पॉल वेरलेन की कविताएं

 

पॉल वेरलेन 


कहा जाता है कि दुनिया का हरेक व्यक्ति जन्मना कवि ही होता है। यह कहने के पीछे मनुष्य की वह संवेदनशीलता ही रही होगी जो उसमें अन्य के प्रति प्रेम का भाव जगाती है। लेकिन वही कविता पाठकों के दिल में जगह बना पाती है जिसमें सार्वजनीनता के दर्शन होते हैं। जिसमें आम जन का दुःख दर्द और उस की विडम्बनाएं होती हैं। कविता जबरन नहीं लिखी जा सकती बल्कि आज भी हृदय की आवाज पर ही लिखी जाती है। इसीलिए वास्तविक कविता लिख पाना हमेशा कठिन होता है। यही वजह है कि आसान दिखने के बावजूद हर समय किसी भी कवि के साथ कविता लिखना संभव नहीं हो पाता। आज जिस तरह की कविताएं अधिकांशतः लिखी जा रही हैं उसे देख पढ़ कर तो यही लगता है कि कविता के साथ धोखा या अत्याचार किया जा रहा है। फ्रांसीसी कवि पॉल वेरलेन अपनी कविता 'काव्य कला' में लिखते हैं : 'घूँघट के नीचे सुन्दर नज़र हो/ प्रचण्ड गर्मी की तपिश हो उसमें/ झलके शरद ऋतु का आकाश/ तेज़ नृत्य की कशिश हो उसमें'। फ्रेंच कवि पॉल वेरलेन की कविताओं का मूल रूसी से अनुवाद किया है वरिष्ठ कवि अनिल जनविजय ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  पॉल वेरलेन की कविताएं। कविताओं के साथ क्वि के बारे में एक टिप्पणी भी अनिल जनविजय की ही है।


पॉल वेरलेन को आज फ़्रांसीसी भाषा का एक बड़ा कवि माना जाता है। लेकिन तीस साल की उम्र तक वेरलेन को एक उद्दण्ड शराबी, चाकूबाज़ और गुण्डा ही माना जाता था। वेरलेन बेलजियम में पैदा हुए थे। बेल्जियम में फ़्रांसीसी के साथ-साथ हॉलैण्ड की भाषा बोली जाती है। वेरलेन की भाषा दोनों भाषाओं की खिचड़ी भाषा थी। यह माना जाता है कि बचपन से ही उन्हें गन्दी-गन्दी किताबें पढ़ने की आदत पड़ गई थी और वे उन्हीं बाज़ारू किताबों के दीवाने थे। यहाँ इस बात का ध्यान रहे कि गन्दी किताबों का मतलब सिर्फ़ अश्लील किताबें नहीं हैं, बल्कि वह बाज़ारू किस्म का साहित्य है, जिसे हम आज हिन्दी में ’लुगदी साहित्य’ कहते हैं। पॉल वरलेन जब कुल तेरह बरस के थे तो एक दिन उनके हाथ आज के विश्व प्रसिद्ध फ़्रांसीसी कवि शार्ल बोदलेयर का पहला कविता संग्रह 'पाप के फूल’ या 'अमंगलकारी फूल’ लग गया। इस कविता-संग्रह पर छपते ही प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। लेकिन पॉल वेरलेन पूरा कविता-संग्रह कई-कई बार पढ़ गए और फिर उन्होंने भी कविताएँ लिखना शुरू कर दिया। यह यह 1857 की बात है। एक साल बाद ही उन्होंने तब के मशहूर फ़्रांसीसी कवि विक्टर ह्यूगो को अपनी प्रारम्भिक कविताएँ पोस्ट कर दीं। हालाँकि विक्टर ह्यूगो ने उनकी कविताओं पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। पर तभी से वेरलेन को कविताएँ लिखने का चस्का लग गया। वेरलेन की वे प्रारभिक कविताएँ आज भी पढ़ी जाती हैं और उनके अनुवाद दुनिया भर की भाषाओं में हो चुके हैं।

वे एक फ़ौजी पिता की सन्तान थे। उनकी माँ उन्हें बेहद प्यार करती थी और उनकी आवारागर्दी के बावजूद उन पर जान देती थी। पॉल वेरेलेन शराब पीने के बाद हिंसक हो जाते थे। वेरलेन ने कई बार अपनी माँ का गला घोंटा, कई बार उस पर चाकू से वार किए। उनके कई दोस्त उनके हमलों के शिकार हो चुके थे। जो भी उन्हें शराब पीने से रोकता, वही उनकी उग्रता का शिकार हो जाता। फिर जब वेरेलेन इक्कीस बरस के हुए तो एक दिन उनके पिता की मृत्यु हो गई। लेकिन इसके बावजूद वेरलेन की उद्दण्डता में कोई कमी नहीं आई। जब वे तेईस के हुए तो ख़बर मिली की शार्ल बोदलेयर की मृत्यु हो गई है। वेरलेन बोदलेयर को श्रद्धांजलि देने गए और उनके अन्तिम संस्कार में शामिल हुए।

फिर जब वे पच्चीस साल के हुए तो एक दिन उनकी मुलाक़ात सोलह वर्षीया मतिल्दा मौटे से हुई। उन्हीं दिनों इनका तीसरा कविता-संग्रह छप कर आया था और साहित्य के क्षेत्र में उन्हें पहचान मिलनी शुरू हो गई ती। अगले ही बरस वेरेलेन ने मतिल्दा से शादी कर ली। यह ’ब्यूटी और बीस्ट’ का मिलन था यानी एक हिंसक जानवर ने एक ख़ूबसूरत किशोर लड़की को अपने प्रेम में फँसा लिया था। मतिल्दा उन पर जान देती थी, लेकिन वेरलेन उसकी कोई परवाह नहीं करते थे। उनकी गुण्डागर्दी की वजह से उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया।

वेरलेन तीस साल के हो चुके थे। जेल में बन्द थे। एक दिन उन्हें सूचना मिली कि उनकी बीवी मतिल्दा ने उन्हें तलाक़ दे दिया है और दोनों का बच्चा ख़ुद अपने पास रखने और उसे अकेले ही पालने का फ़ैसला किया है।

आज मैंने उनकी उन प्रारम्भिक कविताओं में से, जो उन्होंने बचपन में लिखी थीं, कुछ कविताओं का अनुवाद किया है। पेश हैं आप लोगों के लिए वे कविताएँ। ये सभी अनुवाद उनकी रूसी भाषा में अनूदित कविताओं से किए गए हैं।

अनिल जनविजय 


पॉल वेरलेन की कविताएं 


शरद का गीत


देर तक रोता हूँ

शरद काल में बजती

उदास वायलिन की तरह

घायल है मेरा दिल

दुखी है

नीरस है बेसुरा


घनी ऐंठन है मन में

पीला हो गया है चेहरा

मुझे याद आते हैं

पुराने दिन

और रोता हूँ मैं आह भर-भर


अब जा रहा हूँ

शरद की हवा के साथ

थपेड़े खाता हुआ

सूखे मृत पत्ते की तरह

 


ग़रीब चरवाहा


मैं एक चुम्बन से डरता हूँ

किसी मधुमक्खी के चुम्बन की तरह।

सारी रात जागता रहता हूँ

मैं आख़िर उस पर मरता हूँ

पर उसके चुम्बन से डरता हूँ!


मैं केट से प्यार करता हूँ

और टकटकी लगा कर वह देखे।

नाज़ुक, चारु, सलोनी है वह

नयन-नक़्श उसके तीखे।

ओह, प्यार करूँ उसे नीके-नीके!


सन्त वलेन्तीन दिवस है आज!

पर मैं डरपोक हूँ, बन्दा नवाज

कल हँसी उड़ाएँगे वो मेरी ...

इश्क़ का भयंकर है अन्दाज़।

सन्त वलेन्तीन दिवस है आज!


वादा किया उसने मुझसे,

अनायास किया उजियारा!

पर मुश्किल, बस, इतनी, भाई!

मैं प्रेमी हूँ, बेचारा,

प्रेम है मेरा बंजारा!





नींद 


नींद, ओ गहरी नींद

घेर, मुझे तू घेर

नींद, अरी ओ नींद

बेकार है सब उम्मीद

उदासी चारों तरफ़

होने वाली है उजेर


अरे, अन्धा हो चुका हूँ

अब क्या सही, क्या ग़लत

दिमाग में धुन्ध छाई है

क्या गाऊँ, सब उलट-पलट


पालना होगा अब, बस, वही

जो क़ब्र में ले जाए

ज़रा धीमे बोलो, चुप रहो

गहरी नींद मुझे आए    



लड़की और बिल्ली


खेल रही थी वो बिल्ली से अपनी

और इस तरह गुज़र गई पूरी शाम

उतर आई अन्धेरे की छाया घनी

श्वेत हाथ पकड़े पंजा उसका स्याम।


बिल्ली नटखट थी, कर रही शरारतें

वह पाजी, शैतान

लड़की उसे छेड़े, हँसे, करे उससे बातें

और हाथ पर उसके झलकें

बिल्ली के नाख़ूनों के गहरे निशान।


अपने खेल में जब मगन थीं दोनों

तभी हँसी से फट पड़ा गगन

चार आँखों से रोशनी यूँ झमके

ज़्यों फ़ास्फ़ोरस की अगन।



काव्य-कला 


लय और धुन ही मुख्य चीज़ है

राह यह आसान नहीं है

गोश्त कितना भी हो शरीर में

पर रुह बिना कुछ काम नहीं है


भाषा पर मत अड़े रहो तुम

लापरवाही से मत राह चुनो

गीत हमें नशा देते हैं

शब्द फीके हों पर धुन गुनो


घूँघट के नीचे सुन्दर नज़र हो

प्रचण्ड गर्मी की तपिश हो उसमें

झलके शरद ऋतु का आकाश

तेज़ नृत्य की कशिश हो उसमें


छायाएँ हों विभिन्न रंगों की

रंग एक-ही झलके ऐसा न हो

कोई नियम नहीं है पोशाकों का

सिर्फ़ ख़ुशबू महके ऐसा न हो


मन संकुचित न हो, शातिर हो हंसी

सुनने वाले का मन बहलाए

कभी आँसू निकले, कभी मुस्काए वो

लहसुन जैसे सब्ज़ी का स्वाद बढ़ाए


लफ़्फ़ाजी की तोड़ के गरदन

कविता में थोड़ी समझदारी बढ़ाओ

मन की आवाज़ से जोड़ो उसे

मन से बहुत दूर न जाओ


कविता को धोखा मत दो तुम

उस पर अत्याचार करो मत

नक़ली घण्टी बाँध कविता में

उस पर बेकार भार बनो मत


लय हो, धुन हो, सुर हो उसमें 

चाल-ढाल हो, तेज़ गति हो

हाव-भाव हो, चमक-दमक हो

प्यार हो उसमें गगन-मति हो


लगे वो चाहे कुछ-कुछ बहकी-सी

सुबह-सवेरे की मन्द हवा हो

जादू कर दे सुनने वाले पर

साहित्य की, बस, यही दवा हो।


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मार्कण्डेय की कहानी 'दूध और दवा'

प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन (1936) में प्रेमचंद द्वारा दिया गया अध्यक्षीय भाषण

हर्षिता त्रिपाठी की कविताएं