गरिमा श्रीवास्तव का आलेख "आधुनिक काव्यानुभूति और भक्ति का सौंदर्यशास्त्र: यतीन्द्र मिश्र की कविता 'पंढ़रपुर'"
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| यतीन्द्र मिश्र |
भक्ति आन्दोलन का भारतीय साहित्य, संस्कृति और इतिहास में महत्वपूर्ण अवदान है। इस आन्दोलन ने बनी बनाई लीक को तोड़ने का कार्य किया। धर्म से जुड़े हो कर भी उसमें समाहित पाखंडों एवं अंधविश्वासों पर प्रहार करने का साहस दिखाया और इस तरह जनता के मन में उम्मीद की वह ज्योति भरी जो राजनीतिक परिस्थितियों के चलते निरन्तर धूमिल होती जा रही थी। गरिमा श्रीवास्तव लिखती हैं 'इस तरह भक्ति केवल एक व्यक्तिगत मोक्ष की आकांक्षा नहीं है, बल्कि वह एक सामूहिक कलात्मक उत्सव और इंद्रिय-बोध का विस्तार बन गई।... इसी समय कविता में अभंगों के 'चेतावनी देते बोल' उस सामाजिक चेतना को स्वर देते दिखाई पड़ते हैं जिसे मध्य काल में संत तुकाराम और ज्ञानेश्वर ने शुरू किया था।' वारकरी सम्प्रदाय का उद्भव दक्षिण भारत के 'पंढरपुर' नामक स्थान पर विक्रम संवत की तेरहवीं शताब्दी में हुआ था। इस सम्प्रदाय के प्रवर्तकों में संत ज्ञानेश्वर का स्थान महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने 'ज्ञानेश्वरी' और 'अमृतानुभव' नाम के दो महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना कर वारकरी सम्प्रदाय के सिद्धांतों को स्पष्ट कर दिया था। वारकरी' शब्द से तात्पर्य है कि 'वारी' तथा 'करी' अर्थात 'परिक्रमा करने वाला'। इस सम्प्रदाय के लोग संयमित जीवन जीते हुए पंढरपुर के मन्दिर में स्थापित विट्ठल की परिक्रमा करते हैं। वे भजन-कीर्तन, नाम-स्मरण तथा चिन्तन आदि में सदा लीन रहते हैं। वे नृत्य तथा गान करते हुए कभी-कभी भावावेश में भी आ जाते हैं। वर्णाश्रम धर्म के नियमों का बहिष्कार करते हुए इन लोगों ने सम्प्रदायिक परम्पराओं का भी विरोध किया। यतीन्द्र मिश्र की एक कविता है 'पंढ़रपुर'। पुराने प्रतीकों के सहारे यतीन्द्र ने अपनी इस कविता में नवीन अभिप्रायों को चित्रित किया है। इस कविता की विवेचना करते हुए गरिमा श्रीवास्तव लिखती हैं :" ‘वारकरी संप्रदाय’ में 'कीर्तन' केवल भावुकता नहीं है, बल्कि वह एक विमर्श है, जिसका दार्शनिक आधार मेटाफिजिक्स के बजाय समाज दर्शन के ज्यादा करीब है जिसके तहत भक्त विठोबा से सवाल करता है, समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है और जीवन के दुखों का समाधान ढूँढता है। यतीन्द्र की इस कविता का शिल्प इस 'संवाद' को बहुत खूबसूरती से पकड़ता है। जब एक आदमी मंजीरा बजाते हुए दूसरे को 'लय पकड़ाता' है, तो वह केवल संगीत नहीं, बल्कि वह 'ज्ञान' और 'अनुभव' का हस्तांतरण है। यह दार्शनिक मान्यता है कि ज्ञान अकेले का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा धन होता है।" आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं गरिमा श्रीवास्तव का आलेख "आधुनिक काव्यानुभूति और भक्ति का सौंदर्यशास्त्र: यतीन्द्र मिश्र की कविता 'पंढ़रपुर'"।
"आधुनिक काव्यानुभूति और भक्ति का सौंदर्यशास्त्र : यतीन्द्र मिश्र की कविता 'पंढ़रपुर'"
गरिमा श्रीवास्तव
पंढ़रपुर
गले में अधखुले हार जैसा
मंजीरा डाले एक आदमी
गाते हुए दूसरे को पकड़ाता भक्ति की लय
दूसरा पसार देता चारों तरफ़
झांझ, चिपली और तंबूरे की आवाज़ों में अन्दर की पुकार
पंढरपुर में गलियाँ गूँजतीं
वारकरियों की साधना
उनका सजल कोरस कंठ विठोबा के लिए गाते हुए
समय को ठेका और ताल देता रहता है
सफेद रंग को धारे सब के सब
अपने संकीर्तन से
सरगम में कई रंग का गुलाल घोलते हैं
उधर विठोबा और रुक्मिणी के मंदिर से
रंग-सुरंगी पताकाएँ लहराती रहतीं
नारदीय परम्परा हो
हो सवाल-जवाब के बहाने भागवत कथाएँ
या अभंग के चेतावनी देते बोल
कुछ ढोल, कुछ डफली कुछ झांझ में
डूब जाता एकबारगी पंढरपुर…
उधर एकनाथ तुकाराम ज्ञानेश्वर से पूछे बग़ैर
हिलोरें भी नहीं लेती चंद्रभागा….
यतीन्द्र मिश्र
यतीन्द्र मिश्र की यह कविता पंढ़रपुर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को एक आधुनिक सौंदर्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में पुनर्परिभाषित करती है। यहाँ भक्ति केवल एक व्यक्तिगत मोक्ष की आकांक्षा नहीं है, बल्कि वह एक सामूहिक कलात्मक उत्सव और इंद्रिय-बोध का विस्तार है। भक्ति-चेतना के सादगी युक्त सौंदर्यबोधात्मक मानदंडों के आधार पर इस कविता का विश्लेषण करने पर साफ़ हो जाता है कि आधुनिक काव्यानुभूति किस प्रकार परंपरा के पुराने प्रतीकों में नवीन अर्थ भरती है। कविता का आरंभ ही एक दृश्य बिंब से होता है जहाँ मंजीरे को गले में अधखुले हार की उपमा दी गई है। यह उपमा रूप गोस्वामी रचित ‘उज्ज्वल नीलमणि’ जैसे पारंपरिक भक्तिशास्त्रीय ग्रंथों के साथ ही विद्यापति पदावली या रीतियुग में भक्तिकाव्य के नाम पर कविता लिखने वाले कवियों की रचनाओं की सजावट से अलग है। यहाँ मंजीरा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं है, बल्कि वह भक्त के शरीर का आभूषण और उसकी पहचान का हिस्सा बन गया है। सादगी का सौंदर्यशास्त्र यहाँ इस बात में निहित है कि कवि ने किसी स्वर्ण आभूषण की कल्पना न कर एक साधारण धातु के वाद्य को ही शृंगार मान लिया है।
भक्ति की लय को एक हाथ से दूसरे हाथ तक पकड़ाने की क्रिया सामूहिक चेतना का बहुत गहरा संकेत है। यह उस अटूट परंपरा की ओर इशारा करती है जो सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बिना किसी लिखित विधान के केवल अनुभव और श्रवण के आधार पर चली आ रही है। आधुनिक काव्यानुभूति में इसे एक 'परफॉर्मिंग आर्ट' या सामूहिक क्रिया के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ व्यक्ति की पहचान समूह में विलीन हो जाती है। झांझ, चिपली और तंबूरे की आवाज़ के बीच 'अन्दर की पुकार' का सुनाई देना ही वह बिंदु है जहाँ बाह्य प्रदर्शन और आंतरिक सादगी का मिलन होता है। सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से यह 'नाद-ब्रह्म' की अवधारणा का आधुनिक रूपांतरण है, जहाँ शोर में भी एक आध्यात्मिक शान्ति और पुकार छिपी होती है।
गायन से पंढ़रपुर की गलियों का गूँजना और वारकरियों की साधना का 'सजल कोरस' बन जाना भक्ति के उस रूप को प्रकट करता है जो तरल है। 'सजल' शब्द का प्रयोग यहाँ केवल आँखों की नमी के लिए नहीं, बल्कि उस आर्द्रता के लिए है जो कठोर हृदय को पिघला कर उसे करुणा से भर देती है। सौंदर्य-बोध के स्तर पर यह कविता सादगी को एक चुनौती के रूप में पेश करती है। सफेद रंग धारण करना एक ओर तो समस्त रंगों का त्याग है, लेकिन दूसरी ओर यह वह श्वेत कैनवास है जिस पर भक्ति के तमाम रंग उभरते हैं। कवि जब कहता है कि सफेद रंग को धारे सब के सब अपने संकीर्तन से सरगम में कई रंग का गुलाल घोलते हैं, तो वह एक महान विरोधाभास की रचना करता है। यह सादगी के भीतर निहित उस प्रफुल्लता और उत्सवधर्मिता का चित्रण है, जो भारतीय लोक-जीवन का आधार है। यहाँ आधुनिक काव्यानुभूति यह स्पष्ट करती है कि वैराग्य का अर्थ नीरसता नहीं, बल्कि रंगों का एक नया और पवित्र संयोजन है।
मंदिर के शिखर पर लहराती रंग-बिरंगी पताकाएँ और नीचे वारकरियों का सफेद समूह एक दृश्य संतुलन पैदा करता है। यह संतुलन ही इस कविता का सौंदर्यशास्त्रीय आधार है। नारदीय परंपरा और भागवत कथाओं का उल्लेख केवल धार्मिक संदर्भ नहीं है, बल्कि यह उस मौखिक परंपरा का सम्मान है जिसने भारतीय समाज को बौद्धिक और भावनात्मक रूप से जोड़े रखा है। सवाल-जवाब के बहाने कथा का होना यह बताता है कि यहाँ भक्ति 'जड़' नहीं है, बल्कि उसमें तर्क और जिज्ञासा का स्थान है। कविता में अभंगों के 'चेतावनी देते बोल' उस सामाजिक चेतना को स्वर देते हैं जो मध्य काल में संत तुकाराम और ज्ञानेश्वर ने शुरू की थी। यतीन्द्र मिश्र की कवि-दृष्टि यहाँ बहुत परिष्कृत एवं सूक्ष्म है; वे जानते हैं कि पंढ़रपुर केवल भजन की जगह नहीं है, वह अहंकार, पाखंड और समय की बर्बादी के विरुद्ध एक चेतावनी भी है।
आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करने पर समय को 'ठेका और ताल' देने वाली पंक्ति इस कविता का दार्शनिक केंद्र मालूम पड़ती है। आमतौर पर समय मनुष्य को चलाता है, लेकिन यहाँ भक्ति और कीर्तन की शक्ति समय को अपनी लय पर नाचने के लिए विवश कर देती है। यह सौंदर्यशास्त्र का वह स्तर है जहाँ कला काल पर विजय प्राप्त कर कालजयी रूप धारण करती है। ढोल, डफली और झांझ की आवाज़ में पंढ़रपुर का डूब जाना एक ऐसी समाधि की स्थिति है जिसे आधुनिक कविता 'टोटल इमर्शन' या पूर्ण तल्लीनता कहती है। इसमें भक्त, भगवान और स्थान के बीच की भौगोलिक दूरी समाप्त हो जाती है।
कविता का अंतिम भाग भूगोल को इतिहास और स्मृतियों के साथ जोड़ देता है। चंद्रभागा नदी का उल्लेख यहाँ केवल एक जलराशि के रूप में नहीं है। वह एक जीवंत साक्ष्य है। कवि का यह कहना कि वह एकनाथ, तुकाराम और ज्ञानेश्वर से पूछे बिना हिलोरें भी नहीं लेती, भक्ति चेतना के उस चरम को दर्शाता है जहाँ प्रकृति और संस्कृति एकरूप हो जाते हैं। यह सौंदर्यशास्त्र की वह आधुनिक अनुभूति है जो पारिस्थितिकी को भी आस्था के साथ जोड़ कर देखती है। यहाँ संतों की उपस्थिति केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि वे आज भी उस नदी की गति और उस समाज की धड़कन को नियंत्रित कर रहे हैं।
इस कविता में सादगी का सौंदर्य-बोध उन साधारण उपकरणों में है जो असाधारण प्रभाव पैदा करते हैं। एक मंजीरा, एक सफेद कुर्ता, एक मटमैली सड़क और एक प्राचीन नदी—इन साधारण तत्वों से यतीन्द्र मिश्र ने जो चित्र खींचा है, वह किसी भव्य स्वर्ण-जड़ित वर्णन से अधिक प्रभावशाली है। आधुनिक काव्यानुभूति यहाँ अपनी जड़ों की ओर लौटती है, लेकिन एक सजग और विश्लेषणात्मक दृष्टि के साथ। वह पंढरपुर की भीड़ को नहीं देखती, बल्कि उस भीड़ के भीतर की उस 'लय' को देखती है जो बिखरे हुए समाज को एक सूत्र में पिरोती है। अंततः यह विश्लेषण हमें इस निष्कर्ष पर ले जाता है कि भक्ति का सौंदर्य उसके बाह्य आडंबरों में नहीं, बल्कि उस 'सजल कंठ' और 'अन्दर की पुकार' में है जो सदियों से चंद्रभागा के तट पर गूँज रही है। यह कविता इसी शाश्वत गूँज का आधुनिक काव्यात्मक दस्तावेज़ है।
यतीन्द्र मिश्र की यह कविता पंढरपुर की उस आध्यात्मिक विरासत को जीवंत करती है जहाँ भक्ति किसी शास्त्र का बोझ नहीं, बल्कि लोक जीवन की सहज अभिव्यक्ति है। यहाँ विठोबा का स्वरूप केवल पाषाण की एक प्रतिमा मात्र नहीं है, बल्कि वह उस प्रेम का केंद्र है जिसके चारों ओर महाराष्ट्र की पूरी सांस्कृतिक चेतना परिक्रमा करती है। वारकरियों के लिए विठ्ठल 'माऊली' (माता) हैं, जो युगों से ईंट पर खड़े हो कर अपने भक्तों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कविता में जिस सादगी का उल्लेख है, वह विठोबा के स्वरूप से ही निःसृत होती है—एक ऐसा देवता जिसने न शस्त्र उठाए हैं, न कोई जटिल मुद्रा धारण की है, बल्कि जिसके हाथ कटि पर हैं, जो धैर्य और अटूट प्रतीक्षा का प्रतीक है।
चंद्रभागा के तट पर जब हजारों श्वेत वस्त्रधारी वारकरी एक लय में झूमते हैं, तो वह दृश्य आधुनिक काव्यानुभूति में एक महान 'परफॉरमेंस' जैसा प्रतीत होता है, जहाँ दर्शक और अभिनेता का भेद मिट जाता है। संतों की वाणी—चाहे वह ज्ञानेश्वर की दार्शनिकता हो या तुकाराम की निर्भीकता—वहाँ की हवाओं में रची-बसी है। कविता का सौंदर्य इस बात में है कि वह पंढरपुर को किसी मंदिर की चारदीवारी में कैद नहीं करती, बल्कि उसे गलियों, मंजीरों की खनक और नदी की हिलोरों में विस्तार देती है। यह कविता अपनी बनावट में जितनी आधुनिक है, अपनी बुनावट में उतनी ही पारंपरिक और सांस्कृतिक है। उनके यहाँ सांस्कृतिक बिम्ब केवल सजावट के लिए नहीं आते, बल्कि वे उस समूचे परिवेश की आत्मा को उद्घाटित करने का माध्यम बनते हैं। पंढरपुर पर केंद्रित इस कविता में सांस्कृतिक बिम्बों का सौंदर्य उनके दृश्य, श्रव्य और आध्यात्मिक स्वरूप में बिखरा हुआ है।
इन बिम्बों का सबसे पहला और प्रभावी रूप वाद्य यंत्रों के माध्यम से उभरता है। मंजीरा, झांझ, चिपली, तंबूरा, ढोल और डफली—ये केवल संगीत के उपकरण नहीं हैं, बल्कि ये वारकरी संप्रदाय की पहचान के ध्वन्यात्मक बिम्ब हैं। कवि जब मंजीरे को गले में अधखुले हार की तरह देखता है, तो वह एक निर्जीव वस्तु को मानवीय संवेदना और सौंदर्य से जोड़ देता है। ये वाद्य यहाँ लोक-चेतना के विस्तार के रूप में आए हैं, जो व्यक्ति की एकांतिक पुकार को सामूहिक कीर्तन में बदल देते हैं। यह श्रव्य बिम्ब पाठकों के भीतर एक ऐसा परिवेश निर्मित करता है जहाँ भक्ति केवल मौन साधना नहीं, बल्कि एक मुखर और गुंजायमान उत्सव बन जाती है। कविता में रंगों का बिम्ब विधान अत्यंत सूक्ष्म और दार्शनिक है। सफेद रंग का बिम्ब यहाँ सादगी, पवित्रता और आत्मसमर्पण का प्रतीक है। वारकरियों का यह सफेद रंग एक रिक्तता की तरह है, जिस पर भक्ति के अन्य रंग चढ़ते हैं। दूसरी ओर, गुलाल और रंग-सुरंगी पताकाओं का बिम्ब उस उल्लास को दर्शाता है जो सादगी के भीतर छिपा होता है। सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से, यह सफ़ेद और रंगीन का संयोजन जीवन के द्वैत को समाप्त कर देता है—जहाँ वैराग्य (सफेद) और अनुराग (रंग-सुरंगी) एक साथ नृत्य करते हैं। यह आधुनिक काव्यानुभूति की विशेषता है कि वह परंपरा के इन रंगों को केवल धार्मिक चश्मे से नहीं, बल्कि एक कलात्मक परिदृश्य (Landscape) के रूप में देखती है।
एक अन्य महत्वपूर्ण बिम्ब परंपरा की निरंतरता का है। नारदीय परंपरा, भागवत कथा और अभंगों का उल्लेख कविता को केवल वर्तमान क्षण तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि उसे सदियों पुराने इतिहास से जोड़ देता है। 'सवाल-जवाब के बहाने भागवत' एक ऐसा सांस्कृतिक बिम्ब है जो भक्ति के भीतर संवाद और तर्क की गुंजाइश को दिखाता है। यह बिम्ब सिद्ध करता है कि भारतीय लोक संस्कृति में ज्ञान और भक्ति अलग-अलग खाने नहीं हैं, बल्कि वे एक-दूसरे में घुले-मिले हैं। अभंगों को 'चेतावनी देते बोल' कहना उस क्रांतिकारी सामाजिक चेतना का बिम्ब है जिसे तुकाराम और चोखामेला जैसे संतों ने स्थापित किया था।
प्रकृति और संतों का एकत्व इस कविता का सबसे भव्य सांस्कृतिक बिम्ब है। चंद्रभागा नदी का एकनाथ, तुकाराम और ज्ञानेश्वर की अनुमति के बिना हिलोरें न लेना प्रकृति के प्रति उस भारतीय दृष्टि को दर्शाता है जहाँ नदी केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि संतों की वाणी का विस्तार है। यह बिम्ब भूगोल को अध्यात्म में बदल देता है। यहाँ सौंदर्य केवल आँखों के दिखने में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है जो एक पत्थर को विठ्ठल और एक नदी को साक्षात् चेतना बना देता है। यतीन्द्र मिश्र इन बिम्बों के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि पंढरपुर एक भौगोलिक स्थान होने से कहीं अधिक एक सांस्कृतिक अनुभूति है।
यतीन्द्र मिश्र की इस कविता का शिल्प पक्ष और इसकी भाषाई बुनावट उन सांस्कृतिक बिम्बों को और अधिक सुदृढ़ बनाती है जिनका ज़िक्र किया गया है। कविता का सौंदर्य इसके अलंकार विहीन सहजता में छिपा है, जो सीधे तौर पर भक्ति की सादगी से मेल खाता है। कवि ने 'मंजीरा', 'चिपली', 'ठेका' और 'ताल' जैसे ठेठ लोक शब्दों के साथ 'सजल', 'संकीर्तन' और 'परम्परा' जैसे तत्सम प्रधान शब्दों का जो मेल किया है, वह पंढरपुर की उस हकीकत को बयान करता है जहाँ शास्त्र और लोक एक साथ चलते हैं। कविता छंदमुक्त होने के बावजूद एक आंतरिक लय (Internal Rhythm) से बंधी हुई है। यह लय वैसी ही है जैसे वारकरियों की दिंडी यात्रा, जहाँ थके हुए होने के बावजूद कीर्तन की ताल पर कदम अपने आप उठते रहते हैं। शिल्प की दृष्टि से यह कविता दृश्य-श्रव्य संयोजन (Audio-Visual Synthesis) से पैदा किए गये एक 'कोलाज' की तरह काम करती है। एक तरफ हमें सफेद वस्त्रों का विशाल समूह दिखता है (Visual), तो दूसरी तरफ डफली और झांझ का शोर सुनाई देता है (Auditory)। "भक्ति की लय पकड़ाना" अमूर्त को मूर्त करना है जो एक अद्भुत प्रयोग है। लय अमूर्त होती है, उसे पकड़ाया नहीं जा सकता, लेकिन यहाँ कवि ने उसे एक 'वस्तु' की तरह प्रस्तुत किया है, जो यह दर्शाता है कि पंढरपुर में भक्ति इतनी सघन है कि उसे छुआ जा सकता है। कविता का अंतिम हिस्सा शिल्प का चरमोत्कर्ष है, जहाँ चंद्रभागा नदी का मानवीकरण किया गया है- "पूछे बगैर हिलोरें भी नहीं लेती"। यहाँ नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि एक आज्ञाकारी शिष्या या एक सखी की तरह है जो संतों की उपस्थिति में मर्यादित है। यह शिल्प परंपरा के प्रति कवि के अगाध सम्मान को रेखांकित करता है।
यतीन्द्र मिश्र ने आधुनिक कविता के मुहावरे में उस 'प्राचीन' को पकड़ने की कोशिश की है जो आज भी प्रासंगिक है। उनकी कविता यह सिद्ध करती है कि आधुनिक होने के लिए अपनी जड़ों को छोड़ना अनिवार्य नहीं है। पंढरपुर का यह वर्णन हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाता है जहाँ भक्ति केवल ईश्वर की आराधना नहीं, बल्कि मनुष्य का खुद से, समाज से और प्रकृति से जुड़ने का एक संगीतमय तरीका है। इस कविता में जो भक्ति चेतना और सादगी उभरती है, उसका वास्तविक मूलाधार वारकरी संप्रदाय की वह दार्शनिक पृष्ठभूमि है जिसमें अभंगों के माध्यम से एक सामाजिक और आध्यात्मिक क्रांति की नींव रखी गई थी। कविता में वर्णित झांझ, मंजीरे और सफेद वस्त्रों के सौंदर्य के पीछे एक गहरा जीवन-दर्शन है, जिसे 'भागवत धर्म' के नाम से जाना जाता है।
कविता में 'अभंग के चेतावनी देते बोल' का उल्लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अभंग का शाब्दिक अर्थ है— जिसका 'भंग' न हो सके। वारकरी दर्शन के अनुसार, ईश्वर किसी मंदिर के गर्भगृह में क़ैद कोई प्रतिमा नहीं, बल्कि वह हर मनुष्य के भीतर मौजूद चेतना है। संत तुकाराम और ज्ञानेश्वर ने अपने अभंगों में चेतावनी दी थी कि जब तक मन में अहंकार और भेदभाव है, तब तक विठ्ठल की प्राप्ति असंभव है। कविता इस 'चेतावनी' को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। जब कवि कहता है कि पंढ़रपुर इस संगीत में 'डूब जाता है', तो वह डूबना दरअसल व्यक्ति के निजी 'अहं' का विसर्जन है। वारकरी दर्शन का प्रमुख सिद्धांत 'अद्वैत' है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रहती। कविता में 'सफेद रंग' इसी अद्वैत का प्रतीक है—एक ऐसा रंग जिसमें दुनिया के सारे रंग समाहित हो जाते हैं और जो पूर्णतः निष्कलंक है।
कविता में 'नारदीय परम्परा' और 'सवाल-जवाब' का उल्लेख भक्ति के बौद्धिक और तार्किक पक्ष के साथ ही शास्त्रार्थ की महान भारतीय परम्परा के सौंदर्यशास्त्र को उजागर करता है जिसकी कुछ मिसालों में कुमारिल और प्रभाकर या भगवत्पाद आदि शंकराचार्य और मिथिला के ‘मंडन मिश्र-भामती’ दम्पत्ति के बीच हुए विख्यात शास्त्रार्थ के रूप चर्चित हैं। ध्यान देने की बात है कि ‘वारकरी संप्रदाय’ में 'कीर्तन' केवल भावुकता नहीं है, बल्कि वह एक विमर्श है, जिसका दार्शनिक आधार मेटाफिजिक्स के बजाय समाज दर्शन के ज्यादा करीब है जिसके तहत भक्त विठोबा से सवाल करता है, समाज की कुरीतियों पर प्रहार करता है और जीवन के दुखों का समाधान ढूँढता है। यतीन्द्र की इस कविता का शिल्प इस 'संवाद' को बहुत खूबसूरती से पकड़ता है। जब एक आदमी मंजीरा बजाते हुए दूसरे को 'लय पकड़ाता' है, तो वह केवल संगीत नहीं, बल्कि वह 'ज्ञान' और 'अनुभव' का हस्तांतरण है। यह दार्शनिक मान्यता है कि ज्ञान अकेले का नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा धन होता है।
इस कविता में प्रकृति और भक्ति का तादात्म्य के सन्दर्भ में चंद्रभागा का दर्शन को अगर समझने की कोशिश करें। वारकरी भक्ति-दर्शन में प्रकृति को 'पांडुरंग' (विठ्ठल) का ही एक रूप माना गया है। इसीलिए कविता के अंत में चंद्रभागा नदी का संतों के साथ जो संबंध दिखाया गया है, वह कोरी कल्पना नहीं बल्कि एक गहरा दार्शनिक सत्य है। संत ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' में प्रकृति और ईश्वर के अटूट संबंध की व्याख्या की है। यतीन्द्र जब लिखते हैं कि "एकनाथ तुकाराम ज्ञानेश्वर से पूछे बगैर हिलोरें भी नहीं लेती चंद्रभागा,"—तो यह उसी दार्शनिक स्थिति को दर्शाती हैं जहाँ मनुष्य की साधना इतनी ऊँची हो जाती है कि प्रकृति भी उसके साथ सामंजस्य बिठा लेती है। यह सादगी का वह सौंदर्य-बोध है जहाँ नदी का पानी केवल पानी या जल नहीं, बल्कि 'अमृत' बन जाता है।
कविता और दर्शन के बीच एकात्मकता यतीन्द्र की कविता की एक बड़ी ख़ासियत है। उन्होंने इस कविता में पंढ़रपुर को केवल एक भौगोलिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक 'जीवंत दर्शन' के रूप में चित्रित किया है। यहाँ की सादगी दरिद्रता नहीं, बल्कि 'अपरिग्रह' (त्याग) का सौंदर्य है। कविता के बिम्ब, उसकी लय और उसके शब्द उस वारकरी आंदोलन का आधुनिक विस्तार हैं, जिसने सदियों पहले यह घोषणा की थी कि भक्ति का सबसे बड़ा मानदंड 'मानवता' और 'सादगी' है। यह कविता हमें यह महसूस कराती है कि जब तक हमारे भीतर 'अंतरात्मा की आवाज़' और 'सजल कोरस' की भावना जीवित है, तब तक पंढ़रपुर की वह आध्यात्मिक लय कभी भंग नहीं होगी। यतीन्द्र मिश्र की कविता में पंढरपुर केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि वह 'अनुभव का भूगोल' है। जब कवि नागरीदास की उस प्रसिद्ध पंक्ति—‘हौंहि ब्रज, वृन्दावन मोहि में बसत, हौ कहाँ’—के समांतर हम इस कविता को रखते हैं, तो सादगी का सौंदर्यबोध अपनी पूर्णता को प्राप्त करता है। यहाँ पहुँच कर तीर्थयात्रा का उद्देश्य बदल जाता है; वह बाहर की किसी प्रतिमा के दर्शन तक सीमित न रह कर आत्म-साक्षात्कार के लिए तत्पर होता है।
भक्ति की यह आधुनिक काव्यानुभूति हमें उस मानसिक अवस्था तक ले जाती है जहाँ हमारा अपना मन ही पंढ़रपुर बन जाता है। इस आंतरिक पंढ़रपुर में, इंसानी जज़्बात चंद्रभागा नदी की लहरों की तरह हिलोरें लेने लगते हैं। जिस प्रकार चंद्रभागा का जल सबको समान रूप से भिगोता है और पवित्र करता है, उसी प्रकार इस मन-रूपी पंढरपुर में उठने वाली संवेदनाएँ मनुष्य को उसके अहंकार से मुक्त कर 'सजल कोरस' का हिस्सा बना देती हैं।
यतीन्द्र मिश्र रचित की ‘पंढ़रपुर’ कविता यह महसूस कराती है कि भक्ति की सार्थकता 'सादगी' में है। यह सादगी केवल वस्त्रों या वाद्य यंत्रों में नहीं है, बल्कि उस निष्कपट 'अन्दर की पुकार' में है जो सदियों से संतों के अभंगों से छन कर हम तक पहुँच रही है। यहाँ 'विठोबा' कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर की वह मुस्कान है जो 'आदि-अंत' को समेटे हुए है। अंततः, यह कविता संवेदनशील पाठक को एक ऐसे लोक में प्रतिष्ठित करती है जहाँ पहुँच कर हर थकान 'परमानंद की सरिता' बन जाती है और मनुष्य स्वयं उस महान संगीत का एक मंजीरा बन जाता है।
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| गरिमा श्रीवास्तव |
सम्पर्क
प्रोफ़ेसर,
भारतीय भाषा केंद्र, जे.एन.यू.
नई दिल्ली -110067





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