विजेंद्र का आलेख 'आज की हिंदी आलोचना का गिरता स्तर'
वागर्थ के दिसंबर अंक में 'लॉन्ग नाइन्टी ज' जैसे एक नवगढ़ित टर्म पर वरिष्ठ कवि विजेंद्र जी का यह सुविचारित आलेख हम 'पहली बार' पर प्रस्तुत कर रहे हैं। बिना किसी टिप्पणी के सीधे यह लेख आपके लिए विशेष तौर पर प्रस्तुत है। आज की हिंदी आलोचना का गिरता स्तर विजेन्द्र मैं कई बार कह चुका हूँ कि खराब आलोचना खराब कविता से ज्यादा खतरनाक है। हानिकारक भी। खराब कविता जब हमारे सामने आती है तो हम उसे छोड़ दूसरी चीज़ पढ़ने लग जाते हैं। कविता का अच्छा बुरा कोई असर हमारे चित्त पर अंकित नहीं होता। यदि होता भी है तो इतना धुँधला कि स्मृति उसे पकड़ नहीं पाती। पर आलोचना में पाठक का पूर्व निर्धारित विश्वास होता है कि जो बात यहाँ कही गई है खूब जाँच-परख कर ही कही गई होगी। क्योंकि आलोचक से अपेक्षा ही यह होती है। यह भी सही है कि किसी समय में बड़े से बड़ा कवि अपने समय की आलोचना से असंतुष्ट रहा है। इस सबके बावजूद ईमानदार आलोचक रहे हैं। हैं। रह...