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रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी 'सुभान ख़ाँ'

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  रामवृक्ष बेनीपुरी एक समय हुआ करता था जब हिन्दू और मुसलमान दोनों हिलमिल कर रहा करते थे। दोनों के पर्व त्यौहार साझा हुआ करते थे। दोनों के बीच आपसी भाईचारा होता था और दोनों को एक दूसरे पर पूरा पूरा यकीन हुआ करता था। आज ये सब बातें सपना सरीखी लगती हैं। दोनों धर्मों के लोगों के बीच आज सन्देह की बड़ी खाई है।  रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी   'सुभान ख़ाँ' उस स्वर्णिम अतीत की याद दिलाती है जो हमारे देश की थाती हुआ करती थी।  आज  23 दिसंबर को  रामवृक्ष बेनीपुरी की  जयंती है। उनकी स्मृति को हम पहली बार की तरफ से नमन करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  रामवृक्ष बेनीपुरी की कहानी 'सुभान ख़ाँ'। कहानी 'सुभान ख़ाँ' रामवृक्ष बेनीपुरी क्या आपका अल्लाह पच्छिम में रहता है? वह पूरब क्यों नहीं रहता? 'सुभान दादा की लंबी, सफ़ेद, चमकती, रोब बरसाती दाढ़ी में अपनी नन्ही उँगलियों को घुमाते हुए मैंने पूछा। उनकी चौड़ी, उभरी पेशानी पर एक उल्लास की झलक और दाढ़ी-मूँछ की सघनता में दबे, पतले अधरों पर एक मुस्कान की रेखा दौड़ गई। अपनी लंबी बाँहों की दाहिनी हथेली मेरे सिर पर स...