संदेश

यश मालवीय लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

यश मालवीय की टिप्पणी 'पंचमी के चाँद की तरह ही रोशन यादों का चिराग'

चित्र
  इलाहाबाद इसलिए आज भी एक जीवन्त शहर है क्योंकि यह मूलतः रचनाकारों का शहर है। रचनाओं में इसकी धड़कन को सहज ही महसूस किया जा सकता है।  एक से बढ़ कर एक नायाब रचनाकारों के तोहफे इस शहर ने समय समय पर दिए हैं। इनमें कई रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्हें पुरस्कार मिलना चाहिए था। नहीं मिला तो भी ये रचनाकार अपनी रचनाओं के बूते जिन्दा हैं। ये ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें पुरस्कृत कर कोई भी सम्मान खुद गौरवान्वित महसूस करता और गरिमा से भर जाता।  इन्हीं इलाहाबादी रचनाकारों की कड़ी में एक  नायाब नाम ममता कालिया का है।  ममता कालिया को आखिरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल ही गया। यह पुरस्कार उन्हें काफी पहले मिल जाना चाहिए था लेकिन जोड़ तोड़ के जमाने में जब पुरस्कार अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं, साहित्य अकादमी सम्मान ने उनसे मिल कर अपना ही मान बढ़ाया है। ममता कालिया और इलाहाबाद एक सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। एक के बिना दूसरे का वजूद ही नहीं। शारीरिक तौर पर आज वे भले ही नोएडा में रहती हों, मन तो उनका पल पल इलाहाबाद में ही रमता है। वे आज भी उतनी ही इलाहाबादी हैं जितना रानीमंडी या मेंहदौरी क...

यश मालवीय के गजल संग्रह पर अनामिका सिंह की समीक्षा

चित्र
कोई भी रचना समकालीन समकालीन यथार्थ को किसी न किसी तरह अभिव्यक्त करती है। यह समकालीनता ही उस रचना को सार्वभौमिकता प्रदान करती है। नवगीतकार यश मालवीय अपने गीतों और गजलों में लोक समस्याओं को करीने से उठाते हैं और अभिव्यक्त करते हैं। हाल ही में यश मालवीय का एक गजल संग्रह 'अनमने राम' प्रकाशित हुआ है। इसकी समीक्षा लिखी है युवा गजलकार अनामिका सिंह ने। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यश मालवीय के गजल संग्रह पर अनामिका सिंह की समीक्षा। ' अनमने राम : दर्द वही अपना, जो दर्द है अवाम का' अनामिका सिंह  18 जुलाई 1962 को यश मालवीय ने लब्धप्रतिष्ठ कवि उमाकान्त मालवीय जी के पुत्र के रूप में जन्म लिया।  गीत संसार में उमाकान्त मालवीय जी ने  जो प्रसिद्धि और स्थान पाया था, उस विरासत को यश मालवीय ने जितनी  शिद्दत से सहेजा, सँवारा, दुलारा वह  दुर्लभ है। उनके लगभग दर्जन भर नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। गीत उनके लिए साँस लेने जैसा है। शायद ही कोई विषय छूटा हो जिस पर उन्होंने गीत न लिखा हो। जीवन के हर पल को उन्होंने गीत में दर्ज़ किया है। लगभग उन्होंने हर विधा को समृद्ध किया, पर...

हेरम्ब चतुर्वेदी के उपन्यास हमीदा बानो बेगम का एक अंश

चित्र
  इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हैं जिनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद वे हमेशा हाशिए पर ही खड़े रहे। इतिहासकार का काम यही होता है कि ऐसे व्यक्तित्वों को वह रेखांकित करे और अपनी लेखनी से उस व्यक्तित्व को जीवन्त कर दे। मुगल काल भारतीय इतिहास का एक चमकदार अध्याय है जिस दौरान भारत न केवल सांस्कृतिक रूप से बल्कि समृद्धि के तौर पर दुनिया के अग्रणी देशों में से एक हुआ करता था। इस काल में कई ऐसी महिलाएं हुईं जिनकी भूमिका शासन सत्ता या सांस्कृतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण थी। नूरजहां, मुमताज महल, जहां आरा के नाम  ऐसे नामों में अग्रणी हैं और इन पर काफी कुछ लिखा भी गया है। लेकिन हमीदा बानो बेगम के बारे में हमें ज्यादा जानकारियां नहीं मिलती। भारतीय इतिहास में हमीदा बानो बेगम एक रहस्य की तरह ही दिखाई पड़ती हैं। इस रहस्य पर से बखूबी पर्दा उठाया है प्रोफेसर हेरम्ब चतुर्वेदी ने। हेरम्ब जी इतिहासकार होने के साथ साथ मंजे हुए साहित्यकार भी हैं। वे कल्पना की उड़ान तो भरते हैं, लेकिन इस उड़ान की मूल जमीन तथ्यपरकता को कभी विस्मृत नहीं करते। यही खूबी उन्हें अन्य रचनाकारों से अलग ख...

यश मालवीय का आलेख 'हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का आज का चेहरा'

चित्र
  यश मालवीय  ग़ज़ल मूल रूप से अरबी साहित्य की काव्य विधा है जो आगे चल कर विभिन्न भाषाओं जैसे फ़ारसी, उर्दू, नेपाली और हिंदी साहित्य में भी बेहद लोकप्रिय हुई। इस विधा में महबूबा से बातें या उसके बारे में बातें की जाती थी। लेकिन हिन्दी ग़ज़ल ने अपना एक नया रास्ता अख़्तियार किया। दुष्यन्त कुमार का गजल संग्रह ‘साये में धूप’ का प्रकाशन एक युगान्तरकारी घटना साबित हुई। अपनी गजलों में दुष्यंत ने वस्तुत: समकालीन सवालों और चुनौतियों से जम कर मुठभेड़ की। इसने भविष्य के लिए वह रास्ता तैयार किया जो उसकी मजबूती बने। आज के मुद्दे गजल की रचनात्मकता का सच बने हैं। हिन्दी गजल की यात्रा पर यश मालवीय ने विस्तार से रोशनी डाली है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं यश मालवीय का आलेख 'हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का आज का चेहरा'। 'हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का आज का चेहरा'                         यश मालवीय  जो ग़ज़ल माशूक़ के जलवों से वाकि़फ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो सुपरिचित ग़ज़लकार अदम गोंडवी का यह शेर सचमुच अब चरितार्थ हो चुकी...

यश मालवीय का आलेख 'महाकुंभ और प्रयागराज'

चित्र
  यश मालवीय  कुम्भ मेला दुनिया का सबसे बड़ा मेला है। इस दौरान गंगा यमुना और संगम की रेत पर तंबुओं का एक बड़ा शहर बस जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार इसे एक जनपद मानते हुए तमाम प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति करती है। करोड़ों लोग यहां आस्था, धर्म और अध्यात्म के समागम को देखने के लिए पधारते हैं। इस मेले की तैयारी साल-दो साल पहले शुरू हो जाती है। सड़कों को बेहतर बनाया जाता है। दीवार को तमाम तरह के चित्रों से सजाया संवारा जाता है। समूचे शहर को झालरों से कुछ इस तरह सजा दिया जाता है जैसे तारों भरा आसमान जमीन पर उतर आया हो। लेकिन इस तैयारी की कीमत तमाम वृक्षों की कुर्बानी दे कर चुकाई जाती है। इस दौरान लगने वाले जाम से शहरवासी त्रस्त हो जाते हैं। गीतकार यश मालवीय ने कुम्भ की इस तैयारी को नजदीक से देखा और महसूस किया है। 'महाकुम्भ विशेष' के अन्तर्गत आज हम पहली बार पर प्रस्तुत कर रहे हैं यश मालवीय का आलेख 'महाकुम्भ और प्रयागराज'। महाकुम्भ विशेष : 14 'महाकुंभ और  प्रयागराज'                                 ...