रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'



राजेन्द्र कुमार का प्रारम्भिक जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। इन संघर्षों ने उनके जीवन को निखारने का काम किया। बचपन में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू किया। छात्र वे विज्ञान के थे लेकिन रुचि हिन्दी साहित्य में थी। इसीलिए उनके लेखन में हमेशा एक तार्किकता दिखाई पड़ती है। कल्पना की उड़ान भरते हुए भी वे यथार्थ की जमीन पर मजबूती से अपने पांव जमाए रहे। सादगी उनके जीवन का पर्याय थी। समन्वय उनकी आदत में था और संघर्षों की आंच ने स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया। एक साथ ये गुण कम लोगों में मिलते हैं। आलोचक रवि भूषण जी की राजेन्द्र कुमार से घनिष्ठता थी। अपने संस्मरण में रवि भूषण ने राजेन्द्र कुमार जी को आत्मीयता के साथ याद किया है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रवि भूषण का संस्मरण 'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी'।


'सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी' 


रवि भूषण 


शायद वह बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक का कोई वर्ष था, जब हम लोग इलाहाबाद में मिले थे। पहली बार। उसके बाद कई बार कानपुर से ले कर इलाहाबाद तक के उनके जीवन के बारे में उनसे जाना। अस्सी के दशक के आरंभ से उन्होंने 'अभिप्राय' पत्रिका निकाली थी। कानपुर के कॉलेज के दिनों में ही राजेन्द्र कुमार ने एक हस्तलिखित पत्रिका आरंभ की थी, जिसके केवल दो अंक ही निकल सके। उनके जीवन के बारे में उनसे जाना, कुछ जगहों पर पढ़ा और उनके इंटरव्यू में भी उसे सुना। अपने छात्र-जीवन में वे कानपुर से कई बार भागे। 1959 में उन्होंने इंटर की परीक्षा दी थी। पिता जी को सूचित किये बिना वे दिल्ली गये। पहली बार। कुछ पता नहीं था, कहाँ जाना है, क्या करना है? कैलेंडर पर लिखे पते पर वे चावड़ी बाजार, दिल्ली पहुंचे सुन्दर के पास। यह दिल्ली की पहली यात्रा थी एक दिन की। वहाँ वे गाँधी के समाधि पर गये। छह-सात घंटे बैठे रहे। फिर तुरत वापस लौटे कानपुर। उन दिनों का कानपुर कुछ और था। वह एक औद्योगिक शहर था। वहाँ कॉमरेड थे, प्रगतिशील लेखक संघ था, कम्युनिस्ट पार्टी थी और थे शील जी, जिनके नाटक 'किसान' का पृथ्वीराज कपूर ने मंचन किया था। पृथ्वीराज कपूर को उन्होंने वहीं देखा था। राजेन्द्र जी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। तब की कम्युनिस्ट पार्टी कुछ और ही थी। पार्टी ने उन्हें मिल के गेट पर किताबें बेचने का काम दिया। उनके यहाँ रहने वाले भगवती गेट पर चाट लगाते थे और राजेन्द्र जी वहाँ किताबें बेचते थे। पिता जी के पास शिकायत हुई कि लड़का अब मजदूरों की संगत में रहता है। कानपुर से भागने की एक वजह यह भी थी। राजेन्द्र जी ने बताया है कि पहली बार जब वे दिल्ली भागे थे, तब वहाँ से लौट कर दिल्ली पर उन्होंने एक लम्बी कविता लिखी थी - 'दिल्ली के नाम पाती।' दूसरी बार वे भाग कर कोटा गये और फिर वहाँ से लौट आए। उनके भीतर एक ऊब थी, क्षोभ था और था अकेलापन, जिसके कारण वे कानपुर से बाहर जाते रहे थे। उनके पिता जी की तीन शादियाँ हुई थीं। वे दूसरी पत्नी के पुत्र थे।


आज जब राजेन्द्र जी नहीं हैं, मैं क्यों उनके इलाहाबाद के पहले के जीवन को याद कर रहा हूँ? वे संघर्ष करते रहे और कभी हार नहीं मानी। उनके चेहरे पर एक आभा थी, चमक थी। वह एक लगभग खिला चेहरा था। उन्होंने अंत-अंत तक कैंसर से लड़ाई लड़ी और मृत्यु का वरण किया। 'अभिप्राय' से मैंने उन्हें जाना और समझा था। पता था कि वे इालाहाबाद विश्वविद्यालय में हैं और कवि-आलोचक हैं। तब इलाहाबाद उन्हें कानपुर के मुकाबले कस्बा जैसा लगा था। अमृत राय जब 'नई कहानियाँ' के सम्पादक बने संभवतः 1967-68 में, उन्होंने अपनी कुछ कहानियाँ उनके पास भेजी थीं, जो प्रकाशित हुई थीं। 'नई कहानियाँ' में अमृत राय ने एक नया स्तंभ आरंभ किया था 'कथानगर'। राजेन्द्र जी ने अपने गृह नगर कानुपर पर एक फीचर लिखा 'धुएँ में लटका शहर कानपुर'। पहली बार जब इलाहाबाद आए, किसी से परिचय नहीं था। अमृत राय से केवल पत्राचार था। इलाहाबाद भी वह घर से भाग कर आये थे। कानपुर से इलाहाबाद की बस-यात्रा की थी। अमृत राय का अशोक नगर (हेस्टिंग्स रोड) में बंगला था- धूप-छाँह'। अमृत राय को उन्होंने भाग कर आने की बात नहीं बताई। अमृत राय ने सब कुछ जान कर 'हंस प्रकाशन' में कुछ काम देखने को कहा। वे उनके यहाँ महीने भर रहे। निजी बातचीत में राजेन्द्र जी ने कई बार अमृत राय और उनके यहाँ उन दिनों रहने के बारे में बताया। डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से उन्होंने केमेस्ट्री में एम. एस-सी. किया था। इलाहाबाद के एक स्कूल में 90 रुपये प्रतिमाह पर आरंभ में कुछ दिनों के लिए उन्होंने नौकरी की। राजेन्द्र जी ने अपने को और अपने शिष्यों को निर्मित किया है। इलाहाबाद के आरंभिक दिनों में अमृत राय ही उनके सहारा थे। उनके आवास पर ही उनकी भेंट-मुलाकात उर्दू के प्रोफेसर और मशहूर आलोचक एहतेशाम हुसैन से हुई। एहतेशाम साहब जान गये थे कि इनका झुकाव और लगाव साहित्य के प्रति है। एक दिन उन्होंने कहा - "अदब से पेट नहीं चलता। कुछ बेअदबी करो'। एहतेशाम साहब ने एम. ए. में दाखिला के लिए तीन फॉर्म ला कर उन्हें दिया और एम.ए. करने को कहा। तीन फॉर्म हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में दाखिला के लिए था। हिन्दी की लिस्ट में उनका नाम आया और एम. ए. में दाखिला हो गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने 1970 में हिन्दी में एम. ए. किया। स्कूल में साइंस पढ़ाते थे और विश्वविद्यालय जा कर एम.ए. की कक्षा में बैठते थे। एम.ए. करने के बाद सी.एम.पी. कॉलेज में लेक्चरशिप मिली। मासिक वेतन 300 रुपये था। बाद में शादी हुई दो पुत्र हुए- प्रियम और प्रेयस। चार-पाँच साल बाद इलाहाबाद परिवार ले आए। डॉ. रघुवंश के निर्देशन में उन्होंने शोध किया।


राजेन्द्र कुमार के आरंभिक जीवन को जानना सबके लिए जरूरी है क्योंकि संघर्ष में ही फूल खिलते हैं। इलाहाबाद वे लगभग पचपन वर्ष रहे। दूधनाथ सिंह के निधन के बाद उनके चले जाने से इलाहाबाद एकदम सूना हो गया है, इलाहाबाद की पहचान राजेन्द्र कुमार से थी। उनके योग्य-सुयोग्य एवं प्रतिभाशाली छात्रों की कमी नहीं है, जिनमें कई हिन्दी के प्रमुख कवि और यशस्वी आलोचक हैं। अक्सर सोचता हूँ, हम दोनों इतने अधिक आत्मीय कैसे हुए? क्यों हुए? इस अनात्मीय और भुतहे-चंडाल समय में मैनेजर पाण्डेय के चले जाने के बाद केवल वे बचे थे, केवल वे। उनका मन कवि-मन था और स्वभाव कवि-स्वभाव। वे सच्चे कवि थे। उनका व्यक्तित्व किसी भी कवि-आलोचक के व्यक्तित्व से कहीं अधिक सरल, सहज, निश्छल, आत्मीय, धवल और सादगी से भरा था। शायद उनसे अनन्य मैत्री का यह एक प्रमुख कारण था। 'एलनगंज' का 'बंद रोड' सबके लिए खुला था। वे कहीं से भी बंद नहीं थे। निष्कलुष, निष्कपट व्यक्तित्व था उनका। उनमें सादगी का वैभव था, साधारण की असाधारणता थी। अपने समय, समाज, वातावरण और परिवेश को लेकर हम दोनों बेचैन थे। उनमें उग्रता नहीं, शालीनता थी। हिन्दी में शालीन कवियों, लेखकों और प्रोफेसरों की कमी है। राजेन्द्र कुमार नैतिक एवं लोकतांत्रिक मार्क्सवादी थे। सैकड़ों बार उनसे फोन पर लम्बी-लम्बी बातें होती थीं। चिंताएँ समान थीं, बेचैनियाँ कम नहीं थी। वे 'बदलाव' और 'परिवर्तन' चाहते थे। रांची और इलाहाबाद में भौगोलिक दूरी है। मेरे उनके बीच कोई दूरी नहीं थी। वे संवादी थे, विवादी नहीं। अपने विचारों और मान्यताओं पर सदैव अडिग। उनकी कोई निजी आकांक्षा नहीं थी। उनमें एक अद्भुत किस्म की सादगी थी। दिखावे और प्रदर्शन से वे दूर ही नहीं, उसके खिलाफ थे। उनका मार्क्सवाद केवल सिद्धान्त में नहीं, व्यवहार और आचरण में भी था। राजेन्द्र जी में करुणा थी, क्रोध कम था। उनका कोई निंदक नहीं था। उनमें शत-प्रतिशत 'आचरण की सभ्यता' थी। उनका व्यक्तित्व कृतित्व से बड़ा था।



राजेन्द्र जी सच्चे अर्थों में 'इन्सान' और जिम्मेदार नागरिक थे। कला, साहित्य, संस्कृति, मीडिया, राजनीति, लोकतंत्र, न्यायपालिका, संविधान, राजनीतिक दल, चुनाव, आरएसएस, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, कवियों-लेखकों की आत्ममुग्धता, सांस्कृतिक संगठन, जसम, मार्क्सवाद, भारतीयता, कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, उपभोक्तावाद, धर्मान्धता, शायद ही कोई ऐसा ज्वलंत विषय रहा हो, जिस पर हम लोगों ने बात न की हो। वर्तमान से असंतुष्ट पर भविष्य के प्रति एक उम्मीद हमने की। उनके लिए 'परिवर्तन' और 'बगावत' का महत्व था। प्रत्येक 'कोशिश' को 'बगावत' कहने वाले वे हिन्दी के एक मात्र कवि हैं। उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के विकास में देवी शंकर अवस्थी की एक बड़ी भूमिका है। कानपुर के जिस डी. ए. वी. कॉलेज में वे छात्र थे, उसी कॉलेज में देवी शंकर अवस्थी हिन्दी के प्रोफेसर थे। राजेन्द्र जी ने स्वीकारा है कि उनकी 'साहित्यिक रूचि को संवारने में'' अवस्थी जी का योगदान है। उन्होंने राजेन्द्र जी को "कविता में गीति-भाषाओं की सीमाओं से अवगत कराया।"


"कानुपर की जिन लाइब्रेरियों में (गया प्रसाद लाइब्रेरी, मारवाड़ी लाइब्रेरी वगैरह) वे बैठते थे, वहीं मैं भी। क्या पढ़ना चाहिए- यह तमीज मैंने उन्हीं से पाई।" राजेन्द्र जी से कई लोगों ने इंटरव्यू लिये हैं। ताजा इंटरव्यू साधना अग्रवाल का है-  'राजेन्द्र कुमार की सृजनशीलता' ('दोआबा' समय से संगत, 55, जनवरी-मार्च 2026) इस इंटरव्यू में उन्होंने अपनी 'सृजनशीलता का स्थाई आवास आज भी कविता' को ही माना है। इस साक्षात्कार में उन्होंने अपनी काव्य-रूचि और काव्य-रचना के संबंध में कई बातें कही हैं। बचपन से ही उनमें साहित्य की दुनिया में रमने की प्रवृत्ति जग गई थी। अन्त्याक्षरी में भाग लेने के कारण कविताओं की अनेक पंक्तियाँ उन्हें याद रहीं। तुकबन्दियाँ भी की। 9वीं कक्षा में आने के बाद उनकी 'रचनात्मक गतिविधियाँ' बढ़ी। अध्यापकों का प्रोत्साहन मिलता रहा। विज्ञान का छात्र होने के बावजूद काव्य-रचना का क्रम कभी भंग नहीं हुआ। छात्र-जीवन में ही उनकी कविताएँ और रचनाएँ कई पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही थीं। इलाहाबाद आने के बाद, विशेषतः अमृत राय और एहतेशाम हुसैन की स्नेह-प्रप्ति के बाद उनका साहित्यिक-संस्कार और संसार कहीं अधिक सघन और व्यापक हुआ।


राजेन्द्र कुमार मुख्यतः कवि हैं। अपने आलोचक होने को उन्होंने 'आधुनिकता-बोध के द्वारा कवि को सौंपी गई एक अतिरिक्त भूमिका' कहा है। वे कवि, कहानीकार, आलोचक, सम्पादक, प्राध्यापक और संस्कृति कर्मी थे। जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। मिलने-जुलने में संग-साथ में, आपसी संवाद में वे अधिक प्रसन्न होते थे। उनमें दूर-दूर तक, दूरबीन से खोजने पर भी, हम 'व्यक्तिवाद' और 'अवसरवाद' नहीं देख सकते। उनके व्यक्तित्व में संत और सूफी के कुछ गुण भी हम देख सकते हैं। 'ऋण गुणा ऋण' (बाद में 'ऋण गुणा ऋण तथा कुछ अन्य कविताएँ'), लोहा- लक्कड़', 'हर कोशिश है एक बगावत' और 'उदासी का ध्रुपद' उनका काव्य-संग्रह है। 'आईनाद्रोह' पुस्तिका रूप में प्रकाशित उनकी एक लम्बी कविता है। कई पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ बिखरी पड़ी हैं। अभी 'पक्षधर' 39 (जुलाई-दिसम्बर 2025) में उनकी ग्यारह कविताएँ प्रकाशित हुई हैं। और विनोद दास ने उनकी कविताओं पर विचार किया है। उनके कवि-कर्म और आलोचना-कर्म पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। निराला और मुक्तिबोध उनके आदर्श कवि थे। 'अभिप्राय' का उन्होंने एक अंक 'स्वाधीनता की अवधारणा और निराला' पर केन्द्रित किया था। सम्पादकीय में लिखा था- "हमारे लिए महत्व की बात यह है कि निराला को जब भी हम याद करें, सच्ची स्वाधीनता को कलागत और जीवनगत संभावनाओं के संदर्भ में याद करें क्योंकि सच्ची स्वाधीनता की सांस्कृतिक बिम्ब-रचना के संघर्ष में ही निराला के निराला होने का अर्थ निहित है।" उस समय उन्होंने 'राजनीतिक दलों द्वारा व्यक्ति-पूजा को बढ़ावा दिये जाने' की जिस 'विडम्बना' का उल्लेख किया था, वह आज कहीं अधिक मौजूद है। राजेन्द्र जी के लिए उनका अपना समय महत्वपूर्ण था। हम सब जिस समय में रह रहे हैं उससे तटस्थ और निर्लिप्त हो कर न तो साहित्य-रचना संभव है और न आलोचना-कर्म। राजेन्द्र जी ने निराला की 'रचनात्मक दुनिया' को अपनी दुनिया से मिला कर देखा था। ऐसा करना उन्हें 'अपने असंतोषों और अपनी आकांक्षाओं, दोनों की प्रामाणिक पहचान करने का भी एक उपाय' लगा था। उनकी आलोचना विशुद्ध साहित्यिक आलोचना न हो कर सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना है। इस दृष्टि से वे मैनेजर पाण्डेय के बाद अकेले प्रमुख मार्क्सवादी आलोचक थे। जब भी उनसे बातचीत होती, मैं मुक्तिबोध पर पुस्तक तैयार करने को कहता। यह भी कहता कि दूधनाथ सिंह, रामजी राय और प्रणय कृष्ण के बाद आप इलाहाबाद के चौथे व्यक्ति होंगे, मुक्तिबोध पर लिखने वाले और इलाहाबाद को छोड़ कर अन्य किसी शहर के चार आलोचकों ने मुक्तिबोध पर नहीं लिखा होगा। नया, विचारवान और सार्थक। उनका वह काम अधूरा रह गया। 'अभिप्राय' का एक अंक उन्होंने साही पर केन्द्रित किया था और साही की जन्म शती पर उनका एक मूल्यवान लेख भी हमें पढ़ने को मिला था।


'प्रतिबद्धता के बावजूद', 'कविता समय-असमय', 'यथार्थ और कथार्थ' जैसी पुस्तकों पर अधिक विचार नहीं हुआ है। 'प्रतिबद्धता' को देखने-समझने की उनकी अपनी एक भिन्न और मौलिक दृष्टि है, जिसे हम 'राजेन्द्र दृष्टि' भी कह सकते हैं। वे 'प्रतिबद्धता' को केवल 'विचारधारात्मक आयामों से घिरी अवधारणा' नहीं मानते थे। विचारधारा उनके लिए महत्वपूर्ण थी, पर वे उसे 'अनुभव का स्थानापन्न' नहीं मानते थे - "अनुभव तो हमारा समकाल ही हमें देता है। इसलिए चेतना के स्तर पर समकालीनता-बोध का सवाल उठेगा ही।" 'प्रतिबद्धता' के बावजूद वे अनुभव, समकालीनता-बोध और परम्परा को भी महत्व देते थे। "जो भाषा और जो साहित्य-दृष्टि हमने पाई है, उसके पीछे कोई निरा शून्य तो है नहीं। उसके पीछे एक परम्परा भी है। उसमें क्या छोड़ना है क्या जोड़ना - यह विवेक पाने में हमारी इतिहास-दृष्टि हमें मदद कर सकती है। तो प्रतिबद्धता के बावजूद इस सब पर भी तो विचार करना ही होगा, नहीं तो न्याय कैसे होगा?" राजेन्द्र जी इस पक्ष में नहीं रहे कि जो वैचारिक अथवा विचारधारात्मक रूप से प्रतिबद्ध नहीं है, वह साहित्य से बाहर है। उन्होंने इलाहाबाद के ही दो लेखकों भैरव प्रसाद गुप्त और शैलेश मटियानी के उदाहरण से अपनी बात स्पष्ट की है। भैरव जी 'विचारधारात्मक प्रतिबद्धता' के जैसे हिमायती थे, वैसे हिमायती शैलेश मटियानी नहीं थे। शैलेश मटियानी को 'बीहड़ अनुभव-सम्पन्नता के बल' पर ही 'हिन्दी का गोर्की' कहा गया। अपनी आलोचना से राजेन्द्र कुमार ने 'अपने समय की रचनाशीलता और विचारशीलता' को प्रस्तुत किया, हस्तक्षेप भी किया। 'वाद' का प्रत्यय उनके लिए 'आग्रहवाची' था। उनके यहाँ 'अनुभव का यथार्थ' और 'रचना की अपनी संवेदना' का महत्व था। "आग्रह यदि खुद यथार्थ की तरफ से किसी रचना की संवेदना पर सवारी गाँठने का हो, तो वह कैसे स्वीकार्य हो सकता है?"



राजेन्द्र जी में 'आलोचना का विवेक' था। हिन्दी आलोचना में 'विवेक' को सर्वाधिक प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी ने किया है। वह एक प्रकार से उनकी आलोचना का बीज-शब्द भी है। राजेन्द्र जी के यहाँ यह 'विवेक' सदैव प्रमुख रहा है। कानपुर के अपने छात्र-जीवन में अपने एक निबंध में उन्होंने साहित्य को 'भावों का लोकतंत्र' लिखा था, जिसे पढ़ कर देवीशंकर अवस्थी ने यह जोड़ा था "मगर ऐसा लोकतंत्र, जिसमें विवेक हमेशा बहुमत से नियंत्रित या निर्धारित नहीं होता।" राजेन्द्र जी ने अपने 'विवेक' को 'स्वतंत्रता की शर्त' कहा है। वे साहित्य के एक बड़े परिसर में 'रचनात्मक विधाओं के घर' देखते थे और सभी विधाओं के एक 'आत्मीयतापूर्ण पड़ोस' की बात करते थे। "आजकल की सभ्यता में रहाइश की एक विडम्बना यह है कि पड़ोस में रहने वाले भी एक-दूसरे के लिए प्रायः अजनबी ही रहते हैं। लेकिन, रचना और आलोचना जैसे पड़ोसी आपस में अजनबी बन कर रह ही नहीं सकते।" देवीशंकर अवस्थी के अवदान पर एकाग्र 'आलोचना का विवेक' पुस्तक उन्होंने सम्पादित की। 'विवेक' उनके लिए 'एक मूल्यवाची शब्द' था। उन्होंने रचना-मूल्य के साथ आलोचना-मूल्य की भी बात कही है। आलोचना की विश्वसनीयता का संबंध वे 'विवेक की वस्तुपरकता' से जोड़ कर देखते थे। उनकी दृष्टि में 'आलोचना' 'विवेक और संवेदना के योग का नाम' है। उनकी चिन्ता यह थी कि हिन्दी आलोचना 'अपने विवेक के इजाफे' पर जितना अधिक इतराती है, उतना अधिक उसने 'संवेदना की परवाह' नहीं। कविता उनके लिए 'नितांत सामयिक कार्रवाई' नहीं है। "कविता के नाम पर जो कुछ भी लिखा जाए, वह जब तक स्वयं उसके रचयिता को सचमुच कविता होने की आश्वस्ति न दे सके, तब तक उसे सामने लाने का क्या औचित्य?" वे 'सच्ची कविता' के कायल थे, जिसमें हमारे अनुभवों, हमारे भावों, हमारी स्मृतियों और हमारी कल्पनाओं की सम्मिश्र प्रतिध्वनि" हो। कविता का रचना-काल सावधि है, पर उसका सौभाग्य इसमें है कि "उसका पठन-काल अधिक से अधिक निरवधि हो।" उनकी कविताओं ने एक साथ कई दरवाजे खोले हैं। आज जब सोने और चाँदी की कीमतें उछलती-गिरती दिखाई देती हैं, उनकी कविता 'लोहा-लक्कड़' याद आती है 


"सोना उछले या गिरे

हमें क्या.... 

हमें मालूम है उसकी औकात

किसी भी हाथ की उंगलियों के बीच जब भी होगा

हद से हद होगा

अँगूठी भर

हथौड़ा-भर जब भी होंगे

हम ही होंगे

लोहा-लक्कड़ तो हम ही हैं न !'


राजेन्द्र जी 'तात्कालिकता-ग्रस्त' आलोचना से दुखी थे। उनकी चिंता यह थी कि आलोचना की 'कालिक परिधि' बहुत सीमित रह गई है। सीमित होने के कारण ही वह परम्परा के जीवंत साहित्य-बोध से अपने विवेक को माँजने की सामर्थ्य अर्जित नहीं कर पा रही है और न संभावना के सामर्थ्य से। आलोचना तात्कालिक हो कर अधिक दूर की यात्रा नहीं कर सकती। उनकी विशेषता यह है कि उनमें कही भी निराशा नहीं है। हिन्दी आलोचना के वर्तमान से वे असन्तुष्ट नहीं थे। "संभावना उन्हीं आलोचकों में है, जो अपने समय के प्रति हो कर भी महत्व उस मूल संवेदना की सृजनात्मक पहचान के प्रयत्न को दें, जो किसी रचना के खुद के समय में भी हमें अजनबी नहीं रहने देती हैं" यह समय विस्तार से उनके अवदान पर विचार करने का नहीं है, पर यह उल्लेख जरूरी है कि उन्होंने कई आलोचनात्मक पद गढ़े, जिनमें एक 'कथार्थ' है, जिस पर न तो अभी तक कहानीकारों ने ध्यान दिया है और न कथालोचकों ने। 'यथार्थ' की तर्ज पर उन्होंने 'कथार्थ' पद गढ़ा। उनकी कथालोचना पर भी विचार नहीं हुआ है। 'ईदगाह' और 'कफन' की उनकी आलोचना एकदम नयी और महत्वपूर्ण है। वे इन दोनों कहानियों को 'संवेदनागत स्तर पर पृथक्कृत कर के, एक दूसरे के नितान्त विरोध में' नहीं देखते। उन्होंने सैद्धान्तिक आलोचना नहीं लिखी, पर व्यावहारिक आलोचना में कुछ सिद्धान्त-सूत्र हम देख सकते हैं। उनमें गहरी संवेदनशीलता और विचारशीलता थी। कम लिखा, पर सार्थक लिखा।


देश की वर्तमान स्थिति से वे क्षुब्ध थे। वे देख रहे थे कि देश एक साथ दो समय- पुराने और आगे के समय में जा रहा है। एक साथ 'पौराणिकता और आधुनिकता', 'धर्मान्धता और वैज्ञानिकता'। इसे उन्होंने 'विडम्बनामय ध्रुवीकरण' कहा है। मार्क्सवाद को उन्होंने ढोया नहीं, जिया। वह उनके व्यवहार और आचरण में था। 'अभिप्राय' का सम्पादन हो य 'बहुवचन' का, उन्होंने अपनी छाप छोड़ी। मेरे लिए बड़ी बात यह थी कि वे एकदम सहज-सरल और स्पष्ट थे। निरभिमानी और स्वाभिमानी। मालूम था कि वे अधिक दिन जीवित नहीं रहेंगे, पर एक उम्मीद थी कि वे एकाध वर्ष और जियेंगे, जो नहीं हो सका। अब जब वे नहीं हैं और केवल यादें हैं, अनगिनत स्मृतियाँ हैं, दूर-दूर तक देखता और सोचता हूँ कि अब ऐसा सरल, निश्छल और अपनत्व से लबालब साथी और कौन है? कहाँ है?


(यह आलेख जन संदेश टाईम्स से साभार लिया गया है। आलेख में प्रयुक्त चित्र अवनीश यादव की फेसबुक वाल से लिए गए हैं।)



रवि भूषण 


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