विभूति तिवारी की कविताएँ
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| विभूति तिवारी |
कवि परिचय
विभूति तिवारी
शिक्षिका (प्राचार्य)
म. प्र. स्कूल शिक्षा विभाग
उत्तर स्नातक - रसायनशास्त्र
साहित्यिक परिचय
कविता, गीत, नवगीत लेखन
मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन इकाई ब्योहारी की सचिव
वातायन प्रत्यूषा अलंकरण से सम्मानित
मानव शरीर में मस्तिष्क की विशिष्ट भूमिका होती है। शरीर का संचालन, विचार, जान पहचान, प्रेम, नफरत जैसे जितने भी भाव हैं सब इस मस्तिष्क की बदौलत ही हैं। किसी वजह से मस्तिष्क अगर अपना सन्तुलन खो देता है तो व्यक्ति मनोरोगी हो जाता है। उसे खुद अपनी सुध बुध नहीं रहती। वह पहचान तक नहीं पाता। लोग ऐसे व्यक्ति को पागल की संज्ञा देने लगते हैं। कवि विभूति तिवारी अपनी कविता 'मानसिक रोगी' में लिखती हैं : 'लोग कहते हैं ...पागल) पर कौन पूछता है/ उसके अंदर की दुनिया कितनी टूटी है?/ कितनी रातें उसने बिना नींद के बिताई हैं,/ कितनी आशाएँ उसने खून की तरह बहा दी'। कवि उसे एक मनुष्य की तरह देखती हैं और उस संवेदना की तलाश करती हैं जो अब धीरे धीरे दुर्लभ होता जा रहा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं विभूति तिवारी की कविताएँ। हमें ये कविताएँ कवि केशव तिवारी ने उपलब्ध कराई हैं।
विभूति तिवारी की कविताएँ
रोटी बनाते हुए
रोटी बनाते हुए
अक्सर सोचती हूँ
आड़ी-टेढ़ी लमतुतरी, चौकोर
या किसी भी
मनमाफ़िक आकार-प्रकार में
क्यों नहीं बेली जा सकती रोटी?
क्यों ज़रूरी है
रोटी को गोल ही बेलना
आंखों से नहीं होता स्वाद का रिश्ता
फिर स्त्री का बेलन से
बेलन का रोटी की गोलाई से
क्यों किया जाता है आग्रह
भूख रोटी तोड़ती है
और स्त्री परंपराओं की
इन गोलबंदियों को।
पुतरियों का खेल
क्या दिन थे वे
हम सबसे और सब हमसे बतियाते थे
चंदा मामा आते पुरानी पुतरियाँ ले जाते
नई पुतरियाँ दे जाते
कपड़े की उन रंग बिरंगी पुतरियों में
जान बसती थी हमारी
वे हमारी ही तरह हँसती-बोलती,
रोती-गाती, खेलती-कूदती,
खाती-पीती और सोतीं
हमारी तरह ही रूठतीं
और मनाने पर मान भी जातीं
उनका अपना घर था
घर में बेलन चौकी से ले कर
गृहस्थी का सारा सामान था
उसी में हमारा बसेरा था
हम चूल्हे में सपने पकाते
सुनहरे भविष्य के गीत गाते
हमारी धमाचौकड़ी से चिंता
घर के किसी कोने में दुबकी रहती
हमारी उम्र छोटी थी लेकिन पुतरियों के
मां-बाप भाई-बहन सब हमी थे
हम अपने घर की तंगहाली की छाया से
पुतरियों के घर दूर रखते
उनके पंखों को उड़ान देते
और ख्वाबों की हथेली में
गुड की डली धर देते
पुतरे बड़े और समझदार होते गए
पुतरियाँ सजती रहीं, शर्माती रहीं
फिर एक दिन रचा गया उनके
विवाह का खेल
हमें विवाह का मतलब कहां पता था
न रीत, न रस्म-ओ-रिवाज़
बहन की पुतरी के घर से
बड़े धूम धाम से बारात आती
किसी बात पर झगड़ा होता
और बारात बिन ब्याहे ही लौट जाती
हमारे आँगन में सन्नाटा पसर जाता
दिल बैठ जाता
ऐसा लगता जैसे सचमुच का रिश्ता
टूट गया हो
रात भर सोचते
अब कैसे होगा हमारी बन्नी का ब्याह
कहाँ से आएगा वर,
कैसे लौटेगी उसकी हँसी
हम सबकी खुशी
इस खेल में सब कुछ था
अब सोचती हूं तो लगता है
सही अर्थों में यह खेल
भावी जीवन का रिहर्सल था
सुबह होती और हम फिर से रम जाते
वही घर, वही खेल वही पात्र
वही चिंता, वही कहानी
अंतर बस इतना ही था कि हम
हर बार थोड़े बड़े हो जाते
कुछ खुद समझते कुछ पात्रों को समझते
जीवन थोड़ा और सच्चा लगता
अब जब पीछे मुड़ कर देखती हूँ
तो लगता है
खेल में ही सीख ली थी हमने
सारी दुनियादारी
अब समय बदल गया है
पुतरियाँ अब नौकरी पर जाने लगी हैं
उनके लिए घर के भीतर और बाहर
चुनौतियां एक सी हैं
फर्क सिर्फ इतना है कि अब
अभिनय से काम नहीं चलता।
हम सबमें थोड़ा-थोड़ा बंटा हुआ
समान रूप से उपेक्षित
घर की सभी गैरजरूरी चीजें
एकजुट हो कर
एकबार फिर से
हो चुकी हैं ताकतवर
अब वे मनुष्यों की तरह सोचती हैं
अपने सुख-दुख
आपस में साझा करती हैं
उनके विमर्श का ताजा निष्कर्ष है कि
उपयोगिता एक भ्रम है
जो चीज किसी खास व्यक्ति के लिए
किसी खास मौके में होती है उपयोगी
वही किसी दूसरे के लिए
किसी दूसरे मौके पर होती है
सर्वथा अनुपयोगी
भैंस और वीणा की
बंदर और अदरक की बानगी
ऐसे ही थोड़े दी जाती है
घर के उखड़ते फर्श ने कहा
बात बिल्कुल दुरुस्त है
मैंने तो उन कदमों को झेला है
जो अब लौट कर नहीं आयेंगे
जो आएंगे वे संभवतः मुझे
अनुपयोगी ठहराएंगे
पुराना आईना कहता है
जो कभी खुद को मुझमें देखता था
सजता था, संवरता था
अब वह कहीं दिखाई नहीं पड़ता
मैं उसके लिए अनुपयोगी हो गया कि
वह इस दुनिया के लिए
टूटी आलमारी बुदबुदाती है
जो चीजें मैंने अपने कलेजे में
बड़े जतन से संभाली
वे अब कहां हैं
कुशन में बैठी थकान बोलने लगी है
दीवारें टोंकने लगी़ हैं
कोनों में छुपी चुप्पियां
इतिहास की अनकही कहने लगी हैं
धीरे धीरे घर की सभी गैरजरुरी चीजें संवेदनशील हो उठी हैं
अंततः उनमें से किसी ने पूछा
अब मनुष्य कहां है?
वह नज़र क्यों नहीं आता
रोशनदान से आती धूल ने कहा
यहीं-कहीं है
हम सबमें थोड़ा-थोड़ा बंटा हुआ
हर वस्तु में थोड़ा-थोड़ा बचा हुआ।
"कुछ कमी सी है"
मेरे चारों ओर
पर्याप्त ऑक्सीजन है,
मैं चैन से साँसें
ले सकती हूँ...
मेरे पास राशन है,
मैं अपनी भूख
मिटा सकती हूँ...
और पीने के लिए
अभी पर्याप्त पानी भी है...
इन सबसे परे
मेरे पास कुछ किताबें हैं,
शब्दों का एक विशाल संसार है
उन शब्दों में,
मैं खुद को ढूंढ सकती हूं ..
जो कभी मेरे नहीं थे,
फिर भी मेरे साथ हो सकते हैं।
तो फिर
क्या नहीं है जो होना चाहिए ?
या...
जीने के लिए
और क्या होना चाहिए..?
साँसें चल रही हैं ...
पर जीवन ठहर गया है,
सब कुछ होते हुए भी
कुछ कमी-सी है...
शायद
जीना सिर्फ़ होना नहीं,
महसूस करना भी होता है...
वो जो अब,
कहीं खो गया है।
शायद यही वह जगह है
जहाँ पाने और महसूस करने में
फर्क होता है।
तुम्हारा-प्रेम
तुम्हारा प्रेम शॉल की तरह है
निहायत नर्म, मुलायम
सहूलियत और सलाहियत से भरा
हर मौसम में अनुकूल
पर यह ऊन का नहीं,
विश्वास और अनुभूतियों के तंतुओं से
जीवन के करघे पर बुना
लाल रंग में रंगा
मेरी धमनियों और शिराओं में बहता हुआ
इसे ओढ़ते ही मौसम सुहाना हो जाता है
ओढ़ने से केवल ठंडक ही नहीं मिटती
जन्मों जन्मों की प्यास भी मिटती है
समय से परे है यह शॉल
न ये पुराना पड़ता न इसका क्षय होता
पीड़ा और अकेलेपन को हर लेता है
शरीर को ही नहीं
आत्मा को भी ढँक लेता है
छाया की तरह है
कभी दृश्य कभी अदृश्य
पर हर क्षण विद्यमान और अनुभूत ।।
मानसिक रोगी
वह मुस्कुराता है
पर उसकी मुस्कान में कोई अर्थ नहीं,
सिर्फ़ टूटी हुई नसों की थरथराहट है।
लोग कहते हैं ....वह पागल है,
पर कौन समझेगा कि उसकी खामोशी
कितनी भाषाएँ बोलती हैं
उसके भीतर
एक युद्ध चलता है
जिसका कोई सेनापति नहीं,
सिर्फ़ घायल सैनिक हैं
जो हर दिन मरते हैं,
और हर सुबह फिर से जी उठते हैं।
वह दीवारों से बात करता है,
क्योंकि इंसान अब जवाब नहीं देते।
उसकी भाषा लोगों की समझ से परे है
उसकी आंखों में तूफ़ान हैं,
जिन्हें देखना कोई नहीं चाहता।
कभी वह खुद से नाराज़ होता है,
कभी खुद को माफ़ कर देता है,
फिर उसी माफ़ी पर पछताता है।
लोग उसे ...मानसिक रोगी कहते हैं..
दुनिया के लिए वह “बीमार” है,
पर असल में वह वही है
जो इस नकली भीड़ में
अब भी सचेत है
सिर्फ़ ज़रा ज्यादा संवेदनशील।
उसकी हँसी ...
एक काँच की खिड़की जैसी,
टूटी हुई, छिलती हुई,
छोड़ देती है सिर्फ़ दर्द की परछाई।
वह खड़ा है भीड़ में,
पर भीड़ उसके भीतर की दीवारों से टकराती है,
और वह चुपचाप गिरता रहता है
किसी ने उसे नहीं देखा।
उसके विचार
जंगली तूफ़ान,
जो कभी-कभी खुद को निगल लेते हैं।
वह खुद से लड़ता है,
और हर बार हारता है,
पर फिर भी उठ खड़ा होता है,
लोग कहते हैं ...पागल
पर कौन पूछता है
उसके अंदर की दुनिया कितनी टूटी है?
कितनी रातें उसने बिना नींद के बिताई हैं,
कितनी आशाएँ उसने खून की तरह बहा दी
फिर भी वह जीता है,
एक टूटते मन के साथ,
एक अकेली आत्मा के साथ,
अपने अस्तित्व से लड़ती....।
अक्कड़ बक्कड़
भाई के साथ खेलते हुए
हमको कहां पता था
मैं लड़की, वो लड़का है
हमको तो खेल पता था
पता था भूख लगे पर खाना
बस्ता उठा कर
भागते हुए स्कूल जाना
खुराफातियां कर खिलखिलाना
ऊपर से इतराना
पोशाकें भी तब कहां
अलग-अलग होती थीं
चड्डी पहन कर आंगन में
खिल सकता था कोई भी फूल
जो खेल भाई को रुचता था
उसी में मेरा भी मन लगता था
अक्कड़ बक्कड़ बंबे बोल
अस्सी नब्बे पूरे सौ का
मचाते हुए शोर
घर आंगन बाड़ी के
लगाए इतने चक्कर
कि गणपति की बुद्धि भी
खा गई घनचक्कर
अक्कड़ बक्कड़ दही चटक्कड़
बोल बोल कर दूध दही मक्खन के
बेहिसाब कटोरे किए चट
तो ढीले किए
कितने ही बंधनों के नट
कई बार मुझे लगता है
पानी को जैसे पानी की तरह
रोशनी को जैसे रोशनी की तरह
पहचाना जाता है
उसी तरह पहचाना जाता
मनुष्य को यदि मनुष्य की तरह
तो कितनी खूबसूरत होती ये दुनिया
सुनो हम भले ही बना नहीं पाए हों
वैसी खूबसूरत दुनिया
लेकिन अपने भीतर बसा रखी है
हमने बचपन की वो दुनिया
जो हमें स्त्री या पुरुष होने के पहले
बनाए रखती है मनुष्य।
माँ तुम जब स्वस्थ थी
तुम जब तक स्वस्थ थी
तब तक सब कुछ इतना सहज
इतना स्वाभाविक था
जैसे बिना किसी उपक्रम के
आती-जाती साँसें
जैसे बिना पुकारे पौ फटे
रात के जीने से खुद ही उतरकर
चली आती भोर
तुम हर स्थिति-परिस्थिति में
दाल भात की तरह
इतनी आसानी से सुलभ थी
कि तुम्हारे होने को हमने
कभी नहीं माना दैवीय अनुग्रह
तुम्हारी मुस्कान हमारे लिए
दवा थी, मरहम थी
हमारे कहे-अनकहे प्रश्नों का उत्तर थी
तुम्हारी रहस्यमई चुप्पी
हमारी परेशानी का संसार
तुम्हारे स्वस्थ रहते हुए हमने
जीवन को जीवन की तरह निश्चिंत जिया
लेकिन समझा कहाँ
समझते तो जानते
सेहत की चाहत सिर्फ शरीर को नहीं
संबंधों को और घर को भी होती है
लेकिन आत्मा!
वह तो चिरंतन होती है
तुम तो जीते जी
चिरंतन सी भाषित होती हो माँ
तुम्हारे अस्वस्थ होने पर
समझ आया
सिर्फ ईंट गारे से नहीं
प्रेम से बनता है घर
तुम्हारे रहते घर का हर कोना
लगता था चिरंतन
दया और ममता की आभा से उद्भाषित
अब वही घर
आवाज नहीं देता
बुलाता नहीं
तुमने बोलना क्या बंद किया
वह भी चुप हो गया
कुछ नहीं पूछता
तुम्हारे बीमार होने से
कितना कुछ बदल गया
हमारा हंसना, गाना, रोना
सब एक सा हो गया माँ।
प्रियवर दूर मत जाना
पूनम की रात और चाँदनी का
इच्छाओं की तरह अनंत....
अछोर विस्तार
सच क्या है
छायाओं के पीछे दुबका अंधेरा
या मनोरम चाँदनी का चाक्षुष संसार
सोलह शृंगार किए खड़ी अभिसारिका
कहाँ जानती है
सुख के पीछे अंधेरे की तरह
छुपा है विछोह
सुख की पूर्णिमा के बीतते ही
धीरे धीरे छा जाएगी
दुख की अमावस्या
रोशनी आती-जाती है
सुख भी आता-जाता है
अंधेरा हो या दुख
हर समय मौजूद है
मृत्यु की अनुपस्थिति का
नाम है जीवन
या तुम्हारे होने से है जीवन
मैंने तो यही जाना
तुम्हारे होने को ही जीवन माना
प्रियवर दूर मत जाना।
सम्पर्क
मोबाइल : 97554 31740



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