कैलाश बनवासी की कहानी 'बाजार में रामधन'
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| कैलाश बनवासी |
कृषि के मशीनीकरण ने आज भले ही बैलों को अनुपयोगी बना दिया हो लेकिन एक जमाना हुआ करता था जब किसान की निधि उनके बैल ही हुआ करते थे। यह मात्र पशु नहीं बल्कि परिवार का सदस्य सरीखा होता था। हालांकि किसानों की स्थिति बत्तीस दातों के बीच जीभ सरीखी होती। किसान की स्थिति अपने घर में भी असहज ही होती। नई पीढ़ी को हल, बैल सब बोझिल लगते और वह आधुनिकता से प्रभावित हो अपना अतीत तक भूलने के लिए तैयार हो जाती। पुरातन आदर्शों से उसका कुछ भी लेना देना नहीं होता। रामधन का छोटा भाई मुन्ना बैलों को बेचने के पीछे का तर्क देते हुए कहता है : "आखिर ये दिन भर यहाँ बेकार में बँधे ही तो रहते हैं। खेती-किसानी के दिन छोड़ कर और कब काम आते हैं? यहाँ खा-खा कर मुटा रहे हैं ये!" रामधन अपने ही भाई मुन्ना को समझा नहीं पा रहा था। वह समझा भी नहीं सकता था। अब कैसे समझाता इस बात को कि बैल हमारे घर की इज्जत है... घर की शोभा है। और इससे बढ़ कर हमारे पिता की धरोहर है। उस किसान का भी कोई मान है समाज में, जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं हैं! कैसे समझाता कि हमारे साथ रहते-रहते ये भी घर के सदस्य हो गये हैं। जो भी रूखा-सूखा, पेज-पसिया मिलता है, उसी में खुश रहते हैं। वह मुन्ना से कहना चाहता था, तुमको इनका बेकार बँधा रहना दिखता है मगर इनकी सेवा नहीं दिखती? इनकी दया-मया नहीं दिखती? किसानों पर दलालों का दबाव होता। समाज के वर्चस्वशाली लोगों का दबाव पड़ता जिसके समक्ष किसानों को झुकना ही पड़ता लेकिन कुछेक किसान रामधन जैसे भी होते, जिनके लिए अपना स्वाभिमान सर्वोपरि होता और अपने समय के तमाम दबावों के समक्ष हार नहीं मानते। आज कथाकार कैलाश बनवासी का जन्मदिन है। पहली बार की तरफ से उन्हें जन्मदिन की बधाई एवम शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कैलाश बनवासी की चर्चित कहानी 'बाजार में रामधन'।
'बाजार में रामधन'
कैलाश बनवासी
यह बालोद का बुधवारी बाजार है।
बालोद इस जिले की एक तहसील है। कुछ साल पहले तक यह सिर्फ एक छोटा-सा गाँव हुआ करता था- जहाँ किसान थे, उनके खेत थे, हल-बक्खर थे, उनके गाय-बैल थे, कुएँ और तालाब थे, उनके बरगद, नीम और पीपल थे। पर अब यह एक छोटा शहर है-शहर की सारी खूबियाँ लिये हुए। आस पास के गाँव देहातों को शहर का सुख और स्वाद देने वाला। इसी बालोद के हफ्तावार भरने वाले बुधवारी बाजार की बात है। रामधन अपने एक जोड़ी बैल ले कर यहाँ बेचने पहुँचा था।
बाजार अभी भरना बस शुरू ही हुआ था। वैसे भी ढाई-तीन बजे धूप में खरीदारी करने कौन निकलता है? इसके बावजूद यहाँ चारों तरफ रंगीनी और रौनक है। पता नहीं क्या बात है, रामधन जब भी यहाँ आता है, बाजार और शहर की रौनक को बढ़ा हुआ ही पाया है।
अपने बैलों को ले कर वह उधर बढ़ गया जहाँ गाय-बैलों का बाजार भरता है। बैलों का यह कोई कम बड़ा बाजार नहीं है। बैलों का पूरा हुजूम मौजूद है। दो-ढाई सौ से भला क्या कम होंगे!
रामधन के चेहरे-मोहरे, उसकी चीकट बण्डी और मटमैली धोती- जिसका मटमैला रंग किसी साबुन पानी से नहीं धुलता देख कर कोई भी सहज जान सकता है कि वह किस स्तर का आदमी है। रामधन के बारे में कुछ मोटी-मोटी जानकारी दे देना मैं उचित समझता हूँ। उमर होगी उसकी लगभग बत्तीस साल की। सम्पत्ति के नाम पर दो एकड़ खेत हैं, दो बैल और एक टूटता फूटता पुरखौती कच्चा मकान। परिवार में बुढ़िया माँ है, पत्नी, दो बच्चे और एक छोटा भाई है-मुन्ना। रामधन चौथी कक्षा तक ही पढ़ा हुआ है लेकिन मुन्ना को बारहवीं पास किये हुए दो साल गुजर चुके हैं। रामधन ने अपने छोटे भाई को कॉलेज नहीं पढ़ाया। कुछ तो इसलिए कि उनके सरीखे लोगों के पढ़ने-लिखने से कुछ होता-हवाता नहीं। दूसरी बात और असल बात- वही घर की आर्थिक तंगी। वैसे यह शब्द मैं जानबूझ कर प्रयोग नहीं करना चाहता था, लेकिन मुझे लगता है, यह एक बेहद गम्भीर और संवेदनशील शब्द है। मुझे यह भी लगता है कि दुनिया भर के वक्ताओं ने घसीट-घसीट कर दूसरे तमाम बड़े और महान शब्दों की तरह इसे भी ठस्स और निर्जीव बना डाला है। इसे लिखते हुए मुझे इस बात का डर है कि समाचारों में रोज सुने जाने वाले शब्दों की तरह सस्ता और अर्थहीन न रह जाए।
खैर! तो रामधन और उसकी पत्नी मेहनत-मजूरी कर के ही अपना पेट पाल सकते हैं और पाल रहे हैं। लेकिन मुन्ना क्या करे? वह तो यहाँ गाँव का पढ़ा-लिखा नौजवान है, जिसे स्कूली भाषा में कहें तो देश को आगे बढ़ाने वालों में से एक है। वह पिछले दो सालों से नौकरी करने के या खोजने के नाम पर इधर-उधर घूम रहा है। परन्तु अब वह इनसे भी ऊब चुका है और कोई छोटा-मोटा धन्धा करने का इच्छुक है। लेकिन धन्धा करने के लिए पैसा चाहिए। और पैसा?
"भइया, बैलों को बेच दो!"
मुन्ना ने यह बात किसी खलनायक वाले अन्दाज में नहीं कही थी। उसने जैसे बहुत सोच-समझ कर कहा था। इसके बावजूद रामधन को गुस्सा आ गया, "ये क्या कह रहा है तू?"
"ठीक ही तो कह रहा हूँ मैं। बेच दो इनको। मैं धन्धा करूँगा!"
रामधन को एक गहरा धक्का लगा था- अब यह भी मुँह उठा कर बोलना सीख गया है मुझसे। लेकिन इससे भी ज्यादा दुख इस बात का हुआ कि मुन्ना उसे बेचने को कह रहा है जो उनकी खेती का आधार है। रामधन ने बात गुस्से में टाल दी, "अगर कुछ बनना है, कुछ करना है तो पहले उतना कमाओ! इसके लिए घर की चीज क्यों खराब करता है? पहले कमा, इसके बाद बात करना! हम तेरे लिए घर की चीज नहीं बेचेंगे। समझे?"
लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई। झंझट था कि दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा रहा था।
"आखिर ये दिन भर यहाँ बेकार में बँधे ही तो रहते हैं। खेती-किसानी के दिन छोड़ कर और कब काम आते हैं? यहाँ खा-खा कर मुटा रहे हैं ये!" मुन्ना अपने तर्क रखता।
"अच्छा, तो हमारा काम कैसे चलेगा?"
"अरे, यहाँ तो कितने ही ट्रेक्टर वाले हैं, उसे किराये से ले आएँगे। खेत जुतवाओ, मिंजवाओ और किराया दे कर छुट्टी पाओ!"
"वाह! इसके लिए तो जैसे पइसा-कौड़ी नहीं लगेगा? दाऊ क्या हमारा ससुर है जो फोकट में ट्रेक्टर दे देगा?"
"लगेगा क्यों नहीं? क्या इनकी देख-भाल में खरचा नहीं लगता?"
"लगता है, मगर तेरे ट्रेक्टर से कम! समझे? बात तो ट्रैक्टर की कर रहा है तू, मालूम भी है उसका किराया?"
"मालूम है इसीलिए तो कह रहा हूँ। यहाँ जब बैल बीमार पड़ते हैं तो कितना ही रुपया उनके इलाज-पानी में चला जाता है, तुम इसका हिसाब किये हो? साला पैसा अलग और झंझट अलग।"
"मगर किसी की बीमारी को कौन मानता है?"
"तभी तो मैं कहता हूँ, बेचो और सुभीता पाओ!"
बातचीत हर बार अपनी पिछली सीमा लाँघ रही थी। कहने को तो मुन्ना यहाँ तक कह गया था कि इन बैलों पर सिर्फ तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी हक है।
इस बात ने लाजवाब कर दिया था रामधन को। और अवाक्! कभी नहीं सोचा था उसने कि मुन्ना उसके जैसे सीधे-सादे आदमी से हक की बात करेगा। मुन्ना को क्या लगता है, मैं उसका हिस्सा हड़पने के लिए तैयार बैठा हूँ? रामधन खूब रोया था इस बात पर... अकेले में।
बैल उसके पिता के खरीदे हुए हैं, यह बात सच है। जाने किस गाँव से भाग कर इस गाँव में आ गये थे बैल, तब ये बछड़े ही थे और साथ में बँधे हुए थे। किसी ने पकड़ कर काँजी हाउस के हवाले कर दिया था उन्हें। नियम के मुताबिक कुछ दिनों तक उनके मालिक का रास्ता देखा गया ताकि जुर्माना ले कर छोड़ सकें। लेकिन जब इन्तजार करते-करते ऊब गये और कोई उन्हें छुड़ाने नहीं पहुँचा तो सरपंच ने इनकी नीलामी करने का फैसला किया था। यह संयोग ही था कि रामधन के गॅजेड़ी बाप के हाथ में कुछ रुपये थे। और सनकी तो वह था ही। जाने क्या जी में आया जो दोनों बछड़े वहाँ से खरीद लाया। तब से ये घर में बंध गये और रामधन की निगरानी में पलने लगे। खेत जोतना, बैलगाड़ी में फाँदना, उनसे काम लेना और उनके दाना-भूसा का खयाल रखना, उनको नहलाना-धुलाना और उनके बीमार पड़ने पर इलाज के लिए दौड़-भाग करना-सब रामधन का काम था। तब से ये बैल रामधन से जुड़े हुए हैं। इनके जुड़ने के बाद रामधन इतना जरूर जान गया कि भले ही बेचारों के पास बोलने के लिए मुँह और भाषा नहीं है, लेकिन अपने मालिक के लिए भरपूर दया-मया रखते हैं। इनकी गहरी काली तरल आँखों को देख कर रामधन को यह भी लगता है, ये हमारे सुख-दुख को खूब अच्छी तरह समझते हैं- बिल्कुल अपने किसी सगे की तरह। तभी तो वह उन्हें इतना चाहता है। इतना लगाव रखता है। इन्हें बेचने की बात उठी, तब से ही उसे लग रहा है, जैसे उसकी सारी ताकत जाने लगी है।
रामधन मुन्ना को समझा नहीं पा रहा था। वह समझा भी नहीं सकता था। अब कैसे समझाता इस बात को कि बैल हमारे घर की इज्जत है... घर की शोभा है। और इससे बढ़ कर हमारे पिता की धरोहर है। उस किसान का भी कोई मान है समाज में, जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं हैं! कैसे समझाता कि हमारे साथ रहते-रहते ये भी घर के सदस्य हो गये हैं। जो भी रूखा-सूखा, पेज-पसिया मिलता है, उसी में खुश रहते हैं। वह मुन्ना से कहना चाहता था, तुमको इनका बेकार बँधा रहना दिखता है मगर इनकी सेवा नहीं दिखती? इनकी दया-मया नहीं दिखती?
और सचमुच मुन्ना को कुछ दिखाई नहीं देता। उसके सिर पर तो जैसे भूत सवार है धन्धा करने का। रोज-रोज की झिक झिक से उसकी पत्नी भी तंग आ चुकी है- रोज के झंझट से तो अच्छा है कि चुपचाप बेच दो। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी! मुन्ना कहने लगा है - अगर तुम नहीं बेच सकते तो मुझसे कहो। मैं बेच दूँगा उन्हें बढ़िया दाम में!
.... बाजार की भीड़ अब बढ़ रही है। चारों तरफ शोरगुल और भीड़भाड़। यहाँ की रौनक देख कर रामधन को महादेव घाट के मेले की याद आ गयी। हर साल माघी पुन्नी के दिन भरने वाला मेला। वहाँ भी ऐसी ही भीड़ और रौनक होती है। पिछले साल ही तो गया था उसका परिवार। और पास-पड़ोस के लोग भी गये थे- जितने उसकी बैलगाड़ी में समा जाएँ। सब चलो। पूरी रात भर का सफर था। और जाड़े की रात। फिर भी मेले के नाम पर इतना उत्साह कि सब अपना कथरी-कम्बल सँभाले आ गये थे। रामधन को आज भी वह रात याद है- अँजोरी रात का उजाला इतना था कि हर चीज चाँदनी में नहा-नहा गयी थी-खेत, मेंड़, नहर, पेड़, तालाब... जैसे दिन की ही बात हो।
उनके हँसने-खिलखिलाने से जैसे बैलों को भी इसका पता चल गया था। रात भर पूरे उत्साह और आनन्द से दौड़ते रहे... खन्-खन् खन्-खन्... !
...गाय-बैलों का एक मेला-सा लग गया है यहाँ। हर किस्म के बैल। काले-सफेद, लाल, भूरे और चितकबरे और अलग-अलग काठी के बैल-नाटे, दुबले, मोटे...। ग्राहकों की आवाजाही और पूछताछ शुरू हो चुकी है। बैलों के बाजार में धोती-पटका वाले किसान हैं। सौदेबाजी चल रही है।
रामधन के बैलों को भुलऊ महाराज परख रहे हैं। आस-पास के गाँवों में उनकी पण्डिताई खूब जमी है। चाहे व्याह करना हो, सत्यनारायण की कथा कराना हो, मरनी-हरनी पर गरुड़ पुराण बाँचना हो- सब भुलऊ महाराज ही करते हैं। कुछ साल पहले तक तो कुछ नहीं था इनके पास। अब पुरोहिती जम गयी तो सब कुछ हो गया। खेती-बाड़ी भी जमा चुके हैं अच्छी-खासी।
महाराज बैलों के पुट्ठों को ठीक तरह से ठोंक-बजा कर देखने के बाद बोले, "अच्छा रामधन, जरा इनको रेंगा कर दिखाओ। चाल देख लूँ।"
रामधन ने बीड़ी का धुआँ उगल कर कहा, "अरे, देख लो महाराज... तुमको जैसे देखना है, देख लो! हम कोई परदेसी हैं जो तुम्हारे संग धोखाधड़ी करेंगे।"
रामधन ने बैलों को कोंच कर हकाला, "हो... रे... रे... च्चल!" दोनों बैल आठ-दस डग चले फिर वापस अपनी जगह पर।
भुलऊ महाराज बगुला भगत बने बड़े मनोयोग से बैलों का चलना देख रहे थे। कहीं कोई खोट तो नहीं है! कहने लगे, "देखो भइया, मैं तो कुछ भी चीज लेता हूँ, तो जाँच-परख कर लेता हूँ।"
"देखो न महाराज, रोकता कौन है? न मैं कहीं भाग रहा हूँ न मेरे बैल। अच्छे-से देख लो। धोखाधड़ी की कोई बात नहीं है। फिर बाम्हन को दगा दे कर हमको नरक में जाना है क्या?"
भुलऊ महाराज के चेहरे से लगा, रामधन के उत्तर से सन्तुष्ट हुए। बोले, "अच्छा, अब जरा इनका मुँह खोल कर दिखाओ। मैं इनके दाँत गिनूँगा।"
"अभी लो। ये कौन बड़ी बात है।" रामधन ने बीड़ी फेंक कर अपने बैलों के मुँह खोल दिये। भुलऊ महाराज अपनी धोती-कुरता सँभालते हुए नजदीक आये और बैलों के दाँत गिनने लगे।
दाँत गिनते हुए महाराज ने पूछा, "तुम्हारे बैल कोढ़िया तो नहीं हैं?"
"तुम भी अच्छी बात करते हो महाराज! विश्वास नहीं है तो गाँव में पुछवा लो पाँच-परगट। सब पंच गवाही देंगे!"
"ठीक है भई, ठीक है। मान लिया। अब तुम कहते हो तो मान लेते हैं।" महाराज व्यर्थ ही हँसे, फिर अपने बन्द छाते की नोक को कस कर जमीन में धाँसा-मानो अब सौदे की बात हो जाए। महाराज ने अपने को थोड़ा खाँस-खैखार कर व्यवस्थित किया, फिर पूछा, "तो बताना भाई, कितने में दोगे?"
रामधन विनम्र हो गया, "मैं तो पहले ही बता चुका हूँ मालिक...।"
नाराजगी से भुलऊ महाराज का चन्दन और रोली का तिलक लगा माथा सिकुड़ गया, "फिर वही बात! वाजिब दाम लगाओ, रामधन।"
"बिल्कुल वाजिब लगा रहा हूँ महाराज। भला आपसे क्या फायदा लेना।" रामधन ने उसी नम्रता से कहा।
जाफरानी जर्दा वाले पान का स्वाद महाराज के मुँह में बिगड़ गया। पीक थूक कर खीज कर बोले, "क्या यार रामधन! जान-पहचान के आदमी से तो कुछ कम करो। आखिर एक गाँव-घर के होने का कोई मतलब है कि नहीं? आँय!"
रामधन का जी हुआ कह दे, 'तुम तो लगन पढ़ने के बाद एक पाई कम नहीं करते। आधा-अधूरा बिहाव छोड़ कर जाने की धमकी देते हो अगर दक्षिणा तनिक भी कम हो जाए। गाँव-घर जब तुम नहीं देखते तो भला मैं क्यों देखूँ?' लेकिन लगा इससे बात बिगड़ जाएगी। उसने सिर्फ इतना ही कहा, "नहीं पड़ेगा महाराज, मेरी बात मानो। अगर पड़ता तो मैं दे नहीं देता।"
भुलऊ महाराज अब बुरी तरह बमक गये और गुस्से से उनके पतले लम्बूतरे चेहरे की नरम झुर्रियाँ लहरा उठीं, "तो साले, एक तुम्हीं हो जैसे दुनिया में बैल बेचने वाले? बाकी ये सब तो मुँह देखने वाले हैं। इतना गुमान ठीक नहीं है, रामधन!"
महाराज की तेज आवाज से आस-पास के लोगों का ध्यान इधर ही खिंच गया। रामधन ने इस समय गजब की शान्ति से काम लिया, "मैं कब कह रहा हूँ महाराज। तुमको नहीं पोसाता तो झन खरीदो, दूसरा देख लो। यहाँ तो कमी नहीं है जानवरों की।" इतना तो रामधन भी जानता था कि ग्राहक भले ही गुस्सा हो जाए, बेचने वाले को शान्त रहना चाहिए।
महाराज गुस्से से थरथराते खड़े रहे। कुछ लोग आस-पास घेरा बना कर जमा हो गये, गोया कोई तमाशा हो रहा हो।
इधर-उधर घूम कर सहदेव फिर वापस आ कर खड़ा हो गया था और सारा माजरा देखता रहा था चुपचाप। बोला, "देखो रामधन, तुमको पोसा रहा है तो बोलो, मैं अभी खड़े-खड़े खरीद लेता हूँ।"
रामधन जानता है सहदेव को। यह गाँव-गाँव के बाजार-बाजार घूम कर गाय-बैलों की खरीदारी में दलाली करता है। खरीदार के लिए विक्रेता को पटाता है और विक्रेता के लिए ग्राहक। ये बैल के पारखी होते हैं। सहदेव कुथरेल गाँव के भुनेश्वर दाऊ के लिए दलाली कर रहा है।
रामधन अपने बैलों की तरफ पुआल बढ़ाता हुआ बोला, "नहीं भाई, इतने कम में नहीं पोसाता सहदेव।"
रामधन का वही सधा हुआ और ठहरा हुआ टका-सा जवाब सुन कर जैसे महाराज की देह में आग लग गयी- "देख... देख... इसको! कैसा जवाब देता है? मैं कहता हूँ, अरे, कैसे नहीं पोसाएगा यार? सब पोसाएगा! देख सब जगे सौदा पट रहा है...।" झल्लाहट में महाराज के कत्था से बुरी तरह रचे काले-भूरे दाँत झलक गये।
"मैं तो कह रहा हूँ महाराज। हाथ जोड़ कर कह रहा हूँ।" रामधन ने सचमुच हाथ जोड़ लिये। "आप वहीं खरीद लो!"
अब सहदेव भी बिदक गया, हालाँकि वह शान्त स्वभाव का आदमी है। बोला, "ले रे स्साले! ज्यादा नखरा झन मार! तेरे बैल बढ़िया दाम में बिक जाएँगे। देख, तेरे बैल खरीदने भुनेसर दाऊ खुद आये हैं।"
रामधन ने कुथरेल के भुनेश्वर दाऊ को देखा, जो सामने खड़े थे, सौदेबाजी देखते। अधेड़ दाऊ की आँखों में धूप का रंगीन चश्मा है, सुनहरी फ्रेम का। वे बड़े इत्मीनान और बेहद सलीके से पान चबाते खड़े हैं। भुलऊ महाराज की तरह गँवारूपन्न के साथ नहीं, जिनके होठों से पान की पीक लगातार लार की तरह चू रही है।
रामधन को बहुत असहज लग रहा था... इस भीड़ के केंद्र में वही है। और ऐसा बहुत कम हुआ है। सब पीछे पड़े हैं। एक क्षण को गर्व भी हुआ उसे अपने बैलों पर। उसने बैलों को पुचकार दिया और बैलों की गले की घण्टियाँ टुनटुना उठीं।
अब दाऊ ने अपना मुँह खोला, "देखो भाई, मुझको तो हल-बैल का कुछ नहीं मालूम। मैं तो नौकरों के भरोसे खेती करने वाला आदमी हूँ। बस, हमको बैल बढ़िया चाहिए-खूब कमाने वाला। कोढ़िया नहीं होना चाहिए बैल...।"
रामधन ने अपने बैलों को दुलारा, "शक-सुबो की कोई बात नहीं है दाऊ। मैं अपने मुँह से इनके बारे में क्या कहूँ, गाँव के किसी भी आदमी से पूछ लो, वो बता देगा आपको। आप चाहो तो इनको दिन भर दौड़ा लो, पानी छोड़ कर कुछ और नहीं चाहिए इनको।"
वहाँ खड़े-खड़े भुलऊ महाराज का धैर्य और संयम अब चुकने लगा था। बोले, "तीन हजार दो सौ दे रहा हूँ! नगद! और कितना दूँगा?... साले दो टके के बैल ... आदमी और कितना देगा?"
रामधन अटल है, "नहीं पड़ेगा महाराज! चार हजार माने चार हजार!"
अब महाराज के चेहरे पर गुस्सा, क्षोभ, तिलमिलाहट और पराजय का भाव देखने लायक था। लगता था भीतर ही भीतर क्रोध से दहक रहे हों और उनका बस चले तो रामधन को भस्म कर के रख दें।
अब सहदेव ने कहा, "देखो भाई, तुमको तुम्हारी आमदनी मिल जाए, तुमको और क्या चाहिए फिर?"
"अरे आमदनी की ऐसी की तैसी! मेरा तो मुद्दस नहीं निकलता मेरे बाप।" रामधन भी चिल्ला उठा।
भुलऊ महाराज को इस बीच जैसे फिर मौका मिल गया। अपना क्रोध निगल कर बोले, "ले यार, मैं नगद दे रहा हूँ तीन हजार तीन सौ ! एक सौ और ले लो। ले चल। तुम्हीं खुश रहो। चल अब किस्सा खतम कर...।" भुलऊ महाराज अपनी रौ में रस्सी पकड़ कर बैलों को खींचने लगे, जबरदस्ती...।
महाराज की इस हरकत पर जमा लोग हँस पड़े। सहदेव तो ठठा कर हँस पड़ा, "महाराज, ये दान-पुन्न का काम नहीं है। मैं इनके भाव जानता हूँ। जितना तुम कह रहे हो उतने में तो कभी नहीं देगा! अरे घण्टा भर पहले मैं साढ़े तीन हजार बोला था। एक घण्टा तक इसके कुला में लेवना (मक्खन) लगाया। मुझको नहीं दिया तो तुमको कैसे दे देगा तीन हजार तीन सौ में?"
जमा लोग फिर हँस पड़े। भुलऊ महाराज अपमानित महसूस कर के क्षण भर घूरते रहे। फिर गुस्से से अपना गड़ा हुआ छाता उठाया और चलते बने।
महाराज के खिसकते ही भीड़ के कुछ लोगों को लगा, अब मजा नहीं आएगा। सो कुछ सरकने को हुए। लेकिन अधिकांश अभी-भी डटे हुए थे, किसी नये ग्राहक और तमाशे की उम्मीद में, उन तगड़े सफेद और भूरे बैलों को मुग्ध हो कर निहारते हुए।
तभी भीड़ को चीरता हुआ चइता प्रकट हो गया। चइता इधर का जाना-माना दलाल है। विकट जिद्दी और सनकहा। अपने इस जिद्दी स्वभाव के भरोसे ही वह जीतता आया है। ऐसे सौदे कराने की कला में वह माहिर माना जाता है। सौदेबाजी में सफलता के लिए वह साम-दाम-दण्ड-भेद, हर विधि अपना सकता है। पैर पड़ने से ले कर गाली बकने तक की क्रिया वह उसी सहज भाव से निपटाता है।
उसके आते ही ठर्रे का तीखा भभका आस-पास भर गया। वह सिर में लाल गमछा बाँधे हुए था। अधेड़, काला किन्तु गठीले शरीर का मालिक चइता।
आते ही दाऊ को देख कर कहेगा, "राम-राम दाऊ, का बात है?" वह अपनी आदत के मुताबिक जल्दी-जल्दी बात कहता है।
दाऊ ने अपनी शिकायत चइता के सामने रखी, "अरे देख ना चइता, साढ़े तीन हजार दे रहा हूँ, तब भी नहीं मान रहा है।"
"तुम हटो तो सहदेव, मैं देखता हूँ।"- सहदेव को एक किनारे करता हुआ चइता आगे बढ़ गया। उसने बैलों को देखा और उनके माथे को छू कर प्रणाम किया। और बोला, "ठीक है दाऊ। मैं पटा देता हूँ सौदा। अब चिन्ता की कोई बात नहीं है, मैं आ गया हूँ।"
रामधन ने कहना चाहा कि इतने में नहीं पोसाएगा। लेकिन चइता इससे बेखबर था। उसे जैसे रामधन के हाँ अथवा ना की कोई परवाह ही नहीं थी। वह अपनी रौ में इस समय सिर्फ दाऊ से मुखातिब था, "दाऊ... तुम दस रुपया दो... बयाना... मैं सब बना लूँगा, तुम देखते भर रहो।"
दाऊ ने दूसरे ही पल अपने पर्स से सौ का एक नोट निकाल लिया, "अरे दस क्या लेते हो, सौ रखो।"
रुपये ले कर चइता अब रामधन की तरफ बढ़ा। उसे जबरदस्ती रुपया पकड़ाने लगा, "अच्छा भाई, चल जा। बैलों के पैर छू ले। ये बयाना रख और सौदा मंजूर कर...।"
"कितने में?" - रामधन ने गहरे संशय से पूछा।
"साढ़े तीन हजार में।"
"ऊँ हूँ... नहीं जमेगा।"- रामधन ने स्पष्ट कहा।
अब चइता अपने वास्तविक फार्म में उतर आया, जिद करने लगा, "अरे, रख मेरे भाई और मान जा।"
रामधन ने विनम्र होने की कोशिश की, "नहीं भाई, नहीं पोसाता। देख, मेरी बात मान और जिद छोड़... मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूँ।"
लेकिन चइता भभक गया, "अरे ले ले साले! कितने ही देखे हैं तेरे जैसे! चल रख और बात खतम कर!"
"नहीं नहीं। चार हजार से एक पाई कम नहीं।" रामधन अपनी बात पर अटल था। रामधन को परेशानी में फँसा देख कर सहदेव बचाव के लिए आया और चइता को समझाने लगा, "चइता, जब उसको नहीं पोसाता तो कैसे दे देगा। कुछ समझा कर!"
"देगा! ये देगा और तेरे सामने देगा! तुम देखते तो रहो।" चइता ने जमी हुई नजरों से सहदेव को देखा। वह फिर अपनी जिद पर उतर आया, "ले रख यार और मान जा! जा बैलों के पैर छू ले।"
कोई प्रतिक्रिया रामधन के चेहरे पर नहीं देख कर वह फिर शुरू हो गया, "अच्छा, चल ठीक है! तुम मुझको एक पैसा भी दलाली मत देना। ये लो! तेरे बैलों की कसम! बस्स! एक पैसा मत देना मेरे को! और जो कोई तेरे से पैसा माँगेगा उसकी महतारी के संग सोना! मंजूर? चल...।"
अब रामधन को भी गुस्सा आ गया, "मैं तुम्हारे को कितने बार समझाऊँगा, स्साले! तुमको समझ नहीं आता क्या? नहीं माने नहीं। तू जा यार यहाँ से... जा...!" लेकिन चइता भी पूरा बेशरम आदमी ठहरा। वह इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था, "अच्छा, आखिर मुझको सौ-दो सौ रुपया देगा कि नहीं? आँय? मत देना मेरे को! मैं समझेंगा जुए में हार गया या दारू में फूंक दिया। अरे, मैं पिया हुआ हूँ इसका ये मतलब थोड़ी है कि गलत-सलत भाव करने लगूँगा। मेरी बात मान, इससे बढ़िया रेट तेरे को और कोई नहीं देगा, माँ कसम! धरती दाई की कसम! कोई नहीं देगा!" उसने जमीन की मुट्ठी भर धूल उठा कर माथे पर लगा ली।
लेकिन चइता के इतने हथियार आजमाने के बावजूद वह बेसर रहा। अपनी जिद पर कायम रहा- चार हजार बस्स...।
अब चइता ने हार मान ली। वह गुस्से में फुफकारता और रामधन को अण्ड-बण्ड बकता हुआ चला गया। और भीड़ में खो गया।
चइता के जाते ही भीड़ छँटने लगी। अब वहाँ किसी दूसरे तमाशे की उम्मीद नहीं रही, क्योंकि शाम धीरे-धीरे उतर रही थी। इस समय पश्चिम का सारा आकाश लालिमा से भर उठा था और सूरज दूर पेड़ों के झुरमुट के पीछे छुपने की तैयारी में था। बाजार की चहल-पहल धीरे-धीरे कम हो रही थी।
रामधन ने अपनी बण्डी की जेब से बीड़ी निकाल कर सुलगा ली। वह आराम से गहरे-गहरे कश लेने लगा। तभी सहदेव उसके पास आ गया। उसकी बीड़ी से अपनी बीड़ी सुलगायी। फिर धीरे-धीरे कहने लगा, “ठीक किये रामधन। बिल्कुल ठीक किये। इन साले दाऊ लोगों को गाय-बैल की क्या कदर? साला दाऊ रहे चाहे कुछु रहे- अपने घर में होगा। हम आखिर बैल बेचने आये हैं, किसी बाम्हन को बछिया दान करने नहीं आये हैं। ठीक किया तुमने।"
सुन कर अच्छा लगा रामधन को। उसने सहदेव से विदा माँगी, "अब जाता है भइया, दूर का सफर है। गाँव पहुँचते तक रात-साँझ हो जाएगी। चलता हूँ।" और अपने बैलों को ले कर चल पड़ा।
यह लगातार तीसरा मौका है जब रामधन हाट से अपने बैलों के साथ वापस लौट रहा है- उन्हें बिना बेचे। रामधन जानता है, गाँव वाले उसके इस उजबकपने पर फिर हँसेंगे। घर में पत्नी अलग चिड़चिड़ाएगी और मुन्ना फिर गुस्साएगा।
गाँव के लोगों को जब से इसका पता चला है, वे अक्सर उससे पूछ लेते हैं, "कैसे जी रामधन, तुम तो कल बैल ले कर हाट गये थे, क्या हुआ? बैल बिके के नहीं?"
वे रामधन पर हँसते हैं, "अच्छा आदमी हो भाई तुम भी। इतने बड़े बाजार में तुमको एक भी मन का ग्राहक नहीं मिला!" कुछेक अनुमान लगाते हैं, शायद रामधन को बाजार की चाल-ढाल नहीं मालूम। उसे मोल-भाव करना नहीं आता। उसे अपना माल बेचना नहीं आता। या फिर साफ बात है रामधन को अपने बैल बेचने नहीं हैं।
प्रिय पाठकों, अब आप यह दृश्य देखिए। और सुनिए भी!
रामधन अपने बैलों की रस्सी थामे, बीड़ी पीते हुए चुपचाप लौट रहा है। पैदल। साँझ खूब गहरा चुकी है और अँधेरा चारों ओर घिर आया है। वह किसी गाँव के धूल अटे कच्चे रास्ते से गुजर रहा है। जब आप ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे, वे दो बैल और रामधन नहीं, बल्कि आपस के तीन गहरे साथी जा रहे हैं। हाँ, तीन गहरे साथी। बैलों के गले की घण्टियाँ आस-पास की खामोशी को तोड़ती हुई, उनके चलने की लय में आराम से बज रही हैं- टुन-टुन-टुन-टुन...। क्या आप सिर्फ यही सुन रहे हैं? तो फिर गलत सुन रहे हैं। आप ध्यान से सुनिए, वे आपस में बातें कर रहे हैं...। जी नहीं, मैं कोई कविता या किस्सा नहीं गढ़ रहा हूँ। आपको विश्वास नहीं हो रहा होगा। लेकिन आप मानिए, इस समय सचमुच यही हो रहा है। यह तो समय-समय की बात है कि आपको यह कोई चमत्कार मालूम हो रहा है।
उसके बैल पूछ रहे हैं, "मान लो अगर दाऊ या महाराज तुम्हें चार हजार दे रहे होते तो तुम क्या हमें बेच दिये होते?"
रामधन ने जवाब दिया, "शायद नहीं। फिर भी नहीं बेचता उनके हाथ तुमको।"
"बेचना तो पड़ेगा एक दिन!" बैल कह रहे हैं, "आखिर तुम हमें कब तक बचाओगे, रामधन? कब तक ?"
जवाब में रामधन मुस्करा दिया- एक बहुत फीकी और उदास मुस्कान... अनिश्चितता से भरी हुई। रामधन अपने बैलों से कह रहा है, "देखो... हो सकता है अगली हाट में मुन्ना तुम्हें ले कर आये।"
बीड़ी का यह आखिरी कश था और वह बुझने लगी थी।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)
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