रंजीत वर्मा का आलेख 'कैसी हो आज की कविता'


रंजीत वर्मा


आम तौर पर साहित्य का यह दायित्व होता है कि समाज को दिशा देने का काम करे। वह अपने समय ही नहीं बल्कि समय से आगे की सोचे और इसके लिए जन मानस को तैयार करने का काम करे। हिन्दी साहित्य के आरम्भिक दौर में दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं दिखाई पड़ता। तब के रचनाकारों की रचनाओं में धार्मिक और जातीय पूर्वाग्रह स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ता है। इस नींव ने हमें मुक्त तरीके से सोचने विचारने तक के लिए प्रेरित नहीं किया। 1936 में प्रगतिशील लेखक  लेखक संघ की स्थापना के साथ पुरानी सोच का पटाक्षेप होता है। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद खुले तौर पर कहते हैं - साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं दी गयी हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा 'जीवन की आलोचना' है। चाहे वह निबंध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या होनी चाहिए।' हमें आजादी मिले एक अरसा हो गया। लेकिन हम आज तक पूर्वाग्रहों से मुक्त कहां हो पाए हैं। हम आज कहीं ज्यादा धार्मिक हो गए हैं हम आज कहीं ज्यादा जातिवादी हो गए हैं। हम आज कहीं ज्यादा संकीर्ण हो गए हैं। हम आज कहीं ज्यादा कट्टर हो गए हैं। ऐसे में आज साहित्य की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ गई है। क्या कवि केवल लिखने के लिए ही कविता लिखते हैं या उसका जीवन से भी कोई सरोकार है। इन सब मुद्दों पर दृष्टिपात करते हुए रंजीत वर्मा ने एक गंभीर और तल्ख आलेख लिखा है। इस आलेख को हमने 'समयांतर' के हालिया अंक से साभार लिया है। आज के कवियों को यह आलेख जरूर पढ़ना चाहिए। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं रंजीत वर्मा का आलेख 'कैसी हो आज की कविता'।

                  

'कैसी हो आज की कविता'


रंजीत वर्मा 


ऊपर से देखने पर भले दिखाई न दे लेकिन तह में जाते ही आपको आभास हो जाएगा कि हिन्दी साहित्य हिन्दू साहित्य हो गया है। आज जिस तरह से हिंदुत्ववादी फासीवाद को ले कर साहित्यकारों के बीच न सिर्फ चुप्पी है बल्कि एक हद तक स्वीकृति है, वह भयावह है। देखा जाए तो हिंदी साहित्य के शुरूआती समय में ही इसके हिंदू साहित्य कर दिये जाने की जोरदार तैयारी शुरू हो गयी थी जो वीभत्स सांप्रदायिक चेहरे और वर्णवादी सोच के साथ आज हमारे सामने है। ठीक उसी रूप में जिस रूप में वह राजनीति में आज दिखाई दे रही है। इस तरह कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी का नवजागरण काल इस फासीवाद के युग में अपने और भी नुकीले दाँत और नाखून  के साथ वापस आ गया है। मतलब कि वे जो चाहते थे और जिसके लिए वे लड़ रहे थे उसे पाने का युग आ गया है। यह हिंदी भाषा का हिंदू युग है। वैसे कुछ मजबूरियाँ कहीं अटकी हुई ज़रूर रह गयी हैं जो प्रेमचंद, मुक्तिबोध और नागार्जुन जैसे लेखकों कवियों को साथ ले कर चलने की विवशता बनी हुई है। चाह कर भी वे उन्हें खारिज नहीं कर पा रहे। 


हमें जो भाषा दी गयी है अगर उसके अतीत में हम जाएं तो स्वभाविक रूप से हमें जवाब मिलेगा कि अब इसे किसी लक्ष्य की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उसे जो चाहिए था वह उसे मिल गया है। भारत हिन्दू राष्ट्र बन गया है। बस घोषणा होना शेष है। तो ज़्यादा से ज़्यादा आपका लक्ष्य यही हो सकता है कि जल्द से जल्द घोषणा हो। कहीं आप इसी लक्ष्य की घोषणा के लिए तो नहीं लिख रहे? अगर नहीं तो फिर क्या है लक्ष्य आपका? इस पर विचार करने का समय आ चुका है। हालांकि इस समय को आये कम से कम दस वर्ष तो हो ही चुके हैं और हम में से अधिकांश दबे पाँव उधर जा भी चुके हैं। समझा जा सकता है कि स्थिति गंभीर है इसलिए यह ज़रूरी है कि आप बिना समय गँवाये यह तय कर लें कि आपका लक्ष्य क्या है। 


माँ उपन्यास में मैक्सिम गोर्की लिखते हैं - "मिथ्या प्रचार और लोभ ने पिशाचों और राक्षसों की एक अलग दुनिया बना दी है, हमारा काम जनता को इन पिशाचों से मुक्त कराना है।" क्या हमें यह पिशाच और राक्षस अपने देश में दिखाई नहीं देते। और अगर नहीं दिखाई देते तो कहीं इसकी वजह उन्नीसवीं शताब्दी का प्रेत तो नहीं जो इक्कीसवीं शताब्दी में हमारे सिर चढ़ कर बोल रहा है। लोग उन्नीसवीं शताब्दी के उस प्रेत को नवजागरण काल कहते हैं। यह 1857 के बाद आया था। मैं इसके विस्तार में नहीं जाना चाहूँगा लेकिन कुछ उदाहरणो के जरिये अपनी बात कहने की कोशिश करूँगा। लेकिन पहले हमें सोचना होगा कि आखिर इस अधोगति तक हम पहुँचे कैसे? ऐसा क्यों है कि हम उन्नीसवीं शताब्दी के प्रेत से अलग हट कर सोचने की ज़रूरत महसूस नहीं कर पा रहे हैं? मुझे इसके पीछे दो वजहें नज़र आती हैं। 


गोर्की 


पहली यह कि आंदोलनों पर से हमारा विश्वास उठ चुका है खासकर कम्युनिस्ट आंदोलनों पर से। नक्सलबाड़ी आंदोलन को हम वैचारिक रूप से एक खत्म हो चुका आंदोलन मान चुके हैं। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि जनता से जुड़ कर लिखने या जिसे हम जनपक्षधर साहित्य कहते हैं, उससे हम अलग हो गये हैं या हम उसकी ज़रूरत नहीं महसूस करते हैं। शायद ऐसा इसलिए हुआ हो कि अकादमियो, विश्वविद्यालयों, पुरस्कारों, मेलों-ठेलों और उत्सवों की चकाचौंध ने हमें लगभग अंधा बना दिया है। और हम कहीं न कहीं यह मान कर चल रहे हैं कि अब कुछ बदला नहीं जा सकता। 


दूसरी वज़ह यह कि साहित्य में हमारे आदर्श वे हैं जिन्हें हम हिंदी भाषा के निर्माता के तौर पर देखते हैं और सर्वकालिक तौर पर श्रेष्ठ रचनाकार मानते हैं। इनमें से तीन जो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं वे हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और रामचंद्र शुक्ल। इनकी प्रतिभा और इनके ऐतिहासिक योगदान को मैं कहीं से कम नहीं कर रहा लेकिन जरूरी है कि इनके उस पक्ष को भी जाना जाए जिस पर बात कम की जाती है जबकि अन्डरकरेंट की तरह वह आज भी हिंदी साहित्य में पूरी मुस्तैदी से साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा में मौजूद है। और सिर्फ मौज़ूद ही नहीं है बल्कि हर चीज़ तय कर रही है। 


जिस तरह से हंटर आयोग के सामने शिक्षा और भाषा के सवाल पर भारतेंदु उर्दू और मुसलमानों के ख़िलाफ़ लगातार ज़हर उगलते रहे थे उसे देख कर साफ लगता है कि वे भाषा के सवाल पर समाज को दो फाँक तक करने को तैयार थे। हंटर आयोग का गठन 1882 में शिक्षा संबंधी समस्याओं का पता लगाने के लिए किया गया था। शिक्षा संबंधी एक सवाल के जवाब में भारतेंदु कहते हैं कि लोग नहीं चाहते कि लड़कियाँ स्कूल जाएँ फिर किसी और सवाल के जवाब में कहते हैं कि लड़कियाँ पढ़ना नहीं चाहती क्योंकि उन्हें स्वतंत्र विचार रखने का पाठ पढ़ाया जाता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या प्रांत में ऐसा कोई व्यक्ति है जो सरकारी अनुदान ले कर स्कूल-कॉलेज खोल सके तो उन्होंने जवाब दिया कि 'प्रांत में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है। लोग जो घरों के झगड़े खुद निपटा नहीं पाते वे देश का प्रशासन क्या संभालेंगे।' यह जवाब काफी है यह जानने को कि देश को वे कितनी हिकारत की नज़र से देखते थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में स्कूल चलाने का कम से कम एक ज़बरदस्त उदाहरण उनके सामने था लेकिन वे इसका ज़िक्र नहीं कर सकते थे क्योंकि तब सावित्रीबाई फुले का नाम आता जो दलित थीं। फातिमा शेख का नाम आता जो मुस्लिम थीं। 


दलित और मुसलमानों को ले कर उनकी नफ़रत जगजाहिर थी। ढूँढने की ज़रूरत नहीं। अनेक कविताएँ, अनेक लेख, भाषणों के अनेक अंश मिल जाएंगे। वे अपनी इस नफरत को छिपाते भी नहीं थे। विकट घृणा की उत्कट अभिव्यक्ति  वहाँ देखने को मिल सकती है।


तो पहले हम यहाँ टूटे थे देश बाद में टूटा था। 


यह वो पक्ष है जहाँ हम उनका दलित विरोधी और मुस्लिम विरोधी चेहरा देखते हैं। इसलिए यह ज़रूरी हो गया है कि उनके इस पक्ष को हम जानें क्योंकि इन्हीं दलितों और मुस्लिमों का विरोध आज की फासिस्ट सरकार भी पूरी नफरत के साथ करती है। और अब तो हिंदी के बहाने हिंदुत्व को आगे बढ़ाने का उनका एजेंडा भी सामने आ चुका है। एक राष्ट्र एक भाषा का शिगुफा छोड़ा जा चुका है जो बेहद खतरनाक परिणाम ला सकता है। हम देख चुके हैं कि कैसे नवजागरण काल में भाषा टूटी फिर आज़ादी मिलते ही देश टूटा और भारत पाकिस्तान दो देश बने। बाद में यह भी हम देखते हैं कि भाषा की लड़ाई में पाकिस्तान से टूट कर बांग्लादेश अलग हुआ। समझा जा सकता है कि भाषा या साहित्य को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यह देशों को ही नहीं तोड़ता दिलों को भी तोड़ देता है। एक राष्ट्र एक भाषा का खेल भारत के कई टुकड़े कर सकता है। 


भारतेंदु 


यह हम सब जानते हैं कि 'जात-पात तोड़क मंडल' और उसके अध्यक्ष संतराम बीए के ख़िलाफ़ हिंदू समाज था और उसकी भर्त्सना करता था। उसी 'जात-पात तोड़क मंडल' ने जब अध्यक्षीय भाषण देने के लिए बी. आर. अंबेडकर को बुलाया था तो सवर्ण हिंदू समाज ने उसका जोरदार विरोध किया था परिणामस्वरूप उस पूरे कार्यक्रम को ही रद्द कर देना पड़ा था। विरोध करने वालों में हिंदी के कुछ मूर्धन्य कवि लेखक और संपादक भी थे जैसे कि पंडित लज्जा राम शर्मा, किशोरी दास वाजपेयी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आदि। इन लोगों का मानना था कि यह मंडल जाति तोड़ने के बहाने हिंदुओं को तोड़ने का काम कर रहा है। यदि इसका वश चले तो वह अछूत और ब्राह्मणों को एक ही पायदान पर ला कर खड़ा कर दे। निराला ने मंडल के अध्यक्ष संतराम के बीए होने पर कटाक्ष करते हुए कहा - "अंग्रेजी स्कूलों और कॉलेजों में जो शिक्षा मिलती है उससे दैन्य ही बढ़ता है और अपना अस्तित्व खो जाता है। बी. ए. पास कर के धीवर, लोध अगर ब्राह्मणों को शिक्षा देने के लिए अग्रसर होंगे तो संतराम बी. ए. की तरह हास्यास्पद होना पड़ेगा।" आज अगर कोई जाति का नाम ले कर इस तरह अपमानजनक ढंग से बात करे तो उस पर मुकदमा चल जाएगा। इसी सोच के लोग थे वे जो सावित्रीबाई फुले पर कीचड़ फेंका करते थे जब वे स्कूल जाती होती थीं। भला एक दलित पढ़ाने का काम कैसे कर सकता है और ऊपर से महिला। सोचिए कितनी भयानक मानसिकता है यह। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यही मानसिकता चल कर पहुँची थी हमारे महाप्राण कवि निराला तक जिसे वे आगे बढ़ाते प्रतीत होते हैं। 


उनके इस दलित विरोध को नज़रअंदाज़ करने की भूल आप नहीं कर सकते। दलित ही नहीं मुस्लिम विरोध और उर्दू विरोध भी निराला के यहाँ जबरदस्त दिखाई देता है। इन सबका जिक्र यहाँ इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तभी हमें पता चलेगा कि जिस तरह कल हिंदी को स्थापित करने के लिए नफरत का यह खेल खेला जा रहा था वही खेल आज हिंदू राष्ट्र स्थापित करने के लिए राजनीति खेल रही है। और साहित्य मशाल की तरह आगे चलने की जगह पीछे-पीछे घिसटाते चल रहा है। आज की जो सत्ता है इस देश में वह भी इसी तरह की नफरत को हवा दे कर अपना वज़ूद बनायी हुई है। अगर इस फासिस्ट सत्ता का मुँह आपको तोड़ना है तो हिंदी साहित्य का नया इतिहास आपको बनाना होगा और अगर आप पिटी पिटाई लकीर पर चलते रहे, कविता को तुलसी दल समझते रहे और चरणामृत की तरह ग्रहण करते रहे तो आपको किर्तनिया में बदलते देर नहीं लगेगी। 


विडम्बना देखिये कि अंग्रेजों के शासन काल में निराला लिखते हैं 'शासन करते हैं मुसलमान'। पूरा देश अंग्रेजों से लड़ रहा था, पूरा देश अंग्रेजों से आज़ादी चाह रहा था तब निराला लिख रहे थे 'शासन करते हैं मुसलमान'। क्या वे आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे जो लिख रहे थे 'शासन करते हैं मुसलमान'। यह लिखने की उनकी यह कैसी मज़बूरी थी। सिवाय नफरत के यह क्या चीज थी जो मुसलमानों को ले कर उनके अंदर ज़हर की तरह घुली हुई थी। और यह नफरत इसलिए थी कि वे हिंदी को स्थापित करना चाह रहे थे लेकिन उनके पास मीर और गालिब का कोई जवाब नहीं था तो मुसलमानों को ही हमलावर, आततायी, गोमांस खाने वाले, क्रूर शासक कह कर साबित करना चाह रहे थे कि उर्दू आक्रांताओं की भाषा है इसलिए त्याज्य है। साथ ही न समझ में आने वाली संस्कृतनिष्ठ हिंदी लिख कर यह साबित करने में लगे रहे कि हिंदी किसी भी मायने में उर्दू क्या फारसी से भी कम नहीं है। जनता से दूर होने की कोई चिंता उन्हें थी नहीं क्योंकि जनता के लिए वे लिख भी नहीं रहे थे। इसलिए बेख़ौफ़ लिखते रहे। उनकी तुलसीदास कविता की ही पंक्ति है - 


कल्मषोत्सार कवि के दुर्दम

चेतनोर्मियों के प्राण प्रथम


एक और उदाहरण देखिये


खुले तिर्यक दृग

पहना कर ज्योतिर्मय स्त्रक


हिंदी साहित्य में एम. ए., पी-एच. डी. किया हुआ आदमी भी इन पंक्तियों का सही सही उच्चारण करने की बात सोच कर भयाक्रांत हो सकता है। फिर भी विद्वान आलोचकगण इन पंक्तियों की भूरि-भूरि प्रशंसा करेंगे और कविता को महान साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे जबकि दूसरी ओर वही आलोचकगण यह कह कर कि कोई कवि आज फिलिस्तीन पर कविता नहीं लिख रहा, मणिपुर की हिंसा पर कविता नहीं लिख रहा, चालाकी से यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि इस तरह की कविता का लिखा जाना अब चलन से बाहर है। 


इन सब मामलों में रामचंद्र शुक्ल अपने समकालीन किसी भी साथी रचनाकारों से पीछे नहीं थे। विश्वविद्यालयों में हिंदी का ककहरा यहीं से शुरू होता है। यह जानना दिलचस्प होगा कि रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य में वर्णव्यवस्था की वकालत कितनी हठधर्मिता के साथ और कितना नीचे गिर कर करते हैं। एक छोटा सा उद्धरण नीचे दे रहा हूँ उस पर गौर करने की ज़रूरत है।


"उच्च श्रेणियों के कर्तव्य की पुष्ट व्यवस्था न होने से ही योरप में नीची श्रेणियों में ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार का प्राबल्य हुआ जिससे लाभ उठा कर 'लेनिन' अपने समय में महात्मा बना रहा। समाज की ऐसी वृतियों पर स्थित 'महात्म्य' का स्वीकार घोर अमंगल का सूचक है।" 


'उच्च श्रेणियों के कर्तव्य की पुष्ट व्यवस्था' कह कर वर्णाश्रम का जो पाठ ले कर वो हिंदी साहित्य में प्रवेश करते हैं उसे ही हिंदी साहित्य की नींव माना जाता है। 'पुष्ट व्यवस्था' में कहीं कोई कमी न रह जाए और इस कमी का फायदा उठाकर कोई 'लेनिन' (वर्ण समाज और वर्ग समाज को जड़ से उखाड़ फेंकने वाला) न पैदा हो जाए इसलिए हिंदी साहित्य के मस्तक पर जब तब चंदन का लेप चढ़ाया जाता रहता है। कम्युनिस्ट विरोध की यह बानगी काफी है यह बताने को कि हिंदी साहित्य किसका है, किसके लिए है, का खेल काफी उद्दंड तरीके से वे शुरूआत से ही खेलते आ रहे हैं। 


खैर इस तरह से खुल कर कुत्सित विचार प्रकट करने के दुस्साहस का अंत 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ होता हम देखते हैं। पहले के तमाम साहित्य का पटाक्षेप करते हुए अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रेमचंद कहते हैं - साहित्य की बहुत सी परिभाषाएं दी गयी हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा 'जीवन की आलोचना' है। चाहे वह निबंध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, या काव्य के, उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या होनी चाहिए।'


इसकी अगली पंक्ति में ही प्रेमचंद लिखते हैं - 'हमने जिस युग को अभी पार किया है, उसे जीवन से कोई मतलब न था।' फिर आगे कहते हैं - 'कहानी कहानी है, जीवन जीवन। दोनों परस्पर विरोधी वस्तुएँ समझी जाती थी। कवियों पर भी व्यक्तिवाद का रंग चढ़ा हुआ था। प्रेम का आदर्श वासनाओं को तृप्त करना था, और सौन्दर्य का आँखों को। इन्हीं श्रंगारिक भावों को प्रकट करने में कवि-मंडली अपनी प्रतिभा और कल्पना के चमत्कार दिखाया करती थी। पद्य में कोई नयी शब्द-योजना, नयी कल्पना का होना दाद पाने के लिए काफी था - चाहे वह वस्तुस्थिति से कितनी ही दूर क्यों न हो। आशियाना और कफ़स, बर्क और खिरमन की कल्पनाएँ, विरह दशाओं के वर्णन में निराशा और वेदना की विविध अवस्थाएँ, इस खूबी से दिखायी जाती थी कि सुनने वाले दिल थाम लेते थे। और आज भी इस ढंग की कविता कितनी लोकप्रिय है, इसे हम और आप खूब जानते हैं।' 


प्रेमचन्द



1936 के इस सीधे हमले के बाद छायावाद का अंत हो जाता है। लेकिन तब तक वह पिछला युग आगे की हिंदी कविता के लिए ट्रेंड सेट कर चुका होता है। बड़ी से बड़ी घटना घट जाए, लोगों का जीना भले ही दुश्वार हो जाए लेकिन उसे कविता का विषय नहीं बनाने का उपक्रम चलता रहा। उदाहरण के तौर पर निराला के पहले कविता-संग्रह 'अनामिका'  को देखा जा सकता है। यह संग्रह 1923 में आया था। लेकिन उनका यह संग्रह पिछली बड़ी से बड़ी घटनाओं की शिनाख्त नहीं करता है चाहे वह 1914 में शुरू हुआ पहला विश्व युद्ध हो जो पाँच साल चला था और करोड़ों लोगो की जान गयी थी या 1918 का स्पैनिश फ्लू हो जिसमें करोड़ से ऊपर लोग भारत में ही मरे थे, या 1919 का जालियाँवाला गोलीकाण्ड हो जिसमें सैकड़ो निहत्थे लोगो को घेर कर गोलियों से भून डाला गया था। 'कुल्ली भाट' उपन्यास में उन्होंने ज़रूर स्पैनिश फ्लू का ज़िक्र किया था लेकिन सवाल है कविता में क्यों नहीं? महात्मा गॉंधी अफ्रीका से लौट कर भारत आते हैं लेकिन निराला के पूरे फसाने में इसका जिक्र कहीं नहीं होता है। हाँ, लेकिन सम्राट एडवर्ड अष्टम पर लिखने से निराला खुद को रोक नहीं पाते हैं। राजा के लिए किसी गुलाम देश के गुलाम नागरिक द्वारा लिखा गया शायद यह सर्वश्रेष्ठ प्रशस्ति गीत हो। निराला लिखते हैं - 


"भेद कर पंक

निकलता कमल जो मानव का

वह निष्कलंक "। 


इसी कविता में वे आगे लिखते हैं - 


"सौरभ प्रमुक्त! 

प्रेयसी के ह्रदय से हो तुम

प्रतिदेशयुक्त, 

प्रतिजन, प्रतिमन

आलिंगित तुमसे हुई

सभ्यता यह नूतन!" 


1911 में पहली जनगणना हुई थी और जब दूसरी जनगणना 1921 में हुई तो पता चला कि दस वर्षों में आबादी बढ़ने की जगह कम हो गयी है। कितने लोग मरे होंगे दस वर्षों में इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। सौ वर्ष के जनगणना के इतिहास में दोबारा ऐसा नहीं हुआ कि अगली जनगणना में आबादी पहले के मुकाबले घट जाए। यह  1911 से 1921 के बीच हुआ लेकिन निराला ने इस पर भी लिखने की बात सोची तक नहीं।


उन्होंने तो आश्चर्यजनक ढंग से सांप्रदायिकता पर भी कुछ नहीं लिखा जबकि उन्हीं दिनो उनसे दस साल छोटे भगत सिंह लेख लिख कर सांप्रदायिकता पर गहरी चिंता प्रकट कर रहे थे। अछूत समस्या पर भी भगत सिंह के विचार पढ़े जा सकते हैं लेकिन निराला के यहाँ जैसे यह कोई समस्या थी ही नहीं। वे मुसलमानों से भिड़े पड़े थे। 


उनकी कविताओं को देख कर लगता है कि उनके विचार स्पष्ट थे कि ऐसे विषय चाहे वह जितने भी भीषण, मारक या जनसंहारक क्यों न हो, कविता के विषय नहीं हो सकते। चाहे वह भारत की आज़ादी की लड़ाई ही क्यों न हो। और अगर कविता यह सब दर्ज करती है तो उसे कविता नहीं कहा जा सकता चाहे उसे भगत सिंह या बिस्मिल ही क्यों न गाते हों, चाहे उसे अशफाक उल्ला खाँ ने ही क्यों न लिखी हो। आज भी यही ट्रेंड चल रहा है। और जो इस ट्रेंड से बाहर की कविताएँ लिख रहे हैं उन्हें कविता से बाहर करने की साज़िश वे पूरे धूमधाम से शुरू कर देते हैं। जबकि ट्रेंड के तहत जो कवि लिखते हैं उन्हें विभिन्न साहित्यिक वाद के जरिये मसलन छायावाद, प्रतीकवाद, प्रयोगवाद, नकेनवाद, अकवितावाद, दशकवाद के जरिये साहित्य में ज़िंदा रखने का कुचक्र रचा जाता है।  


1936 के सम्मेलन में जो प्रगतिशील लेखक कवि इकट्ठे हुए थे और जो निरंतर लेखनरत थे उनके लिए कोई वाद नहीं था। जनवादी कविताएँ कही जाती थी लेकिन जनवाद युग जैसा कोई युग नहीं था। इसलिए जनवादी कवि हासिये पर रहने को मज़बूर थे। एकदम टटके युवा कवि के तौर पर नागार्जुन 1936 के सम्मेलन में शामिल हुए थे। उनकी प्रगतिशील कविताओं का संग्रह 'प्यासी पथरायी आँखें' तब आया था जब हिन्दी साहित्य में अकवितावाद का दौर चल रहा था। फिर कौन नोटिस करता नागार्जुन को या उनके इस संग्रह को। यही वज़हें थीं कि नागार्जुन या मुक्तिबोध जैसे सशक्त प्रगतिशील कवियों को भी लंबा संघर्ष करना पड़ा अपनी जगह बनाने में। 


बहरहाल ये जितने साहित्यिक वाद हुआ करते थे उन सबके बनने का अंत एक झटके में नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद हो गया। वाद बनाने की फैक्टरी जो विश्वविद्यालयों में हुआ करती थी वह बंद हो गयी। नक्सलबाड़ी आंदोलन के छप्पन साल हो गये लेकिन इतने दिनों में भी एक भी वाद का  उत्पादन ये नहीं कर पाये। दशकवाद को ज़रूर लाया गया लेकिन जो बेहद मूर्खतापूर्ण और विचारहीन था। यह कौन नहीं जानता कि कवि दशकों में तैयार होते हैं और अपने अंदर शताब्दियों को समाहित किये रहते हैं। इनकी पहचान किसी एक दशक के कवि के तौर पर नहीं की जा सकती है। 


नक्सलबाड़ी आंदोलन की धमक इतनी ज़बरदस्त थी कि इसने भाषा की दीवार तोड़ दी। भारत की समस्त भाषाओं के रचनाकारों ने लिखने की वही एक ज़मीन चुनी। कोई भेद न रहा चाहे वो तेलुगु कवि वरवर राव, श्री श्री हों, या बांग्ला के सरोज दत्त, द्रोणाचार्य घोष, नवारुण भट्टाचार्य हों या पंजाबी के पाश, अमरजीत चंदन या मराठी के नामदेव ढसाल या हिंदी के वेणुगोपाल, गोरख पाण्डेय, आलोकधन्वा हों। यह सब आज इतिहास हो चुका है। 


बहरहाल पिछले दस वर्षों से जो सरकार है अपने यहाँ उसने पूरे देश में हिंदुत्ववाद की आंधी खड़ी कर दी है जिसके सामने सारी संवैधानिक संस्थाएं घुटने टेक चुकी हैं। ऐसे में जब संसद का बचना संभव नहीं हो रहा है तो विश्वविद्यालय क्या बचेंगे। उसका भी भगवाकरण हो चुका है। तो फिर उसकी फैक्टरी से निकलने वाला साहित्य या उसके द्वारा पोषित साहित्य भगवा रंग से अलग कैसे हो सकता है। 


ब्रेष्ट


सभी को एक अदृश्य डर सामने साक्षात खड़ा दिखायी देता है। इस डर के ख़िलाफ़, इस भगवाकरण के ख़िलाफ़, इस फासीवाद के ख़िलाफ़ वही कवि खड़ा हो सकता है जो विश्वविद्यालयों से बाहर होगा, जो हिन्दी के नाम पर चल रहे अकादमियों और संस्थानों से बाहर होगा, जो आउट ऑफ सिलेबस या यों कहिये कि जो आउट ऑफ सिस्टम होगा। आज की कविता वही लिखेगा। आज की कविता वहीं मिलेगी। कैसी होगी आज की कविता? आखिर हमें कैसी कविता चाहिए। 


हमें चाहिए ऐसी कविता

जो दुश्मन तक जाए

उसके सीने में उतर जाए

और बारूद से ज्यादा असर दिखाये। 


हमें चाहिए ऐसी कविता जो शासक को चैन से रहने न दे। जैसा कि ब्रेष्ट कहते हैं - 


मेरे ज़माने में सड़कें दलदलों तक जाती थी

भाषा ने मुझे कातिलों के हवाले कर दिया

मैं ज़्यादा कर ही क्या सकता था

फिर भी शासक और भी चैन से जमे रहते मेरे बगैर

यही थी मेरी उम्मीद।

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