कुमार वीरेन्द्र का आलेख "जन चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' "


कुमार बीरेंद्र 


भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में पत्र पत्रिकाओं की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन पत्र पत्रिकाओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जन चेतना तैयार करने में एक बड़ी भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन इन पत्र पत्रिकाओं को नियंत्रित करने के लिए हमेशा तमाम उपक्रम करता रहा। ऐसे पत्रों में 'चांद' के साथ-साथ 'हिन्दू पंच' नाम भी प्रमुख है। अंग्रेजों ने चांद के फांसी अंक पर तो प्रतिबंध लगाया ही, हिन्दू पंच' के बलिदान अंक को भी जब्त कर लिया। 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' पहले ही उसके पाठकों के हाथों में जा चुका था। इस पत्र ने अपना मुख्य काम कर दिया था। 'हिन्दू पंच' के इस 'बलिदान अंक' को केन्द्रित कर कुमार वीरेंद्र ने एक महत्वपूर्ण आलेख लिखा है जिसे 'उत्तर प्रदेश' के 'जब्तशुदा साहित्य विशेषांक' जनवरी अप्रैल 2023 में प्रकाशित किया गया है। हम इस आलेख को साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। आज कुमार वीरेंद्र का जन्मदिन है कुमार वीरेंद्र की रुचि शोध में है और वह अपने आलेख में शोध पर विशेष ध्यान रखते हैं। वे बिना शोरोगुल के चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। इलाहाबाद में कई एक महत्वपूर्ण आयोजनों को कराकर वे अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दे चुके हैं। उनके जन्मदिन पर हम पहली बार की तरफ से मुबारकबाद देते हैं। तो आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं कुमार वीरेंद्र का आलेख "जन चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' "।


"जन चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' "


कुमार वीरेन्द्र


हिन्दुस्तान के जन-धन के औपनिवेशिक शोषण और राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा का प्रबल स्वर जिन पत्र-पत्रिकाओं में पहले-पहल मुखरित हुआ और जिन्होंने जन-चेतना की निर्मिति और उसे भरपूर अभिव्यक्ति देने में अत्यंत प्रभावशाली भूमिकाएं निभायीं उनमैं 'पयामे आजादी' (उर्दू), 'उदंत मार्तण्ड' (हिन्दी), हिन्दी प्रदीप', 'प्रभा', 'चांद', 'स्वदेश' और हिन्दू पंच' : विशेष रूप से उल्लेखनीय और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।


'हिन्दू पंच' का प्रकाशन सन् 1926 ई. में ईश्वरी दत्त शर्मा के संपादन में कलकत्ता से प्रारंभ हुआ था। 'हिन्दू पंच' का प्रकाशन जब पाँचवें वर्ष में पहुँचा तो 'पहली जनवरी, 1930 को प्रथमांक 'बलिदान अंक' के रूप में निकला। 'बलिदान अंक' प्रकाशित होते ही जब्त कर लिया गया। इसके पहले 'स्वदेश' (गोरखपुर) के 'विजयांक' (1924) और 'चांद' (इलाहाबाद) के 'फाँसी अंक' (1928) की जब्ती हो चुकी थी।


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की दृष्टि से सन् 1920-30 का दशक हलचल, बेचैनी, कार्रवाई, प्रतिक्रिया और अहिंसा के दंड तथा प्रत्यक्ष-परोक्ष लड़ाई का रहा है। इस दशक में गाँधी ने असहयोग आंदोलन (1920) शुरू किया और चौरी-चौरा की हिंसक घटना के कारण इसे 1922 में स्थगित कर दिया। दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस ने संपूर्ण आजादी का प्रस्ताव पारित किया। इस बीच 1925 में काकोरी ट्रेन-डकैती की घटना घटी और इसमें शामिल चार क्रांतिकारियों- प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी को 1927 (दिसंबर) में फाँसी दे दी गई। उधर साइमन कमीशन 1928 में भारत आया, लाहौर में साइमन के विरोध में जबरदस्त प्रदर्शन के नेतृत्वकर्ताओं में से एक लाला लाजपत राय पर इस कदर लाठियाँ बरसाई गई कि उनकी मौत हो गई।


लाला लाजपत राय की मौत का बदला एक माह के भीतर ही लेने के इरादे से भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि ने सांडर्स की हत्या कर दी, फिर छह माह बीतते-बीतते यानि अप्रैल 1929 में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंक दिया। इन बड़ी घटनाओं के दौर में 'हिन्दू पंच' ने भी अपनी रणनीति बदली और 1930 के प्रारंभ होते ही 310 पृष्ठों का विशेषांक निकाल कर पौर्वात्य-पाश्चात्य और राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय बलिदानों तथा मुक्ति आंदोलनों को दृढ़तापूर्वक विस्तार से रेखांकित किया।


इस तरह 'हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' 'चाँद' के 'फाँसी अंक' (1928) की विचार मनोभूमि को आगे ले जाने वाला साबित हुआ। फिरंगी हुक्मरानों को इस विचार सरणी से चिढ़ हो गई। 'बलिदान अंक' उनकी आँखों में इस कदर चुना कि इसकी जब्ती कर उन्होंने इस चुभन के घनत्व को कम करने की कोशिश की।


तत्कालीन हुकूमत ने यह मान लिया था कि 'बलिदान अंक' के बहाने 'हिन्दू पंच' भारतीयों में त्याग और बलिदान की भावना भरने और उनकी राजनीतिक समझ को दिशा देने का प्रयत्न कर रस है। हुकूमत की इस मान्यता के पीछे पर्याप्त आधार थे। 'बलिदान अंक' की भूमिका में संपादक ने 'पाठक पाठिकाओं' को संबोधित करते हुए कहा कि 'यह एक अत्यंत आन्दोलनकारी समय है। इस समय न केवल इस देश में, बल्कि समग्र भूमण्डल पर और समस्त देशों और जातियों में एक अभूतपूर्व अतिक्रांति की उत्ताल तरंग उठी है। प्राचीन परम्पराओं और दासता की जकड़ने वाली रूढ़ियों के विरुद्ध एक घोर विप्लव मचा है।' संपादक ने उम्मीद जतायी कि 'हमें पूर्ण आशा और विश्वास है कि वीरों का बलिदान हमारे देशवासियों को अवश्य ही उत्साहित करेगा।' इस आशा को तत्कालीन हुकूमत ने भारतीयों को उत्साहित करने से ज्यादा उकसाने वाला समझा।


यह ऐसा समय था, जब लाहौर राष्ट्रीय कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास कर रही थी ओर सरकार 'राउण्ड टेबल' का चारा फेंक रही थी। बड़े-बड़े राजनीतिक तथा सामाजिक उलट फेर की आशंका से भरे समय में इस विशेषांक का प्रकाशन एक बड़ी घटना थी और यह घटना देश के स्वाभिमान से युक्त थी। इसे संपादक ने भूमिका में भी रेखांकित किया था-'इस अंक में उन भीमव्रती वीरों तथा हुतात्माओं की स्वर्णमयी स्मृतियों और साहसी कार्यों का रोचक दिग्दर्शन है, जिन्होंने मातृभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के लिये निज प्राणों की बलि चढ़ा दी, पर अपने उज्ज्वल उद्देश्य का कोई अंश भी न छोड़ा। उनके जीवन का उत्सर्ग समस्त मानवजाति का स्वाभाविक अभिमान है और निश्चय ही हमारा भारतवर्ष भी उस अभिमान से वंचित नहीं है।'


'बलिदान अंक' को पाँच उपखंडों में संयोजित-संपादित किया गया था-

1. प्राचीन भारत के बलिदान 

2. मध्यकालीन भारत के बलिदान

3. वर्तमान भारत के बलिदान 

4. कविता खंड और

    5. विदेशों में बलिदान।



हिन्दू पंच' के 'बलिदान अंक' में संपादक ने विवेकसम्मत ढंग से प्राचीन भारत के जिन बलिदानियों के प्रसंग उठाए हैं, वे वेद, महाकाव्य, पुराण आदि से संदर्भित रहे हैं और जिनकी चर्चा लोक-संस्कृति का हिस्सा रही है। मसलन इस खंड में वलि-वामन, प्रहलाद, शिवि, दधीचि, जटायु, भीष्म, हरिश्चंद्र, कर्ण, अभिमन्यु आदि के प्रसंग उठाए गए हैं। इन सभी या ऐसे ही अन्य प्राचीन प्रसंगों को समकालीन संदर्भ में उठा कर देश की जनता में त्याग और बलिदान की भावना उत्पन्न करने का यत्न तो था ही, एक उद्देश्य ब्रिटिश हुकूमत के अहंकार को आत्मघाती और परपीडक साबित करना भी था।


श्रीयुत रामस्वरूप शर्मा ने बलि और वामन की कथा का आधार ले कर 'बलिदान' शीर्षक लेख में अंग्रेजों की साम्राज्य विस्तार नीति को आईना दिखाया है। रामस्वरूप शर्मा लिखते है 'इस कथानक से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि साम्राज्यवाद स्वभावतः राज्यलिप्सा की वृद्धि करता है; साम्राज्यवादी शासक चाहे जितना ही उदार या दानी क्यों न हो, उसे अपने साम्राज्य का एक मद अवश्य होता है और वही मद उसके अन्त का कारण बनता है।' मध्य काल के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने वामन को छली बताया है। 'पदमावत' के 'नागमती वियोग खंड' में जायसी ने हीरामन सुग्गे के छल को बताने के लिए इतिहास पुराण के छलियों-वामन, इन्द्र, जलंधर नाथ, अक्रूर की कथाएं प्रमाण स्वरूप नागमती के मुख से प्रस्तुत करायी हैं- 


'भएठ नारायन बावन करा

राज करत बलि राजा छरा

करन बलि लीन्हेउ करि छद्रं

भारथ लहेउ झिलमिला इंदू'।


वह सुग्गा हीरामन मानो वामन रूपी नारायण बन कर आया और राज करते हुए राजा बलि को छल ले गया। उसने मानो छल करके कर्ण की परीक्षा ली, कवच ले लिया, जिससे कर्ण निष्कवच हो गया और उसके कवच से अर्जुन को आनंद मिला। लेकिन देश की गुलामी के दौर में, इस कथा को संदर्भित करते हुए राम स्वरूप वर्मा ने वामन के कार्य को छल-छद्मपूर्ण न मान कर एक सार्वकालिक आदर्शपूर्ण कार्य माना है। लेखक का विचार है कि 'भगवान यह नहीं देख सकते, कि संसार में साम्राज्यवाद के द्वारा असाम्य की सृष्टि हो और उस असाम्य पर समता की कलई चढ़ाने के लिये वलिदान सम्राट या राजा को समय-समय पर दान देने की आवश्यकता प्रतीत हो।' अपने अपार धन और जन-बल से बलि ने एक-एक बार मर्त्यलोक के सब्र राज्यों पर अपना अबाध आधिपत्य विस्तार कर लिया था। चौबीस घण्टों में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था-ऐसा विस्तृत इनका राज्य था। साम्राज्याधिकार के लिये इन्हें जितना यश मिला था, उतना ही यश उन्हें अपने महान दानों के लिये भी प्राप्त था। अपने असीम साम्राज्य और विशाल दानों के लिये इनके मन में मद एवं अहंकार ने भी घर बना लिया। बलि की राज्य लिप्सा यहाँ तक बढ़ी, कि वे स्वर्ग-राज्य को भी हड़पन का सपना देखने लगे और हड़प भी लिया। महाराज बलि त्रिभुवन-विजयी बन कर दर्प और गर्व से चूर हो रहे थे, तब वामन छल से या कौशल से उसके अन्यायपरक व्यवहार के लिए दंड देने को बाध्य हुए। अंग्रेजों ने जो हड़प नीति अपनायी थी, उसमें कभी सूर्यास्त न होने का अहंकार बोधा निहित था। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने 'भारत दुर्दशा' 1875 में लिखा कि 


'अंग्ररेज राज सुख साज सजे सब भारी

पै धन विदेश चलि जात

दूहै अति ख्वारी' 


दादाभाई नौरोजी ने भी 'अपवाह के सिद्धांत' (ड्रेन थ्योरी) में इस पर (अपने देश का धन विदेश जाने पर) विचार किया था। बाबू बालमुकंद गुप्त ने 17 सितम्बर, 1904 के 'भारत मित्र' में 'वैसराय का कर्तव्य' शीर्षक से तीखा व्यंग्य किया था, इसमें भी बलि का संदर्भ था- 'जिन आडम्बरों को कर के आप अपने मन में बहुत प्रसन्न होते है या यह समझ बैठते हैं कि बड़ा कर्तव्य पालन किया, वह इस देश की प्रजा की दृष्टि में कुछ भी नहीं है। यहाँ की प्रजा ने पढ़ा है कि एक राजा ने पृथ्वी को काबू में कर के स्वर्ग में सीढ़ी लगानी चाही थीं। हस्र क्या हुआ?


'बलिदान अंक' में शिव शंकर मिश्र ने 'सत्याग्रही प्रहलाद' की कथा को शासन द्वारा दी जा रही यातनाओं के संदर्भ में याद किया है और लिखा है कि 'धन्य है ऐसे सत्याग्रही पुरुष को, जिसने सत्य के लिये कठोर-से-कठोर असंख्य यन्त्रणाओं को हँसते-हँसते सहन किया।'


इस अंक में श्रीयुत् नरोत्तम व्यास ने 'दधीचि के देहदान' को त्रिभुवन में अलौकिक और महान त्याग बताया है और लिखा है कि 'आज भी स्वदेश और स्वजाति पर बलि होने वालों में दधीचि प्रथम माने जाते हैं। दधीचि के देह-दान की कथा का संदर्भ लेकर हिन्दू पंच' ने भारतीयों को मातृभूमि और मनुष्य जाति के लिए त्याग करने की प्रेरणा दी। दधीचि ने इन्द्र से कहा था- 'स्वजाति और स्वदेश का दुःख मेरा दुःख है। इसके लिए आत्मार्पण करना मेरा पहला कर्तव्य है। एक दिन इस देह का विनाश अवश्यंभावी है। अतः यह रोग शय्या पर सड़-सड़ कर नष्ट हो, उससे पूर्व तो स्वजाति और स्वदेश के हितार्थ ही त्यागा जाना, इसको अमरता प्राप्त होना है।' श्रीयुत् नरोत्तम व्यास ने अपने लेख में जिक्र किया है कि दानवों द्वारा स्वर्ग पर कब्जा कर लिये जाने से इन्द्र आदि परेशान हो गये। तो विष्णु की शरण में क्षीरसागर पहुँचे। विष्णु ने व्यंग्य के साथ कहा- 'स्वदेश की भक्ति ही जिनका जीवन है, वे भोग और विहारों में अपना समय नष्ट नहीं करते। सम्पत्ति वीरभोग्या है। जो भोगता है, वही प्राण दे कर उसकी रक्षा भी करता है। आप में यदि स्वदेशोद्धार की चिन्ता होती, तो कायरों की भाँति भाग कर मेरे पास न आते, वरन देश के नाम पर अपने को बलि कर देते। परन्तु मालूम है, आपमें वह जीवन ही नहीं रह गया है'। विष्णु ने स्वर्ग के देवताओं को फटकारते हुए धिक्कारा- 'अमृत पी कर जो अमर हो गये हैं, वे ही बलिदान का साहस न कर, आर्त हो कर मेरी शरण ग्रहण करने आये हैं? छिः!'


प्राचीन भारत या कहा जाए कि वेदों-पुराणों से संदर्भित अन्य आलेखों में भी देश-प्रेम, मातृभूमि के लिए त्याग-समर्पण के ही प्रसंग हैं। "विदुला'' (परमानंद जी), 'पक्षिराज जटायु' (दण्डकवासी), 'महाराज हरिश्चन्द्र (हरीकृष्ण शुक्ल), 'दाता कर्ण' (एन. पी. शास्त्री), 'वीर बालक अभिमन्यु (कामता प्रसाद विद्यार्थी) आदि लेख इस दृष्टि से अत्यंत विचारोत्तेजक हैं।


'बीर बालक अभिमन्यु' के लेखक कामता प्रसाद 'विद्यार्थी' ने सवाल उठाया था कि 'क्या आज भारत की माताएँ भी सुभद्रा की तरह अपने प्राण प्यारे पुत्रों को स्वदेश, स्वजाति और स्वराष्ट्र के लिये नहीं त्याग सकतीं? क्या वे भी सुभद्रा की तरह अपनी आँखों के तारे प्यारे बच्चों में उनके कर्तव्य कर्म का भाव जागृत नहीं कर सकतीं? आज देश, जाति और राष्ट्र उनसे बलिदान माँग रहे हैं। क्या वे इनका बलिदान नहीं करेंगी? क्यों नहीं करेंगी?'


इस अंक में मध्यकालीन भारत के बलिदान और बलिदानियों पर भरपूर सामग्री संयोजित की गई है। ऐसे बलिदानों और बलिदानियों में महाराणा प्रताप, शिवाजी, राणा संग्राम सिंह, महारानी लक्ष्मी बाई, महारानी पद्मिनी, रानी दुर्गावती, वीर-धात्री पन्ना, वीरवर हमीर, गोरा और बादल, बन्दा वैरागी, हाड़ा रानी, वीर मुरली मनोहर, मंगल पाण्डेय, तौतिया भील, गुरु अर्जुन देव, गुरु तेग बहादुर, पीर अली, नाना साहब, देवी मैना, गुरु गोविन्द सिंह, बाबू कुँवर सिंह आदि पर जिस निर्भीकता और बेबाकी से लेख छापे गये थे, अंग्रेजों को नाराज कर देने के लिए काफी थे और भारत की जनता स्त्री-पुरुषों की चेतना को झकझोरने वाले थे। बर्नरलैण्ड को उद्धृत कर कहा गया कि 'किसी जाति या राष्ट्र के निर्माण कार्य में जितनी सहायता पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियाँ उनकी अपेक्षा किसी तरह कम सहायता नहीं कर सकतीं।' श्रीराम तीर्थ के कथनों को प्रकाशित किया गया- 'बलिदान होने वाली वीरात्माएँ जितनी संयमी और दृढ़ निश्चयी होती हैं उतनी ही वे शुरू और पवित्र भी होती हैं।'


वर्तमान भारत के बलिदान अखंड के अंतर्गत वारीन्द्र कुमार घोष, यतीन्द्र नाथ मुकर्जी, राम प्रसाद 'बिस्मिल', मास्टर अमीर चन्द, पुलिन बिहारी दास, अशफाक उल्ला खाँ, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह, रास बिहारी बोस, शचीन्द्र नाथ सान्याल, मन्मथ नाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, लाला लाजपत राय, स्वामी श्रद्धानन्द, यतीन्द्र नाथ दास आदि को वैचारिक प्रबुद्धता, राजनीतिक प्रतिबद्धता और जन पक्षधरता के साथ चित्रित किया गया है। इनके बलिदानों को पढ़ कर समाज में बेचैनी और आक्रोश का उपजना सहज संभाव्य था।


कविता खंड के अंतर्गत बीसियों कविताएं संकलित हैं, जिनके पढ़ने मात्र से वीर रस का उद्रेक लाजिमी था। कुछ कवियों ने भारत माता के रूपक को आधार बना कर माँ के प्रति संतानों के कर्तव्य की याद दिलायी तो कुछ कवियों ने पुराने रण-बाँकुरों के रण-कौशल और पराक्रम का बार-बार स्मरण किया-कराया


'बलिदान अंक' का एक महत्वपूर्ण भाग विदेशों में बलिदान पर केन्द्रित है और इसके अंतर्गत कार्ल मार्क्स, लेनिन, सन यात सेन, ईमोन डी वेलरा, रोरी ओकनोर, कौलिन्स और श्रिफिथ, चिआंग काई शेक, जगलूल पाशा, वेजेटी और सेक्को आदि के योगदानों को प्रखर विचारवानता के साथ रेखांकित किया गया है। अन्याय, शोषण, विषमता और पाखंड का प्रबल प्रतिरोध करने वाले इन मशहूर शख्सियतों की वैश्विक संदर्भ में महती भूमिकाओं की गहन पड़ताल की गई है। दुनिया के पीड़ितों, वंचितों, निर्दोषों के लिए ये शख़्सियतें किस कदर प्रेरणा का स्रोत रही हैं इसे हिन्दू पंच' ने खूबसूरती के साथ उद्घाटित किया है।


इस अंक में, लेनिन की धर्मपत्नी, आयरिश विद्रोह में स्त्रियों की उत्तेजना, जलियांवाला बाग का एक दृश्य, मदन लाल ढींगरा के अंतिम हृदयोद्गार, यतीन्द्र नाथ मुकर्जी की धर्मपत्नी शीर्षक लेखों में क्रांति की चिनगारियाँ बिखरी पड़ी हैं। और यह अकारण नहीं है। हिन्दू पंच' ने 'टाइटिल पृष्ठ' पर ही 'विचित्र बलिदानी वीर' शीर्षक कविता प्रकाशित की थी, जिसके रचयिता कवीन्द्र रसिकेन्द्र के माध्यम से अपना उद्देश्य स्पष्ट किया था- 'क्रांति के प्रकाशक हैं, भ्रांति के विनाशक हैं। शांति के उपासक हैं, क्रांति के पुजारी हैं।' साधारण भारतवासियों ने अपने आलस्य और अविवेक से बलिदान का महत्व बहुत कुछ भुलाना चाहा तो हिन्दू पंच' ने 'बलिदान अंक' निकाल कर जन जागरण का काम किया। 'बलि-वेदी पर' शीर्षक संपादकीय में हिन्दू पंच' ने जनता को उसके कर्तव्यों का बोध कराया और 'स्वतंत्रता' को अंतिम ध्येय करार दिया 'जहाँ धुँआधार गोलियाँ चल रही हैं और हवाई जहाजों से बम बरसाये जा रहे हैं, जहाँ दीन अनाथों के रक्त से भूमि सींची जा रही है, वहाँ आ कर वीरों को खड़ा होना होगा। इस कर्तव्य-पालन के लिये तुम्हें समस्त यातनाएँ सहन करते हुए, चुपचाप बलि चढ़ जाना होगा और इसका पुरस्कार होगा-'स्वतन्त्रता'।


हिन्दू पंच' ने भारत के युवकों का आह्वान किय 'देश के नौजवानों! उठो, जागो और माता के लिये अगणित बलिदान देने को तैयार हो जाओ! एक बार आया हुआ अवसर फिर नहीं आता। तुम सच्चे आशावादी हो और याद रहे, कि तुम कभी निराशा न होगे !'


इस प्रकार हिन्दू पंच' का 'बलिदान अंक' भले ही ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जब्त कर लिया गया था, पर हकीकतन भारत की जनता की चेतना के निर्माण का दहकता दस्तावेज साबित हुआ। जब्त होते-होते इसकी प्रतियाँ इसकी प्रतियाँ देश के कई हिस्सों में पहुँच चुकी थी, रगों में रक्त की तेजी और बाँहो फड़कन पैदा कर इसने जन-जागरण में अहम भूमिका निभायी।


सम्पर्क


हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

प्रयागराज-211002


मो. : 9955971358

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