प्रचण्ड प्रवीर का आलेख 'वर्णोच्चार तथा छन्द : प्रातिशाख्योँ के आलोक मेँ'




किसी भी भाषा के लिए उसकी वर्तनी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती है। प्रचण्ड प्रवीर लिखते हैँ 'प्राचीन भारतीय परम्परा मेँ समस्त ज्ञान को वैदिक संहिता और उनके उपजीव्य ग्रन्थोँ मेँ निबद्ध किया गया है। वेद के छह अङ्गोँ मेँ पहले दो, शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णोँ के उच्चारण और पदोँ की साधुता का ज्ञान हो जाना प्रतिपाद्य है। वैदिक मन्त्रोँ और पदोँ के अर्थ-ज्ञान के लिये 'निरुक्त' तीसरा अङ्ग गिना जाता है। अधिकांश मन्त्र पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त हैँ अतः उनके लिये चौथे अङ्ग 'छन्द' का विधान है। वैदिक कर्मोँ के अङ्गदर्श आदि कालोँ के ज्ञान के लिये 'ज्योतिष' पाँचवा अङ्ग है। वैदिक अनुष्ठान के क्रमोँ के ज्ञान के लिये कल्पसूत्र आदि वेद के छठे और अन्तिम अङ्ग 'कल्प' मेँ आते हैँ।' लिखने या बोलने में बरती जाने वाली अशुद्धियां दिक्कततलब होती हैँ। फ़िराक़ गोरखपुरी कहा करते थे कि अशुद्धियां खाने में कंकड़ के समान होती हैं जो खाने का सारा स्वाद बिगाड़ देती हैँ। न्यूज चैनल्स और पत्र पत्रिकाओं की बात तो छोड़िए किताबों में भी तमाम अशुद्धियां सहज ही देखी जा सकती हैँ। बचपन में हमें बताया जाता था कि भाषा सीखने के लिए पुस्तकें आवश्यक रूप से पढ़ी जानी चाहिए। लेकिन आज भाषिक अराजकता का जो दौर है, उसमें पाठक कहाँ जा कर सीखे, यह एक गम्भीर सवाल है। प्रवीर का यह गम्भीर आलेख धैर्यपूर्वक पढ़ा जाना चाहिए। खुद मुझे इस आलेख से सीख और कई नए तथ्य जानने को मिले हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर का आलेख 'वर्णोच्चार तथा छन्द : प्रातिशाख्योँ के आलोक मेँ'। प्रस्तुत आलेख का सन्दर्भ प्रवीर की सद्यःप्रकाशित पुस्तक ‘वर्णोच्चार विधान : भारतीय ध्वनि-तत्त्व-शास्त्र मेँ वर्णविलास’ है। यह पुस्तक ‘किताबवाले प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली से प्रकाशित हुई है।



'वर्णोच्चार तथा छन्द : प्रातिशाख्योँ के आलोक मेँ'


प्रचण्ड प्रवीर 


प्राचीन भारतीय परम्परा मेँ समस्त ज्ञान को वैदिक संहिता और उनके उपजीव्य ग्रन्थोँ मेँ निबद्ध किया जाता था। वेद के छह अङ्गोँ मेँ पहले दो, शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णोँ के उच्चारण और पदोँ की साधुता का ज्ञान हो जाना प्रतिपाद्य है। वैदिक मन्त्रोँ और पदोँ के अर्थ-ज्ञान के लिये 'निरुक्त' तीसरा अङ्ग गिना जाता है। अधिकांश मन्त्र पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त हैँ अतः उनके लिये चौथे अङ्ग 'छन्द' का विधान है। वैदिक कर्मोँ के अङ्गदर्श आदि कालोँ के ज्ञान के लिये 'ज्योतिष' पाँचवाँ अङ्ग है। वैदिक अनुष्ठान के क्रमोँ के ज्ञान के लिये कल्पसूत्र आदि वेद के छठे और अन्तिम अङ्ग 'कल्प' मेँ आते हैँ।


यह विचारणीय है कि प्राचीन भारत मेँ समस्त ज्ञान के लिये छह अङ्गोँ मेँ चार अङ्ग भाषा विषयक हैँ। वस्तुतः भाषा ही समस्त संसार को ‘अर्थ’ प्रदान करती है और उस अर्थ की उपयोगिता केवल मनुष्य जीवन मेँ संवादोपयोगी होने तक सीमित न हो कर ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन के लिये भी है। शिक्षा ज्ञान की पहली सीढ़ी कही जा सकती है। यह चिन्ताजनक है कि विद्यालयोँ मेँ किसी भी स्तर पर हिन्दी भाषा के उच्चारण के सम्यक पठन-पाठन की कोई निश्चित राष्ट्रव्यापी व्यवस्था नहीँ है। 


हमने हिन्दी के स्वरूप को मनमाने ढंग से बिगड़ाते हुए वैयाकरणिक अशुद्धियाँ तो रहने दीजिये, साधारण वर्तनी और उच्चारण सम्बन्ध मेँ भी अधोगति प्राप्त की है। हिन्दी भाषा के अधिकांश परास्नातक, शोधार्थी, यहाँ तक कि प्राध्यापक भी शुद्ध हिन्दी न लिख पाते हैँ और न ही बोल पाते हैँ। 


समकालीन भारत मेँ हिन्दी भाषा का प्रयोग शोचनीय दिशा मेँ हैँ, जैसा कि समाचार पत्रोँ और न्यूज-चैनलोँ मेँ चिन्ताजनक स्थिति मेँ दृश्यमान है। इन दिनोँ बड़े नामे-गिरामी पत्रिकाओँ के सम्पादक हिन्दी के उच्चारण के लिये अरबी-फारसी मानकीकरण का हवाला देते हैँ, भले ही वे ऊष्म वर्ण – श ष स – का शुद्ध उच्चारण कदापि न कर पायेँ। कुछ यहाँ तक कहने मेँ भी लज्जित नहीँ होते कि हिन्दी का विकास उर्दू से हुआ है, जबकि तथ्य यह है कि उच्चारण की दृष्टि से उर्दू के ‘ये’ जैसे वर्ण, हिन्दी के ‘य’ जैसे व्यञ्जन वर्ण नहीँ हैँ। अनुनासिक वर्णोँ के लिये भी अबजद भाषाओँ (अरबी,फारसी, उर्दू) मेँ संस्कृत के वर्ण-समाम्नाय जैसी व्यवस्था है ही नहीँ। हिन्दी मेँ भले ही बहुत-सी बोलियाँ, भाषाएँ आकर समाहित होती रहेँ, किन्तु हमारी भाषा के मूल स्वरूप और ध्वन्यात्मक विन्यास को समझने के लिये हमेँ संस्कृत का ही अनुसरण करना पड़ेगा। ध्वन्यात्मक स्वरूप की अनदेखी करते हुए हम हिन्दी लेखन मेँ अनुनासिक और अनुस्वार का भेद नहीँ करते। प्रस्तुत आलेख मेँ मैँने अनुनासिक स्वर-वर्णोँ के लिये ‘चन्द्रबिन्दु’ का प्रयोग किया है। इसके स्रोत वैदिक हैँ जहाँ अनुनासिक स्वरोँ के लिये ‘रङ्ग’ संज्ञा दी गयी है। लौकिक संस्कृत से यह बड़ी भ्रान्ति फैली हुई है कि संस्कृत मेँ ‘अनुस्वार’ ही होता था और ‘चन्द्रबिन्दु’ का प्रयोग हिन्दी की देन है। यह सरासर ग़लत है। वेदोँ के अनुस्वार स्वर-वर्णोँ के साथ संयुक्त हो कर ‘अनुनासिक-स्वर’ तथा अपने मौलिक स्वरूप मेँ ‘व्यञ्जन’ हैँ।


वेदाङ्ग शिक्षा ग्रन्थ और प्रातिशाख्य


वेदाङ्ग शिक्षा मेँ प्रमुख ग्रन्थ हैँ – पाणिनीय शिक्षा, याज्ञवल्क्य शिक्षा, नारदीय शिक्षा, आपिशल शिक्षा, भारद्वाज शिक्षा, सर्वसम्मत शिक्षा आदि। इसके अतिरिक्त प्रातिशाख्य ग्रन्थोँ मेँ उच्चारण की नियमावली निर्दिष्ट है। अलग-अलग संहिताओँ के अलग-अलग प्रातिशाख्य मिलते हैँ। इन प्रातिशाख्योँ मेँ ध्वनितत्त्व और ध्वनि विकास सम्बन्धी विलक्षण संक्षिप्त कारिकाएँ कई अध्यायोँ मेँ दी गयीँ हैँ। उन कारिकाओँ को ठीक से समझने के लिये उन पर कई-कई भाष्य हैँ जो उनका अर्थ स्पष्ट करते हैँ। कुछ विद्वानोँ का मत है कि प्रातिशाख्य शास्त्र वैदिक शिक्षा के अन्तर्भूत हैँ। इसके विपरीत कतिपय अन्य विद्वानोँ का मत है कि प्रातिशाख्य शिक्षा-शास्त्र से पृथक् स्वतन्त्र शास्त्र है, जिसमेँ शिक्षा और व्याकरण, दोनोँ शास्त्रोँ के प्रतिपाद्य विषयोँ का समावेश है। शिक्षा का प्रतिपाद्य विषय ‘सन्तान’ का सर्वाङ्गीण विवरण किसी शिक्षा-ग्रन्थ मेँ नहीँ मिलता है, इसके विपरीत सन्तान विषयक साहित्य व्याकरणशास्त्र मेँ वर्णित है।  ध्वनियोँ का मौलिक स्वरूप किस तरह व्याकरण मेँ उपस्थित सन्धि-नियमोँ को प्रभावित करता है, इसका भी अनुसन्धान प्राचीन भारतीय ध्वनि-तत्त्वशास्त्रियोँ ने किया था।


महान् वैयाकरण पाणिनि (लगभग ५०० ईसा पूर्व) के नाम से प्रचलित साठ कारिकाओँ की सङ्क्षिप्त पुस्तिका ‘पाणिनीय शिक्षा’ के श्लोकात्मक पाठ मेँ उच्चारण सम्बन्धी बहुत से नियम हैँ। पाणिनि से भी पूर्व आचार्य आपिशलि विरचित ‘आपिशल शिक्षा’ (या आपिशलि शिक्षा) भी एक महत्त्वपूर्ण पुस्तिका है। पाणिनीय शिक्षा के सूत्रात्मक पाठ – पाणिनीय शिक्षासूत्र के वृद्ध पाठ के लिये भी युधिष्ठिर मीमांसक द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘शिक्षा-सूत्राणि’ देखी जा सकती है।


मुख्य प्रातिशाख्य ग्रन्थोँ का सङ्क्षिप्त परिचय निम्न है, जिनमेँ से अधिकांश का रचनाकाल पाणिनि से पूर्व का माना जाता है: —


१. शौनकाचार्यकृत ऋग्वेद-प्रातिशाख्य का सम्बन्ध ऋग्वेद की संहिता से है। यह अठारह अध्याय मेँ है। इस पर उवट का भाष्य प्रसिद्ध है। ऋक् प्रातिशाख्य पर विष्णुमित्र की वर्गद्वयवृत्ति प्रसिद्ध है। इस प्रातिशाख्य का प्रोफेसर एम.ए. रेंइए (M.A, Regnier) द्वारा किया गया फ्रेञ्च भाषा मेँ (१८५७-१८५९) तथा प्रो॰ मैक्सम्यूलर द्वारा किया गया जर्मन भाषा मेँ (१८५६-१८६९) किया गया अनुवाद पाश्चात्त्य जगत के लिये महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। यह प्राचीनतम प्रातिशाख्य माना जाता है। इसमेँ निरुक्तकार यास्क (७०० ईसा पूर्व) का उल्लेख है, अतः अनुमान लगाया जाता है कि यह ईसा से ७०० वर्ष पूर्व के आसपास का है।


२. तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य का सम्बन्ध कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से है। यह चौबीस अध्यायोँ मेँ है। प्रोफेसर ह्विटनी (W.D. Whitney) कृत अँग्रेजी अनुवाद (१८७१) पाश्चात्त्य जगत के लिये पहला अनुवाद था। विद्वानोँ ने ऋग्वेद-प्रातिशाख्य के बाद इसे ही सबसे पुराना प्रातिशाख्य कहा है। तै॰प्रा॰ पर सारे भाष्योँ मेँ सोमयार्य ‘त्रिभाष्यरत्न’ और गोपालयज्वा का ‘वैदिकाभरण’ भाष्य मुख्य हैँ। इस पर सबसे प्राचीन भाष्य माहिषेयकृत पदक्रमसदन भाष्य है, जो कि पूरा नहीँ मिलता। 


३. कात्यायनाचार्य कृत ‘वाजसनेय प्रतिशाख्य’ का सम्बन्ध शुक्ल यजुर्वेद से है। यह आठ अध्यायोँ मेँ है। प्रोफेसर ए. वेवर (A. Waber) द्वारा जर्मन भाषा मेँ अनुवाद (१८५८) पाश्चात्त्य जगत के लिये पहला अनुवाद था। इस ग्रन्थ के तीन नाम व्यवहार मेँ उपलब्ध हैँ – वाजसनेय-प्रातिशाख्य, शुक्लयजुःप्रातिशाख्य तथा कात्यायन-प्रातिशाख्य। इस पर उपलब्ध छह व्याख्याओेँ मेँ उवट का ‘मातृमोदभाष्य’ तथा अनन्त भट्ट का ‘पदार्थप्रकाशभाष्य’ प्रमुख हैँ। इसके अधिकतर भाष्य शुक्ल यजुर्वेद संहिता की माध्यन्दिन शाखा से जुड़े हैँ। 


४. शौनकीय ‘चतुरध्यायिका’ का सम्बन्ध अथर्ववेद की शौनक शाखा से है। नाम के अनुरूप यह चार अध्यायोँ मेँ है। इसका आलोचनात्मक संस्करण, अँग्रेजी अनुवाद के सहित, प्रो॰ ह्विटनी (W.D. Whitney) ने १८६२ मेँ प्रकाशित किया था। यह भी सूत्रशैली मेँ और चार अध्यायोँ मेँ है। प्रसिद्धि के कारण कई बार इसे ही ‘अर्थववेद प्रातिशाख्य’ कह दिया जाता है। 


५. सामवेद से सम्बन्धित ऋक्तन्त्र, सामतन्त्र, अक्षरतन्त्र और पुष्पसूत्र नाम के चार प्रातिशाख्य मिलते हैँ। सामवेद की कौथुम शाखा से सम्बन्धित ऋकतन्त्र के रचयिता आचार्य शाकटायन या औदव्रजि हैँ। यह प्रातिशाख्य भी सूत्ररूप मेँ उपनिबद्ध है। सम्पूर्ण ऋकतन्त्र पाँच प्रपाठकोँ मेँ विभक्त है। 


६. ‘अथर्व प्रातिशाख्य’ सभी प्रातिशाख्योँ मेँ सबसे छोटा है। यह तीन प्रपाठकोँ मेँ विभक्त है। यह सबसे अधिक अर्वाचीन है, तथा पाणिनि के बाद की रचना है। अथर्व-प्रातिशाख्य की विषय-वस्तु सीमित है। इसमेँ सन्धिनियम, स्वर और पदपाठ के नियम आदि कतिपय विषय ही प्रतिपादित हैँ। ध्वनि-शास्त्र विषयक महत्त्वपूर्ण नियमोँ का सर्वथा अभाव है।


यह दुःखद है कि हम अपनी भाषा मेँ  ‘अक्षर’ और ‘वर्ण’ आदि का सही अर्थ नहीँ समझते हैँ। भारतीय ध्वनि-तत्त्व-शास्त्र मेँ अक्षर दो अर्थोँ मेँ लिया जाता है। पहला अर्थ है – सिलेबल (Syllable), दूसरा अर्थ है, आधुनिक स्वनिम विज्ञान मेँ प्रयुक्त - फोनीम (Phoneme)। जहाँ अँग्रेजी का ‘फोनीम’ शब्द किसी भाषा के उच्चारण मेँ प्रयुक्त मौलिक सिद्ध (=प्रसिद्ध,  सुग्राह्य, सर्वस्वीकृत) ध्वनि है, जैसे कि ‘क’; वहीँ ‘सिलेबल’ शब्द उच्चारण की दृष्टि से पद (= word) की छोटी ईकाई है, जैसे कि – की, कु, कि, को आदि।


भाषा का ध्वन्यात्मक स्वरूप जाने बिना समकालीन हिन्दी कवि न जाने कौन-सी कविता करते हैँ, जबकि रीतिकाल मेँ वर्णोँ के प्रति बड़ी सावधानी बरती जाती थी। सदियोँ मेँ हमने अपनी भाषा मेँ द्रव्य-संयोजन (छन्दोँ मेँ प्रयोग की जाने वाली हिन्दी मेँ प्रसिद्ध लघु-गुरु व्यवस्था) के लिये लघु-गुरु को ह्रस्व और दीर्घ से समीकृत करते रहे हैँ, जो कि नितान्त अवैज्ञानिक है। वैदिक द्रव्य-संयोजन कहीँ अधिक सूक्ष्म और तर्कसंगत है। इसका एक निदर्शन ‘गायत्री मन्त्र’ मेँ दे कर अपनी बात स्पष्ट करना चाहूँगा।


गायत्री मन्त्र मेँ छन्द तथा द्रव्य-संयोजन

मैँ इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र, जो कि गायत्री छन्द पर आधारित है, वह विशुद्ध गायत्री छन्द नहीँ है। गायत्री छन्द मेँ चौबीस अक्षर होते हैँ जो तीन पादोँ मेँ विभक्त होते हैँ। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षर मेँ विच्छेद गायत्री छन्द के अनुरूप - सम्यक निर्दशन नीचे किया गया है।


कुछ आचार्योँ को मत है कि गायत्री छन्द ८+८+८ का होता है। सूर्यगायत्री या वह गायत्री मन्त्र जिसके द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं, वह २४ अक्षरोँ का न होकर २३ अक्षरोँ का है। अतः निचृद् गायत्री कहलाता है। उस छन्द को २४ अक्षर का करने हेतु ही ‘वरेणियं’ किया जाता है।


वैदिक छन्दोँ मेँ अक्षर (=Syllable, भाषा मेँ ध्वनि की छोटी इकाई) गिने जाने का आदेश है। यह भक्तिकालीन तथा रीतिकालीन काव्य मेँ प्रसिद्ध द्रव्य संयोजन से कुछ भिन्न है। गायत्री छन्द के लिये तीन पादोँ मेँ आठ-आठ अक्षर गिन कर चौबीस होने चााहिये। यहाँ छन्द के लिये लघु-गुरु गिनना कुछ भ्रामक हो सकता है। जिस तरह हम चौपाई, सोरठा, रोला, सवैय्या मेँ मात्राओँ को गिनते हैँ, वैदिक मन्त्रोँ मेँ मात्रा उस तरह नहीँ गिना जाता।


प्रातिशाख्योँ और शिक्षा ग्रन्थोँ से हम जानते हैँ कि व्यञ्जन वर्ण की मात्रा १/२ (=०.५) है। ह्रस्व स्वर ‘अ’ की १ मात्रा, वस्तुतः निमेष (पलक झपकने तक) यानी ०.१ से ०.४ सेकेण्ड के बीच की होती है। यह कालिक मात्रा नियत न हो कर पदोच्चार मेँ सापेक्षिक है। 


ऋक् प्रातिशाख्य के छन्द पटल मेँ, अठारहवेँ अध्याय मेँ द्रव्य (लघु-गुरु) संयोजन के सम्बन्ध मेँ निम्न कारिकाएँ है: —

  ऋ॰प्रा॰ १८.३७ – दीर्घ अक्षर गुरु संज्ञक है

  ऋ॰प्रा॰ १८.३८ – ‘ह्रस्व’ लघु संज्ञक होता है, यदि उसके ठीक बाद मेँ संयुक्त वर्ण (संयोग) न हो।

  ऋ॰प्रा॰ १८.३९ – अनुस्वार मेँ भी ऐसा ही है।

  ऋ॰प्रा॰ १८.४० – व्यञ्जन (वर्णोँ) के मेल (सङ्गम) को संयोग जानना चाहिये।

  ऋ॰प्रा॰ १८.४१ – दीर्घ अक्षर गुरु संज्ञक होता है। (जैसे आ, ई, ऊ, ए, ऐ)

  ऋ॰प्रा॰ १८.४२ – यदि दीर्घ अक्षर ‘व्यञ्जन’ के सहित हो तो वह गुरुतर होता है। (जैसे का, पा)

  ऋ॰प्रा॰ १८.४३ – व्यञ्जन सहित ह्रस्व (अक्षर) लघु (संज्ञक) होता है। (जैसे क, कि, कु)

  ऋ॰प्रा॰ १८.४४ – व्यञ्जन से रहित (केवल) ह्रस्व अक्षर लघुतर होता है। (जैसे अ, इ )

अतः द्रव्य सम्बन्धी मात्राएँ इस तरह गिनी जानी  चाहिये: – 

लघुतर की मात्रा – १

लघु की मात्रा – १.५

दीर्घ की मात्रा – २

दीर्घतर की मात्रा – २.५

दीर्घतम की मात्रा (प्लुत) – ३


अक्षर  (यहाँ ‘सिलेबल’ के अर्थ मेँ) के सम्बन्ध मेँ हमेँ शास्त्रीय मत जान  लेना चाहिये। वाजसनेय प्रातिशाख्य (वा॰प्रा॰) मेँ अक्षर के विषय मेँ बताया गया है।  इस सम्बन्ध मेँ पण्डित मधुसूदन ओझा (१८६६-१९३९) का कहना है कि अक्षर (=Syllable) की गणना निम्न तरीके से होती है: —


पूर्व तथा पश्चात दोनोँ प्रकार के व्यापारोँ (व्यञ्जनोँ) से शून्य अक्षर, जैसे – अ। (वा॰प्रा॰ १.९९ – स्वर वर्ण अक्षर संज्ञक होता है।)

पृष्ठ व्यापार से युक्त तथा पूर्व व्यापार से शून्य अक्षर, जैसे – स्म। 

पृष्ठ व्यापार से शून्य तथा पूर्व व्यापार से युक्त अक्षर, जैसे – मो। (वा॰प्रा॰ १.१०० – पूर्ववर्ती व्यञ्जन वर्ण के सहित स्वर-वर्ण अक्षर संज्ञक होता है।)

पूर्व तथा अपर दोनोँ प्रकार के व्यापारोँ से विशिष्ट अक्षर, जैसे – वाक्। (वा॰प्रा॰ १.१०१ – (पूर्ववर्ती ए‌वं) विराम मेँ स्थित व्यञ्जन वर्ण के सहित स्वर-वर्ण अक्षर संज्ञक होता है।)


संस्कृत और हिन्दी जैसी ध्वन्यात्मक-आक्षरिक भाषाएँ (=Alphasyllabry or Abugida system of writing script) मेँ हम अक्षरोँ का उच्चारण करते हैँ। इस आधार पर निम्न शब्दोँ के सही उच्चारण की विधि इस प्रकार है:— 


उपग्रह  = उ+पग्+ र+ह = उपग् + रह (उप+ग्रह नहीँ, क्योँकि ‘उपग्रह’ पद मेँ ‘पग्’ एक अक्षर है)

उपन्यास= उ+पन्+या+स = उपन्+ यास (उप+न्यास नहीँ, क्योँकि ‘उपन्यास’ पद मेँ ‘पन्’ एक अक्षर है)

भूपति = भू+प+ति  (भूप्+ ति नहीँ)

अनुक्रम = अ+ नुक् + र+ म (अनु+क्रम नहीँ, क्योँकि ‘अनुक्रम’ पद मेँ ‘नुक्’ एक अक्षर है)

जनता = ज + न + ता (जन्+ता नहीँ)


इस आधार पर गायत्री मन्त्र मेँ प्रणव (ॐ) तथा महाव्याहृतियोँ (भू:, भुव:, स्वः)  को छोड़ देने पर अक्षर का क्रम संलग्न चित्र/ तालिका के अनुसार बनेगा। 



द्रव्य-संयोजन हेतु तालिका




इस सम्बन्ध मेँ समकालीन अध्येता श्री धनञ्जय कुमार मिश्र का मत इस प्रकार है: —

वैदिक छन्दोँ मेँ अक्षर संख्या ही छन्दोँ के निर्धारण मेँ नियामक है। जैसे कि तीन अष्टाक्षर गायत्र पादोँ के प्रयोग से गायत्री छन्द बनेगा। अतः २४ अक्षर होना अपेक्षित है। यदि कुत्रचित् निर्धारित अक्षर संख्या मेँ कम ज्यादा अक्षर होते हैं। वहाँ पर "व्यूह" करना है। ( व्यूह क्या होता है ?, तो जहाँ पर मन्त्र मेँ संयुक्ताक्षर होता है, वहाँ संयुक्ताक्षर में प्रयुक्त य-कार और व-कार के स्थान मेँ इ कार अथवा उ कार जोड़ कर, एक अक्षर बढ़ाया जाता है। यथा - वरेण्यम् (संयुक्ताक्षर के स्थान मेँ) इकार जोड़ कर, "वरेणियम्" उच्चारण करना है। जिससे न्यूनाक्षर दोष निरस्त हो जायेगा। ( वरेण्यम् -तीन अक्षर हैं, वरेणियम् - में चार अक्षर हो जायेँगे।)

 वैदिक छन्दोँ मेँ एक अक्षर कम होने पर उसे निचृत् (Nichrut) विशेषण दिया जाता है (जैसे निचृद् गायत्री), जबकि एक अक्षर ज़्यादा होने पर भुरिक् (Bhuriq) कहा जाता है (जैसे भुरिग्गायत्री) और दो अक्षर कम होने पर विराट् (Virat) कहते हैं; ये विशेषण मूल छन्द के नाम के साथ जुड़ते हैं। 

उदाहरण:

गायत्री छन्द (२४ अक्षर) में २३ अक्षर होने पर निचृद् गायत्री।

गायत्री छन्द (२४ अक्षर) में २५ अक्षर होने पर भुरिग्गायत्री।

गायत्री छ्न्द (२४ अक्षर) में २२ अक्षर होने पर विराट् गायत्री। 

इस प्रकार, अक्षर संख्या मेँ कमी या वृद्धि के आधार पर छ्न्दोँ को ये नाम दिए जाते हैँ, जिससे उनके स्वरूप और नाम में परिवर्तन आता है। 

सन्दर्भ: वैदिक वाङमय में छन्दशास्त्र का महत्त्व, https://www.setumag.com/2024/01/Vaidik-Chhand-Shastr-DK-Mishra.html


यहाँ उल्लेखनीय है कि कुछ समकालीन संस्कृत अध्येताओँ का मत यह है कि गायत्री मन्त्र मेँ द्रव्य-संयोजन पदोच्चार मेँ सापेक्षिक करके मन्त्रोच्चार की कालिक अवधि ‘२४’ मात्रा होनी चाहिए। यह विवाद का विषय है क्योँकि डॉ॰ भरत गुप्त जैसे विद्वानोँ का मत है कि वैदिक मन्त्र आधुनिक अर्थ के गायन मेँ नहीँ बल्कि मन्त्रोच्चार की निर्दिष्ट विधि से ही करना चाहिए।


उपसंहार


हिन्दी के अध्यापकोँ और पाठकोँ को शुद्ध उच्चारण हेतु प्रातिशाख्य तथा शिक्षा ग्रन्थोँ का अवलोकन आवश्यक है। इस क्षेत्र मेँ शोध की भी बहुत-सी सम्भावनाएँ हैँ। हिन्दी मेँ उर्दू-फारसी-अरबी के प्रभाव मेँ कई नये शब्द आयेँ। साथ ही उच्चारण और वर्तनी दोष भी आया। आज वस्तुस्थिति यह है कि हम शास्त्रीय सम्मत तालव्य (=palatal) वर्णोँ (चवर्ग, श आदि) का उच्चारण ‘वर्त्स्य’ (=alveolar) करने लगे हैँ, तथा यह हमारे संज्ञान मेँ भी नहीँ है। प्रायः हम ‘शिव’ मेँ ‘श’ का उच्चारण ही अशुद्ध करते हैँ। किसी भाषा के मूल मेँ वर्ण (=परिचीयमान और सिद्ध ध्वनियाँ) और अक्षर (=phoneme) हैँ, जिसे हम ठीक से नहीँ समझते। चूँकि यह अध्यापकोँ द्वारा ही ठीक से नहीँ समझा जाता, अतः विद्यार्थियोँ मेँ भी सम्यक रूप से सम्प्रेषित नहीँ हो पाता। साथ ही हम ‘मात्रा’, ‘स्वर’, ‘स्थान-करण’, ‘आभ्यन्तर प्रयत्न’, ‘बाह्य प्रयत्न’ आदि मूलभूत विचारोँ से सर्वथा अनभिज्ञ हैँ। कुछ लोग का कहना है कि जिस तरह ज्यामिति दसवीँ कक्षा के बाद कुछ और नहीँ रह जाती, उसी तरह वर्णोच्चार (=aticulatory phonetics) मेँ भी कुछ ऐसा विशेष नहीँ है कि जिस पर अधिक ध्यान दिया जाय। ऐसा सोचना हमारे अज्ञान का दम्भ है। ज्ञान का दम्भ बहुधा प्रकट होता है, किन्तु वर्णोच्चारण की अनदेखी हमारे समाज के अज्ञान का दम्भ नहीँ तो और क्या है? 


सम्बन्धित विषयोँ पर मैँने अपनी पुस्तक ‘वर्णोच्चार विधान : भारतीय ध्वनितत्त्वशास्त्र मेँ वर्णविलास’ मेँ अधिक विचार किया है। सम्भव है कि मेरे प्रयास मेँ दोष होँ, किन्तु मेरा संकल्प शुभ और सत्यपरक है। मुझे आशा है कि भाषा के विद्वान मेरे इस प्रयास को गम्भीरता से लेँगे।


यह तथ्य है कि संस्कृत और हिन्दी भाषा के फोनीम (=अक्षर) को पाश्चात्य जगत मौलिक फोनीमोँ मेँ नहीँ गिनता क्योँकि उनके पास ‘ख’, ‘छ’, ‘ठ’,’थ’, ‘फ’ जैसी ध्वनियाँ सिद्ध रूप (यानी स्वीकृत और सहज रूप मेँ भाषा मेँ अस्तित्वमान) नहीँ है। पर उन्होँने उच्चारण के लिये अपनी विधि विकसित की है जिसे आज ‘अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला’ से अभिहित किया जाता है। हमारे समय मेँ भाषाविषयक जिज्ञासु उच्चारण के लिये उक्त पाश्चात्त्य स्वनविज्ञान (फोनेटिक्स) की ओर हतप्रभ हो कर देखते हैँ। पर हम यह नहीँ जानते कि इस सम्बन्ध मेँ बहुतेरे सूक्ष्म विचार भारत-भूमि पर हो चुके हैँ। हमेँ अपनी थाती का अवलोकन करना चाहिये। यह हमेँ वैभव ही प्रदान करेगा।


[नोट: ‘वर्णोच्चार विधान’ पुस्तक ‘किताबवाले प्रकाशन' से फोन, ईमेल या ह्वाट्सएप के द्वारा मँगायी जा सकती है। सम्पर्क सूत्र : सुकून भाटिया, +91-9599041956, kitabwale@gmail.com]

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