अरुण शीतांश के कविता संग्रह 'एक अनागरिक का दुःख' पर मीरा श्रीवास्तव की समीक्षा 'विस्मृति के गह्वर से गंवई देशज शब्दों को बाहर निकालने की कवि की जिद'।
सार्वभौम होने के लिए स्थानीय होना पड़ता है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि बिना स्थानीय हुए सार्वभौम नहीं हुआ जा सकता। यह स्थानीयता अपने आप में मौलिक और विविधवर्णी होती है। अरुण शीतांश हिन्दी के ऐसे ही कवि हैं जो गहरे तौर पर स्थानीय हैं। इसीलिए उनकी कविताएं बात करती हुई नजर आती हैं। वाणी प्रकाशन से उनका हालिया कविता संग्रह ' एक अनागरिक का दुःख' प्रकाशित हुआ है। मीरा श्रीवास्तव ने इस संग्रह की पड़ताल करते हुए समीक्षा लिखी है। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अरुण शीतांश के कविता संग्रह ' एक अनागरिक का दुःख' पर मीरा श्रीवास्तव की समीक्षा ' विस्मृति के गह्वर से गंवई देशज शब्दों को बाहर निकालने की कवि की जिद'। विस्मृति के गह्वर से गंवई देशज शब्दों को बाहर निकालने की कवि की जिद ("एक अनागरिक का दुःख") मीरा श्रीवास्तव सर्वसम्मत तथ्य है कि तमाम नाउम्मीदियों के हाशिए से ही कविता जन्म लेती है! गहन चुप्पी जब कान को फाड़ने वाले शोर में तब्दील हो जाती है और हम एकबारगी अपने अपने हिस्से क...