ममता जयंत का आलेख 'साहस सीमा और संवेदना का समेकन मित्रो'
कृष्णा सोबती आम तौर पर स्त्रियों से हमारा समाज यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी जुबान न खोलें, और दुःख दर्द को अपनी नियति मान कर उसे सह जाएं। अगर वह अपनी बात या व्यथा कहती है तो उस स्त्री को मुँहफट और निर्लज्ज जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। कृष्णा सोबती एक दूरदर्शी रचनाकार रही हैं। हिंदी साहित्य में जब नारी विमर्श का कोई नामलेवा तक नहीं था कृष्णा जी उन विमर्शों को सामने लाती हैं जो स्त्रियों के दुःख दर्द को उजागर करते हैं। वे ऐसी लेखिका हैं जो साहस के साथ स्त्री मन की व्यथा को सामने लाती हैं। ममता जयंत मित्रो मरजानी का पुनर्पाठ करते हुए लिखती हैं 'भारतीय समाज में मातृत्व को इतना अधिक महिमामण्डित किया गया है कि बाँझ स्त्री, चाहे उसके बाँझपन का असली कारण पुरुष ही क्यों न हो, संतान न होने पर दोषी स्त्री को ही ठहराया जाता है, किंतु कृष्णा सोबती की मित्रो एक निर्भीक तथा स्पष्ट बोलने वाली स्त्री है, डर-शर्म उसके यहाँ नहीं हैं। सच कितना भी कड़वा क्यों न हो वह बोले बिन नहीं चूकती। जब परिवार द्वारा उसके मातृत्व पर प्रश्न उठाया जाता है, तो वह खुले शब्दों में अपने पति की कमजोरी तथा नपुसंकता की...