अमरजीत राम की कविताएँ
अमरजीत राम आज़ादी मिलने के दशकों बाद भी हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो आधारभूत सुविधाओं तक से वंचित है। हमारी सामाजिक व्यवस्था की उन असंगतियों ने ही इस व्यवस्था को गढ़ा जिससे ये असमानताएँ आगे चल कर और वीभत्स रूप लेती गयीं। अमरजीत राम अपनी कविताओं में इन विसंगतियों को उभारने का काम करते हैं। यह काम वे अपने तरीके से बिना किसी तल्खी के करते हैं। इस सन्दर्भ में मुझे तुलसी राम और उनकी रचना ' मुर्दहिया ' की याद आयी जिसमें वे अपने अंदाज़ में बिना तल्खी के शोषण की सारी तस्वीर को खोल कर रख देते हैं। अमरजीत के यहाँ दलित बस्ती के उजडने के साथ साथ ‘ टूटी नाव ’, गुब्बारों वाली लडकी , सन्नाटे की चीख जैसी कविताएँ हैं। पहली बार पर आज प्रस्तुत है अमरजीत राम की कविताएँ। अमरजीत राम की कविताएँ दिल्ली दूर है लोग कहते हैं दिल्ली दूर है माँ भी कहती थी साफ़-साफ़ मुहावरे की भाषा में मैं समझा लेकिन देर से। जब पथरा गईं उनकी आँखें पैदल चलते - चलते जब सूख गए उनके कपकपाते होंठ बिन पानी के जब ऐंठ गईं उनकी आँतें भूख की आग से जब सो गए ...