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संतोष भदौरिया का आलेख 'औपनिवेशिकता, प्रतिबंधन और पग-पग प्रतिवाद'

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  सन्तोष भदौरिया भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में प्रेस की भूमिका अहम रही है। शायद ही कोई ऐसा स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हो जो कोई पत्र, पत्रिका न निकालता हो या पत्र पत्रिकाओं में लेख न लिखता हो। इस तरह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बौद्धिक तौर पर भी बेहद जागरूक थे और पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त करते थे। इन्हें दबाने के लिए ब्रिटिश शासन को कई बार दमनकारी कानून बनाने पड़े। फिर भी प्रतिरोध की ज्वाला कभी थमी नहीं, बल्कि प्रतिरोध निरन्तर चलता ही रहा। चांद, स्वदेश, सैनिक, वर्तमान आदि पत्र पत्रिकाओं का प्रतिरोध प्रबल था। कुछ पर ब्रिटिश शासन को प्रतिबंध भी लगाना पड़ा। हिन्दी की प्रतिबंधित पत्रकारिता पर प्रोफेसर सन्तोष भदौरिया का महत्त्वपूर्ण काम है। आज पहली बार पर हम उनका आलेख 'औपनिवेशिकता, प्रतिबंधन और पग-पग प्रतिवाद' प्रस्तुत कर रहे हैं। 'औपनिवेशिकता, प्रतिबंधन और पग-पग प्रतिवाद'                                           संतोष भदौरिया ...