यश मालवीय की टिप्पणी 'पंचमी के चाँद की तरह ही रोशन यादों का चिराग'
इलाहाबाद इसलिए आज भी एक जीवन्त शहर है क्योंकि यह मूलतः रचनाकारों का शहर है। रचनाओं में इसकी धड़कन को सहज ही महसूस किया जा सकता है। एक से बढ़ कर एक नायाब रचनाकारों के तोहफे इस शहर ने समय समय पर दिए हैं। इनमें कई रचनाकार ऐसे हुए हैं जिन्हें पुरस्कार मिलना चाहिए था। नहीं मिला तो भी ये रचनाकार अपनी रचनाओं के बूते जिन्दा हैं। ये ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें पुरस्कृत कर कोई भी सम्मान खुद गौरवान्वित महसूस करता और गरिमा से भर जाता। इन्हीं इलाहाबादी रचनाकारों की कड़ी में एक नायाब नाम ममता कालिया का है। ममता कालिया को आखिरकार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल ही गया। यह पुरस्कार उन्हें काफी पहले मिल जाना चाहिए था लेकिन जोड़ तोड़ के जमाने में जब पुरस्कार अपनी अहमियत खोते जा रहे हैं, साहित्य अकादमी सम्मान ने उनसे मिल कर अपना ही मान बढ़ाया है। ममता कालिया और इलाहाबाद एक सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। एक के बिना दूसरे का वजूद ही नहीं। शारीरिक तौर पर आज वे भले ही नोएडा में रहती हों, मन तो उनका पल पल इलाहाबाद में ही रमता है। वे आज भी उतनी ही इलाहाबादी हैं जितना रानीमंडी या मेंहदौरी क...