शिवदयाल का आलेख 'एकला चलो रे.. ताकि पथ नये खुलते रहें'
गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की एक कविता है : ‘यदि तुम्हारी पुकार पर/ कोई नहीं आता/ अकेले ही चले चलो.....’ यह कविता व्यक्तिगत तौर पर मुझे काफी आकर्षित करती है। हालांकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यह सामाजिकता ही उसे सही मायने में उसे एक मनुष्य बनाती है, लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ सामने आ जाती हैं जब मनुष्य को अकेले ही आगे बढ़ने का निर्णय लेना पड़ता है। गांधी जी इसके प्रमुख उदाहरण हैं। गांधी जी ने हालांकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन अगर हम इतिहास को गौर से देखें तो कई अवसरों पर उन्होंने खुद को अकेला पाया। यहां तक कि भारत का विभाजन न हो इसे ले कर भी वह अकेले पड़ गए। उनके अलावा अपवादस्वरूप शायद ही कोई ऐसा था जो विभाजन के पक्ष में नहीं था। विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी अकेले चलते रहे। गांधी और गुरुदेव के रिश्ते जगजाहिर हैं। गांधी जी ने रवीन्द्र नाथ को 'गुरुदेव' कहा जबकि रवीन्द्र नाथ ने गांधी जी को 'महात्मा' की संज्ञा दी। आज के दौर में जब अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अवसरवाद जीवन मूल्य बनते जा रहे हैं ऐसे में किसी भी आदर्शवादी व्यक्ति का अकेले पड़ जाना स्व...