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शिवदयाल का आलेख 'एकला चलो रे.. ताकि पथ नये खुलते रहें'

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गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कविता है : ‘यदि तुम्हारी पुकार पर/ कोई नहीं आता/ अकेले ही चले चलो.....’ यह कविता व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी आकर्षित करती है। हालांकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यह सामाजिकता ही उसे सही मायने में उसे एक मनुष्य बनाती है, लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं जब मनुष्य को अकेले ही आगे बढ़ने का निर्णय लेना पड़ता है। गांधी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। गांधी जी ने हालांकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन अगर हम इतिहास को गौर से देखें तो कई अवसरों पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। यहां तक कि भारत का विभाजन न हो इसे ले कर भी वह अकेले पड़ गए। उनके अलावा अपवादस्वरूप शायद ही कोई ऐसा था जो विभाजन के पक्ष में नहीं था। विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी अकेले चलते रहे। गांधी और गुरुदेव के रिश्ते जगजाहिर हैं। गांधी जी ने रवीन्द्र नाथ को 'गुरुदेव' कहा जबकि रवीन्द्र नाथ ने गांधी जी को 'महात्मा' की संज्ञा दी। आज के दौर में जब अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अवसरवाद जीवन मूल्य बनते जा रहे हैं ऐसे में किसी भी आदर्शवादी व्यक्ति का अकेले पड़ जाना स्व...

शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य से प्रेम का मूल्य रचता मैला आंचल'

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फणीश्वर नाथ रेणु  भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समवेत भारतीय जन के संघर्ष की कहानी रही है। इस संग्राम में सभी वर्गों ने अपनी भूमिका अपने अंदाज में निभाई। मजदूरों किसानों की भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका थी। इन सबको मिला कर ही भारत माता की वास्तविक तस्वीर साकार होती है। फणीश्वर नाथ रेणु अपने उपन्यास मैला आंचल में भारत माता के उस तस्वीर को सामने रखते हैं जिसके बारे में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सोचा तक नहीं था। शिवदयाल लिखते हैं कि "रेणु के कथा साहित्य के मूल में भूमि है। मैला आंचल में भी रेणु जी भूमि की अवस्थिति, भूगोल, उसकी जैविक संपन्नता और मनुज समाज का ऐसा समग्र चित्र खींचते हैं कि मानो उसका भी मानवीकरण कर देते हैं। कहीं-कहीं इस कोशिश में मनोहरी भू-दृश्य भी उपस्थित करते हैं। ऐसी धरती के प्रति अगाध प्रेम उपजता है जिसका मोह छुड़ाए नहीं छूटता।" मिट्टी से मनुष्य का प्रेम पुरातन है जिसे रेणु जी अपने इस उपन्यास में पुनर्रचित करते हैं। आज रेणु जी की पुण्य तिथि पर हम उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं शिवदयाल का आलेख 'मिट्टी और मनुष्य ...

शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'

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भारतीय दर्शन की एक लंबी एवं समृद्ध परम्परा रही है। छठी सदी ई पू में दर्शन की कई ऐसी धाराएं अस्तित्व में आईं जिन्होंने वैदिक दर्शन के समक्ष चुनौती प्रस्तुत किया। इनमें जैन और बौद्ध धर्म सर्वाधिक ख्यात हुए। आगे चल कर इसमें संन्यासियों, वीतरागियों, गोरखपंथियों, कबीरपंथियों आदि की धारा भी समाहित और समंजित हुईं। भारत की समृद्ध चिन्तन परम्परा ने साहित्य को भी काफी हद तक प्रभावित किया। कवि शिवदयाल एक्टिविस्ट भी रहे हैं। एक तरफ जे. पी. आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है तो दूसरी तरफ भारतीय दार्शनिक धारा से वे प्रभावित रहे हैं। इसका उदाहरण उनकी कविताएं हैं। अनुभव संसार व्यापक होने के चलते उनकी कविताओं में पर्याप्त विविधता दिखाई पड़ती है। वर्ष 2024 में उनका  पहला कविता-संग्रह  'ताक पर दुनिया' प्रलेक प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की समीक्षा की है जितेन्द्र कुमार ने। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शिवदयाल के कविता संग्रह पर जितेन्द्र कुमार की समीक्षा 'शिवदयाल की कविताई : सामाजिक सरोकार से वैराग्य तक'। शिवदयाल की कविताई : सामाजिक स...

शिवदयाल का आलेख 'गांधी-लोहिया-जयप्रकाश : तीन द्युतिमान तारे'

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  महात्मा गांधी  अक्टूबर का महीना भारतीय सन्दर्भ में इसलिए उल्लेखनीय है कि इसी महीने की कोई न कोई तारीख भारत की तीन प्रमुख विभूतियों से जुड़ी हुई हैं। ये विभूतियां हैं महात्मा गांधी, राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण। भारतीय इतिहास में इन तीनों का अवदान विशिष्ट है। गांधी जी ने अहिंसा के हथियार से अंगेजों को पराभूत किया। लोहिया जी आजादी के बाद गैर कांग्रेसवाद के जनक थे जबकि जय प्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया जिसने आजाद भारत में पहली बार गैर कांग्रेसी शासन को सम्भव बनाया। कवि एवम विचारक शिवदयाल ने इन तीनों विभूतियों पर एक महत्त्वपूर्ण आलेख लिखा है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  शिवदयाल का आलेख 'गांधी-लोहिया-जयप्रकाश : तीन द्युतिमान तारे'। 'गांधी-लोहिया-जयप्रकाश : तीन द्युतिमान तारे' शिवदयाल भारत के चित्त पर पिछले दो सौ सालों में जिस राजनीतिक व्यक्तित्व का सबसे गहरा, सबसे व्यापक और स्थाई प्रभाव पड़ा है, जो अपने जन्म के डेढ़ सौ वर्ष बाद भी विद्वानों, राजनीतिकों ही नहीं, सर्व सामान्य भारतीय जन की चर्चाओं में रहता है चाहें जिस भी कारण से, वह निर्विवाद रू...