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अष्टभुजा शुक्ल का आलेख 'अथ कुम्भ कथा'

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  अष्टभुजा शुक्ल कुम्भ के आयोजन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व तो है ही इसका दार्शनिक पहलू भी है जो रोचक है। कुम्भ को कुम्हार की सबसे उत्कृष्ट कृति बताते हुए अष्टभुजा शुक्ल ने इसके असीम आयाम की तरफ इशारा किया है और बताया है कि  जिससे भूमि को सींचा जाता है वह हुआ कुम्भ। भूमि जिससे अन्न का उत्पादन होता है और जो जीवन के लिए आवश्यक भी है। भूमि के बिना जीवन की कल्पना सम्भव ही नहीं। खुद मानव की विकास यात्रा भी सरल से जटिलतम रही है। कुम्भ भी जटिलतम का प्रतिनिधित्व करता है। 'महाकुम्भ विशेष' के अंतर्गत अभी तक हम पंकज मोहन, ममता कालिया और निर्मल वर्मा की रचनाएं पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में आज हम चौथी कड़ी प्रस्तुत कर रहे हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कवि  अष्टभुजा शुक्ल का आलेख 'अथ कुम्भ कथा'। महाकुम्भ विशेष : 4 'अथ कुम्भ कथा'             अष्टभुजा शुक्ल   और कोई आए न आए लेकिन कुम्भ आएगा। आषाढ़ में बादल आए न आए, चैत में कोकिल गाए न गाए, शरच्चन्द्र उगे न उगे, वृषराशि में सूर्य तपे न तपे लेकिन कुम्भ आएगा, कुम्भ आ रहा है बल्कि कुम...

हरीश चन्द्र पाण्डे की कविताएँ

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    सामान्य तौर पर केन्द्र अक्सर बनाया जाता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने कृतित्व और व्यक्तित्व के चलते खुद केन्द्र बन जाते हैं। इसके लिए उन्हें किसी कन्धे या सहारे की जरूरत नहीं पड़ती। हरीश चन्द्र पाण्डे ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी कविताओं के द्वारा खुद को साबित किया है। पक्षधर के हालिया अंक में हरीश चंद्र पाण्डे की दस कविताएँ अष्टभुजा शुक्ल की विस्तृत टिप्पणी के साथ प्रकाशित की गई है। हम इस आलेख और कविताओं को साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।  अन्ततः सिर्फ कवि : हरीश चन्द्र पाण्डे अष्टभुजा शुक्ल हिन्दी कविता में जिसे नवें दशक से अभिहित करने की कोशिशें हुईं, उसके कई अब के उल्लेखनीय कवियों की पृष्ठभूमि के केन्द्र में पहले का सांस्कृतिक शहर इलाहाबाद रहा। आशय यह कि तब के कवियों की जनपदीयता भले किंचित् भिन्न रही हो लेकिन उनकी युवा-चेतना और संवेदना का नाभिक अब का प्रयागराज ही रहा। स्वाभाविक रूप से इस कविता पर अस्सी के दशक का प्रभाव और दबाव शुरुआती दौर में दिखा किन्तु कालान्तर में आए वैश्विक परिवर्तनों के मद्देनजर इसने अपने काव्य-प्रत्यय और मुहावरे अर्जित करने और उन्हें व...

अष्टभुजा शुक्ल की कविता 'चैत के बादल'।

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अष्टभुजा शुक्ल हिन्दू पंचांग की शुरुआत चैत के महीने से होती है। चैत का यह महीना किसानों के लिए नई फसलों की सौगात ले कर आता है। सरसों, गेहूँ जैसी रब्बी की फसलें पूरी तरह पक जाती हैं। किसान इन्हें जल्द से जल्द काट कर अनाज और भूसा घर में रख देना चाहते हैं। साल भर के अपने भोजन छाजन का उन्हें इंतज़ाम जो करना होता है। अपने मवेशियों के लिए भूसे का स्टॉक बनाना होता है। लेकिन सब कुछ मन के अनुरूप कहाँ हो पाता है। जब वे अपने खेतों में पकी फसल देख कर उल्लसित होने को होते हैं आसमान पर घिर आते हैं काले कजरारे चैत के बादल। इनका बरसना किसानों के लिए त्रासदी की तरह होता है। बारिश इन फसलों के अन्न को सड़ाने लगती है। किसानों को अपनी मेहनत पर पानी फिरता हुआ सा दिखता है। वे हताश हो इन बादलों को कोसने लगते हैं। वे उन्हें इस बात के लिए भी कोसते हैं कि जब सिंचाई के लिए पानी की जरूरत थी तब आसमान में ये बादल कहीं नहीं दिखते। और जब जरूरत नहीं तब तबाही फैलाने के लिए आ गए। किसानों के इन सूक्ष्म मनोभावों को गँवई कवि अष्टभुजा शुक्ल ने अपनी कविता 'चैत के बादल' में करीने से संजोया है। ...

अष्टभुजा शुक्ल की कविता 'चैत के बादल' पर आशीष मिश्र की एक टिप्पणी

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अष्टभुजा शुक्ल आसमान में उमड़ने घुमड़ने वाले बादल बचपन से ही हमारे मन में अनेकानेक कल्पनाओं को जन्म देते हैं। आकाश में अनेक रुपाकृतियाँ निर्मित करते ये बादल जैसे हमारे सामने एक विविध वर्णी रंग-मंच ही खड़ा कर देते हैं। यही बादल किसानों के मन को कभी हुलसित कर देते हैं तो कभी घोर चिन्ता-फ़िक्र में डाल देते हैं। जीवन से इतने गहरे रूप से जुड़े ये बादल साहित्य खासकर कविताओं में भी अपनी समृद्ध उपस्थिति दर्ज कराते आए हैं। कालिदास के 'मेघदूत' को भला कौन भूल सकता है । इसी क्रम में हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि अष्टभुजा शुक्ल के ‘चैत के बादल’ कविता की याद आती है। हम इस को कविता को मूल रूप में प्रस्तुत करते हुए इस पर लिखी एक सारगर्भित टिप्पणी भी दे रहे हैं जिसे पहली बार के लिए लिखा है युवा आलोचक आशीष मिश्र ने। अष्टभुजा शुक्ल की यह कविता भी हमें आशीष के सौजन्य से ही प्राप्त हुई है ।         चैत के बादल अष्टभुजा शुक्ल   मुँह अन्हारे सन्न मारे गाँव में माया पसारे कहाँ से उपरा गये भड़ुए , अघी ये चैत के बादल! बालियों से झुकी-झपकी-पकी...