शैलेंद्र शांत की कविताएँ
शैलेन्द्र जी यह पृथिवी अपने विविधवर्णी रंगों की ही बदौलत ही गुलजार है. यहाँ का जीवन भी अद्भुत रूप से सहकारी है. तकनीकी शब्दावली में इसे जैविक विविधता का नाम दिया जाता है. पशु-पक्षी से लेकर पेड़-पौधे तक सहकार का यह जीवन चलता रहता है. कवि शैलेन्द्र प्रकृति के इस नैकट्य को न केवल महसूस करते हैं बल्कि इसे अपनी संवेदनाओं में शिद्दत से दर्ज करते हैं. इसी क्रम में वे अपनी एक कविता में दर्ज करते हैं कि कवि के साथ-साथ गौरैये, कौवे, चूहे, चींटी , मच्छर , झींगुर , कुत्ते-बिल्ली जैसे जीव-जंतु भी पडोसी के चले जाने से हत्चकित, हलकान और परेशान हैं. कुछ इसी तरह के अंदाज वाले कवि शैलेन्द्र की कविताएँ अबकी बार पहली बार के पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं. शैलेंद्र शांत की कविताएँ उनको कहां पता था गर्वित थे सीख कर हुनर डूब-डूब कर खूब-खूब करते हुए भरोसा हाथों के हुनर से नहीं बढ़ता है देश आगे पीछे छूट जाता है उनको कहां पता था कि जब आता है विकास तो बदल जाता है मतलब हास-परिहास का उनको कहां पता था हास को हंस के पंख लग जाते हैं हाथ पर धरे हाथ बैठे तकते हैं...