सुशील कुमार की कविताएँ
![]() |
| सुशील कुमार |
कवि परिचय
सुशील कुमार कवि और लेखक हैं। वे भारत के झारखंड राज्य में निवास करते हैं। उनकी पहचान पर्यावरणीय साहित्य, कविता और साहित्यिक चिंतन के क्षेत्र में एक सजग और प्रतिबद्ध रचनाकार के रूप में रही है। सुशील कुमार नियमित रूप से हिंदी साहित्य की मानक पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। अब तक उनके छह कविता-संग्रह और दो आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
सुशील कुमार का जन्म 13 सितंबर 1964 को पटना सिटी (बिहार) में हुआ। विगत इकतालीस वर्षों से वे झारखंड में रह रहे हैं। वर्ष 1985 में उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत बैंक क्लर्क के रूप में की। यह समय पारिवारिक दृष्टि से कठिन था, क्योंकि उनके पिता मानसिक अस्वस्थता से गुजर रहे थे। कम उम्र में ही पारिवारिक दायित्व उनके कंधों पर आ गए। निजी ट्यूशन और नौकरी के माध्यम से उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वाह किया। वर्ष 1996 में वे राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफल हुए और झारखंड शिक्षा सेवा में चयनित हुए। विभिन्न जिलों में शिक्षा पदाधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने सितंबर 2024 में दुमका से जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की।
साहित्य की ओर उनका प्रवेश किसी पूर्वनियोजित निर्णय का परिणाम नहीं रहा, बल्कि एक सहज और स्वाभाविक जागरण के रूप में घटित हुआ। उनके अनुसार, जब उन्हें अपने अंतर्जगत का बोध हुआ, तब वे स्वयं को पहले से ही साहित्य की दुनिया से घिरा हुआ पाए। आरंभिक लेखन उन्होंने कहानियों से किया, पर आगे चलकर कविता और आलोचना में उनकी रचनात्मक संवेदना का विस्तार हुआ। गद्य लेखन की नियमित शुरुआत उन्होंने वर्ष 2004 में अपने व्यक्तिगत ब्लॉग “शब्द सक्रिय हैं” (https://www.authorsushil.com) के माध्यम से की।
उनके प्रकाशित हिंदी कविता-संग्रह हैं— 'कितनी रात उन घावों को सहा है' (2004), 'तुम्हारे शब्दों से अलग' (2011), 'जनपद झूठ नहीं बोलता' (2012), 'हाशिये की आवाज़' (2020), 'पानी भीतर पनसोखा' (जनवरी 2025) और 'बाँसलोई में बहत्तर ऋतु' (जुलाई 2025)। 'जनपद झूठ नहीं बोलता' (2012) के लिए उन्हें सव्यसाची साची सम्मान प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। ‘बाँसलोई में बहत्तर ऋतु’ को हिंदी में पर्यावरणीय कविता की एक महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जाता है। उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ हैं— 'आलोचना का विपक्ष' (2019) और 'हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष' (2021)।
इधर उनका रचनात्मक सरोकार विशेष रूप से कहानी, उपन्यास, पर्यावरणीय साहित्य तथा हिंदी और गैर-कथा लेखन के विविध रूपों से जुड़ा हुआ है। कुमार भाषा, प्रकृति और मनुष्यता प्रति गहरे रूप से प्रतिबद्ध हैं।
दूरदर्शी लोग प्रायः अपने समय से आगे की सोच लेते हैं। अपने समय से आगे सोचना किसी को भी विशिष्ट बनाता है। हालांकि यह भी खतरे से भरा होता है। क्योंकि समकालीन समाज आगे की सोचने की वजह से उस व्यक्ति के साथ खुद को समायोजित नहीं कर पाता और उस पर तमाम आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनको अपने जीवन में ही सामाजिक प्रतिष्ठा और मान्यता मिल पाती है। गौतम बुद्ध ऐसे ही विशिष्ट व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपने समय से आगे सोचा और जीते जी ही किंवदंति बन गए। अपने बातों और विचारों से उन्होंने समाज के एक बड़े वर्ग को दिशा दिखाने का काम किया। बुद्ध ने खुद के प्रति भक्ति भाव को नकारते हुए अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा 'अप्प दीपो भव'। यानी 'अपना प्रकाश खुद बनो'। बुद्ध तो यहां तक कहते हैं कि मेरे वचनों को अपने समय की कसौटी पर कसो। अगर वे समयानुकूल लगें, तार्किक लगें तो उन्हें स्वीकार करो अन्यथा उन्हें अस्वीकार कर दो। इस तरह बुद्ध ने दुनिया भर के बुद्धिजीवियों को प्रभावित किया। बुद्ध पर दुनिया के तमाम कवियों ने कविताएँ लिखीं हैं। कवि सुशील कुमार की एक लम्बी कविता है 'बुद्ध पर कुछ कविताएँ'। ढाई हजार साल बाद भी बुद्ध किसी रचनाकार को इस रूप में प्रेरित करते हैं कि आज का एक कवि बुद्ध की भाषा में शान्ति और अहिंसा की बात करता है। अपनी कविता में सुशील कुमार लिखते हैं 'बुद्ध स्थिर है/ पर कायर नहीं,/ लड़ता नहीं है बुद्ध/ न किसी का वध करता है/ वह हमारे विवेक के चरम बिंदु पर/ ज्ञान की पूरी शक्ति से प्रहार करता है/ और भीतर तक मुझे आलोड़ता है'। बुद्ध ने दुनिया को अहिंसा का नायाब हथियार दिया। वह हथियार जिसे आगे चल कर गांधी ने तब की दुनिया की महाशक्ति ब्रिटेन के खिलाफ इस्तेमाल कर भारत के आजादी की राह को प्रशस्त किया। आज भी दुनिया जिस युद्ध के मुहाने पर खड़ी है उसमें अहिंसा ही एकमात्र साधन है जिससे विश्व में शान्ति स्थापित हो सकती है। आइए पहली बार पर आज हम पढ़ते हैं सुशील कुमार की कविताएँ।
सुशील कुमार की कविताएँ
एक अनाम कविता
आकाश क्या है,
निर्वात है यह, या कि नीलाभ है
या आँखों का भ्रम केवल
लेकिन आकाश आशा भी है
उमंग भी है
जमीन से जब आदिमानवों ने आकाश को निहारना शुरू किया
तभी वे तन कर खड़े हो पाए!
मान भी लें कि आकाश कुछ नहीं है
तो भी उसमें जीने की आशा और जीवन के रंग है।
आकाश में उगा पनसोखा क्या है,
यह भी तो दृष्टिभ्रम ही है सात रंगों का
धूप, बारिश और आँखों के बीच का जादू भी कह सकते हैं
लेकिन मन और मोर दोनों नाच उठते हैं इसे देख कर।
यौवन क्या है
धोखा है जीवन के एक अंतराल का
उसे तो ढलना ही है धीरे-धीरे
भला कौन रोक पाया उसकी ढलान को!
फिर भी जीवन का सर्वांश है यह
और यहीं जीवन उमड़ता है, उमगता है।
फूलों का क्या,
कितना ही सुंदर क्यों न हो
कितनी ही सुगंधी से आपुर क्यों न हो,
एक दिन उसे तो झड़ना ही है, झुलसना ही है!
लेकिन वंश-बीज है इनमें
पौधों को गर्व है अपने फूलों पर।
आकाश हो या कि इंद्रधनुष,
यौवन की बात करें या फूलों की
इसके अनहद स्वर, इसकी मौन भाषा
इसके दिगंत सौंदर्य को
पकड़ नहीं सकता कोई वैज्ञानिक मन।
केवल हृदय ही एक यंत्र है हम सबों के पास
उसे निरखने-परखने के लिए!
क्रियाएं
1)
देखना तो उस तरह मत देखना
कि दृश्य-पटल पर आभाएँ अधूरी रह जाएँ
पूरा देखना
मन की आँखों से भी देखना
हृदय को खोल कर देखना।
2)
देखना तो सुनना भी जरूर
अंदर के जगे कान से,
हृदय-वीणा की ध्वनि भी उसमें सुनना।
3)
स्पर्श करना तो केवल इन गातों से नहीं
वस्तु को भीतर तक जा कर छूना
स्पर्श में स्पंदन है गति है
कंपन भी है
उस कंपन से अपने को पूरी तरह प्रकंपित करना।
4)
देखने सुनने और छूने की यात्रा में
अपने अगम इंद्रियों को भी शामिल करना
और उसमें एक-रस एक-लय हो जाना
तब वहाँ रूप रस गंध के फूल खिलेंगे
तब जीवन-यात्रा की बगिया महक उठेगी!
देखना
देखना
आँखों में बिंब का उतरना ही नहीं,
बिंब का सचेतन होना भी है,
देखना आपके जिंदा होने का प्रमाण है।
देखते तो कैमरे भी हैं
हम से कई गुना तेज
और ज्यादा दूर तलक..
लेकिन दृश्य की लिपियाँ
नहीं पढ़ पाते!
उनकी रेटीना में आँसू या आक्रोश नहीं आते।
इस दुनिया में कई नयनसुख
देखते हुए भी नहीं तजवीज पाते चीजों को।
उनके लिए
शहर सरगोशियों और बहसों की इबारत भर है।
इन आँखों में नींद और नशा बहुत है।
तीन क्षणिकाएं
1)
देह छूती है जब
देह को
प्रेम में,
विदेह हो जाती है
दोनों ही
प्रेम में!
2)
जितनी धँसती जाती हैं जड़ें
अतल में,
शाखों पर
हरे सैलाब सा लहराते हैं
3)
बहती है करुणा
तुम्हारे कोटरलीन आँखों से
जब तर-बतर,
उसके जल में मैं
समाधिस्थ होता
चला जाता हूँ
बुद्ध पर कुछ कविताएं
1]
बुद्ध मेरा सबसे प्रिय व्यक्ति है
सब जगह सबको टटोल कर देख लिया मैंने
ऑफिस में घर में सड़क पर
दोस्तों में रिश्तेदारों में बाजार में
होटलों में मयखानों में..
पूजाघरों में भी,
नहीं मिला मुझे कोई भी बुद्ध सा
2]
बुद्ध मेरा सबसे प्रिय मित्र है
सबसे बेहतरीन शौक है मेरा
मेरा धन है वह, मेरा घन है
और मेरा मन भी है।
3]
बुद्ध से अधिक भावुक अधिक उदार
इरादों में उतना ही बज्र
पर उतना तरल और रूई सा नरम
भावप्रवण, मोम सा विह्वल
मुझे और कोई नहीं मिला
4]
बुद्ध की कहन
बुद्ध की दशा
बुद्ध की दिशा
बुद्ध की चेतना
बुद्ध का उठना, बैठना
ध्यानमग्न होना
उपदेश देना
संसार की करुणा से पोर-पोर भींगी हुई है
यह जितनी निश्छल और ममतालु है
उतनी ही रागात्मक और प्रेम से उब- डूब
5]
बुद्ध सब बुद्धि का सार है,
पर सबसे अलग सबसे नायाब
बुद्ध आस्तिकों का अनिश्वरवादी है
नास्तिकों का ध्यानमग्न आनंदमूर्ति है
6]
बुद्ध के चेहरे पर पसरी शांति में
अनंत ब्रह्मांड समाया है
जो मेरे भीतर सहज ही उतर आती है
उसके आलोक से मेरे अंदर का दीया
जलने लगता है
7]
बुद्ध स्थिर है
पर कायर नहीं,
लड़ता नहीं है बुद्ध
न किसी का वध करता है
वह हमारे विवेक के चरम बिंदु पर
ज्ञान की पूरी शक्ति से प्रहार करता है
और भीतर तक मुझे आलोड़ता है
8]
बुद्ध किसी क्षत्रिय कुल में जन्मा होगा
पर वह किसी कुल-जाति का नहीं
पूजा-पाठ बलि-वेदी तंत्र-मंत्र यज्ञादि पर
उसे तनिक भरोसा नहीं
बुद्ध पाखंड का विरोध शब्दों से नहीं करता
ध्यान, ज्ञान और बोध से करता है
9]
बुद्ध किसी को आशीर्वाद भी नहीं देता
चुप रहता है हमेशा
फिर भी हम उसके पास बैठ कर
लीन हो जाते हैं किसी अज्ञात सत्ता से
और धन्य हो उठते हैं!
10]
वह तथागत है और प्रबुद्ध भी पर
न किसी को आश्वासन देता है
न किसी से मंत्र पढ़ता-पढ़वाता है
केवल अपने पास बैठाता है
और स्वयं में लय होने का इशारा करता है
11]
बुद्ध किसी से कुछ लेता नहीं
सबको देता है
और सिर्फ़ देता ही जाता है
बुद्ध का भिक्षाटन भी सबसे अलग है
भीख से वह केवल पेट की आग बुझाता है
मगर भीख देने वालों की मन की आग बुझा देता है
12]
बुद्ध की आवाज
सभी दुनियावी स्वरों और सब ध्वनियों से अलग है
वहां कोई साज-बाज नहीं है
वहां कोई भजन-कीर्तन भी नहीं है
न मंत्रोच्चारण, न धूप-बत्ती
न बलि के पशुओं की कराह
न कोई याज्ञिक शंखनाद
वहां तो घनघोर चुप्पी है!
आत्मचिंतन में लवलीन
स्वांस के झूले पर झूलता
ध्यान-मुद्रा में डूबा
चिर निद्रा में गोते लगाता
पूरा सचेतन स्थिर मानव काया है
बुद्ध!
13]
बुद्ध कोई तृष्णा नहीं,
न कोई कामना
सूत दारा महल से आसक्त नहीं वह
कंचन कामिनी कीर्ति सबका त्याग करता है
उसे विपासना प्रिय है, ध्यान प्रिय है
और वह सब अप्रिय है जो
जो उसे जीवन को उस तरह जीने से रोकती है।
14]
बुद्ध यशोधरा के लिए विलाप नहीं करता
बुद्ध को राहुल की भी दुश्चिंता नहीं
लेकिन बुद्ध तो देवदत्त के तीर से बिंधे
हंस को भी बचाता है!
बुद्ध मुझको तुमको सबको
स्वयं में ही
पूरी सृष्टि से एकाकार करता है
और प्रेम की अविरल धारा में बहाता है
चेहरे से फूटती
उसकी अजस्त्र मुस्कान और कांति इसकी गवाह है
15]
बुद्ध मेरी थाती है
वह मुझे रोग बुढ़ापा और मृत्यु के बारे में बताता है
जीवन में मृत्यु सिखाता है
और उसके भय से मुक्त करता है मुझे।
कुछ नहीं है आसपास
कुछ नहीं है आस-पास
कोई नहीं है यहाँ
कुछ छायाएँ हैं केवल
दूर तलक पीछा करती हुई
रोज कुछ मिटती कुछ आरी तिरछी होती हुई
चारों तरफ से अदृश्य दीवारों ने घेर रखा है मुझे
किसी भूतबंगले की काई खाई जीर्ण-शीर्ण
मकड़ियों के जाले और कीट- पतंगों से भरे हुए
सोचता हूं, किन बन्धनों में मैं कैद हूँ
किन विचारों ने मेरी निजता को खंडित किया है,
मेरे प्रवाह को रोक रखा है,
फ़िलवक्त यह तय कर पाना मुश्किल है
इतना अँधेरा है यहाँ कि
चीजों को हाथ से टटोलने की जरूरत आन पड़ी है
लेकिन हाथ बंधे हैं मजबूत अदावत और
कशमकश की उन जंजीरों से
जिससे मुझे बांधा गया है हिजाब की तरह!
जीवन का दृश्य बहुत वीभत्स है यहाँ!
चलो अब यहाँ से कहीं दूर देस
जहाँ खुला आकाश हो
पूरी धरती हो ग्लोब की तरह
दर्द के लिए थोड़ा आँसू हो
जहाँ पंख खोलने की इजाजत हो
जहाँ उड़ान भरने की भरपूर आजादी हो!
जहाँ कहने और सुनने के लिए
थोड़ा वक्त जरूर हो!
दुःख से कचोटती एक कविता
विश्वास डगमगाता है रोज अपने घर में अब अपने ही लोगों से ..
जितनी उम्मीद कर सकता हूँ एक फूल से, एक पत्ती से, एक चलना सीखता बच्चे से, बतर्न धोती, झाड़ू-पोछा करती कामिन से उतनी अपनी बेटियों-बहुओं और दिन-दिन बड़े होते लड़कों से नहींl..
श्रीमती जी भी तो अब उन्हीं का पक्ष लेती हैं !
घर की डौगी-बिल्लियाँ' भी जितना कहना मानती, उतने बड़े होते बेटे-बेटियाँ नहीं..
हम सादा और साफ़ अन्न खा कर, रंगहीन जल पीकर अपना दिन पालते हैं
पिज्जा, बर्गर, चाउमिन, चिल्ली से पेट नहीं भरता अपना, न कोल्ड ड्रिंक्स से प्यास..
एक ही घर में रोज दो जून के अलग-अलग डिश और पसंद हैं यहाँ, खैर ..
आईने के सामने बेतरतीब पसरे उनके सौंदर्य-प्रसाधनों में अपनी कोई रूचि नहीं ..
मैं सुबह की बहती हवा में घुले सुगंध का आदी रहा हूँ
हमारे टी वी चैनल, हमारे टाइम-टेबल, हमारे बतियाने के विषय और व्यक्ति सब कुछ अलग-अलग हैं घर में..
मेरा मानना है, सुबह होने और दिन उठने से चेहरे खिलते हैं,
हुब आती है पसीने की बूंदों में लिपटी अपनी अप्रतिहत जिम्मेवारियों के श्रम से,
क्या होगा इस नई पीढ़ी का
जो अपने सिवाय किसी को पसंद नहीं करती
या केवल अपने जैसे को ही पसंद करती है
जो सब आशाओं को बाजार से ही खरीदना चाहती है
जो हमारी जमीन छोड़ कर अपने आसमान में उड़ना चाहती है..
मुझे दुःख है, हर जज्बा इनका एक फैशन बन गया है
मुझे संदेह भी है कि
जब मैं जाने लगूंगा उस दुनिया से
तो मेरे विदा को भी वे अपने शौक के समारोह में बदल देंगे
सच है, आंसूओं का भी अपना श्रृंगार होता है ग्लोब्लाइज होती, नित बदलती इस दुनिया में
मैं जानता हूँ यह समय पीछे नहीं जाएगा,
चाहे मैं कितनी कविताएँ रच लूँ
उनके हाथों में, उनकी आँखों में वह कशिश नहीं ला पाऊंगा जो जीने के लिए जरुरी होता है और रोज मरता रहूंगा थोड़ा-थोड़ा उसके सदमे में नकारे हुए आदमी की जिंदगी जीता हुआ
हाँ हर रोज असभ्य और कुलीन होते इस घर में, इस दुनिया में
टूटी-फूटी चीजें
घर की रौनकों से गुम
टूटी-फूटी चीजें
पड़ी रहती हैं बहुत दिनों तक
निर्वासित अकेली उपेक्षित
घर के किसी अनुपयुक्त कोने
फिर घर से निष्कासित कर दी जाती हैं
पड़ी रहती हैं टूटी-फूटी चीजें त्याज्य अभिशप्त हो
(डिक्शनरी के 'आउटडेटेड' शब्दों की तरह)
घर के व्याकरण से बाहर
उन्हीं टूटी-फूटी चीजों को बीनती हुई
सुबह से शाम तक घूमती है मोहल्ले- मोहल्ले
कबाड़ वाले की अधेड़ उम्र की अनब्याही लड़की
अपनी कुचैली बुढ़िया माँ के साथ
टूटी-फूटी चीजें तय कर लेती हैं तब
डस्टबिन से कबाड़खाने तक का सफ़र
बेमुरव्वत
प्रसंस्करित हो नई धज में कारखाने से लौटती
वही टूटी- फूटी चीजें
फिर से दुकानों में सजती हैं
और पुराने घर का नया व्याकरण गढ़ती है•
(18 फरवरी 2025)
मैं गलत था
मैं गलत था,
लहरें गहराई नहीं जानती
ऊपर-ऊपर उठती गिरती हैं!
उसकी खामोशी सूखे पत्तों की खरखराहटें हैं
जितनी बार लिखता हूँ रेत पर कोई काव्य
आकर मिटा जाती है शोर करती हुई -
"कुछ नहीं पता तुम्हें, मुझसे भी छोटी है कहानी तुम्हारी"
लौट आता हूँ अवाक्
जहाँ प्रार्थना के दीप जल रहे थे
छायादार वृक्ष के नीचे बैठे कुछ लोग
झुके हुए थे इबादत में किसी डर की वजह से
आस्थावान नहीं लग रहे थे उनके चेहरे
हिल रहे थे कुछ होंठ, बुदबुदा रहे थे कुछ शायद अपनी आँखें भींचे
मुझे लगा, जैसे हर कोई बेमन मौत के लिए खुद को तैयार कर रहा हो!
वह लड़की
वह लड़की
अक्षरों के बीच गिरे प्रेम को
करीने से चुन-चुन
कागज पर रखती हैं
और रोज़ उससे एक प्रेम कविता लिखती हैं
एक लड़का
उन कविताओं को चुरा कर भाग जाता है
स्वप्न के बीहड़ में
जहाँ ख़ूँख़ार बनैले से सामना होता है उसका
लड़की साहस के साथ उसका पीछा करती है
और जंगल गायब हो जाता है
लड़की ने देखा,
जंगल, बनैला और लड़का कागज पर
अक्षर बन कर उग आए हैं
लड़की ने जैसे ही छुआ उसे,
पढ़ा उनको
वह भी अक्षर बन गई, दर्ज हो गई
अक्षरों के बीच गिरे प्रेम में।
चुप्पी
चुप्पी गहरे पानी में उगा एक नन्हा पौधा है
चुप्पी चुपचाप खड़े पेड़ और पहाड़ का मौन संगीत है
चुप्पी तेज बहती नदी का कल-कल निनाद है
चुप्पी घनघोर जंगल की उदासी है
चुप्पी सुबह की ओस है हल्की धूप में उड़ती भाप की तरह।
चुप्पी को आप अपने एकांत का एक कोना भी मान सकते हैं या
चुप्पी तो हृदय में उठा एक तरंग की तरह भी हो सकता है
चुप्पी में कई-कई बिंब हैं अनदेखे, अनसुने
चुप्पी की एक भाषा भी होती है जो गहरे मौन में कहीं व्यक्त होती है।
चुप्पी अनबोलता होते हुए देह की एक भाषा भी है
जो अर्थ का विपर्यय बन कविता में उतरती है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
संपर्क :
सुशील कुमार
हंस निवास, कालीमंडा
पुराना दुमका, दुमका
झारखंड - 814101
मोबाइल : 7004353450
ई मेल : sk.dumka@gmail.com
.png)



'आकाश एक आशा भी है/उमंग भी है'...'बुद्ध सब बुद्धि का सार है '। विचार प्रवण कविताएं। सुशील कुमार जी को इन कविताओं के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएं