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निशान्त का आलेख 'रचनाकार का आलोचक होना'

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  रचनाकार और आलोचक के सम्बन्धों पर तमाम बातें पहले भी हो चुकी हैं और आज भी ये बातें निरन्तर जारी हैं। इन दोनों के बीच का सम्बन्ध किसी दुश्मन जैसा नहीं होता बल्कि ये दोनों एक सिक्के के ही दोनों पहलू की तरह होते हैं। हर रचना खुद के लिए आलोचक का बाट जोहती है जबकि हर आलोचना किसी न किसी रचना को केन्द्र बना कर ही आगे बढ़ती है। यानी यह सम्बन्ध अन्योन्याश्रित है। इसी क्रम में कवि निशांत की एक आलोचना पुस्तक 'कविता पाठक आलोचना' हाल ही में सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। इसी कृति को 29वां देवी शंकर अवस्थी सम्मान प्रदान किया गया है। आलोचना की दुनिया में यह प्रतिष्ठित सम्मान है। पहली बार की तरफ से निशांत को बधाई एवम शुभकामनाएं। आज हम इसी पुस्तक का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। सरस आलोचनात्मक आलेखों को विस्तार से पढ़ने के लिए आप इस पुस्तक को मंगवा सकते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  निशान्त का आलेख 'रचनाकार का आलोचक होना'। 'रचनाकार का आलोचक होना'       निशान्त एक किताब (भावन) पढ़ते-पढ़ते मन में प्रश्न उठा कि रचनाकार, आलोचक कब बनता है? कब उसके अंदर आलो...

निशान्त का आलेख 'रचनाकार का आलोचक होना'

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  निशान्त को आलोचना का प्रतिष्ठित देवीशंकर अवस्थी सम्मान 2023 उनकी पुस्तक 'कविता पाठक आलोचना' (सेतु प्रकाशन) पुस्तक पर देने की घोषणा हुई है। निशान्त को आज से पंद्रह साल पहले कविता का भी प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार नामवर सिंह ने उनकी एक कविता 'अट्ठाइस साल की उम्र में' के लिए दिया था। इस तरह एक कवि ने अब आलोचना में भी सक्रिय उपस्थिति दर्ज की है। इस साल के देवीशंकर अवस्थी सम्मान के निर्णायक थे - सर्वश्री सुधीर चंद्र, पुरूषोत्तम अग्रवाल, मृदुला गर्ग, अशोक वाजपेयी और कमलेश अवस्थी। यह देवीशंकर अवस्थी सम्मान का 29वां साल है। निशान्त को पहली बार की तरफ से बधाई एवम शुभकामनाएं। इस सम्मान के अवसर पर उनकी पुस्तक से एक संक्षिप्त आलेख यहां हम दे रहे हैं। 'रचनाकार का आलोचक होना'       निशान्त एक किताब (भावन) पढ़ते-पढ़ते मन में प्रश्न उठा कि रचनाकार, आलोचक कब बनता है? कब उसके अंदर आलोचना का जीव द्रव्य हिलकने लगता है। वह कवि, नाटककार, गद्य लेखक से आलोचना की प्रस्तर प्रतिमा का निर्माण करने लगता है। रचना से दूर जा कर आलोचना के राहों का वह रहबर बन जाता है।  रचना...

निशान्त की कविताएं

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  कविता पर विमर्शों की एक लम्बी श्रृंखला मिलती है, जो कविता के औचित्य को साबित करने के क्रम में व्यक्त की गई होती है। कविता में छंद हो। कविता समझ में आने वाली हो। कविता में बिम्ब हो। आदि आदि... ...। लेकिन मेरे ख्याल से कविता तो वही होती है जो आपको चिन्तन मनन करने के लिए विवश करती है। उसकी पंक्तियां आपके जेहन में बस जाती हैं। कविता तो वही जिसे पढ़ते हुए हम अपने जीवन के अक्स को आसानी से महसूस कर सकते हैं। कविता तो वही जिसे आप एकसुरुकिया नहीं पढ़ सकते, बल्कि आहिस्ता आहिस्ता पढ़ते और आगे बढ़ते हैं। निशांत की कविताएं चमत्कार पैदा नहीं करतीं, न ही इसकी कोई कोशिश वे करते हैं। निशांत की कविताएं कुछ ऐसी मिजाज की ही कविताएं हैं जिसे पढ़ते हुए हम कई बार रुकते हैं, सोचने के लिए विवश होते हैं और वह हमारे जेहन में अपनी जगह बना लेती हैं। आज निशांत का जन्मदिन है।  जन्मदिन की बधाई देते हुए आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं निशांत की कविताएं। निशान्त की कविताएं एडहॉक                    चार महीने हम हँसते है वोगेनबेलिया की तरह चार महीने जीते है अमीबा के ...

बुद्धदेव दासगुप्ता की कविताएं

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  बुद्धदेव दासगुप्ता     11 फरवरी 1945 को पुरुलिया के एक कस्बे में जन्मे फिल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता बांग्ला के एक प्रतिष्ठित कवि थे जिनका फिल्म निर्देशक का व्यक्तित्व ही भारतीय अंतरराष्ट्रीय फलक पर ज्यादा छाया रहा , जबकि वे एक उत्कृष्ट निर्देशक , पटकथा लेखक के साथ - साथ एक बड़े कवि भी थे । उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं जिनमें ' काफिन किंवा सूटकेस ' (1972), ' हिमयुग ' (1977), ' छाताकाहिनी ' (1982) और ' सेबोटेर गान ' प्रमुख हैं। इधर की उनकी कविताएं उनके फिल्म सृजन से भी प्रभावित हुई । यह उनकी स्वयं की स्वीकृति है जो उनके ताजा प्रकाशित संग्रह में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। बुद्धदेव दासगुप्ता की इन कविताओं का अनुवाद किया है कवि निशांत ने। यह कविताएं पहल के 77 वे अंक में प्रकाशित हुई थीं। हम पहली बार पर साभार इन कविताओं को प्रकाशित कर रहे हैं। तो आइए आज पढ़ते हैं बुद्धदेव दासगुप्ता की कविताएं।     बुद्धदेव दासगुप्ता की कवित...