विन्ध्याचल यादव का आलेख 'रेत में आकृतियां : हर नाउम्मीदी के ख़िलाफ़!'
विन्ध्याचल यादव श्रीप्रकाश शुक्ल एक प्रयोगधर्मी कवि हैं। उनकी कविताओं में ठेठ शब्द कविता की जरूरत बन कर आते हैं और पाठक को सहसा चकित करते हैं। आम बोलचाल के भोजपुरी शब्द, जिनका प्रयोग हम आम तौर पर करते हैं श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं में अपनी पूरी गरिमा के साथ आते हैं। ऐसा प्रयोग उनके समकालीन किसी अन्य कवि में नहीं दिखाई पड़ता। रेत में आकृतियां उनका चर्चित कविता संग्रह है। इस संग्रह में वे नदी को दोनों पाटों पर बिखरी रेत को अलग अर्थों में देखते हैं। युवा आलोचक विन्ध्याचल यादव उचित ही लिखते हैं कि इस संग्रह के केंद्र में नदी और रेत के साथ गुंथती मानवीय रचनाशीलता की विविध भंगिमाएं और रूप हैं। इस संग्रह की भूमिका विन्ध्याचल यादव ने लिखी है। ब्लॉग पर हम इस भूमिका आलेख को प्रस्तुत कर रहे हैं। आइए आज हम पढ़ते हैं विन्ध्याचल यादव का आलेख 'रेत में आकृतियां : हर नाउम्मीदी के ख़िलाफ़!' 'रेत में आकृतियां : हर नाउम्मीदी के ख़िलाफ़!' (बनारस के लोक को ग्रसती नव-औपनिवेशिकता का सांस्कृतिक सामना) विन्ध्याचल यादव रेत में आकृतियां। आकृतियां निष्प्राण नहीं। मुर्दों क...