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यतीश कुमार का समीक्षात्मक आलेख 'रंगों के साथ उसकी खुशबू भी जमी रहती है'।

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    गद्य को लेखन की कसौटी माना जाता है। महाकवि त्रिलोचन कवियों से गद्य वद्य लिखने की बात कहते हैं। एक आलोचक और एक कवि के गद्य में अन्तर सहज ही देखा महसूसा जा सकता है। यतीश कुमार मूलतः एक दृष्टिसंपन्न कवि हैं। इधर उन्होंने कई कालजयी किताबें पढ़ कर न केवल खुद को सम्पन्न किया है बल्कि उसे अपनी कविता में सराहनीय ढंग से दर्ज़ भी किया है। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि आज के अधिकांश रचनाकार अपना लिखने के अलावा दूसरे का लिखा कुछ भी पढ़ने से परहेज करते हैं। वे अपने लिखे में ही भरमते रहते हैं और जल्द ही अपनी श्रेष्ठता का दावा खुद करने लगते हैं। वह श्रेष्ठता जो स्वयं में एक मृगमरीचिका सरीखी होती है। बहरहाल यतीश को पढ़ते हुए आप खुद महसूस करेंगे कि उनका गद्य भी लाजवाब है। बिल्कुल पानी की तरह बहता हुआ काव्यात्मक गद्य , जिसमें उनकी आभा को महसूस किया जा सकता है। महत्त्वपूर्ण किताबें प्रकाशित कर संवाद प्रकाशन ने अल्प समय में ही अपनी एक बेहतरीन छवि बना ली है। हाल ही में संवाद प्रकाशन से राकेश श्रीमाल की एक अलग तरह की किताब आई है ' मिट्टी की तरह मिट्टी ' । इसमें वस्तुतः कलाकार सीरज स...