श्रीधर मिश्र की कविताएं
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| श्रीधर मिश्र |
किताबें मनुष्य को सभ्य बनाती हैं। किताबें मनुष्य को वह जानकारियां प्रदान करती हैं जो उसे अपने समय और समाज के प्रति जागरूक करती हैं। किताबें बताती हैं कि अतीत में हमसे किस तरह की चूक हुई और किस तरह हम अपने भविष्य को बेहतर बना सकते हैं। साहित्य हो या ज्ञान विज्ञान किताबों के मार्फ़त ही हम जानकारियाँ प्राप्त करते हैं। छापेख़ाने की खोज ने मनुष्य के जीवन को बदल कर रख दिया था और सही मायने में दुनिया ने तभी आधुनिक युग में प्रवेश किया था। लोगों ने धर्म की आंतरिक दिक्कतों को पहली बार जाना समझा था। श्रीधर मिश्र अपनी कविता में लिखते हैं 'इसमें कुछ दूरदर्शी लोगों का जिक्र है/ जिन्होंने टूटती जमीन की जगह/ आसमान की फ़िक्र की।/ कुछ ने चट्टान के बचाव में/ नदी के जल पर हथौड़े चलाये।' कवि किताबों की ताकत से परिचित है और उन किताबों के उ। आयामों से भी जिनकी इस दुनिया को बेहतर बनाने में भूमिका है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं श्रीधर मिश्र की कविताएं।
श्रीधर मिश्र की कविताएं
यह किताब
यह एक जादुई किताब है
जहाँ से भी पढ़ना शुरू करें
एक नई कहानी खड़ी हो जाती है।
कई दस्तावेज हैं जिन्हें
छिपाने में पीढियां नंगी हुईं।
कहाँ कहाँ चुप्पी के चलते
सभ्यता के दांत हिले
कब एक साथ खाते पीते लोग
एक दूसरे को खाने लगे।
इसमें जिक्र है कई महान यज्ञों का
जब इतिहास की काली खोह से
बरामद हड्डियों पर वर्तमान के
खून से हवन किया गया।
एक पूरा अध्याय है उन चूकों पर
जो एक क्षण में हुईं और
सदियों ने मूल्य चुकाया।
कई रास्तों का पता है इसमें
जिनसे हो कर गुजरने की
हिम्मत नहीं की गई
वरना आज दुनियां कुछ और होती।
इसमें कुछ दूरदर्शी लोगों का जिक्र है
जिन्होंने टूटती जमीन की जगह
आसमान की फ़िक्र की।
कुछ ने चट्टान के बचाव में
नदी के जल पर हथौड़े चलाये।
कुछ लोग सोचते रहे
और उम्र गुजर गयी।
उनकी यादों में कुछ सादे पन्ने भी हैं
जिन पर दीमकों ने काम किया नक्शे बना कर
अजीब रहस्यमय और अबूझ।
कई जरूरी युद्ध जो नहीं लड़े गए
उनका भी जिक्र है यहां
जिनके चलते शान्ति पर्व में
संस्कृति का गर्भपात हो गया।
कुछ धूप के टुकड़े भी गुनाह में शामिल थे।
कुछ पेड़ थे जो
आँधियों को रोकने में शहीद हुए।
कुछ चिड़ियों ने सूरज से पहले
सुबह का पता दिया।
कुछ चीखें हैं कराहें हैं जो
वरक उलटते ही हाथ थाम लेती हैं।
और उभरती है
समय की टूटती देह की आवाज।
जिसमें सुनी जा सकती है
आपके समय की टूट रही देह की
आवाज साफ़ साफ़............
हम मान लेंगे
बहुत चाहा गया
मगर दोस्ती का रक्तचाप गिरता चला गया
बहुत कुछ चाहा गया
मसलन दोस्ती की तस्वीर पर
हाथ फेरते रहने से छाले पड़ी
उँगलियों का इलाज किया जाय
मसलन एक किताब लिखी जाय
जिसमे सामने से दाखिल होने का दरवाजा हो
बहुत चाहा गया कि लिखा जाय पूरा एक खत
भाषा के साम्प्रदायिक तनाव से ऊपर उठ कर
और मौजूद रहा जाय खत के अंतिम शब्द तक
लेकिन नहीं सोचा जा सका समय रहते कि
बिना वजन खोये नही अटा जा सकता लिफ़ाफ़े में।
जिस रस्सी से जमीने बंटती हैं
उसकी मोटाई सौहार्द के सीने में
क्लिफ की तरह चुभ जाती है
कौन आगे आया कौन पीछे हटा
त्रासदी का खाका खींचने का कारोबार चलता रहेगा
भूचाल की फसलें फिर फिर रोपी जायेंगी
और कहा जाएगा हमसे कि हालात सुधरेंगे
और हम मान लेंगे कि
उन्हें न चाहने से बेहतर है
उन्हें चाहते रहना
सजा चाहिए
वैसे भी
बहुत कम जगह बची है
कविता के लिए आज की दुनिया में।
और अब तो बहुत कम
जगह बच रही है
कवि के लिए
कविता में।
मैं नहीं हूँ एक स्त्री
सो नही रच सकता
स्त्री पर कोई कविता।
न ही दलित हूँ
सो नही रखता
दलित की सम्वेदना से
सगे सरोकार का अधिकार।
मैं ठहरा ब्राह्मण।
अपने पूर्वजों के
न जाने कितने झूठे सच्चे
अपराधों का
प्रायश्चित करता हुआ
एक अक्षम्य अपराधी।
अब कविता भी निरापद जगह
नही रही मेरे लिए।
मैं न हिरण हूँ न बाघ
पहाड़ और न नदी,
फिर कैसे लिख सकता हूँ
उन पर कोई कविता।
वाल्मीकि का अवध राजवंशोपाख्यान
बिहारी की नायिका
अब क्या कहा जाय उनके लिए।
कालिदास!
आप तो मनुष्य थे महाकवि
फिर क्यों रच डाले मेघदूत।
निराला!
जो तोड़ रही थी पत्थर
इलाहाबाद के पथ पर
वह दलित थी स्त्री भी।
हद कर दी आपने भी महाप्राण।
आज खड़ा हूँ
साहित्य की खाप पंचायत के सामने
अपने पूर्वज कवियों का प्रतिनिधि मैं
सुनने को उनके सम्वेदना उल्लंघन पर
फैसला।
मुझे क्षमा नही
सजा चाहिए
उनके अक्षम्य अपराधों की
कठोर सजा
उसके एक जोड़ा होठ
रेशमी मुलायम
लिपिस्टिक पुते
उभरे हुए भरपूर उरोज
पीछे की ओर पसरे हुए कसे नितम्ब
वह पहली ही नज़र में भा गयी थी
उसकी आँखों से टपकता था नशा
और फिर जाने कितनी
कल्पनाएं अपना सर उठाने लगी थीं
देखते देखते
उसके अधोवस्त्र कैसे होंगे
कैसे भिंचे होंगे जांघो के बीच
एक जोड़ा होठ।
वह कब की जा चुकी थी
हो चुकी थी आंखों से ओझल
लेकिन कितना कुछ छूट गयी थी
उस जगह जहां खड़ी थी
कुछ देर पहले
उसे पता भी नहीं होगा कि
एक आदमी का जानवर कैसे
उसके भीतर से सर उठा कर
कुलबुलाने लगा था
कहाँ जान पाती हैं लड़कियां समय रहते
वे सिर्फ आदमी को समझने में
लगी रह जाती हैं आदमी
और वे सम्भल भी नहीं पातीं कि
आदमी के भीतर का जानवर
झपट्टा मार देता है।
बच्चा
बच्चा अपने बचपन को
मार कर आदमी बनता है
हर आदमी भूतपूर्व बच्चा होता है
कुछ आदमियों में बचा रह जाता है
उनका बच्चापन ताउम्र
वे होते हैं कच्चे आदमी
और वे कच्चे आदमी ही बचाते हैं
इस पकी हुयी दुनिया को
टूट कर छितराने से
एक ऐसा मौसम जब
रात के बाद सीधे
हो रही हो दुपहर
झुलस रहे हों
पेड़ पौधे चिरई चुरूंग
आग बरस रही हो
आसमान से
नदी सिमट कर
हो चली हो सफेद करधनी सी
हवा से झरते हों अग्निकण
पत्थर के मकान
सुलगते हों भठ्ठी की तरह
मुझे याद आते हैं आज
बचपन के गाँव के वे दिन
जब दुपहरी में हम खेलते थे ओल्हा पाती
नहाते थे पोखरे में
खेलते थे पानी में छप्पक छैया
घनी बाग़ के मुस्टंड पेड़ों से
टकरा कर औंधे मुंह हो जाती थी लू
और लह लह करती दुपहरी
डूब कर पोखरे में हो जाती थी
पानी पानी
अब न बाग़ रहे न वे पेड़
पोखरे को धीरे धीरे जरीब दर
जरीब सहन बना लिया लोंगों ने
प्रधान की मुट्ठी गर्म कर
और आज गाँव उघार हो गया
शहर के एक माचिस की डिबिया से
छोटे से मकान में पड़ा आज
सोचता हूँ ये धरती लौट तो नहीं रही
अपने पुराने आग के गोले में
चलता हूँ जी
आप भी बोलेंगे गर्मी सर चढ़ गयी है इनके
क्योंकि आप तो रहेंगे ही
धरती जब आग का गोला बन कर
दहकने लगेगी तब भी आप रहेंगे
आप को कुछ नहीं होगा भाई
क्योंकि नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः
हर जीवित व्यक्ति को डर लगता है आग से
यह खबर किस ने मेल कर दी सूरज को
कि अब नहीं बचे हैं धरती पर लोग जीवित
ये खबर लीक कैसे हुई
सोचो भाई सोचो।
हिरन
मैं लौटा हूँ
तुम्हारे शहर में
कई बरस के बाद
अपने साथ।
तुम्हारे शहर की नदी
जो कभी मुझमे हो कर बहती थी
बीच में रेत छोड़ कर निकल गयी है
किसी अनाम समुद्र की तलाश में।
हमारे तुम्हारे बीच का हिरन
दम तोड़ चुका है
इस जलती रेत के टीले पर।
जहाँ कहीं बची है
कुछ हंसी की जगह
वहां वहां हवा का विलाप
पहरेदारी में लगा है।
फूल होने का प्रमाण पत्र काँटों को देना है।
समय अपनी कालिख
झड़ता हुआ
तेजी से भाग रहा है
हमारे दिन के नीलेपन से।
घर लिफ़ाफ़े में और रिश्ते
पोस्टकार्ड में तब्दील हो गये हैं।
ऐसे में मुझे ढूंढना है
रात की नंगी जांघ पर
चाँदनी के हस्ताक्षर
और सुबह होने से पहले
छोड़ देना है तुम्हारा पत्थर शहर
अपने हिरन का दाह कर के
इसी बसन्त घाट पर
चुपचाप
नखरे
चुप रहने के सुभीते गए
अब तो बोलना ही होगा
इस चुप्पी का शोर तोडना ही होगा
तोडना ही होगा तिलस्म
जिसका ओट ले कर विपत्तियां कपडे बदल लेती हैं
दुःख की चिड़ियाँ साँसों के बीच
अपना घोंसला बना लेती है
बड़े संकरे रास्ते से आता है दुःख
और जाने के लिए धरती भर का रास्ता मांगता है
सभ्यता के नखरे भी निराले हैं
जब तक शान्तिवाहिनी सीख रही होती है परेड
तानाशाह गुजर चुका होता है
सभ्यता के करघे पर जब तक
बुना जाता है भाषा का गाउन
नंगा सच चौराहा लांघ चुका होता है
उम्र बीत जाती है
एक जिंदगी को साबुत सहेजने में
एक जिंदगी को साबुत बनाए रखने में
टूट फूट जाता है
एक मुकम्मल आदमी
कभी चुप्पी ओढ़ कर
कभी समझौते पहन कर
बचता ही रहता है
मुँह खोलने से
जबकि उसे हवा भी नहीं लग पाती
और दर्ज कर लिया जाता है उसका बयान
इस नए समय में
हरियाली का अहसास
चले जाएंगे
बुरे दिन
जरूर चले जाएंगे
एक दिन
जैसे चले चले गए
अच्छे दिन
बनाये रखना
मुस्कराने का अभ्यास
बचाये रखना एक बार
खुल कर हंसने भर का
सामर्थ्य
ठूंठ के किसी अंतिम तन्तु में भी
जब तक बचा रहेगा
हरियाली का जीवाश्म
बसन्त उसे नकार नहीं सकेगा।
फ्रिज
उन्होंने मुझे देखा
पसंद कर लिया
उन्हें मेरी आवाज पसंद आई थी
हांका लगाने के लिए
मेमना मेरी पीठ पर
बांध दिया गया था
चारा मैं था या मेमना
यह बाघ पर था
मेरे साथ मेमना भी
चीखता रहा सारी रात
लेकिन बाघ नही आया
कभी कभी ऐसा होता है
जानवरों के साथ
पेट भरा होने पर वे टाल देते हैं
खून खराबा
शायद इस लिए भी कि
फ्रिज नहीं होता उनकी मादों में
सभ्य जनों
यह कितनी अच्छी बात है कि
अभी नहीं है फ्रिज
उनकी दुनिया में
वातानुकूलित कक्ष में
मेरे पसीने का
पानी मर गया
और नमक
शोरे की तरह
बदन से झर गया।
अब मैं
मुकम्मल तौर पर
बिना पानी और नमक
का आदमी था।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
परिचय
श्रीधर मिश्र
जन्म - 1 जनवरी 1970
पिता - श्री रमापति मिश्र
माता - श्रीमती अन्नपूर्णा मिश्रा
शिक्षा - स्नातक, बी.टी.सी.
सम्प्रति - सहायक अध्यापक, बेसिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश
साहित्यिक अवदान - आप प्रयोगवादी कविता के कवि श्रीधर मिश्र की प्रकाशित कृतियाँ हैं :
इस सरपत समय में, छूट गया हूँ मैं, वह सुबह कब होगी (काव्य संग्रह)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ से 2019 का "विजय देव नारायण साही" पुरस्कार एवं स्थानीय संस्थाओं द्वारा लगातार सम्मानित।
सम्पर्क
एल.आई.जी.डी. 40
राप्तीनगर फेज-4
पोस्ट-चरगावा
गोरखपुर
मोबाइल - 9450829617, 7703022040
ई-मेल- mishrashridhar70@ gmail.com




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