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सन्तोष दीक्षित के उपन्यास पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा

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  राजनीति भी अपनी तरह से अपने समय का मिथक गढ़ती रहती है। हर पार्टी और राजनीतिज्ञ जो सत्ता पर काबिज होता है, अपने राष्ट्र और समाज को नई दिशा देने का दावा करता है। भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक कांग्रेस शासन में रही और अपने हिसाब से वह सत्ता को संचालित और परिभाषित करती रही। 2014 से भारतीय राजनीति में एक नए युग का आरम्भ हुआ जिसे  'न्यू इंडिया' जैसा एक चमकदार नाम दिया गया है। इस न्यू इंडिया में सब कुछ उलट पलट सा गया है। धर्म का उभार इसका एक प्रमुख अंग है। वैसे भी भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की हमेशा एक नेतृत्वकारी भूमिका रही है। आज इस जाति और धर्म का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ा है। सन्तोष दीक्षित ने अपने उपन्यास 'खलल' के जरिये इस न्यू इंडिया की कवायद को करीने से विश्लेषित करने की कोशिश की है। जितेन्द्र कुमार ने इस उपन्यास की एक विस्तृत पड़ताल की है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं सन्तोष दीक्षित के उपन्यास 'खलल' पर जितेन्द्र कुमार द्वारा लिखी गई समीक्षा 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद'। 'ख़लल : न्यूू इंडिया गढ़ने की क़वायद' जितेन्द्र कुमार  रामर...

जितेन्द्र कुमार का संस्मरण 'प्रतिबद्ध कथाकार-संपादक अनन्त कुमार सिंह'

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अनन्त कुमार सिंह  आज के समय में साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका निकालना एक अत्यन्त दुष्कर काम है। यह एक घर फूंक तमाशा है। साहित्यिक पत्रिका निकालने के लिए जुनून की जरूरत होती है। अनन्त कुमार सिंह में वह जुनून था। एक छोटे से शहर आरा से वे 'जनपथ' पत्रिका का सम्पादन करते रहे। वे एक प्रतिबद्ध कहानीकार तो थे ही, सम्पादन में भी वह प्रतिबद्धता लगातार दिखाई पड़ती है। इस क्रम में वे विचारों को कभी आड़े नहीं आने देते थे। जनवादी लेखक संघ से जुड़े होने के बावजूद 'जनपथ' के सम्पादन में उन्होंने तमाम ऐसे रचनाकारों की मदद ली जो जन संस्कृति मंच या प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े हुए थे। आज जब इंसानियत खत्म होती जा रही है, उनके बारे में कहा जा सकता है कि सही मायने में वे एक इंसान थे। जो उनके पास गया खाली हाथ नहीं लौटा। उनसे जो भी मदद हो सकती थी, वे बढ़ चढ़ कर करते थे। 'जनपथ' के अंकों में उन्होंने तमाम नए रचनाकारों को प्रकाशित किया। समय समय पर उन्होंने कई विशेषांक प्रकाशित किए जो अब हिन्दी साहित्य की धरोहर हैं। वरिष्ठ आलोचक जितेन्द्र कुमार अरसे से 'जनपथ' के सम्पादन से जुड़े रहे ह...

शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'

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भारतीय दर्शन की एक लंबी एवं समृद्ध परम्परा रही है। छठी सदी ई पू में दर्शन की कई ऐसी धाराएं अस्तित्व में आईं जिन्होंने वैदिक दर्शन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्म सर्वाधिक ख्यात हुए। आगे चल कर इसमें संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों आदि की धारा भी समाहित और समंजित हुईं। भारत की समृद्ध चिन्तन परम्परा ने साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया। कवि शिवदयाल एक्टिविस्ट भी रहे हैं। एक तरफ जे. पी. आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है तो दूसरी तरफ भारतीय दार्शनिक धारा से वे प्रभावित रहे हैं। इसका उदाहरण उनकी कविताएं हैं। अनुभव संसार व्यापक होने के चलते उनकी कविताओं में पर्याप्त विविधता दिखाई पड़ती है। वर्ष 2024 में उनका  पहला कविता-संग्रह  'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की समीक्षा की है जितेन्द्र कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'। शिवदयाल की कविताई : सामाजिक स...