अवन्तिका राय की लघु कथाएं


अवन्तिका राय


रोजी रोटी के लिए विस्थापन उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड के लोगों की जैसे उनकी नियति ही है। इन लोगों को समवेत रूप में बिहारी कहा जाता है। जैसे बिहारी होना अपराध हो। आमतौर पर उनके बारे में उनके इलाके के लोगों की राय होती है कि वह खुशकिस्मत है। दूसरी जगह जा कर अच्छे से कमा खा रहा है। लेकिन उसकी दिक्कतें क्या हैं, कैसी हैं, इससे भला किसी को क्या लेना देना? तमाम संसाधन होने के बावजूद उत्तर भारत के ये राज्य पिछड़े होने के लिए अभिशप्त हैं। यहां के जनप्रतिनिधि तमाम तरह से जनता को भरमा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब में अक्सर इन लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है लेकिन ये लोग जैसे जहर पी कर अपना जीवन बिताने के अभ्यस्त हो जाते हैं। अवन्तिका राय अपनी लघु कथा पन्द्रह अगस्त में इस पीड़ा की एक बानगी करीने से व्यक्त करते हैं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं अवन्तिका राय की लघु कथाएं।



अवन्तिका राय की लघु कथाएं 



कहानी सांढ़ और बंदरों की 


एक सांढ़ मन्थर गति से चलते हुए जंगल में विचरण कर रहा था।  जैसा कि दिखता ही है, उसका अंडकोश बड़हल फल के मानिंद धरती की तरफ लटका हुआ था। उस जंगल में प्रचुर मात्रा में भंग के समगुणी फल थे और वन के बन्दर उनका सेवन कर बौराए रहते थे।

    

हुआ यह कि भंग आदि का सेवन किए हुए कुछ बंदरों की नजर सांढ़ के अंडकोष पर पड़ी। बंदरों ने सोचा, क्या ही सुदिन आए कि ऐसा पका फल भी देखने को मिल रहा है। मन ही मन विचारा की इसकी अवस्था टपकने वाली ही है। वे सांढ़ के पीछे हो लिए। फिर बंदरों में कम्पटीशन छिड़ा की कौन पहले इस स्वादिष्ट फल को प्राप्त कर ले। इस प्रकार सांढ़ आगे आगे और बंदरों का झुंड इस आस में की फल, अब टपका तब टपका, उसके पीछे पीछे। सांढ़ को भी खेल में मजा आने लगा। एकाध बंदरों का गलबहियां भी करता दिखा। 

      

पर जनाब, वह दुर्लभ फल क्या किसी को आज तक मिला जो बंदरों को मिल जाता। निराश हो उन भंग पीए बंदरों ने थक हार कर सांढ़ का पीछा करना छोड़ दिया।

       

कभी कभी सोचिए तो लगता है कि हम सब वही भंग पिए बन्दर हैं। सबका काम्य कोई न कोई मनहर अण्डकोष है जिसका पीछा करता हुआ वह चलता चला जा रहा है। इस विराट सृष्टि में ऐसे अण्डकोषों की भी कितनी महत्ता है, वरना तो यह धरती थम ही जाए। और स्वयं धरती भी तो किसी का चक्कर काट ही रही है न, जनाब!



पन्द्रह अगस्त


पिछले चार साल से मैं उसकी गुमटी पर खैनी, पान के लिए जाता हूँ। पहले उसका पिता और वो मिल कर गुमटी सम्भालते थे। अब दोनों में से कोई एक ही रहता है।

    

झारखण्ड के किसी दूरदराज के गांव से वे दोनों रोटी की टाह में यहां आए। कालोनी, नई नई बस रही थी और उसके सर्वाधिक व्यस्त नुक्कड़ का अनुमान ले उन दोनों ने कोने में अड्डा जमा लिया।

    

उसके पिता घुटे हुए वणिक हैं, दुनियावी बारीकियों की पैनी समझ रखने वाले, ऐसा उनसे बात बात में पता चला। बहुत कम बोलना, जहां जरूरी हो टाइट हो जाना, जो सदय हों उनसे मुस्कुराकर मिलना, पैसे कौड़ी को ले कर अतिरिक्त सजग जैसी खूबियों से भरे हुए। एक दिन बात बात में उन्होंने बताया कि वह रात को तीन से चार घण्टे बमुश्किल सो पाते हैं।


गांव में एक भरे पूरे परिवार की पालनहार, यही एक गुमटी।

     

गुमटी में मजदूर वर्ग की आय को ध्यान में रखते हुए किसिम किसिम की मिठाईयां, बिस्किट, नमकीन, टॉफी आदि।

      

मैं उनकी दुकान पर प्रायः रोज ही जाता हूँ। आजकल महीनों से दुकान सम्भालते उनका लड़का ही मिलता है। चेहरे पर एक गहरी ऊब पुती रहती है। उसकी शादी पिछले एक दो साल पहले ही हुई है। कान में मोबाइल सटाए, अनिच्छापूर्वक मशीनी गति से हाथ चलाता हुआ। गुमटी को वहां टिकाए रखने के लिए तरह तरह के पापड़ उसने बेले। साल में एकाध महीने अपने देश हो आने की उम्मीद में वह बाकी समय जैसे तैसे काटता रहता। सुबह पांच बजे गुमटी पर आ जाना और रात में ग्यारह बारह बजे रूम पर जाना। उसी बाकी समय में भात पकाना, खाना और शेष दिनचर्या।

     

एक दिन, जब गुमटी पर उसके पिता थे, मैंने उन्हें खाते हुए देखा। कटोरे में मोटा भात और कुछ तरल पदार्थ। आज पन्द्रह अगस्त के दिन न जाने क्यूं उन दोनों का चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम गया, जो बकौल उसके पिता, अपने झारखण्ड में खुशकिस्मत समझे जाते हैं।





अपेक्षा का भार


रात का समय है, शायद पापा के ऑफिस से लौटने का समय।


चुन्नू अचानक से हिंसक हो उठता है। ममा बताती है कि यह रोज इसी समय ऐसी हरकत करता है। इसे डॉक्टर को दिखाना है। अब चार साल का एक नन्हा मुन्ना हिंसक हो कर भी भला क्या कर पाएगा?, ज्यादा से ज्यादा चीखने, कुछ नोचने-फाड़ने के सिवा। तो वह ममा को आँखे दिखा यही सब करता है।


दरअसल भोपाल में मेरे घर चुन्नू और उसकी माँ मेहमान स्वरूप ठहरे हुए हैं। वह दोनों दिल्ली से आए हुए हैं। बकौल उसकी ममा दिल्ली के प्रदूषण ने उन्हें धक्का मार कर प्रकृति के बीच बसे  इस नायाब शहर की तरफ मोड़ दिया जहां वह मेजबान के दुगुने से भी बड़ा मकान खरीद कर अपनी छुट्टियां मनाया करेगी।


चुन्नू एक काश्मीरी नाक नक्श के बच्चे सा, जिसके गाल पर हँसते ही गुलाब खिल जाएं, बड़ा ही प्यारा बच्चा है। मां भी गोरी चिट्टी और पिता का तो कहना ही क्या? मुझसे जल्दी ही वे दोनों घुल मिल गए हैं। भगवान ऐसे पेइंग गेस्ट सबको दें।


चुन्नू से खेल खेल में मैं पूछता हूँ, 'पापा और ममा में आपको कौन ज्यादा प्यार करता है?' वह लगभग चिल्लाते हुए कहता है, 'डैडी......*' जैसे यह तो मुझे पता होना ही चाहिए। मेरी दिलचस्पी बढ़ जाती है।


बुकिंग के दूसरे दिन मैं दिन भर किराए की गाड़ी चला कर हारा थका घर पहुंचता हूँ तो ममा को अपनी थकी हारी बीबी से किचन में गपियाते पाता हूँ। चुन्नू एक काल्पनिक दुश्मन के साथ लड़ रहा होता है और मेरे तकिए पर मुट्ठियाँ भांज रहा होता है। दीवार पर टँगी महावीर स्वामी की फोटू की तरफ इशारा करते हुए चुन्नू से पूछता हूँ कि यह किसकी तस्वीर है। चुन्नू जवाब देता है कि रामलला की है। मैं उसे तसवीर के बहाने उस जैन मुनि के विषय में एक बालकथा सुनाने को ही होता हूँ कि ममा चीखते हुए कमरे में इंट्री लेती है, 'फिर से देखो, गन्दे बच्चे। तुम्हें मैंने राजस्थान ट्रिप पर इनकी मूर्ति दिखा बार बार याद कराया था। जल्दी बताओ!' मैं सकपका जाता हूँ। ममा की आँखों में मैं जैसे दिल्ली का समूचा गुस्सा देखता हूँ। 


बात खत्म हो जाती है। गेस्टहाउस छोड़ते समय मैं गाड़ी में अपने इस नन्हे दोस्त को बैठा अपनी छलछलाई आँखों से इतना भर कह पाता हूँ, 'आई एम वेरी सॉरी चुन्नू! '



जहर


वह मिश्रित आबादी का एक छोटा गाँव था जहाँ बड़ी आबादी फकीरों की और शेष उत्तर भारत के हिंदीभाषी गांवों जैसी थी। पास की एक मिल में उस गांव के अधिकांश भूमिहीन लोग काम करते थे। ख़ास बात यह थी कि उस चमड़ा  मिल में महिलाओं का अनुपात पुरुषों से अधिक था। मिल का मालिक भी एक रईस फकीर था जिसका नाम जैनुल था। 


उसी मिल में उस गांव की एक फ़कीर लड़की राबिया काम करती थी। राबिया बला की खूबसूरत थी और सोलह की अपनी उम्र में कई पुरुषों से ज़्यादा जांगर रखती थी। मिल मालिक उससे बहुत खुश रहता पर पगार में अन्य कारकूनों जैसी ही निर्ममता रखता। उनसे ज्यादा एक दमड़ी भी नहीं देता।


राबिया भी असल फकीरों की तरह ही खुद्दार और जैसे को तैसा स्वभाव की मालकिन थी। वह घर से निकल सीधे अपने काम पर जाती और बांए हाथ से अपनी चोटी लहराते घर वापसी करती। रास्ते के मजनू उसे देख खूब सित्कारी छोड़ते। पर क्या मजाल कि उसके नाक पर मक्खी भी बैठ जाए।


गांव की मंजू आँटी से राबिया की खूब पटरी बैठती। दोनों अपने तीज त्यौहार मिल जुल मनातीं और बगैर एक दूसरे की सलाह लिए कोई काम नहीं करतीं। वैसे भी फकीरों की उदारता की कहानियाँ जगत प्रसिद्ध हैं और साथ ही मंजू आन्टी भी एक उदार वैष्णव महिला थीं। घर हो, बाजार हो या मन्दिर, दरगाह वे दोनों साथ साथ रहतीं। मेलजोल में करीब करीब पूरा गांव ही यकीन रखता था। गांव के एक तरफ शिवाला तो दूसरे कोने पर एक छोटी मस्जिद थी। जहां आदतन इक्का दुक्का लोग दिख जाते क्योंकि सही समझो तो पूरा गांव ही देवालय से कम नहीं था


मिल मालिक को एक और मिल बनाना था पर उसके लिए जमीन का इंतजाम नहीं हो पा रहा था क्योंकि गांव वाले उसे अपनी जमीन बेचने के लिए रजामंद नहीं थे। जैनुल अपने काम के सिलसिले में देश के पश्चिमी हिस्से जाया आया करता। एक दिन उसके दिमाग में एक आइडिया आया। उसने फकीर टोले की मस्जिद को बनवाने और उसे वृहत आकार देने का फैसला लिया। गाँव वालों को उसके जहरीले इरादे का कोई भान नहीं हुआ और उसने इस काम को अंजाम दे डाला। फिर उसने पश्चिम के ही एक घुटे मौलवी को अपने घर के पास बसा उस मस्जिद का हेड बना दिया। मस्जिद पर माइक बंध गई और वह मौलाना धीरे धीरे गांव के लोगों को कायदा कानून समझाने लगा। साल दो साल तक तो किसी ने ध्यान नहीं दिया पर धीरे धीरे कुछ और समय बीतने के साथ इसका जहर बच्चों पर असर करने लगा और अपनी तकरीरों से उसने गांव के एक हिस्से को उन्मादी बना दिया।


वैष्णवों का गांव का दूसरा हिस्सा भी कुछ दूसरे शरारती और उन्मादी तत्वों के गिरफ्त में आ कर अपना असल स्वभाव त्यागने लगा। इस तरह देखते देखते गांव का वातावरण जहरीला हो उठा।


जैनुल और दूसरे हिस्से के उन्मादी तत्व अपनी मंशा में करीब करीब कामयाब हो गए।


एक दिन राबिया ने मंजू आंटी से पूछा- 'आंटी, तुम सब काफ़िर हो ना?' दरअसल इधर कुछ समय से राबिया, आंटी से बचने लगी थी। आंटी ने कहा 'हम तो मंजू आंटी ही हैं, प्यारी, और यह जो तुम हो वह कोई और है, राबिया नहीं!,  शायद तुम्हारे मौलाना साहब?'


एक हफ़्ते बाद ही मंजू एक अटपटे एक्सीडेंट में चल बसीं और राबिया सदा के लिए उस काफ़िर आन्टी से दूर हो गई जिनके साथ मिल कभी मीठी सेवईयां खाती थी और रंगोली बना बना निहायत खुश हो जाया करती थी।


एक लंबे समयांतराल के बाद राबिया उसी गाँव में, जैनुल की दूसरी मिल बनते हुए देख रही थी और शाम के धुंधलके में मिल को बनता देख उसके बेनूर चेहरे पर आँसू की बूँदें ढुलक आई थीं। आज उसे मंजू आन्टी की बातें बेसाख़्ता याद आ रही थीं।





आलोचक


वह बड़ा ही प्यारा आदमी था। सहज, सरल, निश्छल और परदुःखकातर। जितना सरल उतना ही संजीदा और पढ़ाकू। कहते हैं कि जो इन गुणों से युक्त होते हैं उनका एक दैवीय आभामंडल बन जाया करता है। ऐसे लोगों से प्यार करने वाले जितनी संख्या में होते हैं, रश्क करने वाले भी कुछ कम नहीं।


और उसके मामले में तो यह चीज़ और भी अधिक थी क्योंकि वह दूसरे और भी फनों में उतना ही माहिर था।


किंतु उसके अर्थात देवेश के विषय में एक धारणा आम थी कि वह जहां भी होता उस जगह के लोग उसके हो जाते और जगह छोड़ते ही वह उस स्थान के लोगों को भी करीब करीब छोड़ देता था। कारण साफ था कि यदि वह ऐसा नहीं करता तो नई जगह और उस नई जगह के जीवन में पूरी तरह से उतर नहीं पाता। और किसी जगह में बिना गहरे पैठे उस जगह से सम्बंध आखिर कैसे बना पाता ?! आप दुनिया के किसी भी जगह से जब तक आत्मीय रिश्ता नहीं बना पाते पिछली जगह का भूत आपका पीछा करता रहता है।


फलस्वरूप पिछली जगह के लोग उसे मिस करने लगते और इंतहा तो तब हो जाती जब उनमें से इक्का दुक्का किसी भी विधि से उसे खोज उस नई जगह पर उससे मिलने चले आते।


धीरे धीरे ऐसे लोगों की संख्या भी सैकड़ा पार कर गयी। पर वह अपनी नौकरी से संतुष्ट, उस नई जगह में खोया ऐसे लोगों को आख़िर किस विधि इंटरटेन करे यह उसकी समझ में नहीं आता।


एक दिन वह गंगा के बालू पर बैठा कलकल बहती गंगा को मुग्ध हो निहार रहा था कि वह अपने अब तक बने बेहतरीन दोस्तों के बारे में सोचने लगा। उसने सोचा क्यों न वह उन दोस्तों में संभावनाशील दोस्तों के भी कुछ काम आ जाए ?


इस तरह  उनमें जो दोस्त उसके क़रीब आते वह उन्हें एक सहज मानवीय स्पर्श के साथ गढ़ने लगा। वह करता इतना ही कि तत्समय तद्विषयक जो भी प्रसंग उठता उसमें अपने लब्ध कौशल के अनुसार कुछ नया जोड़ उस प्रसंग को अविस्मरणीय बना देता। कभी कभी वह अपने अनोखे अंदाज में उस दोस्त की इतनी निर्मम आलोचना कर देता की उसे मानो काटो तो खून नहीं सूझने लगता।


वह कोई घोषित आलोचक नहीं था पर उसकी आलोचना की जद में जो फँस जाता वह उससे अगली बार मिलने पर एक दूसरे आदमी के रूप में दिखने लगता। कभी कभी तो यह मिलना दशकों बाद होता पर देवेश के किसी दोस्त को उससे कोई गिला नहीं होता। वह अपने चिरपरिचित मजाकिया अंदाज में हंसता, खेलता माहौल को जीवंत कर देता और दोस्तों का सारा गिला शिकवा धरा का धरा रह जाता। तभी वह बेहद संजीदा हो कुछ ऐसी मार्के की बात कहता कि वह  कुछ नितांत मौलिक चीज़ होने के एहसास दिलाती। 


दरअस्ल आलोचक देवेश इस कला में माहिर हो चला था कि पतीली को कब कितनी आँच पर चढ़ाना और फिर उसे उतार कर कितना फेंट देना है जिससे वह पदार्थ सुगन्धित और सुस्वाद्य बना रहे।


इस तरह देवेश जीवन का एक मकसद पा चुका था और सच पूछिए तो बिना सार्थक मकसद के इंसानी जिंदगी कोई जिंदगी है, जनाब?



बंगा मियां टेलर


कहाँ दूर जाऊँ। बात मेरे गाँव शेरपुर की है और उस पर बंगा टेलर की।


धुंधली सी याद बची है कि चाचा जी बताते बंगा उनके सहपाठी हुए, पता नहीं यह उन्होंने बताया था या घर के किसी और वरिष्ठ ने इसका इस कथा से कोई ख़ास मतलब नहीं।


पर पते की बात यह है कि बंगा की चर्चा चलते ही उनके कमरे से लगे हाते में चारा खाती मुर्गियां और एक लाल झिल्लर वाला फोंटियाया मुर्गा ध्यान में आ जाता जो तड़के, सुबह होने की सूचना देते दिख जाता।


अपने कमरे में पैर से चलने वाली सिलाई मशीन को धड़धड़ाते और कपड़े में खचखचाती सूई पर टकटकी बांधे बंगा ऐसे लगते मानो किसी आखरी इम्तहान में बैठे हों, ऐसे जैसे कपड़े की वह पीस उनके जीवन की आखिरी पीस बनने वाली हो।


और तभी तो गाँव के इकलौते महावीर जी का झण्डा बंगा से ही सिलवाने का सिलसिला चल निकला था।


अपने छुटपन में बंगा से ही हम बच्चे दशहरा, होली और दिवाली का कपड़ा सिलाते। घर की सबसे बड़ी दीदी, माया दीदी घर में आने वाली पत्रिकाओं से फैशन की डिजाइन दिखाती और क्या मजाल की बंगा मिंया उस डिजाइन में कुछ अपनी तरकीब लगा नित नूतन न कर दें।


लम्बी कद काठी के बंगा पैर पर जरा ऊंचे पायजामे और लंबे कुर्ते में सर पर बहुत छोटे बालों में दिख जाते। हर वक़्त गले में इंची फ़ीट का फीता लटकाए अपने काम पर मुस्तैद रहने वाले। ठुड्ढी पर गिनती के चार पांच बाल। उनका घर द्वार सब कुछ भूमिहार ब्राह्मणों की आबादी के बीचोबीच था जहां वह सुख चैन से जैसे चाहे वैसे चैन की बाँसुरी बजाते और हँसी ठठ्ठा करते सहज ही  रहते चले आए।


सन 90 के बाद मेरा विस्थापन इलाहाबाद हो गया और बंगा की तो नहीं पर उन जैसों की खोजखबर स्थानीय अखबारों से मिलने लगी। शायद वह भी विस्थापन का शिकार हुए।


पता नहीं अब बंगा मिंया कहां हैं, कैसे हैं, हैं भी या नहीं ???


पर हमारे छुटपन में खड़ी हिंदी में हमसे प्रश्न पूछते हुए वह याद आ जाते 

       'क्या नाम है?'

       'किस स्कूल में पढ़ते हैं?'

       'क्या पढ़ना अच्छा लगता है?'

        'अपने जिले का नाम बताइए?'

      'आपकी कंट्री कौन सी है?' और भी ढेरों सवाल!


बंगा मियां, अगर आप जीवित होंगे तो आज के नौनिहालों के प्रश्नों का जवाब तो देते ही होंगे। कलेजा क्या कहने को आता होगा जब वे आपसे आपके गांव, जिले या कंट्री के बारे में पूछते होंगे?


(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग्स कवि विजेन्द्र जी की हैं।)



सम्पर्क 


मोबाइल : 07985325004

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