मयंक मिश्र की कविताएं
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| मयंक मिश्र |
इस सृष्टि में छोटी हो या बड़ी, सभी की अपनी कुछ न कुछ विशिष्टताएं होती हैं। अलग बात है कि नींव के पत्थर को सब देख नहीं पाते, जिस पर पूरी इमारत ही खड़ी होती है। उसे देखने के लिए अंतर्दृष्टि की जरूरत पड़ती है। इसी तरह नुक्ता यानी कि एक बिन्दु का भी अपना महत्व है। इसके बिना शब्दों की संरचना अक्सर लड़खड़ा जाती है। अलग बात है कि यह नुक्ता प्रायः अलक्षित ही रह जाता है। लेकिन कवि की अंतर्दृष्टि से वह अलक्षित नहीं रह पाता। मयंक मिश्र नवोदित कवि हैं, लेकिन उनके पास चीजों, घटनाओं, परिस्थितियों को देखने की अंतर्दृष्टि है। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह कहा जा सकता है कि उनके पास एक कवि दृष्टि है। अपनी कविता 'नुक्ता' में वे लिखते हैं 'हिल जाती घास/ इधर-उधर/ हो जाता है वह बूंद/ ओस का/ और/ बदल जाता है अर्थ'। कवित्व के सफर में मयंक की ये प्रारंभिक कविताएँ हैं। वे यह जानते हैं कि यह सफर आसान नहीं है। फिर भी चयन तो व्यक्ति को खुद करना होता है कि उसे किस रास्ते पर आगे बढ़ना है। कबीर लिखते हैं 'सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै।/ दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥' मयंक की राह अपने पुरखे कबीर की राह है जो जागने और रोने वाली राह है। इस कवि को आगे के सफर के लिए पहली बार की तरफ से शुभकामनाएं। आइए आज पहली बार पर हम पढ़ते हैं मयंक मिश्र की कविताएं।
मयंक मिश्र की कविताएं
एक नुक्ता
इंसान होता जा
रहा है नुक्ता
आतुर है जुड़ने को
पंक्ति से
अधूरेपन के साथ।
चलती हवा के बीच
हिल जाती घास
इधर-उधर
हो जाता है वह बूंद
ओस का
और
बदल जाता है अर्थ
आश्चर्य है ये
कि
छोटा सा नुक्ता
बड़ी सी दुनिया का
बन जाता है
निर्णायक।
तुम्हारा जाना
जाना
तुम भी
जैसे जा रहा है
बसंत
खेतों के मेड़ पर
छोड़
उतरती हुई
धूप को।
सरसों में
रह गयी है
सिर्फ गंध
तुम्हारे स्पर्श की
हवा बन
रोज
झकझोर जाती है
तुम्हारी यादें।
किसान दूर खड़ा
बालियों को देखता है,
जैसे कोई प्रेमी
भीड़ में
अपने ही खोए हुए नाम को।
रुक गया
इंसान
बस जा रहा है
बसंत
रोजगार की
थकी दोपहर में
तुम्हारी जुदाई का
तपन दिये।
तुम्हारा जाना
जाना बसंत का
जैसे
प्रेम का रंग
मेरी हथेलियों से
फिसल रहा
चुपचाप।
जाना
जाना,
ऐसे हुआ उसका
जैसे नहीं होता बंद कोई
दरवाज़ा;
एक पूरी आदत के बाद
अचानक
खामोश हो जाना था।
वहीं कमरा रहा,
हवा अब भी वहीं
पर मौजूद है
एक खाली श्वेत
किरण।
हर चीज़ की
आवाज़ विकृत है
उसके जाने के बाद
ठंडी हो गयी है चाय
टिक.... टिक.... टिक
ज्यादा करती है घड़ी
तन्तु की तरह
खींचती जा रही है
शाम।
वो गया
पर नहीं आया
रोना,
क्योंकि हर चीज़
शेष बच गयी है मेरे पास
अपने अधूरेपन में।
तेज भागती
जिंदगी में
सुकून के साथ ठहरना है
उसका नाम, जो
जुबान पर आते ही
कर देता है
स्थिर मुझे।
"आदमी, बिना जूता का"
सीधे नहीं देखता है सड़क
ठंडक, पहले उसे देखती है
फिर वह पत्थर
जो पड़ चुका है शीत
अंत मे देखता है
आदत खुद की
वह
बिना जूता का आदमी है।
खुरदरे चमड़ी वाले
पैरों में ज़मी है परत
सालों की चुप्पी की
जो करती है प्रहार
हर सुबह
प्रतिश्याय हथौड़े की तरह
बिना जूता का आदमी
बिना गिनती का आदमी होता है
"सत्य और तथ्य"
दुनिया के शहरों में
शहरों के घरों में
घरों के कमरों में
कमरों में आदमी के मन में
बैठे,
ओ मेरे अकेलेपन
तुम्हें क्या चाहिए
जीवन में एकांत
कार्यो में फ्लांत
अंधेरे में जीते हो
अन्न को त्याग
विष को तुम पीते हो
कितना कठिन है
अमृत का मिलना
एक डोर में दो मन का सिलना
दाएं बाएं के चक्कर में
फंसा ये मन है
रोड के डिवाइडर पर बैठा
चुपचाप सन्न है
नदी को पार कर
है, उस ओर जाना
यही तो सत्य है
बाकी सब
तथ्य है, तथ्य है, तथ्य है।
(इस पोस्ट में प्रयुक्त पेंटिंग कवि विजेन्द्र जी की है।)
सम्पर्क
मयंक मिश्र
24 w, शिवपुर शहबाजगंज,
गोरखपुर 273014
मोबाइल : 8707811186


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