संदेश

कैलाश बनवासी लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कैलाश बनवासी की कहानी 'सही या गलत?'

चित्र
कैलाश बनवासी  जिन्दगी की गाड़ी को सुचारूपूर्वक चलाने के लिए सभी को एक उम्र में रोजगार की जरूरत होती है। देश के अधिकांश युवा सरकारी नौकरियों के लिए दिन रात हाड़ तोड़ परिश्रम करते हैं। लेकिन नौकरियां इनी गिनी होती हैं जबकि आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। रही सही कसर हमारे देश की लचर व्यवस्था निकाल देती है जिसमें पेपर लीक होने से ले कर नियुक्तियों में धांधलेबाजी की समस्या आम है। आजकल के युवा मजाक में कहते भी हैं कि आपलोगों को प्री मेंस और इंटरव्यू देने होते थे। आजकल तो उसमें एक चौथा आयाम कोर्ट भी जुड़ गया है। और कोर्ट जब तक मामला सुलझाए तब तक उम्र बीत जाती है। कैलाश बनवासी की कहानी में एक पात्र आज नौकरियों की हकीकत को कुछ इस तरह बयां करता है : ‘पापा, आप लोगों का ही टाइम अच्छा था,” बेटा अक्सर मुझसे कहता है, “कम से कम जो वेकेंसी निकलती थी, वो फुलफिल तो होती थी! यहाँ तो ढेर सारे प्रॉब्लम्स हैं...। बल्कि पूरी सीरिज है प्रॉब्लम्स की! परीक्षा से ऐन पहले ही पेपर लीक हो जाता है...। मेरे दो इम्पोर्टेंट एग्जाम्स के पेपर लीक हो गए थे और एग्जाम कैंसिल! अगर एग्जाम किसी तरह हो भी गए तो रिजल...

कैलाश बनवासी की कहानी 'बाजार में रामधन'

चित्र
कैलाश बनवासी  कृषि के मशीनीकरण ने आज भले ही बैलों को अनुपयोगी बना दिया हो लेकिन एक जमाना हुआ करता था जब किसान की निधि उनके बैल ही हुआ करते थे। यह मात्र पशु नहीं बल्कि परिवार का सदस्य सरीखा होता था। हालांकि किसानों की स्थिति बत्तीस दातों के बीच जीभ सरीखी होती। किसान की स्थिति अपने घर में भी असहज ही होती। नई पीढ़ी को हल, बैल सब बोझिल लगते और वह आधुनिकता से प्रभावित हो अपना अतीत तक भूलने के लिए तैयार हो जाती। पुरातन आदर्शों से उसका कुछ भी लेना देना नहीं होता। रामधन का छोटा भाई मुन्ना बैलों को बेचने के पीछे का तर्क देते हुए कहता है :  "आखिर ये दिन भर यहाँ बेकार में बँधे ही तो रहते हैं। खेती-किसानी के दिन छोड़ कर और कब काम आते हैं? यहाँ खा-खा कर मुटा रहे हैं ये!"  रामधन अपने ही भाई मुन्ना को समझा नहीं पा रहा था। वह समझा भी नहीं सकता था। अब कैसे समझाता इस बात को कि बैल हमारे घर की इज्जत है... घर की शोभा है। और इससे बढ़ कर हमारे पिता की धरोहर है। उस किसान का भी कोई मान है समाज में, जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं हैं! कैसे समझाता कि हमारे साथ रहते-रहते ये भी घर के सदस्य हो गये हैं। ज...

कैलाश बनवासी की कहानी 'काका के जीवन की एक घटना'

चित्र
  कैलाश बनवासी अभी तक धैर्य, अनुशासन, सहनशीलता और दूसरों का सम्मान जीवन के मूल्य माने जाते थे। समाज में लोगों से इसकी अपेक्षा की जाती थी और प्रायः इसके इर्द गिर्द ही समाज चलता रहता था। लेकिन समय बदला। सोच बदली। और इसके साथ जीवन के प्रतिमान भी बदल गए। अब किसी के पास धैर्य नहीं है। अनुशासन को ताक पर रख दिया गया है। सहनशीलता अतीत की बात हो गई और इसकी जगह हिंसा प्रतिहिंसा ने ले ली है। और सम्मान की तो पूछिए ही मत। साहित्य प्रायः अपने समय को प्रतिबिंबित करता है। कैलाश बनवासी की कहानी  'काका के जीवन की एक घटना' हमारे समय और समाज की सोच को बारीकी से उद्घाटित करती है। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं  कैलाश बनवासी की कहानी 'काका के जीवन की एक घटना'।       'काका के जीवन की एक घटना'                                               कैलाश बनवासी       खोली का माहौल अतिशय गंभीर था। उस खोली में, जहां मैं पिछले तीन साल से कॉलेज की अपनी पढाई पूर...