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शिवदयाल का आलेख 'आरक्षण : नई वैचारिकी की जरूरत'

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शिव दयाल भारत का संविधान बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि समाज का सबसे निम्नतम तबका अपने को उपेक्षित महसूस न करें। जाति व्यवस्था की विसंगतियों के चलते दलित समाज एक लम्बे समय तक छुआछूत और अस्पृश्यता का शिकार बना रहा। समाज में सामान्य जीवन जीना भी उसे नसीब नहीं हुआ। लेकिन आजादी के पश्चात संविधान बनाते समय इन वर्गों का जीवन उन्नत करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान किया गया। यह बात सच है कि आरक्षण की व्यवस्था ने इन वर्गों को एक बेहतर जीवन प्रदान किया। हालांकि इस व्यवस्था की यह खामी रही कि आरक्षण का लाभ कुछ चुनिंदा जातियों को ही मिल सका। बाकी जातियों के जीवन स्तर में वह सुधार न हो सका जो अपेक्षित था। आजकल आरक्षण को ले कर फिर से बातें चल निकली हैं। जब तक निम्नतम जातियों के साथ भेदभाव बरता जाएगा आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचा नहीं जा सकता। लेकिन यह सुपात्र व्यक्तियों को मिले या उनको मिले जिन्हें इसकी जरूरत है। इन जातियों के उन वर्गों या लोगों को सामने आना ही होगा जिन्होंने आरक्षण का भरपूर लाभ उठाया है। अपेक्षाकृत बदहाल जीवन जीने वाले लोगों को की ज्यादा जरूरत है। इसी संदर्भ में ...