प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'एआई समिट'




आजकल चारों तरफ ए आई का बोलबाला है। कुछ भी जानना हो तो झट फोन उठा कर ए आई से पूछ लो। कुछ सेकेंडों या मिनटों में तमाम जानकारियां आपके सामने रख देगा। क्रिकेट खेलना हो या बच्चों को पालना हो तब भी ए आई ही बताएगा या सिखाएगा। सवाल वही है कि हम किस कदर तकनीक के गुलाम होना चाहते हैं? मोबाइल ने पहले ही बहुत कुछ वारा न्यारा कर रखा है। अब हमें अपने प्रिय जनों के मोबाइल नंबर भी याद नहीं होते। गिनती, पहाड़ा, जोड़, घटाना सबके लिए मोबाइल। यानी अब बच्चों को पहाड़ा रटने की कोई जरूरत नहीं। कहीं जाना हो तो गूगल मैप लगा लो। राहगीर बन कर पूछने का काम कौन करेगा? यानी सब कुछ खत्म सा होता जा रहा है। तो क्या ए आई मानवीय संवेदना या भावनाओं की जगह ले सकेगा? कत्तई नहीं। फिर हम ए आई को इतना महत्त्व क्यों दे रहे हैं। तकनीक की हमारे जीवन में कहीं इतनी अधिक दखलंदाजी न बढ़ जाए कि वापस लौट पाने की राह भी न बचे। आजकल नई दिल्ली के भारत मंडपम में इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आयोजन हो रहा है जिसमें दुनिया के सौ से अधिक देश हिस्सेदारी कर रहे हैं। प्रचण्ड प्रवीर भी इस समिट में गए थे। इस विषय पर कल की बात के अन्तर्गत उन्होंने एक कहानी लिखी है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं प्रचण्ड प्रवीर की कहानी 'एआई समिट'।


कल की बात – २८६

'एआई समिट'


प्रचण्ड प्रवीर 



कल की बात है। जैसे ही मैँने प्रगति मैदान के परिसर मेँ कदम रखा, मुझे आरुषि दिख गयी। इस अद्भुत संयोग पर वह एक बार फिर मुस्कुरायी। उसके पास पहुँच कर मैँने कहा, “प्रगति मैदान मेँ अन्दर आना ही मुश्किल है। बाहर पङ्क्ति मेँ पैँतालिस मिनट खड़े-खड़े पहले ही मन खिन्न हो गया था। क्यूआर कोड के बिना किसी को अन्दर नहीँ आने देते। आरुषि ने कहा, “पहली बात यह है कि अब यह प्रगति मैदान नहीँ रहा, भारत मण्डपम् हो गया है। दूसरी बात है कि आपकी कोई मजबूरी यहाँ खिँच लायी है। फिर शिकायत किस बात की है?”


मैँने लाचारी मेँ कहा, “बेरोजगारी मेँ नौकरी की सम्भावनाएँ ढूँढते यहाँ ‘एआई समिट’ तक आ पहुँचा हूँ। मुझे एआई का विचार ही बचकाना लगता है। आरुषि आगे बढ़ते हुए बोलने लगी, “देखिए, मैकियावेली ने कहा था कि जो बुद्धिमान झट से करते हैँ, बेवकूफ अन्ततः वही करते हैँ। किसी को अच्छे-बुरे लगने का सवाल यह है ही नहीँ। मैँ भी उसके आँचल की अनदेखी डोर मेँ बँधा साथ-साथ चलते कह बैठा, “एआई के नाम मेँ भी पीछे पड़ जाने का भाव है। ध्यान दीजिए कि कहा क्या जा रहा है? ये ‘तू चल मैँ आई’ वाली नहीँ है। बर्दाश्त नहीँ कर सकती, अब दूर नहीँ रह सकती तेरे बिन, ए आई, वाली ‘एआई’ है। मतलब हम आ गई हैँ और अब यहीँ रहेँगी। 


हॉल नम्बर पाँच से हमने प्रदर्शनी का जायजा लेना शुरू किया। दुनिया जहाँ की बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अपना झण्डा गाड़े बैठी थीँ। इन्हीँ हॉलोँ मेँ जनवरी के पुस्तक मेले मेँ स्कूली बच्चे और अध्यापक अधिक नज़र आते हैँ वहीँ ‘एआई समिट’ मेँ सूट-बूट धारी बिजनेसमैन और प्रोफेशनलोँ की भरमार थी। किसी स्टॉल मेँ कोई रोबोट बिठा रखा था। कहीँ हेडफोन, कहीँ चश्मा, कहीँ घूमते पँखोँ पर लेजर से प्रोजेक्शन। एक स्टॉल पर ‘एआई’ की सहायता से क्रिकेट खेलना सिखाया जा रहा था। वहाँ बहुत भीड़ लगी थी। सफेद रस्सी की जाली से घेर कर एक छोटी-सी जगह मेँ पिच बना कर मशीन की सहायता से गेँद फेँकी जा रही थी और प्रशिक्षु बल्ले से गेँद का सामना कर रहे थे। मैँने आरुषि से कहा, “भविष्य मेँ भरतनाट्यम् भी ऐसे ही सिखाया जायेगा।” आरुषि ने मुझे देख कर कहा, “इसमेँ कोई संदेह है क्या?” मैँने निराशा प्रकट करते हुए कहा, “यह दुःखद होगा। एआई के साथ कला, कौशल और शिल्प का सम्बन्ध निर्जीव ही है और निर्जीव ही रहेगा, जैसा कि आज के समय मेँ बालजाक़ कहते। 


“उन्नीसवीँ सदी के कहानीकार ‘ओनोरे द बालजाक़’ इक्कीसवीँ सदी की कला के बारे मेँ ऐसा क्योँ कहते?” आरुषि ने पूछा। मैँने कहा, “बालजाक़ का मानना था कि अनुपात, संरचना, रङ्ग यह सभी निर्जीव हैँ। भाव अनुभाव मेँ प्रकट भले होते हैँ किन्तु अनुभाव भाव नहीँ बना सकते। यही मौलिक भूल है। भाव के लिए आत्मा चाहिए। ऐसा उन्होँने अपनी प्रसिद्ध कहानी ‘अज्ञात उत्कृष्ट कृति’ मेँ कहना चाहा था। भरतनाट्यम् की कठिन मुद्राएँ सीखने मेँ कुछ सहायता अवश्य मिले पर इससे नृत्य नहीँ आने वाला।



आरुषि मेरी बातोँ से सहमत नहीँ थी। हम एक स्टॉल पर गए जो एआई की सहायता से भविष्य बताने का दावा कर रहे थे। आरुषि ने मुझसे पूछा, “आपको हस्तरेखा और ज्योतिष पर विश्वास है?” मैँने कहा, “बहुत है। आरुषि ने विजयी मुस्कान से कहा, “फिर एआई इसमेँ कमाल कर देगा। आपकी हाथ की लकीरेँ, पर्वतोँ की ऊँचाई-निचाई, उँगलियोँ की बनावट, लालिमा और कोमलता – यह सब देख कर एआई झट से आपके भविष्य के बारे मेँ बता देगा। इतना ही नहीँ, बल्कि जन्म की तिथि, समय और स्थान बताने पर दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय कुण्डलियाँ बना कर आपके व्यक्तित्व के बारे मेँ सब बता देगा। मैँने कहा, “यह नहीँ होगा। आरुषि ने जोर दे कर कहा, “चलिए, अपना हाथ यहाँ सेंसर पर रख दीजिए। एआई का जवाब आया, “हे कटु आलोचक! जल्दी ही आपकी मुलाकात एक बहुत हँसने वाली कन्या से होने वाली है।“ आरुषि ने सुनकर कहा, “वो कन्या मैँ नहीँ हूँ। देखिए, अब क्या कहेँगे आप?” हॉल के भीड़-भड़क्के मेँ आगे बढ़ते हुए मैँने कहा, “ज्योतिष विद्या का सारा उपक्रम केवल मन बहलाने के लिए होता है। मैँ इस तरह की भविष्यवाणियोँ को नहीँ मानता। आरुषि ने हैरानी जतायी, “बड़े अजीब हैँ आप? ज्योतिष मानते भी हैँ और भविष्यवाणियाँ नहीँ मानते?” मैँने हाँ मेँ सिर हिलाया, “बिल्कुल सही समझ रही हैँ आप। जैसे कि मैँ मानता हूँ देवियाँ दिलकश होती हैँ, पर हर देवी दिलकश नहीँ होती। चलिए अगले स्टॉल पर, वहाँ सोशल मीडिया से जुड़ा कुछ कहा जा रहा है।  


सोशल मीडिया वाले स्टॉल पर बैठे एक युवक ने मुझसे पूछा, “क्या आप अपने किसी मित्र के बारे मेँ कुछ जानना चाहते हैँ? हमारा एआई एप्लिकेशन झट से उसके और आपके बारे मेँ बहुत-सी सटीक बातेँ बताएगा और साथ ही आपको पूर्वानुमान भी देगा। मैँने आरुषि को देखा और कहा, “यहाँ किस्मत आजमाते हैँ। तभी फाल्गुनी का फोन आया, “यार, मैँ लेट हो चुकी हूँ। भारत मण्डपम आ भी जाऊँ तो अन्दर आते-आते बहुत समय लग जाएगा। तुम कनॉट प्लेस आ सकते हो क्या?” फाल्गुनी से मिलना दो महीनोँ से लगातार टलता जा रहा था। मैँने उससे कहा कि पौन घण्टे मेँ कनॉट प्लेस के रेस्तराँ मेँ मिल सकते हैँ। उसके बाद आरुषि को देख कर कहा, “फाल्गुनी के बारे मेँ पता करते हैँ।


सोशल मीडिया वाले युवक ने मेरे कहने पर मेरी फ्रेण्ड लिस्ट मेँ से फाल्गुनी के बारे मेँ  जानकारियाँ खंगाल कर फौरन रिजल्ट दिखाया। बहुत सी सामान्य जानकारियाँ जैसे कि वह तैँतीस साल की आकर्षक युवती है। अच्छी नौकरी करती है। काम के सिलसिले मेँ देश-विदेश के चक्कर लगाती रहती है। खाने मेँ मीठा पसन्द करती है। विवाह के लिए उसे उपयुक्त वर की तलाश है किन्तु अभी तक मन लायक वर नहीँ मिला है। मैँने आरुषि से कहा, “इसमेँ कौन-सी बड़ी बात है?” आरुषि ने भी मेरी कही बात सोशल मीडिया वाले युवक को सुनायी। सोशल मीडिया वाले युवक ने आगे रिजल्ट देख कर बताया, “वैलेन्टाइन डे के दिन फाल्गुनी का ब्रेक-अप जैसा हो गया है जिसके कारण फाल्गुनी दुख भरे गाने सुन रही है और शेयर कर रही है। कई पुरानी तस्वीरेँ हटा रही है।  पिछले तीन-चार दिनोँ से अपने पुराने मित्रोँ की फोटो लगा रही है। अंदेशा है कि यह सब किसी को जलाने के लिये किया जा रहा है। सम्भावना है कि फाल्गुनी आपसे मिल कर आपकी तस्वीर लेगी और सोशल मीडया पर लगा कर कुछ लोग का दिल जलायेगी। आरुषि ने मुझे याद दिलाया, “कहीँ फाल्गुनी बहुत हँसने वाली लड़की तो नहीँ?” मैँने मुस्कुरा कर हामी भर दी।


पौन घण्टे के बाद कनॉट प्लेस के मशहूर रेस्तराँ मेँ बैठी फाल्गुनी ने हँसते हुए कहा, “ए, यहाँ मैँ कितने सालोँ बाद आई हूँ। मैँने पूछा, “आप एआई समिट मेँ नहीँ आई?”  फाल्गुनी ने कहा, “सुबह वहाँ आई थी। कल भी थी। वो सब छोड़ो। फिल्टर कॉफी पियोगे?” मैँने मना किया। फाल्गुनी वेटर को बुला कर एक मिठाई और दो फिल्टर कॉफी ऑर्डर की। मैँने ’दो फिल्टर कॉफी’ पर आपत्ति करनी चाही तब फाल्गुनी ने हँसते हुए कहा, “अरे, एक कॉफी मेँ मन नहीँ मानता। मैँ दो कप पियूँगी। अच्छा सुनो, हम लोग अढाई साल बाद मिल रहे हैँ। तुम्हारी एक तस्वीर ले लूँ?” सुनते ही मेरे कान खड़े हो गये।  “मेरे तस्वीर ले कर क्या करोगे तुम, मेरी तस्वीर ले कर,” मैँने कहा, “मेरी तस्वीर भी मुझ-सी कहाँ है, के ये बेजाँ है ये बेज़ुबाँ है, तुम्हारे काम ये न आ सकेगी, तुम्हारा दिल न ये बहला सकेगी,  जुनून में तो गिरहबान चाक होगा, के परवाना तो जल के ख़ाक होगा,  तुम्हारे सामने जब हम ना होंगे,  ये ग़म तस्वीर से तो कम न होंगे, यूँ ही तड़पोगे तुम आहेँ भरोगे, क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर ले कर?” १


फाल्गुनी खिलखिलाने लगी। उसने अपना चश्मा आँखोँ पर लगाया और फिर वापस निकाल कर टेबल पर रख दिया। मुझसे बोली, “ये एआई वाले चश्मेँ से आपकी विडियो  सहेज कर रख ली है। बजा है बात ये हम मानते हैँ, न बहलेगी तबीयत जानते हैँ, करेँगी हसरतेँ फ़रियाद अक्सर, के तुम आया करोगे याद अक्सर, ग़म-ए-फ़ुर्क़त न होगा यूँ गवारा, मगर थोड़ा सा तो होगा सहारा, जुदाई मेँ मुलाक़ातेँ करेँगे, के हम तस्वीर से बातें करेँगे।  


मैँने पूछा, “आप मुझसे मिलना क्योँ चाह रहीँ थीँ?” फाल्गुनी ने संजीदगी से कहा, “कुछ उलझनेँ थीँ। आपसे सलाह लेना चाहती थीँ लेकिन अब मुझे एक बात समझ एकदम से आई। मैँने पूछा, “क्या आई?” फाल्गुनी ने कहा, “ए, ये बात दिमाग मेँ आई कि जिन्दगी मेँ कुछ चीजोँ को छोड़ देना चाहिए। जिस चीज को आना था, अक्सर खुद चल कर आई। आगे भी ऐसा ही होगा। इंसान को जीवन मेँ खुश रहना चाहिए। मैँ मिल चुके को इतनी आसानी से किसी को जाने नहीँ देती। मैँने किसी को पकड़ा भी नहीँ और आसानी से छोड़ा भी नहीँ। शानदार खाने के बाद रेस्तराँ से बाहर निकल कर फाल्गुनी ने हँसते हुए कहा,  “अब तो एक तस्वीर लेते हैँ हम? आज की मुलाकात की यादगार!” मैँने मना करते हुए कहा, “आप मेरी तस्वीर सोशल मीडिया मेँ डालेँगी। ज़माने की निगाहोँ से बचा के, इसे तुम लाख रखोगे छुपा के, किसी दिन देख ही लेगा ज़माना, ओ, बड़ा मशहूर होगा ये फ़साना, जो लोगोँ की ज़ुबाँ तक बात पहुँचे, तो फिर जाने कहाँ तक बात पहुँचे, कहो क्या प्यार को रुसवा करोगे, क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर ले कर, मेरी तस्वीर ले कर क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर ले कर?” फाल्गुनी मेरे बगल मेँ आ कर फोन को सेल्फी मोड मेँ ला कर बोली, “हमें मन्जूर ये रुस्वाइयाँ हैं, के इनसे भी बुरी तनहाइयाँ हैं, वफ़ा में लोग लुटाते हैँ जानेँ, तुम्हें आशिक़ भला हम कैसे मानें?”  मैँने देखा कि फाल्गुनी के फोन ने एआई की सहायता से मेरी तस्वीर को फौरन कुछ बदल कर पहलवाननुमा, दारा सिंह जैसा हट्टा-कट्टा बना दिया, जिसकी जिस्मानी खूबसूरती देख कर कुछ कमअक्ल और कमबख्त पक्का जल उठेँगे। 


शुबहा हो इश्क़ मेँ तो इम्तिहाँ लो, मेरी तस्वीर न लो मेरी जाँ लो

कहो जान-ए-वफ़ा अब क्या कहोगे, क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर ले कर

मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर ले कर

  

ये थी कल की बात!

दिनाङ्क: १९/०२/२०२६


सन्दर्भ: 

१. गीतकार – आनन्द बक्षी, चित्रपट – काला समन्दर (१९६१)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

हर्षिता त्रिपाठी की कविताएं