प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘जिंदगी है तो उम्मीद भी’।
स्टीफन हाकिंस के नाम से कौन परिचित नहीं होगा। दुनिया का यह सर्वश्रेष्ठ भौतिकविद अपने जीवट के दम पर आज जीते-जी ही एक किंवदंती बन चुका है। हाल ही में स्टीफन के जीवन पर एक बायोपिक फिल्म बनी है - ‘ द थियरी ऑफ एव्रीथिंग ’ । इस असाधारण फिल्म को जेम्स मार्श ने निर्देशित किया है। फिल्म में एडी की असाधारण भूमिका ने स्टीफन हॉकिंग की जिजीविषा और उसकी उपलब्धियों को मर्मस्पर्शी ढंग से जीवंत कर दिया है। जिस शरीर में दिमाग के अलावा सारे अंग धीरे-धीरे शिथिल पड़ते गये हो वह व्यक्ति गणित और एस्ट्रोफिजिक्स जैसे व्यापक विषय पर लगातार शोध कर रहा हो ऐसा अविश्वसनीय लगने वाला जीवन स्टीफन हॉंकिंग का ही हो सकता है। फिल्म ने इस जिजीविषा और जटिलता को पूरी जीवंतता के साथ रचा है। प्रख्यात इतिहासकार प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा ने इस बायोपिक के बहाने से हाकिंस के जीवन संघर्ष पर रोशनी डालने का प्रयास किया है। तो आइए आज पढ़ते हैं प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा का आलेख ‘जिंदगी है तो उम्मीद भी’। ज़िन्दगी है तो उम्मीद भी प्रोफ़ेसर लाल बहादुर वर्मा आपको पता ही होगा कि साहित्य और कलाएं...