बलभद्र का आलेख 'भोजपुरी के दस कवि'
बलभद्र दुनिया की हर भाषा हर बोली अपना अलग सौन्दर्य होता है। हर बोली अपने लहजे के साथ जीती है। भोजपुरी भाषा ऐसी ही रागात्मक भाषा है, जिसका लहजा सहज ही आकर्षित करता है। लेकिन विद्रूपताओं और विडंबनाओं के ऊपर जब हमला करना हो तो इसकी तल्खी देखते ही बनती है। भोजपुरी के रचनाकार इस मामले में काफी जागरूक हैं। संयोगवश यह भोजपुरी क्षेत्र राजनीतिक जागरूकता का भी क्षेत्र रहा है जिसका प्रभाव भोजपुरी कविताओं में सहज ही दिखाई पड़ता है। बलभद्र भोजपुरी के जाने माने कवि और आलोचक हैं। भोजपुरी की नब्ज पर इनकी सूक्ष्म दृष्टि रहती है। बलभद्र ने इधर भोजपुरी के उन दस कवियों पर बातचीत की है जो उम्दा लिखने के बावजूद चर्चा से प्रायः बाहर ही रहे हैं। आज पहली बार पर हम प्रस्तुत कर रहे हैं बलभद्र का आलेख 'भोजपुरी के दस कवि'। भोजपुरी के दस कवि बलभद्र तनी अरज सुनीं मोरे भइया हो भोजपुरी कविता प जब बात होई त भोजपुर के भोजपुरी कविता प जरूर बात होई भा होखे के चाहीं। भोजपुर के जमीन भोजपुरी कविता खातिर काफी उपज के जमीन ह। भोजपुर के भोजपुरी कविता के एगो महत्वपूर्ण पक्ष ह ओकर जनधर्मी मिजाज। सत्ता से असहमति आ जन आ जन ...