तो पूरी तरह प्राकृतिक है, न पूरी तरह सांस्कृतिक। उसका अर्थ इसी बीच के अंतराल में बनता है—जहाँ वह काटी गई है, पर पूरी तरह अलग नहीं हुई; जहाँ वह बजती है, पर स्वयं के लिए नहीं। कविता में आनंद और पीड़ा का सहअस्तित्व किसी संतुलन की स्थिति नहीं रचता, बल्कि अर्थ को लगातार टालता रहता है। बाँसुरी आनंद के लिए बजती है, पर उसी क्षण दर्द से भर जाती है। यह विरोधाभास किसी समाधान पर नहीं पहुँचता, बल्कि अर्थ को अनिश्चित बनाए रखता है। देरिदा की ‘डिफ़रांस’ (difference) की संकल्पना के अनुसार यही वह बिंदु है जहाँ अर्थ स्थिर होने से इंकार कर देता है।
सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण कविता के अंत में आता है, जहाँ बाँसुरी यह कहती है कि वह बजाई न जाए, तब भी आदतन बज उठती है। यह ‘आदतन’ शब्द स्वायत्तता का दावा भी है और उसके सीमित होने का संकेत भी। बाँसुरी अब किसी के ओठों पर नहीं है, फिर भी वह बजती है—लेकिन यह बजना स्वतंत्र निर्णय नहीं, बल्कि भीतर पैठ चुकी संरचना की पुनरावृत्ति है। ‘डिकंसट्रकशन’ की शब्दावली में यह कहा जा सकता है कि बाँसुरी यहाँ एक ‘सप्लिमेंट’ बन जाती है। वह उस अनुपस्थिति को भरती है जिसे उसने स्वयं जन्म दिया है। वह अकेलेपन की आवाज़ बनती है, पर उस अकेलेपन से मुक्त नहीं हो पाती। उसका स्वर चलता रहता है, पर वह कहीं पहुँचता नहीं। इस प्रकार स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी मंगलेश डबराल की राख से पहले की अवस्था में स्थित प्रतीत होती है। यहाँ अर्थ अभी पूरी तरह जला नहीं है, पर उसकी पूर्णता की संभावना भी समाप्त हो चुकी है। यह एक संक्रमण की स्थिति है—जहाँ स्वर है, पर मुक्ति नहीं; भाषा है, पर समाधान नहीं।
स्त्रीवादी सैद्धांतिकी के आलोक में मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी-केंद्रित कविताएँ केवल सौंदर्यात्मक प्रतीक नहीं रह जातीं, बल्कि देह, सत्ता और दमन की जटिल राजनीति को उद्घाटित करती हैं। यहाँ बाँसुरी स्त्री-देह के रूपक में बदल जाती है—एक ऐसी देह जिस पर हस्तक्षेप किया गया है, जिसे उपयोग में लाया गया है और जिसे अंततः चुप या आदतन सक्रिय रहने के लिए बाध्य किया गया है।दोनों कविताओं में ‘छेद’ एक केंद्रीय संकेत के रूप में उभरता है। स्वप्निल की कविता में यह छेद धीरे-धीरे विस्मृत हो जाता है—पीड़ा स्मृति से हटकर आदत में बदल जाती है। इसके विपरीत, मंगलेश डबराल की कविता में यही छेद राख गिराने लगते हैं। एक स्थिति में दमन आंतरिकीकृत हो जाता है, दूसरी में वह आत्म-विनाश की ओर बढ़ता है। स्त्रीवादी दृष्टि से यह अंतर अत्यंत निर्णायक है, क्योंकि यह दिखाता है कि दमन के अनुभव समान नहीं होते—वे अलग-अलग सामाजिक और मानसिक परिणाम उत्पन्न करते हैं।
जूडिथ बटलर की देह की राजनीति संबंधी अवधारणाओं को ध्यान में रखें तो यह स्पष्ट होता है कि देह केवल जैविक इकाई नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा निर्मित और नियंत्रित स्थल है। उनके अनुसार देह को केवल एक जैविक इकाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे संस्कृति, सत्ता और भाषा के माध्यम से निर्मित एक सामाजिक वास्तविकता के रूप में समझना चाहिए। उनका मानना है कि लिंग और पहचान किसी जन्मजात या स्थिर तत्त्व का नतीजा नहीं हैं, बल्कि वे निरंतर किए जाने वाले व्यवहारों और दोहराव के माध्यम से बनते और टिके रहते हैं। समाज कुछ मानदंड तय करता है कि देह कैसी होनी चाहिए, कैसे व्यवहार करना चाहिए और किस तरह स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए। सत्ता संरचनाएँ इन्हीं मानदंडों के सहारे देह को ‘सामान्य’ बनाने की कोशिश करती हैं। लेकिन यही प्रक्रिया इन मानदंडों को चुनौती देने की संभावनाएँ भी पैदा करती है। असुरक्षा और भेद्यता जैसे अनुभव केवल कमजोरी नहीं हैं, बल्कि वे प्रतिरोध और नई तरह की राजनीति के स्रोत भी बन सकते हैं, जिनके सहारे हाशिए पर पड़े लोग अपनी पहचान पर फिर से विचार करते हुए सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष कर सकते हैं।
बटलर के विचार में लिंग कोई आंतरिक या प्राकृतिक सार नहीं है। यह सामाजिक नियमों और अपेक्षाओं का बार-बार किया जाने वाला प्रदर्शन है, जिसके कारण हम ‘पुरुष’ या ‘स्त्री’ के रूप में पहचाने जाते हैं। यह प्रदर्शन हमें सिखाता है कि शरीर को कैसे चलना, बोलना और दिखना चाहिए। इस तरह लिंग सत्ता का ही एक रूप है, जो शरीर को ढालता है और नियंत्रित करता है, लेकिन साथ ही उसमें बदलाव की गुंजाइश भी छोड़ता है।
फुको से प्रेरणा लेते हुए बटलर यह मानती हैं कि शक्ति हर जगह मौजूद है। शक्ति केवल दबाने या नियंत्रित करने का काम नहीं करती, बल्कि वही शक्ति विरोध की संभावनाएँ भी पैदा करती है। दमनकारी नियम या सेंसरशिप जिस भाषा और व्यवहार को रोकना चाहती है, अनजाने में उसी को दोहराती और फैलाती भी है। जब लोग इन तयशुदा मानदंडों का बार-बार उल्लंघन करते हैं, तो नई पहचानों और नए राजनीतिक रूपों का जन्म होता है।बटलर असुरक्षा को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थिति मानती हैं। जब लोग अपनी पहचान, खासकर लिंग और सामाजिक मान्यता को लेकर असुरक्षित महसूस करते हैं, तो वे कभी-कभी ऐसे राजनीतिक विचारों की ओर आकर्षित हो सकते हैं जो समानता और विविधता के खिलाफ हों। लेकिन यही भेद्यता हमें एक-दूसरे से जोड़ने का आधार भी बनती है। यह अहिंसक प्रतिरोध, आपसी निर्भरता और सहानुभूति के नए रूपों को जन्म देती है, जो एक अलग तरह की राजनीति और समाज की नींव रख सकते हैं।‘बॉडीज़ दैट मैटर: ऑन द डिस्कर्सिव लिमिट्स ऑफ़ “सेक्स” (1993) (Bodies That Matter: On the Discursive Limits of ‘Sex’) पुस्तक में देह के संदर्भ में बटलर यह तर्क देती हैं कि ‘सामान्य’ शरीर की धारणा अपने आप में सीमित है। इंटरसेक्स शरीर, शरणार्थी, या राज्य द्वारा अमान्य माने गए लोग यह दिखाते हैं कि ‘मानव’ होने की परिभाषा कितनी संकीर्ण बना दी गई है। इन तथाकथित अमान्य देहों को राजनीतिक और सामाजिक मान्यता देना जरूरी है, क्योंकि इससे ही यह समझ बनती है कि मानवता किसी एक तय ढाँचे में बंद नहीं की जा सकती।पहचान और नैतिकता के प्रश्न पर बटलर यह दिखाती हैं कि जब कोई राजनीतिक परियोजना किसी एक पहचान को ही अंतिम और नैतिक समाधान के रूप में पेश करती है, तो वह नए प्रकार के बहिष्कार पैदा करती है। ज़ायोनिज़्म और यहूदी पहचान जैसे संदर्भों में वह सह-अस्तित्व और आलोचनात्मक अपनेपन की बात करती हैं, जहाँ व्यक्ति अपनी संबद्धताओं से पूरी तरह अलग हुए बिना भी उन पर सवाल उठा सकता है और उन्हें नैतिक रूप से जाँच सकता है।
कुल मिलाकर, बटलर के लिए देह की राजनीति सिर्फ़ देह तक सीमित नहीं है। यह सत्ता, सामाजिक मानदंड, पहचान और न्याय से जुड़े गहरे सवालों को सामने लाती है और हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि हम किस तरह इंसान बनते हैं और एक-दूसरे के प्रति किस प्रकार जिम्मेदार हैं। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी को बनाया जाना, बजाया जाना और फिर उपेक्षित कर दिया जाना उसी प्रक्रिया की ओर संकेत करता है जहाँ स्त्री-देह को उपभोग की वस्तु की तरह बरता जाता है। स्वप्निल की कविता में यह प्रक्रिया इतनी गहरी है कि बाँसुरी स्वयं अपने घावों को भूल जाती है और अंतत: उसका दमन ही पहचान का हिस्सा बन जाता है।
हेलिन सिक्सू के ‘स्त्री लेखन’ (écriture féminine) की अवधारणा के संदर्भ में ‘आदतन बज जाया करती हूँ’ को सीमित मुक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है। यह स्वर पितृसत्ता के भीतर रहकर ही प्रतिरोध करता है; वह पूरी तरह बाहर नहीं निकलता। इसके विपरीत, मंगलेश डबराल की कविता में जो विलाप है, वह विनाशकारी होते हुए भी अधिक उग्र है। यहाँ चुप्पी टूटती है, पर टूटन जीवन नहीं, राख उत्पन्न करती है। यह ब्लैक फेमिनिज़्म की उस समझ से मेल खाती है जहाँ ‘अंतर्संबंधित दमन’ (intersecting oppressions) आत्म-विनाश तक ले जा सकता है। दोनों कविताओं में ‘तुम’ एक सत्ता-स्थिति में है। स्वप्निल की कविता में यह सत्ता अंततः अस्थिर होती है—बाँसुरी बिना बजाए भी बजती रहती है। मंगलेश की कविता में यह सत्ता बनी रहती है; भीतर की बाँसुरी सुनाई नहीं देती। भारतीय संदर्भ में यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आधुनिक स्त्रीवाद की उन धाराओं को सामने लाता है जहाँ सशक्तीकरण की भाषा तो है, पर दमन की संरचना पूरी तरह टूटी नहीं है।
यह तथ्य भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि दोनों कविताओं के रचनाकार पुरुष हैं। इसलिए यहाँ स्त्री-अनुभव प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि रूपकात्मक और अप्रत्यक्ष है। फिर भी, इन कविताओं की शक्ति इसी में है कि वे स्त्री के प्रतिरोधी स्वर की अनिवार्यता को उजागर करती हैं—चाहे वह आदतन बजने की जिद के रूप में हो या राख गिराते हुए विलाप के रूप में। इस प्रकार स्त्रीवादी समीक्षा के तहत बाँसुरी एक ऐसा प्रतीक बन जाती है जो पितृसत्ता की जटिल संरचना को भी दिखाता है और उसके भीतर से उपजने वाले प्रतिरोध की संभावनाओं को भी। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता जहाँ स्त्रीवाद की आशा का संकेत देती है, वहीं मंगलेश डबराल की कविता एक चेतावनी की तरह सामने आती है—कि दमन यदि भीतर ही भीतर जमता रहा, तो अंततः स्वर नहीं, केवल राख बचेगी।
बाँसुरी की प्रतिमा में छिपे ‘विखंडन’ की प्रक्रिया उत्तर-संरचनावादी दृष्टिकोण से अत्यंत प्रासंगिक है। जैक डेरिडा की ‘différance’ और उनकी ‘ऑफ़ ग्रामेटोलॉजी’ में विवेचित सिद्धांतों के अनुसार, अर्थ कभी स्थायी नहीं होता; वह हमेशा खिसकता और टलता रहता है। स्वप्निल और डबराल की कविताओं में बाँसुरी का स्वर, छेद और विराम इसी अस्थिर अर्थ की अभिव्यक्ति हैं। बाँसुरी केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि दमन, प्रतिरोध और अभिव्यक्ति का एक मंच बन जाती है।
स्त्रीवादी दृष्टि से यह देखा जा सकता है कि वाणी और मौन की द्वंद्वात्मकता स्त्री के अनुभव को संरचित करती है। जहाँ स्वप्निल की कविता में मौन भीतर की समझ और आदतन प्रतिरोध का प्रतीक है, वहीं डबराल की कविता में मौन विनाश और विस्फोटक पीड़ा का रूप ले लेता है। यह अंतर हमें याद दिलाता है कि दमन और प्रतिरोध के स्वर समान रूप से नहीं होते; वे सामाजिक, मानसिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भिन्न-भिन्न प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
इस प्रकार सैद्धांतिक दृष्टि से ‘आदतन बजती हुई बाँसुरी’ और ‘राख गिराते हुए बाँसुरी’ दोनों ही स्त्री के अस्तित्व और उसके प्रतिरोध की बहुआयामीता को उजागर करती हैं। यहाँ बाँसुरी का हर स्वर, हर विराम, हर छेद शक्ति-संबंधों का संकेत देता है। यह संकेत स्त्रीवाद की उन धाराओं को भी प्रतिबिंबित करता है जो दमन को अनुभव से पहचानकर उसके भीतर से उभरते प्रतिरोध की खोज करती हैं।
समकालीन भारतीय संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्त्री-अनुभव केवल प्रत्यक्ष स्वरूप में नहीं, बल्कि रूपक, प्रतीक और अप्रत्यक्ष संकेतों में भी उपस्थित होता है। दोनों कविताओं में पुरुष रचनाकार द्वारा प्रस्तुत बाँसुरी इसी जटिलता का उदाहरण है—स्त्री के भीतर दबे दर्द और उसकी प्रतिरोधक क्षमता का प्रत्यक्ष दर्शन। मंगलेश डबराल की बाँसुरी-केंद्रित कविता और स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ कविता का स्त्रीवादी लेंस से विश्लेषण करते हुए बाँसुरी को स्त्री के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है – एक निष्क्रिय वस्तु जो पुरुष द्वारा नियंत्रित, आकारित और शोषित होती है, लेकिन जिसमें प्रतिरोध की संभावना है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता ‘बाँसुरी’ वस्तुत: बाँसुरी की आत्मकथा प्रतीत होती है, जो बाँस के टुकड़े से यातना के माध्यम से बाँसुरी बनने, बजाए जाने और अंत में स्वायत्त रूप से बजने की कहानी कहती है। स्त्रीवादी दृष्टि से यह कविता पितृसत्ता में स्त्री की स्थिति को चित्रित करती है, जहाँ स्त्री को पुरुष द्वारा ‘बनाया’ जाता है, शोषित किया जाता है, लेकिन वह प्रतिरोध और स्वायत्तता की ओर बढ़ती है। कविता की शुरुआत ‘मैं बाँस का एक टुकड़ा था / तुमने मुझे यातना देकर / बाँसुरी बनाया’ से होती है, जो बोउवार के ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है’ जैसे बयान की कविता में पुनर्रचना है। यहां ‘तुम’ (पुरुष सर्जक) पितृसत्ता का प्रतीक है, जो प्राकृतिक बाँस (स्त्री की प्राकृतिक अवस्था) को यातना देकर सांस्कृतिक उत्पाद (बाँसुरी/स्त्री की भूमिका) में बदलता है। यह स्त्री को वस्तु के रूप में दर्शाता है – एक उपकरण जो पुरुष अपने आनंद के लिए इस्तेमाल करता है। कविता में आई पंक्ति –‘मैं तुम्हारे आनन्द के लिए / बजता रहा’ से इसकी पुष्टि होती है। स्त्रीवादी नज़रिए से यह स्त्री के यौन शोषण और घरेलू दमन को प्रतिबिंबित करता प्रतीत होता है, जहाँ पुरुष की ‘साँसें’ (इच्छाएँ) स्त्री को भीतर तक झकझोर देती हैं और वह दर्द से भर जाती है: "मेरे रोम रोम में पिघलती थी / तुम्हारी साँसें / मैं दर्द से भर जाया करता था"। यह दर्द स्त्री-अनुभव की केंद्रीयता है, जैसा वर्जीनिया वुल्फ की ‘ए रूम ऑफ़ वन्स ओन’ (A Room of One's Own) में स्त्री लेखन में आनेवाली बाधाओं एवं पीड़ा की विस्तार से चर्चा के क्रम में बताया गया है। स्त्रियों लेखिकाओं को जिन पीड़ाओं और बाधाओं का सामना करना पड़ता है, उनका अत्यंत सूक्ष्म और विस्तार से विवरण देते हुए वर्जीनिया वूल्फ रेखांकित करती हैं कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्रियों को आर्थिक स्वतंत्रता, निजी स्थान (एक ‘अपना कमरा’) और समाज में स्त्रियों को लेकर होने वाली फ़तवेबाजी के असर से मुक्त नहीं होने देती। नतीजतन, उनकी रचनात्मकता दब जाती है, भीतर आक्रोश पनपता है और साहित्यिक परंपरा (लिटरेरी कैनन) में उनकी उपस्थिति लगभग अदृश्य रह जाती है। इसका प्रतीकात्मक उदाहरण शेक्सपीयर की वह काल्पनिक बहन—जूडिथ शेक्सपियर—है, जो अपने भाई की तरह कभी फल-फूल नहीं सकती। वूल्फ का कहना है कि आर्थिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वायत्तता के अभाव में स्त्रियों को या तो चुप करा दिया जाता है या उन्हें घरेलू दायरों में सीमित कर दिया जाता है। ऐसे में सच्ची कलात्मक अभिव्यक्ति व्यवस्था-जनित अवरोधों के विरुद्ध एक पीड़ादायक रचनात्मक संघर्ष बन जाती है।
स्वप्निल की कविता में छेद (‘मेरे अंदर कितने छेद है’) स्त्री शरीर के घावों या कमी को प्रतीकित करते हैं, जो पितृसत्ता की ‘देन’ हैं। बटलर के ‘लिंग परफॉर्मेंस’ के तहत बाँसुरी बजना एक ‘परफॉर्मेटिव’ भूमिका है – स्त्री को पुरुष के लिए ‘बजना’ पड़ता है, लेकिन वह इस भूमिका को कभी-कभार चुनौती भी देती है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ ‘मैं तुम्हारे अकेलेपन की बाँसुरी हूँ / तुम नहीं बजाते हो तो भी / मैं आदतन बज जाया करती हूँ’ स्त्री की ‘आदतन पराधीनता’ और मुक्ति, दोनों ही को संकेतित करती प्रतीत होती हैं। स्त्री-मुक्ति के लिहाज से यह सिक्सू की ‘स्त्री-लेखन’ ("écriture féminine") की तरह है जहां पितृसत्ता से स्वतंत्र होकर स्त्री अपनी आवाज़ पाती है। कविता में प्रयुक्त ‘आदतन’ शब्द आदत के बंधन को दर्शाता है। इसलिए यह कविता स्त्री की पूर्ण मुक्ति के बजाय आंशिक प्रतिरोध का उदाहरण प्रतीत होती है।
कुल मिलाकर यह कविता स्त्रीवाद की दूसरी लहर (second-wave feminism) को प्रतिबिंबित करती है, जो व्यक्तिगत को राजनीतिक बनाती है। यह स्त्री को पीड़ित से सशक्त बनने की यात्रा दिखाती है, लेकिन पितृसत्ता की छाया भी बनी रहती है। स्त्रीवादी नज़रिए से कविता की कमजोरी यह है कि इसमें ‘तुम’(पुरुष) प्रमुख है, जो स्त्री केन्द्रीयता को कम करती है। फिर भी, यह रचना भारतीय स्त्रीवाद के संदर्भ में इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि अपने देश में स्त्री की स्थिति कई बार घर की ‘बाँसुरी की तरह है – सजावटी लेकिन शोषित।
मंगलेश डबराल की कविता में आई पंक्तियाँ -‘बाहर एक बाँसुरी सुनाई देती है / एक और बाँसुरी है / जो तुम्हारे भीतर बजती है / और सुनाई नहीं देती’- बाँसुरी को दो स्तरों पर रखती है। बाहर की सुनाई देने वाली और भीतर की चुप। स्त्रीवादी दृष्टि से यह पितृसत्ता द्वारा स्त्री की आवाज़ के दमन को चित्रित करती है, जहाँ बाहरी दुनिया पुरुष-केंद्रित है और आंतरिक स्त्री अनुभव दमित रहता है। कविता में ‘बाहर/भीतर’ का द्वंद्व स्त्रीवाद की सार्वजनिक/निजी क्षेत्र के विभाजन को दर्शाता है। बाहर की बाँसुरी ‘सुनाई देती है’ – यह पितृसत्तात्मक समाज में स्वीकृत स्त्री की भूमिका है। लेकिन भीतर की ‘सुनाई नहीं देती’ – यह दमित स्त्री आवाज है, जैसा गेल रुबिन की ‘लिंग आधारित समाज-व्यवस्था’(‘sex/gender system’) पुस्तक में स्त्री को अधीन बताया गया है। ‘एक दिन बहुत वह चुप हो जाती है / तब सुनाई देता है उसका विलाप’ -में चुप्पी विलाप बनती है, जो स्त्री के दर्द की विस्फोटक अभिव्यक्ति है। यह बोउवार के ‘अन्य’ (the Other) की अवधारणा को साकार करती है। गौरतलब है कि पुरुष की तुलना में स्त्री ‘अन्य’ है, जब तक विनाश नहीं होता उसकी आवाज़ दबी रहती है। ‘उसके छेदों से गिरती है राख़’ में जाहिरा तौर पर छेद स्त्री शरीर के घाव हैं और राख मृत्यु या विनाश का प्रतीक जो पितृसत्ता में स्त्री की आत्म-विनाश की ओर संकेत करता है।
इस सन्दर्भ में थोड़ा रुककर ‘जेंडर परफॉर्मेटिविटी’ सिद्धांत पर विचार करना उपादेय हो सकता है जिसे अमेरिकी दार्शनिक, आलोचक और क्वीर सिद्धांतकार जूडिथ बटलर ने अपनी 1990 की किताब ‘जेंडर ट्रबल: फेमिनिज़्म एंड द सबवर्ज़न ऑफ आइडेंटिटी’ और इससे पहले 1988 में लिखे अपने निबंध “परफॉर्मेटिव एक्ट्स एंड जेंडर कॉन्स्टिट्यूशन” में प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार ‘जेंडर’ कोई स्थिर पहचान या चीज़ नहीं है, बल्कि एक प्रक्रिया है—कुछ ऐसा जो हम लगातार अपने कामों और व्यवहार से करते हैं। यानी जेंडर ‘होने’ से ज़्यादा ‘करने’ की चीज़ है। बटलर का कहना है कि ‘जेंडर’ समय के साथ बार-बार दोहराए जाने वाले सामाजिक व्यवहारों और आदतों से बनता है। यह सोच सेक्स और जेंडर के पारंपरिक फ़र्क को भी चुनौती देती है। बटलर के अनुसार सेक्स अपने आप में कोई तय अर्थ नहीं रखता, बल्कि उसका अर्थ भी जेंडर के सामाजिक संदर्भ से बनता है। उनके अनुसार ‘परफॉर्मेटिविटी’ को साधारण ‘अभिनय’ से अलग समझना ज़रूरी है। अभिनय का मतलब होता है किसी तय भूमिका को निभाना, जैसे मंच पर कोई किरदार निभाया जाता है। जबकि ‘परफॉर्मेटिविटी’ का अर्थ है ऐसे काम करना जिनके ज़रिए पहचान धीरे-धीरे बनती है। बटलर ने इसे दार्शनिक जे. एल. ऑस्टिन के परफॉर्मेटिव कथनों के सिद्धांत से जोड़ा है, जहाँ बोलना या करना अपने आप में एक क्रिया बन जाता है। अत: ‘जेंडर परफॉर्मेटिविटी’ सिद्धांत में इस बात पर बल है कि जेंडर कोई पहले से तय सच नहीं है, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार, भाषा और सामाजिक क्रियाओं से लगातार बनता और बदलता रहता है।
इस नज़रिए से मंगलेश डबराल की कविता में भीतर की बाँसुरी की चुप्पी पितृसत्ता द्वारा थोपी गई ‘परफॉर्मेंस’ प्रतीत होती है। कविता में स्त्री-आवाज़ ‘सुनाई नहीं देती’, लेकिन जब सुनाई देती है, तो विलाप के रूप में, जो विद्रोह है। सिक्सू के अनुसार यह स्त्री-पक्षधर लेखन की कमी को उजागर करता है। संभव है कि अगर मंगलेश डबराल की जगह कोई सामर्थ्यवान स्त्री कवि इस स्थिति को चित्रित करे तो उसका लहज़ा और रचनात्मक तर्क नितांत भिन्न हो। भारतीय स्त्रीवाद में यह ग्रामीण स्त्रियों के दमन को प्रतिबिंबित करता प्रतीत होता है, जहाँ उनकी आवाज ‘राख’ बन जाती है। कविता की संक्षिप्तता स्त्री अनुभव की संक्षिप्तता को दर्शाती है। कविता में ‘तुम्हारे भीतर’ पुरुष-केंद्रित संबोधन है, जो स्त्री को पुरुष के भीतर ही सीमित रखता है। फिर भी, यह कविता तीसरी लहर के स्त्रीवाद (third-wave feminism) का स्पर्श करती हुई अंतर्संबंधित दमन को सामने लाती है।
दोनों कविताएँ बाँसुरी को स्त्री का प्रतीक बनाती हैं, लेकिन उनकी व्याख्याएँ भिन्न हैं। मंगलेश डबराल की दमन और विनाश पर केन्द्रित है, पर स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता रूपांतरण और प्रतिरोध पर। स्त्रीवादी दृष्टि से दोनों पितृसत्ता की आलोचना करती हैं, लेकिन स्वप्निल अधिक आशावादी हैं, जबकि मंगलेश निराशावादी। याद रहे कि कवि मंगलेश का निराशावाद परिवार और समाज में स्त्री की स्थिति में परिवर्तन के लिए किसी प्रकार के तात्कालिक सुधार के बजाय प्रकारांतर से आमूल चूल बदलाव पर बल देता है।
दोनों कविताओं में व्यक्त प्रतिरोधी चेतना पर तुलनात्मक दृष्टि से नज़र दौड़ाने पर सिक्सू के स्त्री लेखन की तरह स्वप्निल की कविता में ‘आदतन बज जाया करती हूँ’ स्त्री की सीमित मुक्ति का प्रकटीकरण है। मंगलेश डबराल की कविता में विलाप के माध्यम से विनाशपूर्ण होने के बावजूद प्रतिरोध ‘ब्लैक फेमिनिज्म’ की तरह अंतर्संबंधित दमन को प्रकट करता है। शक्ति संरचनाओं में दोनों कविताओं में ‘तुम’ पुरुष है, लेकिन स्वप्निल में वह उलट जाता है जबकि मंगलेश में बना रहता है। भारतीय संदर्भ में स्वप्निल की कविता स्त्री-सशक्तीकरण की बात करने वाले आधुनिक स्त्रीवाद की पुनर्रचना प्रतीत होती है। दोनों कविताओं के रचनाकार पुरुष हैं, जिसके कारण स्पष्ट स्त्री परिप्रेक्ष्य के बजाय कहीं न कहीं स्त्री-अनुभव अप्रत्यक्ष बनता है। बावजूद इसके दोनों रचनाएँ स्त्री के प्रतिरोधी स्वर की आवश्यकता को उजागर करती हैं। इस प्रकार पितृसत्ता की जटिलता को सामने लाने वाली स्वप्निल की कविता स्त्रीवाद की आशा है, जबकि विलाप और ‘राख’ की बात करने के बावजूद मंगलेश डबराल की कविता एक प्रकार की चेतावनी। स्त्रीवादी समीक्षा के तहत दोनों कविताएँ बाँसुरी को स्त्री दमन का प्रतीक बनाती हैं, लेकिन प्रतिरोध की संभावनाएँ भी प्रदान करती हैं।
देरिदा का विखंडन और स्त्रीवाद, दोनों उत्तर-आधुनिक विचारधारा की उन धाराओं से उद्भूत हैं जो स्थिर संरचनाओं, द्वंद्वों और शक्ति की संरचनाओं पर लगातार प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं। विखंडन वस्तुत: भाषा और पाठ के भीतर छिपी अस्थिरता को उजागर करता है, जबकि स्त्रीवाद लैंगिक असमानता के आधार पर निर्मित गुलामी की संरचना और पितृसत्ता की राजनीति को निशाना बनाता है। इनके रास्ते भले अलग हों, फिर भी हेलिन सिक्सू, ल्यूस इरिगरे और जूडिथ बटलर जैसी स्त्रीवादी विचारक देरिदा के ‘विखंडन’ को हाथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं, क्योंकि यह पुरुष-स्त्री या तर्क-भावना जैसे पितृसत्तात्मक द्वंद्वों को तोड़ने में बेजोड़ युक्ति साबित होता है।
दोनों कविताओं में बाँसुरी एक ऐसा संकेत बनकर उभरती है जो रूपांतरण की पीड़ा, मुक्ति के स्वर का संधान और चुप्पी की गहराई से गुज़रता है। ‘विखंडन’ और ‘स्त्रीवाद’ इसे पितृसत्ता की संरचना के रूप में पढ़ते हैं, पर इनका नज़रिया अलग-अलग है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में विखंडन प्रकृति और संस्कृति, दर्द और आनंद, नियंत्रण और स्वायत्तता के द्वंद्वों को इतना अस्थिर कर देता है कि यातना से जन्मा निर्माण देरिदा के शब्दों में एक ‘सप्लिमेंट’ बन जाता है और अंत में बाँसुरी का ‘आदतन बजना’ अर्थ की अनंत विलंबितता में बदल जाता है। स्त्रीवाद उस प्रक्रिया को पुरुष द्वारा स्त्री को गढ़ने और उसके आनंद के लिए शोषित करने की कहानी के रूप में देखता है, पर अंत में जो स्वायत्तता मिलती है उसे स्त्री मुक्ति का साफ़ संकेत मानता है। ‘विखंडन’ अर्थ को अनिश्चित और अनंत छोड़कर एक तरह का तटस्थ उत्सव मनाता है, जबकि स्त्रीवाद उसे राजनीतिक मुक्ति की दिशा में मोड़ता है और सामाजिक परिवर्तन की आशा जगाता है।
मंगलेश डबराल की कविता में विखंडन बाहर और भीतर, सुनाई देने और न सुनाई देने के द्वंद्व को पूरी तरह उलट देता है। परिणामत: चुप्पी विलाप में बदलती है और ‘राख’ अर्थ के अंतिम विलंब की तरह बिखर जाती है। ‘छेद’ कमी के अवशेष या ‘ट्रेस’ बन जाते हैं जो अर्थ तो पैदा करते हैं पर विनाश भी लेकर आते हैं। स्त्रीवाद इसे बाहर की स्वीकृत आवाज़ और भीतर की दमित स्त्री आवाज़ के बीच के फ़र्क के रूप में पढ़ता है, जहाँ चुप्पी से विलाप तक का रास्ता पितृसत्ता के दमन की पराकाष्ठा बन जाता है। विखंडन इस विनाश को अर्थ की शाश्वत अस्थिरता की तरह देखता है और मुक्तिदायक निराशावाद में डूब जाता है। चूँकि कोई केंद्र बचता ही नहीं, इसलिए स्त्रीवाद इसे स्त्री के आत्म-विनाश या अंतिम विद्रोह की त्रासदी मानता है और आक्रामकता के साथ परिवर्तन की गुहार लगता है।
दोनों ही रचनाओं में निहित दृष्टिकोण मिल कर पितृसत्तात्मक द्वंद्वों को चुनौती देते हैं और छेद को कमी या घाव का प्रतीक बनाते हैं जिससे सर्जक की शक्ति दोनों कविताओं में अस्थिर हो जाती है। फिर भी विखंडन भाषा के दार्शनिक खेल में डूबा रहता है और अर्थ को अनंत छोड़ देता है, जबकि स्त्रीवाद अनुभव की ठोस जमीन पर खड़ा होकर अर्थ को स्त्री मुक्ति की ओर ले जाता है। ‘उत्तर-संरचनावादी स्त्रीवाद’ में ‘विखंडन’ लिंग को ‘परफॉर्मेटिव’ दिखाने का एक औजार बनता है। इन कविताओं में ‘विखंडन’ अनंत संभावनाएँ खोलता है, स्त्रीवाद उन्हें स्त्री-अनुभव की मुक्ति से जोड़ता है। स्वप्निल की कविता में ‘विखंडन’ अनंत संभावना पैदा करता है, तो स्त्रीवाद आंशिक मुक्ति देखता है। मंगलेश की कविता में विखंडन शून्यता फैलाता है, तो स्त्रीवाद दमन की त्रासदी उजागर करता है। दोनों साथ आकर एक गहरी और समृद्ध व्याख्या रचते हैं जिसमें विखंडन औजार बनता है और स्त्रीवाद दिशा देता है। शुद्ध विखंडन अगर स्त्री के स्थिर सार की बात करे तो कभी-कभार स्त्रीवाद को ज्यादा ‘मेटाफिजिकल’ मान सकता है और कुछ स्त्रीवादी विखंडन को पुरुष-केंद्रित बता सकती हैं, क्योंकि वह मुनासिब कार्रवाई नहीं सुझाता। फिर भी दोनों चिन्तन पद्धतियाँ इन कविताओं को पितृसत्ता की गहरी आलोचना का सशक्त माध्यम बनाती हैं, जहाँ बाँसुरी अर्थ की अस्थिरता और मुक्ति का जीवंत प्रतीक बन कर उभरती है।
उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना में बाँसुरी को कभी भी केवल एक मधुर वाद्य या शांत आध्यात्मिक प्रतीक नहीं माना जाता; वह हिंसा की एक लंबी, गहन, छिपी हुई कहानी है जो ध्वनि बनकर बाहर आती है। बाँस पहले मिट्टी में जड़ें जमाए खड़ी रहती है, हवा में लहराती है, नदी के किनारे जीवन की साँस लेती है—फिर एक दिन तेज़ धार से काट दी जाती है। उसकी हरियाली छीन ली जाती है, छिलका उतार दिया जाता है, भीतर का गूदा खोखला कर दिया जाता है और फिर छेद—एक के बाद एक—उसके शरीर में चुभो दिए जाते हैं। ये छेद कोई सजावट नहीं, ये घाव हैं, जिनके बिना कोई स्वर नहीं निकल सकता। और जब पहला स्वर फूटता है, तो वह सुंदरता की नहीं, बल्कि पहले हो चुकी चीर-फाड़ की गवाही देता है—एक ऐसी आवाज़ जो पहले के दर्द को छिपाकर गुनगुनाती है। दलित, आदिवासी और जाति-विरोधी नज़र में यह बाँस हाशिए के श्रम की, उस ज्ञान की, उस जीवन की प्रतीक है जिसे ऊँची जाति, औपनिवेशिक शासक और राष्ट्रवादी अभिजात वर्ग काटकर तराशते हैं, फिर उसकी धुन पर तालियाँ बजाते हैं—पर काटने वाले हाथ, बनाने वाली उँगलियाँ, बजाने वाली साँसों का इतिहास चुपचाप मिटा देते हैं। बाँसुरी इस तरह औपनिवेशिक संसाधन की पूरी कथा कहती है: जंगल को काटो, ज़मीन को खोखला करो, स्वदेशी जीवन में छेद करो—और फिर उससे निकली ध्वनि को विदेशी उदासी या शाश्वत आध्यात्मिकता का नाम देकर बेच दो। जो स्वर हम सुनते हैं वह वास्तव में किसी और की साँस से बोला गया है—वह उपेक्षित शरीर, छिद्रित बाँस, स्वर तो पैदा करता है, पर वह स्वर तभी आकार पाता है जब उसमें कोई प्रभावशाली साँस फूँकी जाती है—चाहे वह भक्ति-कथा का कृष्ण हो, औपनिवेशिक साहब हो, ऊँची जाति का संरक्षक हो या पश्चिमी जैज़ वादक। उसकी आवाज़ कभी पूरी तरह अपनी नहीं होती—वह बोलती तभी है जब उसके माध्यम से बोला जाता है। गायत्री स्पिवक का सवाल ‘क्या सबाल्टर्न बोल सकता है?’ इसी बाँसुरी पर सबसे ज़्यादा गूँजता है—उसकी ध्वनि को अधिकृत किया जाता है, वेंट्रिलोक्वाइज्ड किया जाता है, मालिक के कान के लिए पठनीय बनाया जाता है। होमी भाभा की नकल और संकरता यहाँ भी साँस लेती है—जब बाँसुरी औपनिवेशिक बैंडों में, चर्च के भजन में, इंडो-जैज़ में या वैश्विक संगीत में प्रवेश करती है, तो वह एक ऐसी ध्वनि-स्थली रचती है जो न पूरी तरह भारतीय रहती है, न पूरी तरह पश्चिमी में समा जाती है। उपनिवेशक उसमें आध्यात्मिक उदासी सुनता है, उपनिवेशित उसमें अपनी खोई स्वायत्तता का दर्द और साथ ही एक छिपा विद्रोह भी सुनता है—लगभग वही स्वर, पर बिलकुल वही नहीं। वह ध्वनि नियंत्रण से बच निकलती है, उसका मज़ाक उड़ाती है, उस शक्ति को हिलाती है जिसने उसे जीत लिया था समझ रखा था। नारीवादी और लिंग-आधारित नज़र में यह रूपक और गहरा हो जाता है—खोखली की गई, छेद वाली बाँस में पुरुष साँस के प्रवेश का यौन-चिह्न स्पष्ट है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता इसे नंगे शब्दों में कहती है: बाँस को यातना देकर बाँसुरी बनाया जाता है, उसके आनंद के लिए बजाया जाता है, फिर अँधेरे कोने में फेंक दिया जाता है—फिर भी वह आदतन बजती रहती है, मालिक के बिना भी। यह क्षतिग्रस्त, बाध्यकारी, भूतिया स्वायत्तता है—जो प्रभावशाली खिलाड़ी के चले जाने के बाद भी कंपन करती रहती है। मंगलेश डबराल की कविता इस रूपक को सबसे गहरी उदासी तक ले जाती है—भीतरी बाँसुरी अंततः पूरी तरह चुप हो जाती है, फिर उसका विलाप सुनाई देता है और छेदों से राख गिरती है। यह उत्तर-औपनिवेशिक शोक है—एक बार गूँजी हुई चेतना का धीरे-धीरे जलकर राख हो जाना, जब औपनिवेशिक या पितृसत्तात्मक मालिक जा चुका होता है। दोनों कविताओं में मालिक के प्रस्थान के बाद बाँसुरी अपूर्ण आज़ादी की आकृति बन जाती है—एक ऐसी क्षतिग्रस्त स्वायत्तता जो बिना किसी समाधान के गूँजती रहती है। राष्ट्रवादी कल्पना में बाँसुरी को शाश्वत आध्यात्मिक भारत की ध्वनि बना दिया जाता है—कृष्ण की मुरली, ग्रामीण भारत की उदासी, पूर्व की आत्मा—यह सौंदर्य-मोहक मंत्र एक साथ जाति, श्रम, लिंग और औपनिवेशिक इतिहास को मिटा देता है। उत्तर-औपनिवेशिक आलोचक इस आदर्शीकरण को दूसरी बार का उपनिवेशवाद कहते हैं—बाँसुरी को एक नॉस्टैल्जिक चिह्न में अनुशासित कर दिया जाता है जो उसकी रचना की हिंसा और यह असमानता छिपा देता है कि कौन किस मंच पर, किसके कानों के लिए उसे बजा सकता है। कुल मिलाकर यह बाँसुरी कभी भी केवल उत्क्रमण का साधन नहीं होती—वह एक भौतिक और प्रतीकात्मक स्थल है जहाँ औपनिवेशिक दोहन, सबाल्टर्न वेंट्रिलोक्विज़्म, लिंग-आधारित प्रवेश, नकल, संकरता और क्षतिग्रस्त स्वायत्तता सब एक साथ गूँजते हैं। उसकी ध्वनि सुंदर तभी है क्योंकि पहले उसे घायल किया जाना अनिवार्य था।
स्त्रीवाद से भिन्न उत्तर-उपनिवेशिक दृष्टि बाँसुरी अर्थ को और व्यापक बनाती है। यहाँ बाँसुरी केवल स्त्री की नहीं, बल्कि उपनिवेशित व्यक्ति और समाज की चेतना का प्रतीक बन जाती है। सत्ता पहले इस चेतना को गढ़ती है, फिर उसका उपयोग करती है और अंततः उसे मौन में बदल देती है। इस प्रक्रिया में चुप्पी कोई प्राकृतिक अवस्था नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से निर्मित स्थिति होती है। इस सिद्धांत के आलोक में स्वप्निल श्रीवास्तव और मंगलेश डबराल की बाँसुरी विषयक कविताएँ आधुनिक हिंदी कविता में सत्ता, शोषण और हाशिए की चेतना को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं। दोनों कविताओं में बाँसुरी मात्र एक वाद्य नहीं है, बल्कि वह उपनिवेशित व्यक्ति, समाज और चेतना का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आती है। यह सिद्धांत उपनिवेश और उपनिवेशित के बीच असमान संबंधों, सांस्कृतिक दमन, आत्मविस्मृति और मौन पीड़ा को समझने का माध्यम प्रदान करता है, जिसे दोनों कवि अपने-अपने ढंग से रचनात्मक रूप देते हैं।
स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता में बाँसुरी स्वयं अपनी कथा कहती है। वह अपने प्राकृतिक, स्वतंत्र अस्तित्व से शुरू होकर यातना के माध्यम से एक उपयोगी वस्तु में बदल दी जाती है। यह प्रक्रिया औपनिवेशिक हिंसा की याद दिलाती है, जहाँ किसी समाज या व्यक्ति को उसकी मूल पहचान से अलग कर सत्ता के मनोरंजन और लाभ के साधन में रूपांतरित कर दिया जाता है। बाँसुरी का बजाया जाना और फिर अँधेरे कोने में रख दिया जाना उस व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें शोषित की अहमियत केवल उसकी उपयोगिता तक सीमित रहती है। शासक की साँसों का बाँसुरी के रोम-रोम में उतरना उस सांस्कृतिक और वैचारिक आरोपण का प्रतीक है जिसके माध्यम से उपनिवेशित चेतना को नियंत्रित किया जाता है। धीरे-धीरे बाँसुरी अपने भीतर के छेदों को भूल जाती है, जो उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ पीड़ा को सामान्य मान लिया जाता है। कविता का अंत इस तथ्य को उजागर करता है कि शासक का अकेलापन भी उसी शोषित से भरता है, जिससे वह स्वयं को लगातार वंचित करता रहा है।
इसके विपरीत मंगलेश डबराल की कविता अधिक सूक्ष्म, प्रतीकात्मक और आत्मचिंतनपरक है। यहाँ बाँसुरी का स्वर बाहर भी है और भीतर भी, लेकिन भीतर की बाँसुरी सुनाई नहीं देती। यह आंतरिक उपनिवेश की स्थिति को रेखांकित करता है, जहाँ दमन इतना गहरा हो जाता है कि व्यक्ति स्वयं अपनी पीड़ा का स्वर पहचान नहीं पाता। बाहरी सत्ता के साथ-साथ आंतरिक मौन और भय भी व्यक्ति की चेतना पर हावी हो जाते हैं। जब वह भीतर की बाँसुरी एक दिन पूरी तरह चुप हो जाती है, तब उसका विलाप सुनाई देता है। कविता में यह चुप्पी सांस्कृतिक मृत्यु और पहचान के क्षरण का संकेत है। छेदों से गिरती राख़ उस जले हुए इतिहास, स्मृति और अस्मिता का प्रतीक है, जो लंबे शोषण के बाद शेष रह जाती है।
तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता उपनिवेशित की प्रत्यक्ष और जीवंत स्वर है, जो शोषण सहते हुए भी लगातार बजती रहती है। उसमें पीड़ा के साथ एक तरह की आदतन स्वीकृति दिखाई देती है। मंगलेश डबराल की कविता उस प्रक्रिया के अंतिम बिंदु को दर्शाती है, जहाँ भीतर की आवाज़ समाप्त हो जाती है और केवल राख़ बचती है। एक कविता शोषण की निरंतरता को रेखांकित करती है, जबकि दूसरी उसके भयावह परिणाम को। इस प्रकार दोनों कविताएँ मिलकर उस ‘पोस्टकॉलोनियल’ अनुभव की संपूर्ण त्रासदी को सामने लाती हैं - जहाँ शरीर, श्रम, चेतना और स्मृति सब किसी न किसी रूप में सत्ता के दमन का शिकार बनते हैं।
अत: यह कहा जा सकता है कि साहित्य केवल सौंदर्य की साधना नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, सत्ता और प्रतिरोध का दर्पण भी हो सकता है। बाँसुरी और उसके स्वर के माध्यम से दमन और प्रतिरोध के अनुभव को समझना हमें यह एहसास कराता है कि स्त्रीवादी विश्लेषण में प्रतीक, रूपक और भाषा कितने महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि स्वप्निल श्रीवास्तव और मंगलेश डबराल की कविताएँ आज भी अध्ययन और चर्चा के योग्य हैं।
ऑस्कर वाइल्ड की ‘द फ्लूट प्लेयर’ (The Flute-Player) में बाँसुरी की धुन इतना प्रभावशाली है कि ‘रेड गॉडस’ (red gods) अपने आसनों से झुककर उसे सुनते हैं। यह दृश्य सत्ता के क्षणिक विचलन का प्रतीक है—देवता सुनते हैं, ठहरते हैं, पर रूपांतरित नहीं होते। बाँसुरी यहाँ सौंदर्य का ऐसा क्षण है जो व्यवस्था को थोड़ी देर के लिए रोक देता है, लेकिन उसे तोड़ता नहीं। यह स्थिति न तो भागवत की तरह दिव्य स्थिरता रचती है, न ही रूमी की तरह अस्तित्वगत टूटन।
ऑस्कर वाइल्ड की कविता की ये पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:
"The red deer leans through the fens,
The red gods lean from the sky;
The shepherd piped a tune,
The world forgot to die."
वाइल्ड यहाँ सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) के उस चरम को छूते हैं जहाँ कला किसी उद्देश्य की चेरी नहीं, बल्कि स्वयं में एक साध्य है। 'रेड गॉडस' का अपने आकाश से झुकना सत्ता के उस अहंकार का ढहना है, जो सौंदर्य के सामने नतमस्तक तो होता है, पर विसर्जित नहीं। यह 'झुकना' एक यांत्रिक आकर्षण है, जैसे कोई भारी वस्तु चुंबकीय क्षेत्र में खिंची चली आए। यहाँ देवता रूपांतरित इसलिए नहीं होते क्योंकि वाइल्ड का 'सौंदर्य' नैतिक सुधार का साधन नहीं है; वह तो केवल एक विस्मृति है—"The world forgot to die।"
यह स्थिति भागवत के 'वेणु गीत' से इसलिए भिन्न है क्योंकि वहाँ बाँसुरी आत्मा को उसके मूल स्रोत से जोड़कर एक स्थायी दिव्य आनंद (Ananda) में स्थिर कर देती है। वाइल्ड के यहाँ कोई आध्यात्मिक गंतव्य नहीं है, बस एक ठहराव है। वहीं, रूमी की बाँसुरी जिस 'वज़ूदी बिखराव' या विरह की बात करती है, वह मनुष्य के भीतर एक टीस पैदा करती है जो उसे सत्य की खोज के लिए बेचैन करती है। वाइल्ड की बाँसुरी बेचैन नहीं करती, वह सम्मोहित करती है। यह व्यवस्था को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे थोड़ी देर के लिए 'स्थगित' (Suspend) कर देती है। यह कला की वह शक्ति है जो क्रूर नियति और कठोर देवताओं को भी कुछ क्षणों के लिए उनके पदानुक्रम (Hierarchy) से डिगा देती है, भले ही संगीत रुकते ही वे पुनः अपनी कठोरता में वापस लौट जाएँ।
रूमी की बाँसुरी-कविता उस सौंदर्य को भीतर से चीरती है। ‘मसनवी’ की आरंभिक पंक्तियाँ (अंग्रेज़ी अनुवाद) कहती हैं:
“Listen to the reed how it complains, telling a tale of separations. Ever since I was cut from the reed-bed, my lament has caused man and woman to moan.”
यहाँ बाँसुरी किसी को रोकने या मोहित करने का साधन नहीं है, बल्कि स्वयं एक घाव है जो बोल रहा है। संगीत का स्रोत देवता नहीं, बल्कि कटाव है—नरकट (reed-bed) से अलग किया जाना। देरिदा की दृष्टि से यह वह क्षण है जहाँ अर्थ किसी केंद्रीय उपस्थिति से नहीं, बल्कि अनुपस्थिति से जन्म लेता है। बाँसुरी का नाद उसकी पूर्णता का नहीं, उसकी कमी का परिणाम है। वह इसलिए बोलती है क्योंकि वह अब पूरी नहीं है।रूमी की बाँसुरी रूपक उनकी सबसे गहरी और सबसे प्रसिद्ध छवियों में से एक है—मसनवी की पहली पंक्तियों में ही यह ध्वनि उठती है, एक ऐसी आवाज़ जो पहले से ही टूटन और वियोग की कहानी कह रही होती है:
“सुनो इस नय को, कैसे वह शिकायत करती है
वियोग की कहानी सुनाती है।”
यह ‘नय’—बाँस की बनी बाँसुरी—कोई साधारण वाद्य नहीं है। वह एक जीवित प्राणी की तरह है, जो कभी नदी के किनारे मिट्टी में जड़ें जमाए खड़ा था, हवा में लहराता था, अपनी हरियाली में पूरा और संतुष्ट। फिर एक दिन उसकी जड़ से काट लिया गया। उसकी पत्तियाँ छीन ली गईं, छिलका उतार दिया गया, भीतर का गूदा खोखला कर दिया गया और फिर छेद—एक के बाद एक—उसके शरीर में चुभो दिए गए। ये छेद कोई सजावट नहीं हैं; ये घाव हैं। और बिना इन घावों के, बिना इस खोखलेपन के, कोई स्वर नहीं निकल सकता। रूमी कहते हैं:
“जब से मुझे सरकंडे के बिस्तर से काटा गया है
मेरी पुकार ने पुरुष और स्त्री दोनों को रुलाया है।”
यह पुकार कोई संगीत नहीं है—यह विलाप है। यह उस मूल से अलगाव की कहानी है, जहाँ वह कभी था—ईश्वर के साथ, स्रोत के साथ, पूर्णता के साथ। बाँसुरी का स्वर इसलिए नहीं बजता कि वह खुश है; वह इसलिए बजता है क्योंकि वह पहले से ही टूट चुका है। हर सुर, हर तान, हर लय उस कटाव का दर्द है, उस खोखलेपन का दर्द है, उस वियोग का दर्द है जो अब कभी पूरा नहीं हो सकता। फिर भी विडंबना है कि यही घाव ही उसे बोलने की शक्ति देते हैं। जो पूरा था, वह चुप था। जो काटा गया, खोखला किया गया, छेदा गया—वही गा सकता है।
रूमी के लिए यह सूफ़ी मार्ग का सबसे बड़ा रहस्य है: आत्मा को पहले खाली होना पड़ता है, घायल होना पड़ता है, अलग होना पड़ता है—तब ही उसमें ईश्वरीय साँस प्रवेश कर सकती है। और जब वह साँस फूँकी जाती है—चाहे वह प्रेम की साँस हो, चाहे ईश्वर की साँस—तब खोखलेपन से संगीत बनता है। वह संगीत दुख का नहीं, बल्कि दुख से गुज़रने के बाद की उस तीव्र पुकार का है जो वापस लौटने की चाह रखती है:
“मैं एक ऐसे हृदय की तलाश में हूँ जो वियोग से चीर दिया गया हो
ताकि मैं उस तड़प को बयाँ कर सकूँ।”
जिन्हें 'बाँसुरी का गीत' (Song of the Reed) के रूप में विख्यात रूमी की 'मसनवी' की शुरुआती पंक्तियाँ इस आध्यात्मिक विरह और हृदय की उस 'टूटन' को अद्भुत ढंग से व्यक्त करती हैं। वह हृदय जो विरह में छिन्न-भिन्न हो चुका हो, वही उस दिव्य संगीत का वाहक बन सकता है।इन प्रसिद्ध पंक्तियों का रेनॉल्ड ए. निकल्सन (R.A. Nicholson) द्वारा किया गया प्रामाणिक अंग्रेज़ी अनुवाद इस प्रकार है:
"I want a bosom torn by severance, that I may unfold (to such a one) the pain of love-longing."
यहाँ ‘वियोग से चीरा गया हृदय’ (bosom torn by severance) उसी अनिवार्य खालीपन और घाव का प्रतीक है जिसका उल्लेख किया जा चुका है । रूमी के दर्शन में बाँसुरी (आत्मा) जब तक अपने मूल (बाँस के झुरमुट) से कटकर अलग नहीं होती और भीतर से खोखली नहीं की जाती, तब तक वह परमात्मा की फूँक को संगीत में बदलने के योग्य नहीं बनती। यह संगीत वास्तव में उस 'मूल' की ओर वापस लौटने की एक तीव्र और सचेत पुकार है। वाइल्ड के यहाँ जहाँ संगीत केवल एक क्षणिक सौंदर्यबोध है, वहीं रूमी के यहाँ यह आत्मा की वह चीख है जो अपनी पहचान को ईश्वर में विलीन कर देने के लिए व्याकुल है।
दूसरे शब्दों में, रूमी कहते हैं कि ‘नय’(बाँसुरी) की बात वही समझ सकता है जिसका दिल भी पहले कट चुका हो। सुनने वाला और बजाने वाला—दोनों को वही दर्द चाहिए। बाँसुरी की ध्वनि इसलिए नहीं सुनाई देती कि वह सुंदर है; वह इसलिए सुनाई देती है क्योंकि वह दर्द की भाषा है। वह उस व्यक्ति की भाषा है जो अपने मूल से दूर है और अब हर स्वर में उसी मूल की याद को पुकारता है।इस रूपक में रूमी पूरी सूफ़ी दुनिया को समेट लेते हैं। बाँसुरी आत्मा है। कटाव वह अलगाव है जो जन्म के साथ शुरू होता है। खोखलापन वह त्याग है जो अहंकार से मुक्ति देता है। छेद वे परीक्षाएँ, वे दुख, वे प्रेम-प्रहार हैं जो आत्मा को पारगम्य बनाते हैं। और साँस—वह ईश्वरीय प्रेम है जो बिना किसी शर्त के प्रवेश करती है। जब वह साँस फूँकी जाती है, तब खोखलेपन से नाद बनता है—और नाद ही वह पुल है जो अलगाव को पुनर्मिलन में बदल देता है। पर यह पुनर्मिलन कभी पूरा नहीं होता। नय की पुकार कभी खत्म नहीं होती। वह हमेशा वियोग की कहानी कहती रहती है—क्योंकि वियोग ही उसकी सत्ता है। वही उसकी सुंदरता है। वही उसका संगीत है।रूमी की बाँसुरी इसीलिए इतनी गहरी है—वह हमें बताती है कि सुंदरता कभी भी निर्दोष नहीं होती। सुंदरता वही है जो पहले घायल हो चुकी हो। संगीत वही है जो पहले चुप्पी से टूट चुका हो। और प्रेम वही है जो पहले वियोग से गुज़र चुका हो।
इसलिए जब रूमी कहते हैं “सुनो इस नय को”—वे बस संगीत सुनने को नहीं कहते। वे कहते हैं: सुनो उस दर्द को जो इतना गहरा है कि वह ध्वनि बन गया। सुनो उस वियोग को जो इतना तीव्र है कि वह लय बन गया। सुनो उस आत्मा को जो टूटकर भी गा रही है—क्योंकि टूटना ही उसकी सबसे बड़ी पूर्णता है।
रूमी की एक और पंक्ति इस बात को और गहरा कर देती है:
“I want a heart torn by separation, that I may explain the pain of longing.”
यहाँ बाँसुरी केवल स्वयं का दुःख नहीं कहती; वह श्रोता से भी उसी तरह विदीर्ण हुआ हृदय माँगती है। अर्थ यहाँ संप्रेषण नहीं, सह-टूटन से बनता है। यह उस संरचना को पूरी तरह विखंडित कर देता है जिसमें संगीत केवल आनंद या सौंदर्य का अनुभव हो। अब संगीत एक ऐसी भाषा है जो तभी समझी जा सकती है जब श्रोता भी उसी रिक्ति में प्रवेश करे। इसी बिंदु पर ‘भागवत’ का ‘वेणु-गीत’ अलग अर्थ देता है। वहाँ बाँसुरी के छिद्र हैं, लेकिन वे रूमी की तरह विलाप नहीं करते। ‘भागवत’ की पंक्ति ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’ में रिक्ति स्वीकार की जाती है, लेकिन उसे कृष्ण की उपस्थिति से भर दिया जाता है। भागवत में रिक्ति अर्थ का संकट नहीं बनती; वह ईश्वर के सौंदर्य में विलीन हो जाती है। देरिदा के शब्दों में पाठ उस दरार को दिखाता तो है, पर तुरंत उसे बंद भी कर देता है। रूमी उस दरार को खुला छोड़ देते हैं। ऑस्कर वाइल्ड उस दरार को एक क्षणिक चमक में बदल देते हैं—देवता झुकते हैं, सुनते हैं, और फिर लौट जाते हैं। इस तरह तीनों कविताएँ बाँसुरी को एक ही बिंदु से शुरू करके तीन अलग दिशाओं में ले जाती हैं। भागवत में बाँसुरी दिव्य उपस्थिति का विस्तार है, रूमी में वह कटाव और वियोग की आत्मकथा है, और वाइल्ड में वह सौंदर्य का क्षणिक हस्तक्षेप है जो सत्ता को छूकर निकल जाता है। रूमी कहते हैं:
“सुनो इस नय को,
कैसे वह शिकायत करती है,
वियोग की कहानी सुनाती है।
जब से मुझे सरकंडे के बिस्तर से काटा गया है,
मेरी पुकार ने पुरुष और स्त्री दोनों को रुलाया है।”
'नय' (बाँसुरी) की यह व्यथा, रेनॉल्ड ए. निकल्सन द्वारा मौलाना रूमी के 'मसनवी-ए-मानवी' के अनुवाद में इस प्रकार दर्ज है:
"Listen to the reed how it tells a tale, complaining of separations —
Saying, 'Ever since I was parted from the reed-bed, my lament hath caused man and woman to moan.'"
निकल्सन का यह अनुवाद रूमी के 'नय-नामा' (बाँसुरी का गीत) के मूल सूफ़ी दर्शन को पूरी सटीकता से पकड़ने का प्रयास करता है। यहाँ सरकंडे का बिस्तर या झुरमुट ('Reed-bed') उस दिव्य स्रोत का प्रतीक है जहाँ से आत्मा का विस्थापन हुआ है। उत्तर-संरचनावादी शब्दावली में कहें तो यह 'मूल' (Origin) की वह क्षति है जो संगीत को जन्म देती है। बाँसुरी का 'रोना' या 'शिकायत' दरअसल उस आदिम पूर्णता की खोज है जो अब केवल एक स्मृति या 'रिक्तता' के रूप में शेष है।यह अनुवाद स्पष्ट करता है कि बाँसुरी का संगीत कोई कलात्मक विलास नहीं, बल्कि उस विछोह (Separation) का साक्ष्य है जो हर मनुष्य (Man and Woman) के भीतर समान रूप से गूँजता है। यहाँ 'पुकार' और 'रुदन' ही वे तत्त्व हैं जो बाँसुरी की रिक्तता को अर्थपूर्ण बनाते हैं।
दूसरे शब्दों में, ‘नय’(बाँसुरी) आत्मा है। ‘काटा जाना’ वह अलगाव है जो जन्म के साथ शुरू होता है—ईश्वर से, मूल से, पूर्णता से। ‘रिक्त होना’ वह त्याग है जो अहंकार से मुक्ति देता है। ‘छेद’ वे परीक्षाएँ, दुख, प्रेम-प्रहार हैं जो आत्मा को पारगम्य बनाते हैं। और ‘साँस’—वह ईश्वरीय प्रेम है जो बिना शर्त प्रवेश करती है। जब वह साँस फूँकी जाती है, तब खोखलेपन से नाद बनता है—और नाद ही वह पुल है जो अलगाव को पुनर्मिलन में बदल देता है।
पर यह पुनर्मिलन कभी पूरा नहीं होता। बाँसुरी की पुकार कभी खत्म नहीं होती। वह हमेशा वियोग की कहानी कहती रहती है—क्योंकि वियोग ही उसकी सत्ता है। वही उसकी सुंदरता है। वही उसका संगीत है।
इसलिए रूमी कहते हैं कि ‘नय’ की बात वही समझ सकता है जिसका दिल भी पहले कट चुका हो। सुनने वाला और बजाने वाला—दोनों को वही दर्द चाहिए। नय की ध्वनि इसलिए नहीं सुनाई देती कि वह सुंदर है; वह इसलिए सुनाई देती है क्योंकि वह दर्द की भाषा है। वह उस आत्मा की भाषा है जो अपने मूल से दूर है और अब हर स्वर में उसी मूल की याद को पुकारती है।
रूमी की बाँसुरी इसीलिए इतनी गहरी है—वह हमें बताती है कि सुंदरता कभी निर्दोष नहीं होती। सुंदरता वही है जो पहले घायल हो चुकी हो। संगीत वही है जो पहले चुप्पी से टूट चुका हो। और प्रेम वही है जो पहले वियोग से गुज़र चुका हो।
इसलिए जब रूमी कहते हैं “सुनो इस नय को”—वे बस संगीत सुनने को नहीं कहते। वे कहते हैं: सुनो उस दर्द को जो इतना गहरा है कि वह ध्वनि बन गया। सुनो उस वियोग को जो इतना तीव्र है कि वह लय बन गया। सुनो उस आत्मा को जो टूटकर भी गा रही है—क्योंकि टूटना ही उसकी सबसे बड़ी पूर्णता है। ‘नय’ का अर्थ इस रूपक में तीन स्तरों पर है: भौतिक स्तर पर — बाँस की बनी साधारण बाँसुरी।आध्यात्मिक स्तर पर — मानव आत्मा, जो ईश्वर से अलग होकर विलाप करती है और प्रतीकात्मक स्तर पर — वह भाषा, वह संगीत, वह कविता जो केवल घाव से ही जन्म ले सकती है।
रूमी के लिए ‘नय’ का स्वर वही है जो सूफ़ी मार्ग की पूरी यात्रा कहता है: कटाव, खोखलापन, छेदन, फिर श्वास, फिर नाद—और नाद के भीतर वह अनंत पुकार जो कभी पूरी नहीं होती, पर उसी अनंत पुकार में ही मिलन छिपा होता है।
तुलनात्मक दृष्टि से मौलाना रूमी की बाँसुरी सबसे असुविधाजनक है, क्योंकि वह किसी भी स्थिर केंद्र को स्वीकार नहीं करती। वह कहती है कि संगीत तभी है जब कुछ टूटा है और अर्थ तभी है जब कोई पूर्ण नहीं है। यही कारण है कि देरिदा का कथन ‘पाठ के बाहर कुछ नहीं है’ रूमी की बाँसुरी में लगभग शाब्दिक सच बन जाता है—सारा सत्य उसी कटाव, नाद और भाषा में है।
इस व्याख्या में ‘भागवत’ की पंक्ति ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’ को जोड़कर पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि बाँसुरी की रिक्तता स्वयं में अर्थहीन नहीं है; वह ईश्वर की उपस्थिति से भरी जा रही है। छिद्र पीड़ा या अभाव नहीं, बल्कि अर्थ के प्रवेश-द्वार हैं। अर्थ का स्रोत बाँसुरी के भीतर नहीं, बाहर स्थित है। बाँसुरी तब तक नहीं स्वरित होती जब तक चेतन सत्ता उसमें प्रवेश न करे। छिद्रों की अपनी कोई भाषा नहीं है; वे केवल माध्यम हैं।
अगर इस पंक्ति को देरिदा के विखंडनवाद के आलोक में ऑस्कर वाइल्ड, मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं के साथ तुलना करें, तो अर्थपूर्ण विचलन दिखाई देता है। ऑस्कर वाइल्ड की ‘द फ्लूट प्लेयर’ में बाँसुरी बजती है, देवता सुनते हैं, सौंदर्य घटित होता है, लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि छिद्र कैसे बने या किस पीड़ा से वाद्य जन्मा। ऑस्कर वाइल्ड की बाँसुरी ‘भागवत’ की तरह है—अर्थ बाहर से आता है और सौंदर्य में बदल जाता है।
दूसरे शब्दों में, रूमी के ‘नय रूपक’ और हिंदू परंपरा में कृष्ण की बाँसुरी की तुलना करते समय दोनों के बीच कई समानताएँ और अंतर स्पष्ट दिखाई देते हैं। दोनों ही बाँसुरी को साधारण वाद्य से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक और भावनात्मक प्रतीक बनाते हैं। दोनों में बाँसुरी रिक्तता का माध्यम है जिससे संगीत जन्म लेता है। रूमी के नय में खोखलापन काटने छेदने की यातना से आता है और वह वियोग की कराह बन जाता है। कृष्ण की बाँसुरी भी खोखली बाँस है जिसके छिद्र अधरसुधा से भरकर दिव्य नाद उत्पन्न करते हैं। दोनों रूपक यह कहते हैं कि पूर्ण बाँस चुप रहती है और रिक्ति ही संगीत पैदा करती है।दोनों में बाँसुरी वियोग और प्रेम की पुकार है। रूमी का नय ईश्वर से अलगाव की कराह है। कृष्ण की बाँसुरी गोपियों और राधा के हृदय में विरह और प्रेम की लहर जगाती है। दोनों में ध्वनि प्रियतम की याद और मिलन की तीव्र लालसा पैदा करती है। दोनों में बाँसुरी ईश्वरीय साँस का माध्यम है। रूमी में ईश्वर की साँस नय में प्रवेश कर संगीत बनाती है। भागवत में कृष्ण की अधरसुधा रंध्रों को भरती है। दोनों में वादक ईश्वर या प्रियतम ही वाद्य को जीवंत बनाता है।
रूमी का नय काटे जाने खोखला किए जाने और छेदे जाने की यातना की कहानी है। यह दर्द और विनाश से शुरू होता है। कृष्ण की बाँसुरी में बाँस प्राकृतिक रूप से खोखली होती है और छिद्र बनाना कला या लीला है न कि यातना। रूमी में भावना विलाप शोक और कराह है। संगीत दुख से जन्म लेता है। कृष्ण की बाँसुरी में आनंद आकर्षण और रस है। गोपियाँ मंत्रमुग्ध होती हैं और वृंदावन जीवंत हो जाता है।
रूमी में उद्देश्य आत्मा का ईश्वर से अलगाव व्यक्त करना और वापसी की पुकार है। कृष्ण की बाँसुरी भक्तों को आकर्षित करती है प्रेम और भक्ति जगाती है और दिव्य उपस्थिति का विस्तार करती है। रूमी में अनुपस्थिति और वियोग प्रधान है। ईश्वर दूर है और पुकार है। कृष्ण में उपस्थिति प्रधान है। कृष्ण स्वयं बाँसुरी बजाते हैं और नाद उनके साथ है। रूमी में संगीत कभी पूरा नहीं होता और अनंत विलंब रहता है। कृष्ण में नाद रसपूर्ण और सम्पूर्णता देता है। भक्त गोपवृंद में विलीन हो जाते हैं।
रूमी की कविता वियोग प्रधान सूफ़ी रहस्यवाद पर आधारित है जिसमें ‘फ़ना’ या अहं का विलय है। कृष्ण भक्ति परंपरा प्रेम रस और मिलन प्रधान है। रूमी का नय टूटन से जन्मा संगीत है जो दर्द से निकलता है और दर्द की ओर ले जाता है। आत्मा ईश्वर से कटी हुई है और नय उस कटाव की पुकार है। यह निराशा में छिपी आशा है। कृष्ण की बाँसुरी पूर्णता से उत्पन्न संगीत है जो आनंद से निकलता है और आनंद की ओर ले जाता है। आत्मा ईश्वर से जुड़ी हुई है और वेणु उस जुड़ाव का विस्तार है। यह आनंद में छिपी पूर्णता है।
दोनों रूपक कहते हैं कि बिना रिक्ति या घाव के संगीत संभव नहीं। रूमी दर्द को केंद्र में रखकर वापसी की लालसा जगाते हैं। कृष्ण आनंद को केंद्र में रखकर मिलन का उत्सव मनाते हैं। सूफ़ी और भक्ति परंपराएँ अलग रास्ते से एक ही सत्य तक पहुँचती हैं कि प्रेम या ईश्वर से अलगाव दर्द है और उस दर्द या प्रेम से ही संगीत या भक्ति जन्म लेती है।
मंगलेश डबराल की कविता में छिद्र अब किसी अधरसुधा से नहीं भरते; छेदों से राख गिरती है। अगर इसे भागवत की पंक्ति ‘रन्ध्रान् वेणोरधर-सुधया पूरयन्’ के सामने रखें, तो अर्थ की दिशा पूरी तरह बदल जाती है। भागवत में वेणु के रन्ध्र अधरसुधा पीकर आनंद उत्पन्न करते हैं, पर डबराल की कविता में छिद्र से राख का गिरना विनाश का प्रतीक है। अधरसुधा अब मौजूद नहीं है। ईश्वर अनुपस्थित है। छिद्र फिर भी हैं। देरिदा के शब्दों में, अब हमारे पास ‘उपस्थिति’(presence) नहीं, केवल ‘अवशेष’(trace) है। राख उसी ‘अधरसुधा’ का ‘अवशेष’(trace) है जो कभी थी, पर अब नहीं है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ इस विखंडन को और आगे ले जाती है। वहाँ बाँसुरी कहती है:
मैं इस पीड़ा को भूल गयी कि
मेरे अंदर कितने छेद हैं
यह तभी पूरी तरह खुलती है जब पीछे भागवत के ‘वेणु गीत’ की पंक्ति –‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’ - खड़ी हो। भागवत में छिद्र गौरव के कारण हैं—वे कृष्ण की अधरसुधा से भरते हैं। स्वप्निल में वही छिद्र दूसरों की साँसों और आनंद से इतने बार भर दिए गए हैं कि पीड़ा स्मृति से बाहर हो गई है। यह आंतरिकीकृत विखंडन है। अब न अधरसुधा चाहिए, न संगीत; बाँसुरी ‘आदतन’ बजती है।इस तरह, ‘रन्ध्रान् वेर्णोरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै’ से मिलाकर विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक कविता बाँसुरी के छिद्रों को नहीं बदलती—वह उनमें भरने वाले अर्थ को बदल देती है। भागवत में छिद्र ईश्वर की संभावना हैं। ऑस्कर वाइल्ड में वे सौंदर्य की संभावना हैं। मंगलेश में वे विनाश की संभावना हैं और स्वप्निल में आदत बन चुकी पीड़ा की संभावना हैं। इस दृष्टि से मंगलेश की कविता परिवर्तनकामी और स्वप्निल की समायोजनात्मक (accommodative) प्रतीत होती है।
मंगलेश डबराल की कविता में बाहर और भीतर, सुनाई और न सुनाई देने वाली बाँसुरी के द्वंद्व के माध्यम से अर्थ की अस्थिरता और द्वंद्वों की विखंडन दिखती है। देरिदा के अनुसार अर्थ विलंबित है; भीतर की बाँसुरी का अर्थ बाहर की अनुपस्थिति में निहित है। ‘छेदों से गिरती है राख़’ जीवन/मृत्यु के द्वंद्व का संकेत है और शक्ति संरचनाओं के पतन का प्रतीक है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘बाँसुरी’ कविता आत्मकथात्मक स्वर में बाँसुरी की यात्रा को दर्शाती है। बाँस के टुकड़े से यातना के माध्यम से बाँसुरी बनना, बजना और अंत में स्वायत्त रूप से बजते रहना विखंडन के दृष्टिकोण से संरचनावादी द्वंद्वों को उलट देता है। प्रकृति (बांस) और संस्कृति (बाँसुरी) का द्वंद्व उलट जाता है; संस्कृति प्रकृति को मुक्त करती है। पीड़ा और आनंद का द्वंद्व विलंबित है; अर्थ हमेशा अलगाव से संयोग में टलता रहता है।
पितृसत्ता और स्त्रीवाद के नज़रिए से देखें तो बाँसुरी स्त्री का प्रतीक बनती है। स्वप्निल की कविता में बाँसुरी पुरुष की इच्छा और नियंत्रण के बावजूद आदतन बजती रहती है जो सिक्सू के ‘स्त्री-लेखन’ (Écriture féminine) की तरह पितृसत्ता से स्वतंत्र होकर अपनी आवाज़ पाने का संकेत है। मंगलेश डबराल की कविता में भीतर की बाँसुरी की चुप्पी पुरुष-केंद्रित समाज में दबाए गए स्त्री अनुभव का प्रतिनिधित्व करती है, और जब यह सुनाई देती है तो विलाप के रूप में विद्रोह प्रकट होता है।
जूडिथ बटलर के ‘जेंडर परफॉर्मेटिविटी’(Gender Performativity) के अनुसार, लिंग कोई स्थिर पहचान नहीं, बल्कि लगातार किए जाने वाले सामाजिक कार्यों से बनता है। डबराल की कविता में भीतर की बाँसुरी की चुप्पी पितृसत्ता द्वारा थोपी गई ‘परफॉर्मेंस’ प्रतीत होती है। कविता में स्त्री-आवाज़ ‘सुनाई नहीं देती’, लेकिन जब सुनाई देती है, तो विद्रोह और शक्ति का संकेत बनती है।
स्वप्निल की कविता में अर्थ उत्सवपूर्ण और जीवन-उन्मुख है; बाँसुरी अपनी स्वायत्तता के माध्यम से अर्थ उत्पन्न करती है। डबराल की कविता में अर्थ नकारात्मक और मृत्यु-उन्मुख है; चुप्पी, विनाश और राख के माध्यम से अर्थ का विलंब प्रकट होता है। दोनों कविताओं में अपोरिया और द्वंद्व विद्यमान हैं, लेकिन स्वर, प्रक्रिया और निष्कर्ष अलग हैं। स्वप्निल की कविता परिवर्तन और मुक्ति का उत्सव है, जबकि डबराल की विनाश और शून्यता का। संक्षेप में, देरिदा का विखंडन सिद्धांत इन कविताओं में लागू होता है—अर्थ अनंत, द्वंद्व अस्थिर और पाठ मुक्त है। बाँसुरी स्थिर अर्थ से मुक्त होकर अनंत संकेत बनती है। स्वप्निल की कविता आशा की अंतर्ध्वनि लिए हुए है, डबराल की उदासी की। दोनों में विखंडन अर्थ की मुक्ति का उत्सव है।
स्वप्निल श्रीवास्तव की बाँसुरी कविता में स्त्री का अनुभव और सामाजिक संदर्भ गहराई से जुड़े हैं। बाँसुरी यहाँ केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि स्त्री के अस्तित्व और उसकी आवाज़ का प्रतीक बन जाती है। बांस के भीतर से निकलने वाली ध्वनि स्त्री की दबाई हुई भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जब बाँसुरी बजती है, तो वह स्वयं की स्वतंत्रता का संकेत देती है। इसके माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि स्त्री समाज की पितृसत्तात्मक संरचनाओं में दबकर भी अपनी आवाज़ और अस्तित्व बनाए रखती है। मंगलेश डबराल की कविता की तुलना में स्वप्निल की कविता में यह विद्रोह अधिक जीवनधर्मी और उत्सवपूर्ण प्रतीत होता है।
यहाँ बाँसुरी की स्थिति उस सामाजिक शून्यता और अस्तित्वगत अवरोध को सामने लाती है जिसमें स्त्रियाँ अक्सर पाई जाती हैं। देरिदा के सिद्धांत के अनुसार, अर्थ हमेशा केंद्रीकृत नहीं होता, वह हमेशा संरचनाओं के बीच उत्पन्न होने वाली दरारों और रिक्तियों में जन्म लेता है। बाँसुरी इन दरारों को भरते हुए अर्थ उत्पन्न करती है। डबराल की कविता में अर्थ इस प्रक्रिया में विलंबित और मृत्यु-उन्मुख है, जबकि स्वप्निल की कविता में वह सक्रिय और जीवनधर्मी है।
सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बाँसुरी का स्वर संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। यह न केवल पितृसत्तात्मक नियंत्रण के विरुद्ध विद्रोह है, बल्कि सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं को चुनौती देने वाला संकेत भी है। बाँसुरी की ध्वनि उस संघर्ष का माध्यम बन जाती है, जिसमें स्त्री अपने अस्तित्व और अधिकारों की पहचान के लिए आवाज उठाती है। इस अर्थ में बाँसुरी केवल एक वाद्य नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना का प्रतीक है।
स्वप्निल की कविता में बाँसुरी का आदतन बजना इस स्वतंत्रता की निरंतरता को भी दर्शाता है। इस कविता में अर्थ केवल किसी केंद्रीय सत्ता या आदर्श से नहीं पैदा होता, बल्कि उसका स्रोत स्त्री का अनुभव, पीड़ा और अस्तित्वगत संघर्ष है। बाँसुरी की ध्वनि इस संघर्ष को सीधे पाठक तक पहुँचाती है और उसे अनुभव करने योग्य बनाती है। डबराल की कविता में वहीं बाँसुरी शांति या सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि विनाश और अधूरापन का द्योतक बनती है। यह दर्शाता है कि अर्थ और अनुभव समाज और व्यक्तिगत पीड़ा के मिश्रण से निर्मित होते हैं।
यदि हम जूडिथ बटलर के विचारों के संदर्भ में देखें, तो बाँसुरी की ध्वनि लिंग और सामाजिक पहचान की स्थिरता पर सवाल उठाती है। लिंग कोई स्थिर पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निरंतर निर्मित होता है। डबराल की कविता में बाँसुरी की चुप्पी यह दिखाती है कि स्त्री की पहचान पितृसत्ता द्वारा नियंत्रित और दबाई गई है, जबकि स्वप्निल की कविता में बाँसुरी स्वयं की सक्रिय ध्वनि के माध्यम से अपनी पहचान स्थापित करती है।
इसके अतिरिक्त, बाँसुरी कविता का रूपक यह भी दर्शाता है कि समाज में विद्यमान संरचनाएँ हमेशा स्थिर नहीं रहतीं। बाँसुरी द्वारा उत्पन्न ध्वनि इस परिवर्तन और अस्थिरता की चेतना जगाती है। अर्थ केवल स्थापित संरचना से नहीं, बल्कि विसंगति, अनुपस्थिति और रिक्तियों से भी जन्म लेता है। इस दृष्टि से बाँसुरी का स्वर विखंडन के सिद्धांत को मूर्त रूप देता है। स्वप्निल की बाँसुरी कविता अंततः न केवल व्यक्तिगत पीड़ा और सामाजिक संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती है, बल्कि यह संगीत और भाषा के माध्यम से अर्थ निर्माण की प्रक्रिया को भी उजागर करती है। बाँसुरी का आदतन बजना यह दिखाता है कि अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि हमेशा बहता और परिवर्तित होता है। मंगलेश की कविता की तुलना में यह अधिक आशावादी और जीवनधर्मी है, पर दोनों में अर्थ की उत्पत्ति दरारों और छिद्रों से होती है।
इस पूरे विश्लेषण में यह स्पष्ट होता है कि बाँसुरी-केन्द्रित कविताएँ सांकेतिक और वास्तविक दोनों स्तरों पर अर्थ उत्पन्न करती है। वेणु गीत, ऑस्कर वाइल्ड, एलियट , रूमी, जानकीवल्लभ शास्त्री, मंगलेश डबराल और स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं में बाँसुरी के विभिन्न रूप हमें यह समझने में मदद करते हैं कि संगीत, कला और साहित्य में अर्थ केवल स्थिर प्रतीक या सौंदर्य नहीं, बल्कि प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभव का मिश्रण होता है। यहाँ बाँसुरी केवल वाद्य नहीं, बल्कि अर्थ और अनुभव का माध्यम है, जो समाज, संस्कृति, पीड़ा और स्वतंत्रता की विविधताओं को संप्रेषित करता है। बाँसुरी-केन्द्रित कविताएँ हमें शिद्दत के साथ यह भी महसूस कराती हैं कि अर्थ और अनुभव केवल प्रस्तुत नहीं होते, वे उत्पन्न किए जाते हैं। बाँसुरी की ध्वनि, उसके छिद्र, उसकी रिक्तियाँ और उसका आदतन बजना इस उत्पत्ति की प्रक्रिया को प्रत्यक्ष कर देते हैं। देरिदा का विखंडन सिद्धांत और बटलर के जेंडर सिद्धांत का केंद्रीय विचार ‘परफॉर्मेटिविटी’ मिलकर इस धारणा को पुष्ट करते हैं कि जीवन और कविता में अर्थ और अनुभव स्थिर नहीं होते। वे निरंतर उत्पन्न होते हैं और बदलते रहते हैं। शास्त्रों में संसार को क्षणभंगुर कहे जाने का एक तात्पर्य यह भी हो सकता है। विवेच्य प्रसंग में ‘बाँसुरी’ इसका प्रतीक बनकर पाठक के समक्ष उपस्थित होती है।
List of the books (and a few key essays/articles treated as standalone works) cited:
- Saussure, F. de. Course in General Linguistics.
- Lévi-Strauss, C. Structural Anthropology.
- Barthes, R. Mythologies.
- Barthes, R. The Death of the Author.
- Jakobson, R. Linguistics and Poetics.
- Derrida, J. Of Grammatology.
- Derrida, J. Différance (essay).
- भर्तृहरि. वाक्यपदीयम् (Vākyapadīya).
- भर्तृहरि. वाक्यपदीयम् १.१ (specific verse cited).
- Butler, J. Gender Trouble: Feminism and the Subversion of Identity.
- R.A. Nicholson:The Mathnawí of Jalálu'ddín Rúmí, Luzac & Co.
- Woolf, V. A Room of One's Own.
- Cixous, H. The Laugh of the Medusa (or related écriture féminine works).
- शार्ङ्गदेव. संगीतरत्नाकर (Saṅgītaratnākara).
Notes on the list:
- Primary theorists (Saussure, Lévi-Strauss, Barthes, Jakobson, Derrida) dominate the structuralist/post-structuralist sections.
- Indian philosophical texts (e.g., Vākyapadīya) appear in Nagari for Sanskrit originals.
- Feminist works (Butler, Woolf, Cixous) are referenced in the gender/performativity discussions.
-श्रीमद्भागवत
-जानकीवल्लभ शास्त्री ,चुनी हुई कविताएँ
-मंगलेश डबराल, प्रतिनिधि कविताएँ
-स्वप्निल श्रीवास्तव, प्रतिनिधि कविताएँ
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प्रोफ़ेसर रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’,वाणी प्रकाशन (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’ वाणी प्रकाशन,(2026)
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान’ (2003)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में प्रतिनियुक्त.
सम्प्रति: प्रोफ़ेसर(से.नि.) एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742
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